संविधान दिवस की 75वीं वर्षगांठ के सिलसिले में कार्यक्रम चल रहे हैं । इसमें मुख्य प्रतिभागी भाजपा और कांग्रेस आमने.सामने हैं । केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार और लोकसभा में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस दोनों की ओर से संविधान दिवस के बैनर तले सियासी कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जो उनके अपने राजनीतिक एजेंडे के तय समय तक चलेंगे ।

26 नवंबर को 75वीं वर्षगांठ पूरे होने की तारीख को आयोजित संविधान दिवस समारोह से पहले ही दोनों दलों ने अपने कार्यक्रमों का एलान कर दिया । इसमें सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी इंडिया गठजोड़ के किसी अन्य घटक दलों की कोई भूमिका नहीं है ।

संविधान और संविधान दिवस के सियासी राजनीतिक मुद्दा बनने का परिचय 26 नवंबर को ही अवाम को मिल गया । संसद के ऐतिहासिक दिवस समारोह में और फिर सुप्रीम कोर्ट में इसी अवसर पर आयोजित समारोह में राजनीतिक विरोधाभासों का स्पष्ट संकेत मिल गया ।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने इस अवसर पर सेंट्रल हॉल(केंद्रीय कक्ष) में संसद के दोनों सदनों के संयुक्त सत्र को संबोधित किया । इसलिए सभी दलों के नेता और सदस्य मौजूद थे ।

संविधान को अपनाए जाने के 75वें वर्ष में एक साल तक चलनेवाले समारोहों की शुरूआत राष्ट्रपति ने अपने संबोधन भाषण में की । सत्तारूढ़ भाजपा की ओर से चलाए जानेवाले इस कार्यक्रमों का समापन 26 जनवरी, 2026 को होगा । और इसके समानान्तर कांग्रेस की ओर से आयोजित संविधान रक्षक अभियान कार्यक्रम अगले वर्ष 26 जनवरी, 2025 तक चलेंगे । 2 महीने तक चलनेवाले कांग्रेस के कार्यक्रमों में ‘भारत जोड़ो संविधान अभियान’ भी शामिल है । कांग्रेस ने दोनों ही अभियानों की शुरुआत 26 नवंबर को ही संविधान दिवस के ही दिन बिल्कुल भाजपा के समानान्तर ही कर डाली । इस प्रकार संविधान दिवस के साथ.साथ गणतंत्र दिवस को भी राजनीतिक के लपेटे में ले लिया गया ।

संयोग से एक दिन पहले 25 नवंबर को संविधान के प्रस्तावना के संबंध में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ जाने से कांग्रेस नेताओं का हौसला बुलंद था । चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार की पीठ ने संविधान के प्रस्तावना में जोड़े गए समाजवाद तथा धर्मनिरपेक्ष शब्दों को हटाने की मांग वाली अर्जियां खारिज कर दी । ये शब्द समाजवाद, धर्मनिरपेक्ष( ‘सोसलिज्म’ और ‘सेक्युलर’) तथा अखंडता 1976 में इमर्जेंसी काल में जोड़े गए थे, जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री थी । संविधान के 42वें संशोधन में ये दोनों शब्द प्रस्तावना में जोड़े गए थे । भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी और भाजपा समर्थक वकील अश्विनी उपाध्याय ने याचिकाएं दायर की थी । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि संविधान की प्रस्तावना से ये दोनों शब्द नहीं हटेंगे और इमर्जेंसी के दौरान संसद द्वारा लिया गया हर फैसला निरर्थक नहीं हो सकता ।

