सूचना का अधिकार(आरटीआई) 2019 में लगभग पूरे वर्ष विवाद के घेरे में रहा है । 2019 समाप्त होते-होते सुप्रीम कोर्ट की दो टिप्पणियां कई महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित करनेवाली हैं ।

सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एस. ए. बोबड़े ने सूचना अधिकार के कथित दुरुपयोग पर गत हफ्ते तीखी टिप्पणी की । उन्होंने कहा कि आरटीआई के कई मामले ब्लैकमेल और वसूली वाले पाए गए हैं । चीफ जस्टिस एस. ए. बोबड़े की अध्यक्षता वाली पीठ ने सूचना अधिकार कानून के ‘दुरूपयोग’ बढ़ने की आशंका जतायी और चेताया कि इस संबंध में दिशानिर्देश जारी करना पड़ सकता है । इस पीठ के अन्य जज हैं - जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस सूर्यकांत । आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज की याचिका पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने यह टिप्पणी की । याचिकाकर्ता की आर से पेश वरि’ वकील प्रशांत भूषण की दलील पर सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि पहले भी शीर्ष कोर्ट ने इस स्थिति के खिलाफ चेतावनी दी है कि 75% सरकारी कर्मचारियों का 75% समय आरटीआई आवेदनों से मांगी गयी जानकारी का जवाब देने में गुजरता है । दूसरी ओर यह बात भी सहो है कि सूचना अधिकारी आरटीआई सवालों का जवाब देने से कतराते हैं । जो भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उसस यह बात प्रभावित होती है कि जन सूचना अधिकारी आरटीआई आवेदनों का किस तरह जवाब देते हैं ।

सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका केंद्र को यह निर्देश देने के लिए दायर की गयी थी कि इस वर्ष के आरंभ में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के लिए दिए गए शीर्ष कोर्ट के निर्देश को और देरी किए बगैर लागू करे । सुप्रीम कोर्ट ने इस अर्जी को स्वीकारा और केंद्र तथा राज्य सरकारों से तीन महीने के अंदर रिक्त पद भरने कहा । शीर्ष कोर्ट ने केंद्र को यह भी निर्देश दिया कि केंद्रीय सूचना आयोग के सूचना आयुक्तों के चयन के लिए खोज कमिटी के सदस्यों के नाम ऑफिशियल वेबसाईट पर दो हफ्ते के अंदर अपलोड किए जायें ।

प्रशांत भूषण ने अपनी दलील में कहा कि ‘सूचना आयुक्तों की नियुक्ति न होना आरटीआई एक्ट को हतोत्साहित करने का स्पष्ट प्रयास है ।’ इसके जवाब में खुद चीफ जस्टिस बोबड़े ने कहा कि आरटीआई एक्ट जिस तरह से काम कर रहा है, उसके कुछ पहलू चिंता का विषय है - ‘एक प्रकार की आशंका और लकवा जैसी स्थिति है, लोग कोई भी कार्रवाई करने से डर रहे हैं ।’ प्रशांत भूषण ने कहा कि जो गलत कर रहे हैं, वो भयभीत होंगे । उसके जवाब में पलटवार करते हुए चीफ जस्टिस ने कहा - ‘हर कोई गलत नहीं कर रहा है। मुझे बताया गया है कि महाराष्ट्र में मंत्रालय इस वजह से काम नहीं कर पा रहा है । हम नहीं जानते क्यों? क्या आपने वैसे लोगों को देखा है, जो सूचना मांगते हैं? उन्हें इससे कोई लेना-देना नहीं है ।

चीफ जस्टिस ने कहा - ‘जनहित याचिकाएं दायर करना दूसरी चीज है, लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है । क्या आरटीआई कार्यकर्ता बनना व्यवसाय है? इसके आगे पीठ के दूसरे जज बी. आर. गवई ने जोड़ा - ‘मुंबई में ऐसे लेटर हेड पैड छपे हुए हैं जिसमें खुद को आरटीआई कार्यकर्ता बताया गया है ।

