विवादास्पद ‘देशद्रोह’ कानून की धारा 124(ए) के अंतर्गत सजा पाने के तुरंत बाद तमिलनाडु के फायरब्रांड नेता वाइको ‘ला मेकर’(सांसद) बन गए । एमडीएमके पार्टी प्रमुख वाइको तमिलनाडु से छह अन्य उम्मीदवारों के साथ राज्यसभा के लिए निर्विरोध चुन लिए गए ।
श्रीलंका का विद्रोही गुट लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल इलम(लिट्टे) पर भारत में अभी-भी प्रतिबंध है । एक जमाने में तमिलनाडु के सबसे लोकप्रिय नेता वाइको कट्टर लिट्टे समर्थक रहे हैं । लिट्टे समर्थन ही उनका चुनावी मुद्दा रहा है । 2009 में जब श्रीलंका सरकार लिट्टे और उसके संचालक प्रभाकरन का सफाया अभियान चला रही थी, उस समय वाइको ने भारत सरकार को चेतावनी दी थी । क्योंकि भारत सरकार श्रीलंका को हथियार देकर सहयोग कर रही थी । मनमोहन सिंह के नेतृत्ववाली कांग्रेस गठजोड़ सरकार को वाइको ने खुलेआम धमकी दी थी कि अगर भारत एक ही एकीकृत राष्ट्र बना रहना चाहता है तो श्रीलंका सरकार को लिट्टे के खिलाफ सहायता देना बंद करे । 2009 में तमिलनाडु में द्रमुक नेता एम. करूणानिधि मुख्यमंत्री थे, जिनका कांग्रेस से गठजोड़ था । वाइको ने सार्वजनिक सभा में पुस्तक विमोचन समारोह आयोजित करके ‘अलग तमिल इलम(राष्ट्र)’ विषय पर ही यह वक्तव्य दिया । द्रमुक सरकार ने तुरंत वाइको के खिलाफ आईपीसी की धारा 124(ए) के अंतर्गत ‘देशद्रोह’ का मामला दर्ज किया । चेन्नई के एक थाने में वाइको के खिलाफ 153(ए) का भी मामला बनाया गया । आईपीसी की यह धारा धर्म, जात, जन्म, भाषा, आवास के आधार पर विभिन्न गुटों में दुश्मनी पैदा करने के मामले में लगायी जाती है ।
वाइको के खिलाफ आरोपपत्र तो पुलिस ने 2009 में ही दर्ज किया, मगर उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया । केंद्र में भाजपा गठजोड शासनकाल में अप्रील, 2017 में वाइको की गिरफ्तारी हुई । एक महीना के बाद वाइको जमानत पर जेल से छूटे । उस वक्त द्रमुक और लिट्टे विरोधी जयललिता मुख्यमंत्री थी ।
अभी अर्थात् जुलाई, 2019 का प्रसंग और भी गौर करने लायक है । चेन्नई की स्पेशल कोर्ट जज जे. शांति ने पांच जुलाई को उस समय वाइको को देशद्रोह के आरोप में एक साल कैद की सजा सुनायी, जब वाइको का राज्य सभा के लिए पर्चा तैयार था । जज ने वाइको पर 10,000 का जुर्माना भी लगाया । स्पेशल कोर्ट जज शांति ने कहा कि मामूली सजा दी जा रही है, जो इन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा । उसके जवाब में वाइको ने कड़ी से कड़ी सजा की एक प्रकार से चुनौती दी । जज ने वाइको के बिना मांगे सजा की तामीली पर एक महीने की रोक लगा दी, ताकि वे उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकें । जिस आरोपित को देशद्रोह की धारा 124(ए) में अभियुक्त होने का शान है और जिसने जमानत भी नहीं चाही थी, वो भला इस सजा को चुनौती देने क्यों जाए । चेन्नई के राजनीतिक हलकान में चर्चा थी कि जज ने नरम रवैया इसलिए अपनाया, क्योंकि वाइको का सांसद बनना निश्चित था । वाइको ने अपनी किताब का नाम ही रखा हुआ है, ‘मैं अभियोगी’ । इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को उनकी लिट्टे नीति के खिलाफ 2009 में लिखे गये पत्रों का ब्योरा है और साथ में धमकी भी है कि श्रीलंका सरकार को सहायता जारी रही तो भारत का एकीकृत रहना कठिन हो जाएगा ।
सजा होने के बावजूद वाइको को जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के अनुच्छेद 8(1) के अंतर्गत संसद सदस्य(ला मेकर) बनने में कोई दिक्कत नहीं हुई । चुनाव आयोग को ‘देशद्रोह’ से कोई लेना-देना नहीं है । संविधान से चुनाव आयोग को सिर्फ इतना ही अधिकार प्राप्त है कि दो साल या उससे ज्यादा समय का सजायाप्ता रिहाई के बाद छह साल तक चुनाव लड़ने से अयोग्य हो जाएगा, चाहे अपराध कैसा भी क्यों न हो ।
वाइको वाली घटना ऐसे समय में सामने आयी है, जब देशद्रोह कानून का राजनीतिक इस्तेमाल लगातार विवाद के घेरे में है । नरेंद्र मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा गठजोड़ सरकार को ‘देशद्रोह’ कानून पर स्थिति स्पष्ट करना संभव नहीं हो पा रहा है ।
