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Constitution, Law & Rights

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ब्लॉग: अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे का सवाल

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के अल्पसंख्यक दर्जे का प्रश्न संविधान की धारा 30 के अंतर्गत एक जटिल न्यायिक पहेली बना हुआ है, जिसे सुप्रीम कोर्ट की सात-न्यायाधीशों की पीठ द्वारा 1967 के अजीज बाशा फैसले की समीक्षा के माध्यम से सुलझाया जा सकता है। यह मामला तीन बार शीर्ष अदालत तक पहुंच चुका है, जिसमें 1981 के संशोधन अधिनियम और 2006 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय ने विवाद को और उलझा दिया है। केंद्र सरकार के विरोध और विश्वविद्यालय के दावे के बीच, प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणियाँ संकेत देती हैं कि न्यायालय संविधान के अल्पसंख्यक अधिकारों की व्याख्या में एक निर्णायक मोड़ लाने की ओर अग्रसर है। यह मामला न केवल एएमयू के भविष्य के लिए, बल्कि भारत में अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के संवैधानिक संरक्षण की व्यापक समझ के लिए भी महत्वपूर्ण है।

आरटीआई के आगे नहीं, पीछे देखिए

यह लेख 2019 में आरटीआई एक्ट में हुए संशोधनों की आलोचना करता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'पारदर्शिता' नीति के कारण आरटीआई की आवश्यकता कम हो गई है, लेकिन लेखक इस दावे को खारिज करते हुए संशोधनों के माध्यम से केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) की स्वतंत्रता को कमजोर करने पर प्रकाश डालता है। लेख में बताया गया है कि कैसे इन संशोधनों ने सीआईसी के संवैधानिक दर्जे और सूचना आयुक्तों के कार्यकाल व वेतन-भत्तों को केंद्र सरकार के नियंत्रण में ला दिया है, जिससे आरटीआई कानून का मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ है।