होली अवकाश के बाद शुरू संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण में 12 मार्च को दिल्ली दंगा पर इतना जोरदार हंगामा हुआ कि केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार को नागरिकता संशोधन कानून(सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर(एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) पर अपने अबतक के रवैए से एक कदम पीछे हटना पड़ा । केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने पहली बार देश के सर्वोच्च संवैधानिक जनमंच संसद में सफाई दी कि एनपीआर के लिए किसी दस्तावेज की जरूरत नहीं है और कोई भी संदिग्ध(क - डाउटफुल) श्रेणी में नहीं रखा जाएगा । गृहमंत्री ने कहा कि किसी को भी डरने की जरूरत नहीं है ।

12 मार्च को ही सुप्रीम कोर्ट में उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनवाई हुई । इसमें सीएए विरोध के कारण भड़की हिंसा से ऐसे मामले जुड़े निकले, जिसके ताल्लुकात सीधे आम जनता के संवैधानिक अधिकार और संविधान सम्मत कानून से है ।

11 दिसंबर, 2019 को संसद से नागरिकता संशोधन बिल पास कराया गया और 12 दिसंबर को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी के बाद सीएए लागू हो गया । उसके तुरंत बाद लखनऊ में हिंसा भड़की और जगह-जगह उपद्रव, तोड़-फोड़ हुए । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का हरजाना उपद्रवियों से वसूलने के अपने एलान को अमल में लाने के लिए लखनऊ में लगभग 50 लोगों के नाम पत के पोस्टर सड़क के किनारे लगाने के निर्देश दिए । लखनऊ जिला प्रशासन की ओर से जिन लोगों के व्यक्तिगत विवरण के साथ फोटो पोस्टर लगाए गए वे सरकार की नजर में कथित रूप से उपद्रव में शामिल लोग हैं, जिनसे क्षतिपूर्ति की वसूली होनी है ।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की इस ‘कानूनी कार्रवाई’ के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए इसे ‘शर्मनाक’ बताया और लखनऊ जिला प्रशासन को ऐसे पोस्टर हटाने का आदेश दिया । इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस गोविंद माथुर और जस्टिस रमेश सिन्हा की पीठ ने सरकार की इस कार्रवाई को बिल्कुल अवांछित और संविधान की धारा-21 के तहत प्राप्त लोगों की व्यक्तिगत आजादी में अनुचित हस्तक्षेप बताया । होली से एक दिन पहले 9 मार्च को हाईकोर्ट पीठ ने अपने आदेश में लखनऊ जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस कमिश्नर से कहा कि लोगों की व्यक्तिगत जानकारी वाले ऐसे पोस्टर सड़क के किनारे न लगाया जाए । हाईकोर्ट जजों ने कहा कि सरकार की ऐसी कार्रवाई का कोई कानूनी आधार और औचित्य नहीं बनता । इलाहाबाद हाईकोर्ट पीठ ने कहा कि ‘चुन-चुनकर लोगों के व्यक्तिगत नाम, पते, फोटो सड़क के किनारे लगवाना सरकार द्वारा अपने अधिकारों का रंगारंग उपयोग हैं ।’

उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने हाईकोर्ट के ही अधिकार क्षेत्र पर ऊंगली उठा दी कि हाईकोर्ट को स्वतः संज्ञान लेने का संवैधानिक अधिकार नहीं है । उसके जवाब में जजों ने कहा कि आंख कान बंद करके संवैधानिक अदालत उस दिन का इंतजार नहीं कर सकती कि कोई पीड़ित व्यक्ति न्याय की गुहार लगाने जब आए तब आंख कान खोलें । हाईकोर्ट जजों ने जोर देकर कहा कि सरकार के ऐसे कदम का कोई कानूनी औचित्य नहीं है और यह खुद सरकार द्वारा ही कानून को अवहेलना है ।

लेकिन इतनी फटकार के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार को अपना कदम गलत नहीं लगा । राज्य सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में यह सोचकर चुनौती दी कि शीर्ष कोर्ट राज्य सरकार की दलील मान लेगा कि हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेकर कार्यपालिका के महकमे में ‘अनुचित’ हस्तक्षेप किया है । सुप्रीम कोर्ट जज यू यू ललित और अनिरूद्ध बोस की अवकाश पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर 12 मार्च को सुनवाई के दौरान सरकार के उस कदम पर ही सवाल उठा दिया । कोरोना वायरस के चलते सिर्फ बहुत आवश्यक मामलों की सुनवाई की व्यवस्था के अंदर उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका स्वीकार की गयी ।

सुप्रीम कोर्ट जजों ने कहा कि सीएए विरोध में उपजी हिंसा में संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले लोगों के नाम, पते, फोटो की होर्डिंग पोस्टर लगाने के उत्तर प्रदेश सरकार का कदम कानून के किसी दायरे में नहीं आता । जजों ने कहा कि फिलहाल संविधान में कोई कानून नहीं है, जिसके अंतर्गत सरकार के इस कदम को सही माना जाए । उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से महाधिवक्ता राघवेन्द्र सिंह के अलावे केंद्र सरकार के वकील सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने भी सुप्रीम कोर्ट में दलीलें रखी । सुनवाई कर रहे शीर्ष कोर्ट जजों ने उत्तर प्रदेश सरकार की पोस्टर कार्रवाई के कानूनी औचित्य पर विचार करने का मामला तीन जजों की बड़ी पीठ को भेज दिया, जो सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस तय करेंगे । लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस तय करेंगे । लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट की परवाह और अंतिम फैसले का इंतजार किए बगैर हर हाल में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला मानने को तैयार नहीं थी । कोर्ट संविधान और कानून से चलता है । मगर भाजपा के लिए अपना एजेंडा सर्वोपरि है, जो देश और भारतीय संविधान से ऊपर है । भाजपा के चुनाव घोषणापत्र के अनुसार जनादेश इसी के लिए मिला है । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने लखनऊ जिला प्रशासन को 16 मार्च तक अपने आदेश की तामीली की रिपोर्ट मांगी थी । उत्तर प्रदेश सरकार को उन कथित उपद्रवियों से क्षतिपूर्ति वसूलनी थी । इसलिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के अगले दिन ही 13 मार्च को मंत्रिमंडल ने नया कानून बना लिया । उत्तर प्रदेश सार्वजनिक और निजी संपत्ति के नुकसान की वसूली अध्यादेश, 2020 मसौदे को राज्य मंत्रिमंडल ने क्लियर कर दिया । 15 मार्च को राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने अध्यादेश जारी कर दिया ।

