दंगा, खूनखराबा और लागू होने की मुश्किलों जैसें विवादों में फंसे नागरिकता संशोधन कानून, 2019 को लेकर दिग्भ्रमित स्थिति में ताजा झमेला अफगानिस्तान में राजनीतिक संकट को लेकर पैदा हुआ है । भाजपा अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा अफगानिस्तान से भागकर आए अल्पसंख्यक हिन्दुओं और सिखों को नागरिकता प्रदान करने के इंतजार में हैं । केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी भाजपा अध्यक्ष की तर्ज पर उसी बात को ध्यान में रखकर नागरिकता संशोधन कानून(सीएए), 2019 की तारीफ कर डाली । वो भी वैसे समय में, जब केंद्र सरकार इस कानून को लागू करने के नियम नहीं बना पा रही है । इस कानून के लागू होने से लेकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर बनाने का मामला असम से ही विवाद के घेरे में आया और सुप्रीम कोर्ट भी दो साल से किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पायी है ।

जो नागरिकता संशोधन कानून 2019 में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने बनाया और 10/01/2020 को लागू किया उसके कार्यान्वयन के लिए केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने संसद के गत मानसून सत्र में 27/07/2021 को चौथी बार समय मांगा । लेकिन उसके पहले मई, 2021 में नागरिकता कानून, 1955 के प्रावधानों का इस्तेमाल करके केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पड़ोसी देशों से आए अल्पसंख्यकों(मुसलमान छोड़कर) को नागरिकता प्रदान करने की अधिसूचना जारी कर दी। जबकि इसी इरादे से नागरिकता कानून, 1955 में संशोधन करके सीएए 2019 लाया गया ।

असम में रह रहे बांग्लादेशियों को लेकर नागरिकता विवाद खड़ा हुआ, जहां सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में तैयार राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर(एनआरसी) का झमेला उसके पहले से नहीं सुलझ पाया है । 31/07/2018 को छपे ड्राफ्ट एनआरसी और एक साल बाद 31/08/2019 को छपी पूरी एनआरसी के बावजूद 19 लाख लोगों का भविष्य अधर में लटका हुआ है । असम निवासी अपने को ‘नागरिक’ साबित करने के लिए ट्रिब्यूनल से लेकर गुवाहाटी हाईकोर्ट का चक्कर लगा रहे हैं। डी(डाउटफुल, संदिग्ध) लोग अभी तक संदेह के घेरे में ही हैं । उनके लिए बने ‘डिटेंशन सेंटर’ का नाम बदलकर असम के नए मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने ‘ट्रांजिट कैंप’ कर दिया । मुख्यमंत्री बनते ही मई, 2021 में वे फिर सुप्रीम कोर्ट गए । लेकिन इस चक्की में पिस रहे लाखों लोगों को नारकीय हालत में छोड़कर केंद्र सरकार ने नया बखेड़ा खड़ा कर दिया । सीएए लागू करना संभव नहीं हो पा रहा है । उसी संशय और अनिश्चय के माहौल में केंद्र सरकार ने अपना राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए दूसरा कार्ड मई, 2021 में खेला । इस मामले को भी सुप्रीम कोर्ट ने चुनौती देना तय था और वैसा हुआ भी । केंद्र सरकार की ओर से उस पर सुप्रीम कोर्ट में दिया गया जवाब बड़ा रोचक है ।

पांच राज्यों के 13 जिलों के लिए एक राजपत्र अधिसूचना 28 मई को जारी की गयी, जिसमें पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदायों से नागरिकता के लिए आवेदन मांगा गया । अधिसूचना के अनुसार जिला कलक्टरों और राज्य के गृह सचिवों को अल्पसंख्यक समुदायों के आवेदन स्वीकार करने, जांच करने और उनके नागरिकता आवेदनों को मान्यता देने के अधिकार दिये गए । केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह आदेश नागरिकता कानून, 1955 और नागरिकता नियम 2009 के अंतर्गत जारी किया । विवादित नागरिकता संशोधन कानून, 2019 लागू करने के नियम बनाने का कार्यक्रम टालने और उसके लिए समय-सीमा बढ़ाते रहने का सरकार मन बना चुकी है । लागू होने से पहले ही सीएए पूरे देश में विवाद, दंगा, फसाद का कारण बना और इसका विरोध करनेवाले राजद्रोह/देशद्रोह क जुर्म में जेल में डाल दिए गए । लगभग सभी राज्यों की विधान सभाओं से सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित हो चुका है । असम के बाद दिल्ली वासियों ने सबसे ज्यादा सीएए हिंसा का खामियाजा भुगता । 2020 में महीनों तक चला धरना और उसे भाजपा नेताओं द्वारा दंगा, फसाद का रंग दिया जाना राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लिए ऐतिहासिक है । सीएए का विरोध करनेवाले कई सामाजिक, मानवाधिकार कार्यकर्ता अभी तक ‘राजद्रोह’ के जुर्म में गैरकानूनी गतिविधियां रोक कानून(यूएपीए) के अंतर्गत दिल्ली की जेलों से छूट नहीं पा रहे हैं। किसी पुख्ता सबूत के बिना ही दिल्ली पुलिस निचली अदालतों से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक उनकी जमानत का विरोध करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है । छोड़े से ‘राजद्रोही’ जेल से छुट पाए हैं ।

