केंद्रीय जांच ब्यूरो(सीबीआई) के पास अगर संविधान सम्मत अधिकार होता तो कोलकाता पुलिस से पंगा की नौबत नहीं आती और संघीय व्यवस्था पर खतरे की बात नहीं उठती । कोलकाता पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने गयी सीबीआई टीम को जब स्थानीय पुलिस ने हिरासत में ले लिया तो सीबीआई सुप्रीम कोर्ट गयी और पश्चिम बंगाल सरकार ने पुलिस कमिश्नर से पूछताछ करने की सीबीआई कार्रवाई को कलकता हाईकोर्ट में चुनौती दी । सीबीआई की ओर से केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के जरिए कोलकाता पुलिस कमिश्नर के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई के साथ-साथ अवमानना का भी मामला बनाना चाहा । मगर सफलता नहीं मिली । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने पुलिस कमिश्नर को सीबीआई के सामने कोलकाता से बाहर पेश होने का आदेश दिया और उसके लिए शिलांग कोर्ट तय कर दिया।

इस आदेश के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने अपना अनशन तोड़ा, जो उन्होंने केंद्र सरकार के खिलाफ शुरू किया । केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और दीदी दोनों ने ही इसे ‘नैतिक जीत’ बताया । पश्चिम बंगाल और देशभर के मतदाता समझे नहीं कि यह दोनों पक्षों में से किसकी जीत किसकी हार है और नैतिक है या राजनीतिक । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दीदी के सियासी बैर से उपजा यह हाईवोल्टेज ड्रामा पूरी तरह राजनीतिक है, संविधान और संघीय व्यवस्था की दुहाई सिर्फ चुनावी मकसद से दी गयी। इसमें मोहरा बन गयी सीबीआई और ऐसे समय में सीबीआई की ढांचागत बनावट की फजीहत हुई, जब सीबीआई के अंदर ही घमासान मचा हुआ था । सीबीआई की अंदरूनी बनावट सरकारी एजेंसी की तरह बनाए रखने को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की पुरानी तकरार अपने चरम पर थी । सीबीआई के पास जो भी अधिकार हैं, वो सरकार/सत्ता सम्मत है, संवैधानिक और कानून सम्मत नहीं । इसलिए सीबीआई केंद्र सरकार के टूल की तरह इस्तेमाल होती है । कहने के लिए सीबीआई ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ जांच एजेंसी है, लेकिन इसके पास वैसे अधिकार नहीं है, ताकि स्वतंत्रतापूर्वक अपना काम कर सके । क्योंकि सीबीआई का गठन ऐसी संवैधानिक संस्था के रूप में नहीं हुआ है, जिसका संविधान सम्मत कानूनी अधिकार हो । इसलिए कांग्रेस शासनकाल में जो सीबीआई भाजपा के लिए कांग्रेस जांच ब्यूरो थी, वही सीबीआई अभी बीसीआई(भाजपा जांच ब्यूरो) के आरोप झेल रही है । सीबीआई की इसी बनावट के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को ‘सरकार की भाषा बोलने वाला पिंजरे का तोता’ कहा था । आज सीबीआई को अपनी छवि बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मदद लेनी पड़ती है । कोलकाता पुलिस कमिश्नर 31 जनवरी को चुनाव आयोग की बैठक में शामिल नहीं हुए । मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव तैयारियों का जायजा लेने चुनाव आयोग की पूरी टीम कोलकाता पहुंची थी, जिसमें कानून और व्यवस्था से जुड़े सभी वरिष्ठ अधिकारियों को चुनाव आयोग के साथ बैठना अनिवार्य है । कोलकाता पुलिस कमिश्नर बैठक में नहीं शामिल हुए तो उनसे चुनाव आयोग ने केंद्रीय गृह मंत्रालय को स्पष्टकरण मांगने कहा । चुनाव आयोग को ऐसा करने का अधिकार संविधान से प्राप्त है और इसे किसी अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती । लेकिन कोलकाता पुलिस आयुक्त राजीव कुमार राज्य सरकार के मुलाजिम है । जाहिर है कि सरकार की मर्जी के अनुकूल उन्होंने चुनाव आयोग की परवाह नहीं की और सीबीआई से बचाने के लिए मुख्यमंत्री स्वयं उनके आवास पर पहुंच गयीं । सीबीआई ऐसी स्थिति में कोई कार्रवाई कर सकती है या नहीं, इसका जवाब कानून में नहीं है । सीबीआई के संयुक्त निदेशक पंकज श्रीवास्तव ने कहा - ‘हम पुलिस प्रमुख के आवास पर जांच के लिए पहुंचे, अगर वे हमारा सहयोग नहीं करते तो हम उन्हें हिरासत में लेते ।’ लेकिन हुआ उसका ठीक उल्टा । तीन फरवरी को सीबीआई अधिकारियों को ही पुलिस पकड़कर थाने ले गयी और उन्हीं लोगों से पूछताछ करने के बाद उनकी रिहाई हुई । संयुक्त पुलिस आयुक्त(अपराध) प्रवीण त्रिपाठी के अनुसार सीबीआई अधिकारी एक ‘गुप्त अभियान’ के लिए आए थे । सीबीआई अधिकारियों के बचाव में केंद्रीय पुलिस बल भेजे गए । ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि सीबीआई के पास किसी भी हाई प्रोफाईल मामले की जांच के लिए पर्याप्त कानूनी अधिकार नहीं है। इस प्रकरण पर संसद में हंगामा हुआ और केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने इसे संघीय व्यवस्था के लिए ‘खतरनाक कदम’ बताया । तीन फरवरी को ही कोलकाता से एक अपुष्ट खबर आयी कि पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश कर डाली । राज्यपाल ने केंद्र को राज्य के हालातों पर जो रिपोर्ट भेजी, उसके बाद का हंगामा तब शांत हुआ, जब सुप्रीम कोर्ट ने पांच फरवरी को कोलकाता पुलिस आयुक्त से सहयोग करने कहा । कद्र सरकार ने इसे राज्य में संवैधानिक प्रणाली फेल होना बताया । जिस सीबीआई कार्रवाई के कारण इतना तमाशा हुआ, उसे खुद संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है । सीबीआई केंद्रीय कार्मिक और जनशिकायत मंत्रालय (डीओपीटी) के अधीन काम करती है । जनवरी में जब सीबीआई के अंदर उठापटक मची थी और केंद्र सरकार को बार-बार सुप्रीम कोर्ट में स्पष्टीकरण देना पड़ रहा था, उसी समय ममता बनर्जी ने कहा कि वे सीबीआई को अपने यहां प्रवेश नहीं करने देंगी । उसके बाद आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू ने भी कहा कि वे सीबीआई को अपने राज्य में कदम नहीं रखने देंगे । दीदी का अनशन तुड़वाने के लिए भी नायडू कोलकाता पहुंचे हुए थे । कानून और व्यवस्था राज्य का महकमा है, उसमें संघीय सरकार दखल नहीं दे सकती । पश्चिम बंगाल सरकार की दलील है कि सीबीआई बिना वारंट के पुलिस आयुक्त को गिरफ्तार करने पहुंची । सीबीआई ने राज्य में घुसने का अधिकार किस कानून से प्राप्त किया । सीबीआई दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 1946 के तहत अधिकार प्राप्त करती है । इस एक्ट को ही संवैधानिक/कानूनी दर्जा हासिल नहीं है । इसलिए सीबीआई किसी राज्य सरकार के मामले में सरकार की मर्जी के बगैर दखल नहीं दे सकती । सीबीआई की निष्पक्षता तो कई वर्षों से संदिग्ध बनी हुई है । इसलिए 2011 में 2जी स्पेक्ट्रम और कोलगेट ब्लॉक आवंटन घोटाले में कई मंत्रियों के खिलाफ सबूत मिटाने के कारण सुप्रीम कोर्ट को सीबीआई की मानीटरिंग अपने हाथ में लेनी पड़ी । 6 नवंबर, 2013 को गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की खंडपीठ ने सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया । उस वक्त घोटालों में फंसे केंद्रीय मंत्रियों को क्लीन चिट देने की कथित साजिश के कारण सीबीआई सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में थी । इस फैसले से मची अफरातफरी के कारण केंद्र सरकार ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी और सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम ने अर्जी तुरंत सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली । चीफ जस्टिस ने कोर्ट का समय समाप्त होने के बावजूद अपने आवास पर सरकार की दलील सुनी और तत्काल स्टे दे दिया । सीबीआई का अस्तित्व अधर में लटका हुआ है और स्टे पर यह कानूनी कार्रवाई कर रही है । गुवाहाटी हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले पर स्टे देनेवाले चीफ जस्टिस को इसका राजनीतिक लाभ मिला और वे चीफ जस्टिस जैसे सर्वोच्च पद की गरिमा को ताक पर रखकर केरल के राज्यपाल बन गए । राज्यपाल का पद हाईकोर्ट चोफ जस्टिस के समकक्ष माना जाता है । सुप्रीम कोर्ट जज जे. चलमेश्वर नवंबर, 2018 में रिटायर होने के बाद कहते गए कि सीबीआई का कोई संविधान सम्मत कानूनी ढांचा नहीं है । 70 वर्षों से अराजक स्थिति है । कानून और व्यवस्था में सीबीआई को घसीटने का कोई संवैधानिक आधार बनता नहीं है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सीबीआई को कामचलाऊ निदेशक की बदौलत चलाना चाहते थे । दो साल का कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट ने तय किया हुआ है । अभी सुप्रीम कोर्ट के दवाब में सरकार को निदेशक का चयन करना पड़ा, वर्ना कामचलाऊ निदेशक एम. नागेश्वर राव की बदौलत काम चलता रहता । ताजा बंगाल घमासान के दौरान सीबीआई को संवैधानिक कानूनी दर्जा देने के संबंध में संसद में पूछे गए एक सवाल के जवाब में केंद्रीय कार्मिक राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने कहा कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है । 15000 करोड़ के जिस चिटफंड घोटाले में ममता बनर्जी की पार्टी के सांसद, विधायक और उनकी सरकार में कार्यरत अधिकारियों के फंसे होने के कारण इतना बवेला मचा, उस कानून में संशोधन का फैसला केंद्रीय मंत्रिमंडल

मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति ने सीबीआई को एक अलग ‘स्टेच्यूट’ का दर्जा देकर कानूनी अधिकारों से लैस करने का सुझाव दिया था । वह सुझाव डंप पड़ा है । तभी तो दीदी ने सीबीआई को नरेंद्र मोदी की ‘कांस्पीरेसी ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन’ का नाम दिया । कानून व व्यवस्था का हवाला देकर दीदी भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को रथयात्रा रैली नहीं करने देती । कलकता हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भाजपा की मदद नहीं कर पायी । नरेंद्र मोदी, राजनाथ सिंह दोनों ने ही दो फरवरी को अलग-अलग स्थानों पर जनसभाओं को संबोधित किया और सीबीआई रात भर कोलकाता में छापेमारी करती रही ।