नया वर्ष 2020 की शुरूआत ही एनआरसी(राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) और सीएए(नागरिकता संशोधन एक्ट) को लेकर पहले से चले आ रहे विवादों में उछाल से हुई । एनआरसी तैयार करने का काम सबसे पहले भाजपा शासित राज्य असम से शुरू हुआ । विवादों के कारण ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट गया और असम के असली/फर्जी नागरिकों की सूची बनाने का काम सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होने के बावजूद विवादों से घिरा रहा । अभी तक विवाद जारी है, सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है ।

उसी विवाद के माहौल में केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने नागरिकता संशोधन एक्ट, 2019 संसद से दिसंबर में पारित करा लिया । इस एक्ट के पूर्वाग्रह से ग्रसित प्रावधानों को लेकर संसद के दोनों सदनों में जमकर विरोध हुआ । इसमें सिर्फ उन्हीं पड़ोसी देशों से प्रताड़ित गैर-मुस्लिमों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया, जो इस्लामी देश हैं । सीएए(नागरिकता संशोधन एक्ट) में तो स्पष्ट बताया गया कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, जैन, पारसी, बौद्ध प्रताड़ितों को नागरिकता प्रदान की जाएगी । पूरी तरह धार्मिक आधार पर तैयार किए गए सीएए के मसौदे में इन तीनों पड़ोसी देशों के इसाइयों को भी शामिल किया गया, मगर मुसलमानों को नहीं ।

सीएए लागू होने के बाद देशभर में विरोध का तूफान 2019 समाप्त होते-होते चरम पर पहुंच गया । विरोध करनेवालों में देश भर के नागरिकों के अलावे गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारें खुलकर सामने आ गयीं । यहां तक कि भाजपा और भाजपा-गठजोड़ राज्य सरकारों ने भी सीएए लागू करने में असमर्थता दिखायी । इन तमाम विराधों, असहमतियों को अनुसुनी/अनदेखी करते हुए केंद्र सरकार ने दिसंबर, 2019 के अंतिम सप्ताह में एक नया विवाद एनपीआर(नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर) ठोंक दिया । 24 दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 8,754.23 करोड़ की लागत से जनगणना कराने के प्रस्ताव को मंजूरी दी और साथ-साथ 3,941.35 करोड़ की लागत से एनपीआर को अपडेट करने के प्रस्ताव का भी अनुमोदन कर दिया । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई, जैसे होती है । उसके बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह लगातार देश की जनता को समझाए जा रहे हैं, कि एनआरसी(नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजेन्स, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) और एनपीआर(नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर) दोनों दो चीज है । प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री समेत सभी भाजपा नेता हर गोष्ठी, सम्मेलन, जनसभा में बार-बार जनता को समझा रहे हैं कि ये सारे फैसले देशहित में लिए गए हैं, किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है, विपक्ष देश को गुमराह कर रहा है ।

लोग-बाग दिग्भ्रमित हैं । समझ नहीं पा रहे हैं कि सरकार का कहना सही है कि विपक्ष क विरोध सही है । लेकिन एक बात आम लोग अच्छी तरह समझ रहे हैं कि उनकी रोजमर्रे की जिदंगी से जुड़ी किसी अहम समस्या स प्रधानमंत्री को कोई सरोकार नहीं है । प्रधानमंत्री अपने किसी भाषण में बढ़ती महंगाई, आर्थिक अराजकता, और आम आदमी के भोजन की सबसे बड़ी जरूरत प्याज की किल्लत का जिक्र कभी नहीं करते । जितने करोड़ रूपए का आवंटन जनगणना और एनपीआर के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने किया, उसके कुछ अंश से ही प्याज के लिए मारामारी, रेलवे किराए में बढ़ोतरी, गैस सिलिंडर की बढ़ी कीमत की मार से दुहरी हो रही आम जनता को थोड़ी राहत मिल जाती ।

विवाद, विरोध और प्रधानमंत्री के स्पष्टकरण के सिवाए कुछ भी टीवी, अखबारों में दिखाई नहीं देता, जिससे लोग दिग्भ्रमित हैं । क्योंकि नए साल में बढ़ते विवाद ने संघीय व्यवस्था पर भी सवाल उठा दिया । गैर-भाजपा शासित छह राज्यों ने पहले ही कह दिया था कि नागरिकता संशोधन एक्ट लागू नहीं करेंगे । इसकी शुरूआत वाममोर्चा शासित केरल से हुई और नए साल में केंद्र राज्य संबंध में विवाद का एक नया अध्याय जुड़ा । केरल सरकार ने विधान सभा से प्रस्ताव पारित कराकर सीएए को रद्द करने की केंद्र से मांग कर डाली । केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह जब बिफरे तो केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन ने 11 राज्यों के मुख्यमंत्रियों को सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने के लिए लिखा । केरल के मुख्यमंत्री ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी लिखा, जो भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे हैं । नीतीश कुमार के जद(यू) और भाजपा में सीएए को लेकर पहलेसे मतभेद है । जद(यू) ने संसद से सीएए पास कराने में भाजपा का साथ जरूर दिया, लेकिन लागू करने को नीतीश कुमार तैयार नहीं है ।

