सीआईसी(केंद्रीय सूचना आयोग) के 14वें वार्षिक सम्मेलन को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘पारदर्शिता’ की ऐसी व्यवस्था निर्मित कर दी कि आरटीआई एक्ट इस्तेमाल की जरूरत कम हो गयी है । गृहमंत्री ने दावा किया कि जनता को आरटीआई(सूचना अधिकार) आवदेन देकर सूचना मांगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ रही है । क्योंकि प्रधानमंत्री ने बिल्कुल पारदर्शिता और ‘खुलेपन’ की नीति अपनायी है । यह वक्तव्य सुनने में ऐसा लगता है, माना केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) का अच्छा भविष्य है और अब इसका बोझ कम हो गया हो । जैसा केंद्रीय गृहमंत्री ने दावा किया उसके मुताबिक जब सारी सूचनाएं जनता को बिन मांगे मिल रही हैं और सरकार ने हर विभाग को ‘खुली किताब’ बना दिया, तब तो आम जनता के साथ-साथ सीआईसी को भी काफी ‘राहत’ मिली है ।
लेकिन असलियत जानने के लिए थोड़ा सा पीछे भी देखिए । उसके बाद तय करना कठिन हो जाएगा कि भाजपा गठजोड़ सरकार सीआईसी को कैसी संस्था बनाना चाहती है औ आरटीआई अधिकार वास्तव में कितना दमदार रह गया है ।
संसद के मानसून सत्र में जल्दीबाजी में विवादों के बीच आरटीआई एक्ट, 2005 संशोधन बिल जुलाई (2019) के अंतिम सप्ताह में पारित कराया गया । उसके बाद से स्पष्ट पता ही नहीं चल पा रहा है कि केंद्रीय सूचना आयोग का दर्जा क्या रह गया । केंद्रीय सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों की हैसियत आरटीआई एक्ट 2005 में क्या थी और संशोधन बिल 2019 में क्या हो गयी । 2005 में बने आरटीआई एक्ट के अनुसार सीआईसी को संवैधानिक दर्जा हासिल था या नहीं और संशोधन बिल पारित होने के बाद सीआईसी के संवैधानिक अधिकार का क्या हुआ । इन तमाम सवालों को लेकर दिग्भ्रम की स्थिति अभी तक बनी हुई है ।
आरटीआई एक्ट संशोधन बिल के निशाने पर सीधे केंद्रीय सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का पद था । सरकार को सिर्फ सीआईसी के वेतन, भत्ते, अवकाश की उम्र और फिक्स कार्यकाल वाले प्रावधानों में ऐसा संशोधन करना था, ताकि सीआईसी स्वतंत्र रूप से काम न कर सके । तात्पर्य ये कि केंद्रीय सूचना आयोग बिल्कुल सरकारी संस्था की तरह काम करे । इसके लिए आरटीआई एक्ट, 2005 के अनुच्छेद 13 और 16 में संशोधन करके सरकार ने केंद्रीय सूचना आयोग का नियंत्रण सीधे अपने हाथ में ले लिया । संशोधन बिल, 2019 के अनुसार केंद्रीय और राज्य स्तर पर केंद्रीय सूचना आयुक्त तथा सूचना आयुक्तों का फिक्स कार्यकाल समाप्त कर दिया गया । उतना ही नहीं, अब केंद्रीय और राज्यों के सीआईसी तथा सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते समेत अन्य सेवा शर्तें भी केंद्र सरकार तय करेगी ।
12 अक्टूबर को आयोजित केंद्रीय सूचना आयोग के वार्षिक सम्मेलन के अवसर पर एक विचार गोष्ठी का भी आयोजन किया गया था जिसका विषय था - ‘गांधी के विचार और सूचना अधिकार’ । राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ का सबसे महत्वपूर्ण घटक जद(यू) के राष्ट्रीय महासचिव पवन कुमार वर्मा ने इसी संशोधन पर सीधा हमला किया । उन्होंने कहा कि आरटीआई एक्ट में संशोधन से इसके पंख कतर दिए गए हैं, अब सूचना आयोग के पास वो अधिकार नहीं रहा, जिसकी बदौलत आम लोग सूचना अधिकार का इस्तेमाल करते आ रहे थे । जद(यू) महासचिव ने कहा कि आज अगर महात्मा गांधी जीवित होते तो वे इस संशोधन के खिलाफ सत्याग्रह करते । पूर्व सांसद वर्मा ने कहा - ‘जब आपने फिक्स कार्यकाल समाप्त कर दिया, जब आपने फिक्स वेतन, भत्ता प्रावधान हटाकर उसे समीक्षा का विषय बना दिया तो फिर सीआईसी की संवैधानिक हैसियत क्या रह गयी । मैं बेहद अपमानित महसूस करते हुए पूरी हिम्मत और होशो-हवास में कह रहा हूँ कि इससे कतई सहमत नहीं हूं । इस संशोधन के बाद केंद्रीय सूचना आयोग का कोई अस्तित्व नहीं रह जाएगा ।’ गौरतलब है कि जद(यू) ने जुलाई 2019 में आरटीआई एक्ट संशोधन बिल पास कराने में भाजपा का साथ दिया था ।
मूल आरटीआई एक्ट, 2005 के अनुच्छेद 13 के अनुसार सीआईसी और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल पांच साल या 65 वर्ष की उम्र तक के लिए फिक्स था । वेतन, भत्ता केंद्रीय स्तर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और राज्य स्तर पर मुख्य सचिव के समान फिक्स था । यानी कि केंद्रीय सूचना आयोग को चुनाव आयोग के समान दर्जा प्राप्त था ।