28 मई, 2021 को अधिसूचना में गुजरात, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा और पंजाब में रह रहे वैसे हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई समुदायों से ऑनलाइन नागरिकता आवेदन मांगा गया, जो पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से आए हैं । इस अधिसूचना को इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग(आईयूएमएल) ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । शीर्ष कोर्ट की नोटिस के जवाब में हलफनामा दायर करके केंद्र सरकार ने नागरिकता कानून, 1955 की सेक्शन 16 का हवाला देते हुए कहा कि यह सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है और नागरिकता अधिसूचना को ‘रूटीन’ बताया । अधिसूचना के अनुसार अल्पसंख्यकों की सूची में मुसलमान शामिल नहीं हैं । केंद्र सरकार ने शीर्ष कोर्ट में दिये गए हलफनामें में 14 जून को सफाई दी कि इस अधिसूचना का सीएए से ताल्लुक नहीं है । जून में अफगानिस्तान का उथल-पुथल अपने चरम पर था, जब केंद्र सरकार ने ऐसी अधिसूचना जारी करने और सीएए, 2019 लागू करने के नियम बनाने का काम टालने की योजना बना चुकी थी । ऐसा करना तो सरकार की संवैधानिक लाचारी है । क्योंकि सीएए, 2019 की संवैधानिकता को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है और शीर्ष कोर्ट इस पर कोई निर्णय नहीं ले पायी है । 13 मई को असम के एनआरसी कोऑर्डिनेटर हितेश शर्मा और नए मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की । अपील के अनुसार पूरी एनआरसी छपने के दो साल गुजर जाने के बावजूद एनआरसी की ड्राफ्ट सूची की भी जांच का काम पूरा नहीं हो पाया है । एनआरसी का मामला बांग्लादेश से आकर बसे अवैध प्रवासियों की वजह से सुप्रीम कोर्ट असम के पूर्व भाजपा मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ही ले गए थे । आज की तारीख में असम के विदेशी ट्रिब्यूनल किसी का आवेदन ठुकराने का आदेश जारी करने की स्थिति में नहीं हैं । 3.3 करोड़ आवेदन लंबित हैं और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में तैयार एनआरसी सूची से 19 लाख लोग बाहर हैं । ट्रिब्यूनलों के अस्तित्व को लेकर केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट में ठनी हुई है । असम से प्राप्त एक ताजे मामले से यही क्लियर नहीं होता कि ट्रिब्यूनलों की हैसियत क्या है और किस आधार पर वे किसी को नागरिक मानने या न मानने का फैसला कर सकते हैं । गुवाहाटी में विदेशियों का निबटारा करनेवाले ट्रिब्यूनल(एफटी) ने एक डी(संदिग्ध) को भारतीय घोषित करके अगस्त, 2019 एनआरसी को ‘फाइनल’ बता दिया । जबकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाने से पहले स्टेट कोऑर्डिनेटर ने 2020 में गुवाहाटी हाईकोर्ट में दायर हलफनामे में 2019 एनआरसी सूची को ‘फाइनल’ नहीं ‘सप्लीमेंटरी’ बताया । राज्य कोऑर्डिनेटर और राज्य सरकार दोनों ने सुप्रीम कोर्ट में इसकी फिर से जांच की अपील की है ।

13 सितंबर को असम सरकार के उपसचिव राजनीतिक(बी) विभाग पारिजात भुयन ने लिखित आदेश में एफटी को हिदायत दी कि राष्ट्रीयता तय करने का आदेश जारी न किया जाए । उसी दिन गुवाहाटी हाईकोर्ट ने एक एफटी को आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें मोरीगांव वाशिंदा एक असमिया मुसलमान को विदेशी घोषित कर दिया गया था ।

लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और उससे भी ज्यादा अफगानिस्तान से आकर बसे गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने पर तुली है । सीएए, 2019 में भी पड़ोसी देशों से आए या आनेवाले जिन अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान दिया गया है, उनमें मुसलमान शामिल नहीं हैं । सुप्रीम कोर्ट में सरकार ने नागरिकता कानून, 1955 के हवाले से 28 मई, 2021 की अधिसूचना को ‘रूटीन अधिकार इस्तेमाल प्रक्रिया’ बताया । प्रश्न उठता है कि जब 1955 के कानून से सरकार का राजनीतिक मकसद पूरा हो रहा था तो सीएए, 2019 लाने की क्या जरूरत थी । 2018 में भी केंद्र सरकार ने छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान तथा गृह सचिवों को ऐसे ही आवेदन मंगाने तथा उसे मंजूर करने के अधिकार दिए थे । सीएए, 2019 लागू करने के नियम तय करने के लिए लोकसभा और राज्य सभा में समितियां बनी हुई हैं । इनमें राज्यों से चुनकर आए सभी दलों के सदस्य हैं, जिन्होंने संसद में इस बिल का विरोध किया था और जिनके राज्यों की विधान सभा इसे ठुकरा चुकी है, इसलिए जुलाई, 2021 को लोकसभा में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने 09/01/2022 तक की ‘डेडलाईन’ मांगी । असम से जीते कांग्रेस सदस्य गौरव गोगोई ने सरकार को याद दिलाया कि इसके पहले 09/07/2021 तक की डेडलाईन सरकार ने संसदीय समितियों से मांगी थी । 02/02/2021 को 9 अप्रैल तक की और फिर 9 जुलाई तक की डेडलाईन केंद्र सरकार मांग चुकी है । लेकिन नागरिकता नियम, 2009 का राजनीतिक इस्तेमाल जारी है । सेना शासित बौद्ध देश म्यांमार से प्रताड़ित होकर भारत में शरण लेने आये अल्पसंख्यक रोहिंगिया मुस्लिम नागरिकता के लिए आवेदन नहीं कर सकते ।