एक जनवरी को केरल के मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन और केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद आमने-सामने थे । रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जो राज्य नागरिकता संशोधन एक्ट(सीएए) लागू नहीं होने देने का दावा कर रहे हैं, उन्हें कानूनी सलाह लेनी चाहिए । केंद्रीय कानून मंत्री ने संविधान की धारा 245 के उपबंध 2 का हवाला देते हुए कहा कि राज्य संसद से पारित किसी एक्ट का विरोध नहीं कर सकते । केरल सरकार ने भी एक जनवरी को ही कहा कि राज्य विधान सभाओं के भी अपने विशेषाधिकार हैं । एक जनवरी को ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पार्टी का 22वां स्थापना दिवस सीएए के विरोध में ‘नागरिक दिवस’ के रूप में मनाया । कांग्रेस शासित मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब ने भी कह दिया है कि वे संशोधित एक्ट लागू नहीं करेंगे । पूर्वोत्तर की सभी भाजपा सरकारें इसके खिलाफ है, जहां से बाहरियों को लेकर विवाद शुरू हुआ ।

जब देशहित का मामला है, तो दो अलग-अलग जनादेशों में टकराव क्यों? नया साल आने तक सीएए 2019 के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 60 याचिकाएं दायर हो गयी थी । पांच जनवरी को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने घर-घर जन जागरण अभियान की शुरूआत की, ताकि सीएए के खिलाफ ‘गलत जानकारी’ देने की विपक्षी मुहिम का जवाब दिया जा सके । छह जनवरी को ही सुप्रीम कोर्ट में सरकार को नागरिकता संशोधन एक्ट और असम की एनआरसी पर अपना पक्ष प्रस्तुत करना पड़ रहा था । चार हफ्ते के बाद केंद्र के अटोर्नी जनरल के. के. वणुगोपाल और सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता को जवाब देना है । 1955 सीएए के खिलाफ याचिकाओं में पहले से लागू नागरिकता कानून की धारा-3 को चुनौती दी गयी है । इसी को आधार बनाकर भाजपा सरकार ने नागरिकता संशोधन एक्ट 2019 का मसौदा तैयार किया ।

भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव राम माधव ने कहा कि ‘विपक्ष ने सीएए और एनपीआर को समझा ही नहीं है । भाजपा के एक नेता गैर भाजपा राज्य सरकारों को संघीय सरकार की ताकत की याद दिलाते हुए धारा-356 के इस्तेमाल की चेतावनी दे डाली है ।

घंटों कतार में खड़े होकर वोट डालनेवाले जिन कम पढ़ लिखे वोटरों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दुबारा जनादेश मई 2019 में दिया, वे कुछ समझने की कोशिश करते हैं कि दूसरा भ्रम सोच-विचार को हाइजेक कर लेता है । घर-बाहर चर्चा हो रही है कि 1 फरवरी को संसद के बजट सत्र में पेश होने वाले आम बजट के लिए लोगों से राय मांगनेवाले नरेंद्र मोदी ने नागरिकता संशोधन लाने से पहले राय की जरूरत क्यों नहीं समझी, जो आम आदमी के अस्तित्व से सीधे जुड़ा है । एनपीआर और जनगणना की समय सीमा निर्धारित कर दी गयी है । 2020-21 तक दोनों काम पूरा होना है । जो अपने मां-बाप का जन्मस्थान, जन्मतिथि, जन्म का समय नहीं बतापाएंगे, वे संदिग्ध नागरिकों की सूची में आ जाएंगे । असम से यह काम 2013 में शुरू हुआ, जब केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी और असम में भी कांग्रेस सरकार थी । असम के वर्तमान भाजपा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ही बाहरियों की पहचान का मामला सुप्रीम कोर्ट कांग्रेस शासनकाल में ले गए । राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की अंतिम सूची की सुप्रीम कोर्ट निर्धारित डेडलाईन तारीख 31 अगस्त को प्रकाशित होने के बाद जिन 19 लाख लोगां का नाम सूची में नहीं आया, उनमें बंगाली मुसलमानों से ज्यादा हिन्दू और गोरखा निकले । इसे तैयार करने के दौरान विवादों में फंसे प्रतीक हजेला की असम सरकार से ठनी रही । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर हजेला को हटाकर हितेश देव शर्मा को एनआरसी कोऑडिनेटर बनाया गया और शर्मा को भी छह जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में कैफियत देनी पड़ी । केंद्र सरकार के अटोर्नी जनरल असम सरकार की ओर से भी पेश हुए । असम के उन 19 लाख लोगों की नागरिकता समाप्त होने का आदेश अभी तक जारी नहीं हुआ है । उनका भविष्य अधर में लटका है । विदेशी ट्राइबुनल में सूची में नाम नहीं होने की अपीलों पर सुनवाई चल रही है । अब यही स्थिति पूरे देश में बनने के आसार हैं । भाजपा शासित उत्तर प्रदेश में सीएए विरोध में हिंसा और आगजनी के कारण हाल में कई लोगों की जाने गयीं । उसके बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पांच जनवरी से सीएए लागू करने का काम शुरू कर दिया, जहां पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से आकर बसे लोग ढूंढ़े नहीं मिल रहे हैं ।