2019 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गठजोड़ दूसरी बार सत्ता में आयी । नयी लोकसभा का पहला सत्र चल रहा है । इस सत्र में ‘देशद्रोह’ कानून की इस धारा 124(ए) को खत्म करने की दोनों सदनों में जोरदार मांग उठी । उसके जवाब में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी. किशन रेड्डी ने साफ कह दिया कि देशद्रोह कानून खत्म नहीं किया जाएगा । उसी समय तमिलनाडु से वाइको वारदात सामने आयी । ‘देशद्रोह’ का आरोपी सजा होने के बावजूद ‘ला मेकर’ हो गया, जिसे सत्ता के विरोध में बोलने से रोका नहीं जा सकता । सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलने के कारण जेल में नहीं डाला जा सकता । दूसरो तरफ दर्जनों सामाजिक मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक, वकील, पत्रकार, इतिहासकार ‘सत्ताद्रोह’ के कारण देशद्रोह का जुर्म झेल रहे हैं । उन्हें ‘शहरी नक्सली’, नक्सल समर्थक कहकर गिरफ्तार किया गया । अगस्त, 2018 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने ‘देशद्रोह’ कानून के राजनीतिक इस्तेमाल पर तल्ख टिप्पणी की - ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद सेफ्टी वाल्व की तरह होते हैं, अगर उन्हें रोका गया तो प्रेशर कूकर फट जाएगा’ महाराष्ट्र सरकार और केंद्र सरकार ने ‘देशद्रोह’ के आरोपी जिन ‘शहरी नक्सलियों ‘की जमानत का विरोध किया, वे हैं - कवि वारावारा राव, वकील सुधा भारद्वाज, बर्नोन गोंजाविल्स, अरूण फररिया और गौतम नवलखा । इनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने वाले बुद्धिजीवी थे - प्रसिद्ध इतिहासकार रामिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक, देवकी जैन, समाजशास्त्री सतीश देशपांडे और मानवाधिकार वकील माजा दारूवाला । 29 अगस्त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट से बाहर निकलकर रोमिला थापर ने देशद्रोह की परिभाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा का विरोध करनेवाले क्या ‘देशद्रोही’ हैं? आम बुद्धिजीवियों में ये छवि बन रही है कि देशद्रोह कानून का इस्तेमाल अभिव्यक्ति पर रोक लगाने के लिए किया जा रहा है । गत हफ्ते 16 विपक्षी पार्टियों ने राज्यसभा के सभापति एम. वेंकैया नायडू को नोटिस देकर कहा कि मान्यता प्राप्त पत्रकारों को वित्त और वाणिज्य मंत्रालय तक पहुंचने पर रोक है। ऐसा पहले नहीं था ।
तमिलनाडु का हालिया घटनाक्रम एक रिकार्ड है । तमिल पत्रिका ‘नखोरन’ के संपादक आर. गोपाल की गिरफ्तारी भी विवाद के घेरे में है । उन्हें आईपीसी की धारा 124 के अंतर्गत गत वर्ष 9 अक्टूबर को गिरफ्तार किया गया । यह धारा भी देशद्रोह कानून से मिलती-जुलती है, जिसमें राष्ट्रपति, राज्यपाल जैसे पदों पर आसीन व्यक्ति के खिलाफ टिप्पणी पर कार्रवाई का प्रावधान है । पत्रकार आर. गोपाल ने तमिलनाडु के राज्यपाल बनवारी लाल पुरोहित के खिलाफ टिप्पणी छाप दी । आर. गोपाल ने अपने खिलाफ मुकदमे को मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी । मद्रास हाईकोर्ट ने 4 जून, 2019 को अंतरिम राहत देते हुए संपादक आर. गोपाल के खिलाफ निचली अदालत में चल रही सुनवाई पर रोक लगा दी । सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एस. ए. नजीर और आर. सुभाष की पीठ ने 12 जुलाई को मद्रास हाईकोर्ट के आगे की कार्यवाही पर रोक तो लगा दी । लेकिन सुप्रीम कोर्ट पीठ को यह टिप्पणी ध्यान देने योग्य है - ‘आजादी के बाद से पहली बार ऐसा मामला सामने आया है ।’
देशद्रोह कानून को लेकर शीर्ष कोर्टों की भी आम राय नहीं है, जो आजादी से पहले का है । इसका राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है । मगर इतना ज्यादा विवाद पहले कभी नहीं हुआ, जब ‘देशद्रोह’ के अंदर डाले जानेवाले मामले को लेकर सवाल उठ रहे हैं ।
मानवाधिकार कार्यकर्ता डा. बिनायक सेन ने छत्तीसगढ़ सरकार के नक्सल दमन के लिए लोगों को हथियार देकर नक्सली बनानेवाले ‘सलवा जुडूम’ अभियान के विरोध में वर्षों ‘देशद्रोह’ के जुर्म में जेल काटी । 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने बिनायक सेन को जमानत देकर इस आरोप से बरी किया ।
तमिलनाडु की दो और घटना महत्वपूर्ण है । 2015 में मुख्यमंत्री जयललिता ने लोकनायक एस. कोवन को ‘देशद्रोह’ के जुर्म में बंद कर दिया । क्योंकि उसने गांव-गांव में शराब के सरकारी ठेके का विरोध किया । मद्रास हाईकोर्ट से जमानत मिली ।
57 वर्ष पहले दमुक संस्थापक सी. एन. अन्नादुरई ने राज्यसभा में कहा - ‘द्रविड़ों को आत्मनिर्णय और दक्षिण भारत में अलग देश बनाने का अधिकार है । उनके खिलाफ देशद्रोह का मामला नहीं बना । उसी पार्टी से निकल वाइको ‘देशद्रोह’ में सजा पाने के बाद राज्यसभा सदस्य बन ।