इस पर बाद में चर्चा करेंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की प्रस्तावना वाले संशोधन को चुनौती देनेवाली याचिकाएं खारिज करने के समय क्या.क्या कहा । पहले ये देखें कि संविधान दिवस के ठीक एक दिन पहले सुनाए गए इस फैसले का असर किस प्रकार 26 नवंबर को संविधान दिवस समारोह में नजर आया । समारोहों पर चढ़े राजनीतिक रंग से प्रधानमंत्री का संविधान को ‘मार्गदर्शक, संरक्षक और साक्षी सलाहकार’ बताने का नारा सकारात्मक साबित नहीं हुआ । 2024 लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा संविधान सभा द्वारा संविधान स्वीकार किए जाने की 75वीं वर्षगांठ को ढाल के रूप में अपने धुर प्रतिद्वंदी कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल कर रही है । 2023 के संविधान दिवस के दिन भी यही नजारा देखने को मिला । फिर 2024 आम चुनाव के बाद 18वीं लोकसभा के जुलाई में हुए सत्र में भी संविधान की राजनीति संसद के अंदर और बाहर चली । 11 जुलाई, 2024 को गृह मंत्रालय की ओर से भारत के राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना से स्पष्ट खुलासा हो गया । इस अधिसूचना(फा.सं. 17015/53/2024) में 25 जून की तारीख को ‘संविधान हत्या दिवस’ घोषित किया गया । 25 जून, 1975 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लगायी थी । इसी समय भाजपा सूत्रों से पता चला कि अगले साल(2025) से हर वर्ष 25 जून की तारीख को ‘संविधान हत्या दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा । कांग्रेस ने ‘संविधान बचाओ अभियान’ नारे से 2024 लोकसभा चुनाव में बहुत सारी सीटें जीत ली और मजबूत विपक्ष बन गयी । ऐसा भाजपा का कहना है । उसकी काट में भाजपा ने ‘संविधान हत्या दिवस’ को संविधान की 75वीं वर्षगांठ से जोड़ दिया । वैसी भावना 26 नवंबर, 2024 को वर्षगांठ समारोह के दौरान देखने को मिली । राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने संबोधन भाषण में संविधान को पवित्र ग्रंथ बताते हुए कहा कि यह जीवंत और प्रगतिशील दस्तावेज है, जिसके माध्यम से हमने सामाजिक न्याय तथा समावेशी विकास के लक्ष्यों को हासिल किया है । आयोजन पुराने संसद भवन के ऐतिहासिक केंद्रीय कक्ष में किया गया था । इसी कक्ष में संविधान सभा ने संविधान निर्माण के महती कार्य संपन्न किए और 26 नवंबर, 1949 को अपनाया गया था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो अपनी वही भाषण दुहराया, जो वे लोकसभा चुनाव के बाद से बार. बार कह रहे हैं कि 75 वर्षों में जो भी चुनौतियां आयी हैं, उनका समाधान करने के लिए हमारे संविधान ने उचित मार्ग दिखाया है । यह हमारे वर्तमान और भविष्य का ‘मार्गदर्शक’ है । लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अपना भाषण संविधान की प्रस्तावना के धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी शब्दों से शुरू किया, जिसे प्रस्तावना से हटाने की भाजपा समर्थकों की याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की । उन्होंने कहा कि हमारा संविधान हमारे राष्ट्र की जीवनधारा है, जो भारत को एक संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बनाता है । हम भारत के लोगों को संविधान में व्यक्त प्रत्येक विचार की रक्षा के लिए एक साथ आना चाहिए । मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीधा आरोप लगाया कि वे राजनीतिक कारणों से जनता के बीच संविधान का ढिंढोरा पीट रहे हैं और 1949 में ही आरएसएस के अखबार ‘ऑर्गानाइजर’ में 30 नवंबर को छपे संपादकीय का हवाला दिया जिसमें कहा गया कि संविधान ‘मनुस्मृति’ से प्रेरित नहीं है और इसमें वर्णित कुछ भी भारतीय नहीं है । कांग्रेस नेता खरगे और राहुल गांधी दोनों ने ही राज्य सभा तथा लोकसभा अध्यक्षों को लिखा कि संविधान की 75वीं वर्षगांठ पर दोनों सदनों में 2 दिन चर्चा करायी जाए । मल्लिकार्जुन खरगे ने संस्कृत में संविधान की प्रति जारी करने पर एतराज किया और इसे मनुवादी सोच बताया ।

उधर केंद्रीय कक्ष से बाहर कांग्रेस के विभिन्न प्रकोष्ठों की ओर से आयोजित संविधान रक्षक अभियान कार्यक्रम में लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा और आरएसएस चाहे जो भी कर ले देश में जाति जनगणना और आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा तोड़ने का काम होकर रहेगा ।

दूसरी तरफ 26 नवंबर को ही भाजपा की ओर से राष्ट्रव्यापी संविधान दिवस पदयात्रा ‘मेरा युवा भारत’ के बैनर तले आयोजित की गयी । केंद्रीय युवा मामले खेल मंत्री, श्रम व रोजगार मंत्री और कई गणमान्य व्यक्तियों ने इस पदयात्रा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया ।

सुप्रीम कोर्ट में आयोजित संविधान दिवस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण संविधान पर खतरा के विपक्ष के आरोपों के खंडन पर केंद्रित रहा । इसमें उन्होंने न्यायपालिका को जोड़ा । प्रधानमंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार पर आरोप लगाया जाता है कि एनडीए शासन में न्यायपालिका की आजादी और संविधान खतरे में है। लेकिन उन्होंने हमेशा संवैधानिक कर्तव्य शासन के अन्य महकमे की सीमाओं का अतिक्रमण किए बगैर कार्यपालिका के दायरे में रहकर निभाया ।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष और संसद सदस्य कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट के संविधान दिवस समारोह में बोल चुके थे कि संविधान के मूल्यों और न्यायपालिका की आजादी की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट सरकार को रोजमर्रे के राज.काज में इस बात की याद दिलाते रहे । प्रधानमंत्री के भाषण से लगा कि उनका खंडन कपिल सिब्बल को जवाब देनेवाला था । सिब्बल पूर्व कांग्रेस नेता हैं ।