चीफ जस्टिस ने कहा - ‘हम जज के रूप में सिर्फ अपने अनुभव के आधार ऐसा कह रहे हैं । सूचना अधिकार के नाम पर ब्लैकमेल और वूसली के कई मामले सामने आए हैं। कोर्ट इस बात को लेकर चिंतित है कि आरटीआई का दुरूपयोग कैसे रोका जा सकता है । इस पर कुछ अंकुश लगाने की जरूरत है ।’

केंद्रीय सूचना आयोग में और राज्यों में सूचना आयुक्तों की रिक्तियां टलना केंद्र सरकार के लिए कोई नयी बात नहीं है । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का जवाब सरकार को इसी हफ्ते देना है। क्योंकि 16 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की अर्जी पर सरकार को दो हफ्ते के अंदर सूचना आयुक्तों के चयन के लिए खोज कमिटी के सदस्यों के नाम ऑफिशियल वेबसाईट पर अपलोड करने का निर्देश दिया । तीन महीने में सरकार को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुपालन के लिए सूचना आयुक्तों के रिक्त पद भरने हैं । अगर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को इसमें कोई रूचि होती तो पूरा साल यों ही नहीं गुजर जाता । याचिकाकर्ता के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने 2019 के शुरू में ही सरकार को यह निर्देश दिया था, जिसके अनुपालन के लिए यह अर्जी लगायी गयी ।

भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के पहले शासनकाल में सीआईसी(मुख्य सूचना आयुक्त) का पद कई महीने तक रिक्त रहा । मई, 2014 में सरकार बनी और मार्च, 2015 तक की रिपोर्ट थी कि सीआईसी की नियुक्ति आठ महीने से टल रही थी । सर्च कमिटी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 दिसंबर, 2014 को ही मंजूरी दी और होते-हवात दिसंबर, 2015 में आर. के. माथुर सीआईसी बने ।

दूसरे कार्यकाल में भाजपा गठजोड़ सरकार ने सीआईसी का पर कतरने वाला आरटीआई एक्ट(संशोधन) बिल संसद से पारित करा लिया । जुलाई, 2019 में संसद से पारित आरटीआई एक्ट(संशोधंन) बिल के अनुसार केंद्रीय सूचना आयोग का स्वतंत्र संवैधानिक दर्जा समाप्त हो गया । सरकार ने उनके कार्यकाल की अवधि, वेतन, भत्ते आदि की समीक्षा का अधिकार सरकारी विभागों की तरह अपने हाथ में ले लिया ।

इस असहजता से केंद्रीय सूचना आयोग अभी उभरा नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की भवें सूचना अधिकार के दुरूपयोग के मामले की ओर तन गयीं । सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अगले दिन 17 दिसंबर को बंबई हाईकोर्ट के जज गौतम पटेल ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध सरकार को सूचना से डरने का कोई कारण नहीं है । अगर कोई सरकार विचारों और पारदर्शिता की स्वायत्तता से डरती है तो वो उदार नहीं है । फर्क सिर्फ इतना है कि बंबई हाईकोर्ट के जज ने यह टिप्पणी कोर्ट के अंदर नहीं, कानूनी नीति के लिए विधि केंद्र के वार्षिक लेक्चर समारोह में दी । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने कोर्ट के अंदर आरटीआई अर्जी की सुनवाई के दौरान कहा कि आरटीआई एक्ट के दुरूपयोग की आशंका के मद्देनजर कुछ दिशानिर्देश जारी किए जा सकते हैं ।