सीआईसी वार्षिक समोराह ऐसे समय में आयोजित हुआ, जब इस संस्था के वतमान और भविष्य को लेकर देश भर में सूचना अधिकार कार्यकर्ता चिंतित हैं । वे लगातार संशोधन का विरोध कर रहे हैं कि इससे तो आरटीआई का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा ।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह दोनों ने ही अपनी सरकार के ‘खुलेपन’ की दुहाई दी । गृहमंत्री का संशोधन पर दिया गया वक्तव्य गौर करने लायक है । उससे लगता है कि इसके पहले आरटोआई का दुरूपयोग हो रहा था । सीआईसी सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने का ‘नाजायज’ फायदा सूचना अधिकार कार्यकर्ताओं को तथा उनके जरिए जनता को पहुंचा रहे थे । अमित शाह ने एक ओर तो आरटीआई एक्ट, 2005 को भारत की लोकतंत्र यात्रा का माईलस्टोन बताया और दूसरी ओर यह भी कहा कि जब यह बिल पास हुआ तो इसके दुरूपयोग का अंदेशा था । अमित शाह के शब्दों में - ‘जब मैंने 2016 में आरटीआई एक्ट को पढ़ा, तो मुझे भी लगा कि इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है । आज हम कह सकते हैं कि अब आरटीआई का बहुत कम दुरूपयोग हो सकता है और इसके फायदे ज्यादा मिल सकते हैं ।
जरा और पीछे चलिए । वास्तविकता ये है कि अब सीआईसी किसी सरकारी विभाग को ऐसी कोई सूचना देने का आदेश दे ही नहीं सकते जो सरकार न देना चाहे । पहले ऐसा नहीं था । इसलिए सीआईसी को ही सीईसी का दर्जा का प्रावधान काफी सोच-विचार के बाद किया गया था । 2005 में कांग्रेस गठजोड़ सरकार को सिर्फ इस एक्ट को पास करने का श्रेय जाता है । आरटीआई बिल का मसौदा प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के निर्देश पर तैयार किया गया था । कानून, न्याय और जन शिकायत मंत्रालय से संबंध संसदीय समिति ने इस पर गहन विमर्श किया । ई.एम.एस. नचियप्पन की अध्यक्षता वाली इस संसदीय समिति क भाजपा सदस्यों में रामनाथ कोविंद, राम जेठमलानी और बलवंत आप्टे थे ।
प्रधानमंत्री कार्यालय(पीएमओ) में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह का 19 जुलाई को संसद में आरटीआई एक्ट संशोधन बिल पेश करते समय दिया गया वक्तव्य दिग्भ्रमित करनेवाला है । उन्होंने कहा कि इस संशोधन से केंद्रीय सूचना आयुक्त का दर्जा मुख्य चुनाव आयुक्त वाला और सूचना आयुक्तों का दर्जा चुनाव आयुक्तों के समान हो जाएगा, जबकि यह व्यवस्था पहले से थी । 2005 की जिस ‘त्रुटि’ की बात केंद्रीय मंत्री ने संसद में छेड़ी, वो ये थी कि सरकार को इस संबंध में ‘कोई नियम बनाने’ का अधिकार नहीं था और संशोधन के पक्ष में दलील दी कि अब सीआईसी ज्यादा ‘स्वतंत्र’ रूप से काम कर सकेगा ।
सीआईसी को स्वतंत्र और संवैधानिक मजबूती प्रदान करनेवाले संसदीय समिति के जिन सुझावों का रामनाथ कोविंद ने 2005 में समर्थन किया था, उसी को राष्ट्रपति के रूप में निरस्त करके अपनी सरकार के ‘त्रुटि सुधार’ संशोधन बिल पर उन्होंने मुहर लगा दी । पीएमओ राज्यमंत्री ने आरटीआई, 2005 के एक और प्रावधान को बेतुका बताया कि सीआईसी को सुप्रीम कोर्ट जज का दर्जा दे दिया, जबकि इसके फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है । वही स्थिति मुख्य चुनाव आयुक्त की भी है । सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयुक्तों को ‘आरटीआई’ का ‘अभिभावक’ बताते हुए कई बार कहा है कि जनता को मौलिक अधिकार देनेवाले धारा-19 के प्रावधानों का हिस्सा है आरटीआई, जिसमें बदलाव नहीं किया जा सकता ।
बकौल अमित शाह, वे 2016 से आरटीआई एक्ट का अध्ययन कर रहे थे । 2018 में सीआईसो ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिल्ली यूनिवर्सिटी से प्राप्त बीए डिग्री को चुनौती देनेवाली आरटीआई अपील पर यूनिवर्सिटी को 1978 का रिकार्ड खंगालने का आदेश दे दिया । 2018 में केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी के स्कूल सर्टिफिकेट को चुनौती देनेवाली आरटीआई अर्जी पर सीआईसी ने सीबीएसई को बोर्ड परीक्षा परिणाम सार्वजनिक करने कह डाला । अक्टूबर, 2018 में सीआईसी आर. के. माथुर पीएमओ से 2014 से 2017 के दौरान मंत्रियों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार की शिकायतों का खुलासा करने कहा। वो विदेशों से लाए गए कालेधन के घपले से संबंधित था । इतना काफी था । इसलिए 2019 में प्रचंड जनादेश के बाद सीआईसी क ‘दुरूपयोग’ पर अंकुश लगानेवाला संशोधन तो आना ही था । 2018 में ही इसका मसौदा तैयार हो गया था ।