26 नवंबर को ही आहूत संसद उनके बाद से हंगामे के कारण चौथे दिन भी नहीं चल पायी । दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों ने कांग्रेस के आग्रह पर संविधान की 75वीं वर्षगांठ चर्चा सदन के अंदर कराना स्वीकार नहीं किया । अडाणी समूह की रिश्वतखोरी और संभल हिंसा समेत जिन मुद्दों पर हंगामे के कारण दोनों सदन नहीं चले उसमें संविधान निर्माण पर चर्चा की मांग भी शामिल थी ।

हंगामे के बीच में ही 28 नवंबर को कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा ने संविधान की प्रति हाथ में लेकर लोकसभा सदस्यता की शपथ ली । प्रियंका गांधी ने केरल की वायनाड लोकसभा सीट जीती हैं, जो राहुल गांधी के उनके लिए खाली की । प्रियंका के शपथ लेते समय कांग्रेस सांसदों ने ‘जोड़ो जोड़ो भारत जोड़ो’ के नारे लगाए । 18वीं लोकसभा का सदस्यता लेने वाले इंडिया गठजोड़ के कई सदस्यों ने संविधान की प्रति हाथ में लेकर शपथ ली । नरेंद्र मोदी ने तीनों बार प्रधानमंत्री पद की शपथ संविधान की प्रति माथे से लगाकर ली है । गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 2010 में 26 नवंबर को नरेंद्र मोदी ने ‘संविधान गौरव यात्रा’ शुरू की थी ।

इस वर्ष राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ के तीसरी बार सत्ता में आने के बाद विपक्षी कांग्रेस के खिलाफ राजनीति संविधान की आड़ लेकर तेज हो गयी । जून, 2024 में ‘संविधान हत्या दिवस’ 25 जून से मनाने की अधिसूचना जारी होने के बाद संसदीय सचिवालय की ओर से संविधान की अपडेटेड प्रतियां सभी सदस्यों को बांटने का सिलसिला चला । क्योंकि केंद्र सरकार पर संविधान का मूल स्वरूप बदलने के आरोपों पर बहस सदन के अंदर और बाहर छिड़ी हुई थी ।

उसके बाद जुलाई, 2024 में समाजवादी पार्टी प्रमुख पूर्व उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पार्टी के लखनऊ मुख्यालय में संविधान की प्रति लगाकर ‘संविधान.मानस्तंभ’ की स्थापना की ।

इस पूरे प्रकरण में संविधान के प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्ष और समाजवाद’ शब्द हटाने की याचिकाएं खारिज करने के दौरान की गयी शीर्ष कोर्ट की टिप्पणी से भारत राजपत्र में दर्ज ‘संविधान हत्या दिवस’ अधिसूचना की सियासी ताकत कमजोर पड़ती मालूम होती है । चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि इमर्जेंसी में संसद का हर फैसला निरर्थक नहीं ।

‘समाजवाद’ शब्द को परिभाषित करते हुए सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि भारत में समाजवाद का अर्थ कल्याणकारी राज्य है, वो नहीं है जैसा फ्रांस और पश्चिमी देशों में माना जाता है । इमर्जेंसी काल के संसद के हर फैसले का चुनौती देने वाली कई याचिकाओं का निष्पादन सुप्रीम कोर्ट कर चुकी है । उसी संदर्भ में ‘समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता’ शब्द प्रस्तावना में जोड़नेवाले 42वें संविधान संशोधन के बारे में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसकी कई बार न्यायिक समीक्षा की गयी है और यह नहीं कहा जा सकता है कि इमर्जेंसी काल में लिया गया संसद का हर फैसला गलत था । सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान की धारा.368 संसद को संविधान में संशोधन की शक्ति प्रदान करता है । याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर चुनौती दी कि 1976 में लोगों की बात सुने बिना यह संशोधन बिल पास हुआ । सभी विपक्षी नेता जेल में थे, जो असंवैधानिक है । यही बात भाजपा गठजोड़ पर लागू होती है । 2019 में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद से किए गए सारे संविधान संशोधन बिल विपक्ष की बात अनसुनी करके पास कराए गए । क्योंकि विपक्ष कमजोर था और विरोध करके बिल रोकने की स्थिति में नहीं था । सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तावना वाला संशोधन के खिलाफ 2020 में याचिकाएं लगायी गयी । संविधान के 75वें वर्ष में सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि लगभग 44 वर्षों बाद 42वें संविधान संशोधन को चुनौती देने का कोई वैध कारण या औचित्य आधार नहीं मिलता । यदि पूर्वव्यापी तर्क स्वीकार किए जाते हैं तो सभी संशोधनों पर लागू होंगे ।