16 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट और 17 दिसंबर को बंबई हाईकोर्ट जज की टिप्पणी के तुरंत बाद ऐसे मामले सामने आए, जिसे देखने के बाद तय करना कठिन है कि आरटीआई एक्ट का उपयोग कोई कैसे करेगा । 17 दिसंबर को ही दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्रीय सूचना आयोग के इस फैसले को निरस्त कर दिया कि इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन(ईवीएम) आरटीआई एक्ट के अंतर्गत ‘सूचना’ की परिभाषा के दायरे में आता है । दिल्ली हाईकोर्ट के जज जयंत नाथ ने चुनाव आयोग की अपील पर कहा कि ईवीएम मोडल प्रस्तुत करने की मांग आरटीआई अर्जी के तहत नहीं को जा सकती । सीआईसी के पास यह अर्जी रजाक हैदर ने आरटीआई एक्ट के अनुच्छेद 2(एफ) और 2(आइ) का हवाला देकर लगायी थी कि ‘सूचना और रिकार्ड’ की परिभाषा में वो मोडल तथा सैम्पल शामिल है, जो सरकारी प्राधिकरण इस्तेमाल करता है । चुनाव आयोग के केंद्रीय जन सूचना अधिकारी ने यह अर्जी खारिज कर दी, तब याचिकाकर्ता सीआईसी के पास गया ।

22 दिसंबर को सेना के अंदर मेडल खरीद और प्रदान करने में अनियमितता का खुलासा आरटीआई के जरिए हुआ । सेना के रिटायर कर्नल दर्शन सिंह ढिल्लों ने आरटीआई एक्ट का उपयोग करके यह जानकारी सार्वजनिक करायी कि उन्हें जो सात मेडल मिले, उनमें से एक ओरिजनल है, बाकी दिल्ली के बाजार से 250 रूपये में खरीदे गए हैं । कर्नल(रिटायर) ढिल्लों की आरटीआई अपील पर रक्षा मंत्रालय के हेडक्वार्टर ने सूचना दी कि सेना के 17.33 लाख सेवा मेडल ‘प्रतीक्षा सूची’ में हैं, जैसा कि 31 जुलाई, 2019 तक की स्थिति थी । रक्षा मंत्रालय ने यह भी बताया कि 2014, 2015 और 2016 वर्ष के लिए प्रति वर्ष 20 करोड़ रूपये मेडल के लिए आवंटित किए गए । प्रतीक्षा सूची को रक्षा मंत्री की स्वीकृति की प्रतीक्षा है ।

इसी समय अर्थात् 23 दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ‘रक्षा स्टाफ प्रमुख’(सीडीएस) नामक एक नए पद के गठन को मंजूरी दी, जो सरकार को सैनिक सलाह देनेवाले एकमात्र शीर्ष अधिकारी होंगे । दो दिसंबर को संसद में इस पद के सृजन की जानकारी देते हुए रक्षा राज्य मंत्री श्रीपद नाईक ने यह भी कहा कि सीडीएस आरटीआई एक्ट के दायरे में आएगा ।

लेकिन मौजूदा हालातों में तो सेना के अंदर के मामले और सरकार को सीडीएस को दी जानेवाली सैनिक सलाह के बारे में सूचना मांगने से पहले किसी को भी एक बार सोचना पड़ जाएगा ।

जस्टिस एस. ए. बोबड़े से पहले सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने जाते-जाते 13 नवंबर, 2019 के अपने फैसले में कहा कि भारत के प्रधान न्यायाधीश का पद आरटीआई एक्ट के दायरे में आता है । दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ए. बी. शाह के 2010 के फैसले को सही ठहराते हुए रंजन गोगोई ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस का कार्यालय आरटीआई एक्ट के दायरे में आएगा । 2010 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को व्यक्तिगत झटका माना और कहा कि जजों के बारे में जानकारी आरटीआई के दायरे में नहीं आ सकती ।

2005 में लागू आरटीआई एक्ट के उपयोग/दुरूपयोग पर सवाल अभी उठ रहे हैं । लेकिन आरटीआई एक्ट से पहले 2002 में ही सुप्रीम कोर्ट ने एडीआर(एशोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) की याचिका पर जनप्रतिनिधियों के पिछले रिकॉर्ड जानने के जनता के अधिकार को सही ठहराया था । उसी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अक्टूबर 2012 में संसद और विधान सभाओं का चुनाव लड़नेवाले सभी उम्मीदवारों के लिए अपनी संपत्ति, दायित्व और अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे की जानकारी देना अनिवार्य कर दिया । चुनाव आयोग इसे कड़ाई से लागू करता है और हर उम्मीदवार को पर्चे भरने के साथ हलफनामा देना होता है ।