अब इसी नागरिकता संशोधन कानून को लेकर देखिए कि दिल्ली में क्या क्या हुआ । फरवरी से यह हंगामा व्यापक जन-विरोध से शुरू हुआ । शाहीन बाग का धरना अभी-भी जारी है। कई राज्यों की विधान सभाओं से सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पारित हो चुका है । दिल्ली विधान सभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के प्रचंड जनादेश का श्रेय सीएए विरोध को भी जाता है, जबकि आम आदमी पार्टी ने इससे अपने को अलग रखा । दिल्ली विधान सभा चुनाव के बाद तक भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री समेत सभी भाजपा नेता सीएए को उचित ठहराते रहे । दिसंबर में दिल्ली रामलीला मैदान में आयोजित चुनाव रैली में भी प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रव्यापी एनआरसी(राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर) की सरकारी हलकान में चर्चा नहीं है ।

सीएए की संवैधानिक वैधता पर तो अब सुप्रीम कोर्ट को विचार करना है । राजस्थान और केरल की गैर भाजपा सरकारों के अलावे इसके खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर शीर्ष कोर्ट में सुनवाई चल रही है । लेकिन दिल्ली विधान सभा चुनाव के बाद भड़के दंगों पर संसद में हंगामे के जवाब में अचानक केंद्र सरकार का रवैया बदल गया । दिसंबर से लेकर अभी तक केंद्रीय गृहमंत्री जोर देकर बार-बार दुहराते रहे कि एनआरसी और एनपीआर से पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता । सीएए हर हाल में लागू होकर रहेगा । इसके अंतर्गत मांगी गयी जानकारियों पर पूरे देश की जनता को एतराज था - मां-पिता का जन्मस्थान, देश, गांव अपना जन्मस्थान अगर नहीं बता पाए तो संदिग्ध(क) श्रेणी वाले नागरिक माने जाएंगे । सबसे पहले असम से उपजा विरोध और विवाद जब देशव्यापी हुआ तो सारे विरोध करनेवाले ‘देशद्रोही’, ‘बाहरी तत्व’ घोषित कर दिए गए ।

19 दिसंबर को लखनऊ में सीएए विरोध और 26 फरवरी का उत्तर पूर्वी दिल्ली में भड़के दंगे में संविधान कानून एक तरफ है, भाजपा एक पक्ष है । 12 मार्च को संसद में अमित शाह की सफाई के दिन शाहीन बाग धरना का 90 वां दिन था । 15 दिसंबर, 2019 से शाहीनबाग में महिलाओं का धरना जारी है। दिल्ली दंगे में 53 लोगों के मारे जाने की सरकारी तौर पर पुष्टि हो चुकी है । धरने पर बैठी महिलाएं कपिल मिश्र और अनुराग ठाकुर समेत भाजपा नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रही हैं, जिन्होंने दंगों से पहले ‘उकसाने वाले बयान’ दिए ।

सीएए के मौजूदा विवाद के दौरान देश की जनता ने जाना कि यह भाजपा का पुराना एजेंडा था । इस संबंध में आधा-अधूरा संविधान संशोधन 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी शासनकाल में हुआ । जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरा कर दिया ।

संसद में कोरोना वायरस के साथ-साथ नागरिकता वायरस से उपजे अराजक सवालों पर भी हंगामा हुआ, जिससे पूरे देश में संदेह और आशंकाओं का वातावरण बना हुआ है ।

लखनऊ दंगे के कथित दोषियों से हर्जाना वसूलने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने अपना न्याय हथकंडा अपनाया । राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने जो अध्यादेश जारी किया, उससे सारे अधिकार राज्य सरकार ने अपने हाथ में ले लिए । इसके तहत वसूली का अधिकार एक ट्रिब्यूनल के जिम्मे होगा और उसके किसी फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती । सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे की उत्तर प्रदेश सरकार की अर्जी ठुकरा दी । इसलिए कोर्ट की काट में जारी यह ट्रिब्यूनल पोस्टर में दर्शाए गए कथित दंगाइयों की कोई फरियाद सुने बगैर सीधे हर्जाना वसूल सकता है । ट्रिब्यूनल के ऐक्शन में आने से पहले इस अध्यादेश के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जानी निश्चित है ।

दिल्ली दंगे में शामिल लोगों की पहचान क्यों नहीं, जिसमें शामिल भाजपा नेताओं के नाम सभी जानते हैं । केंद्र सरकार के अधीन दिल्ली पुलिस की दंगे के दौरान कार्रवाई का मूल्यांकन किया जा रहा है। दिल्ली विधान सभा से सीएए के खिलाफ पारित प्रस्ताव के दिन 13 मार्च को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सटीक कहा - ‘अगर आप मुस्लिम हैं तो बंधक कैंप में भेजे जाएंगे, अगर आप हिंदू हैं तो पूछा जाएगा कि कहीं पाकिस्तानी तो नहीं है । कागजात हों या नहीं, बंधक कैम्पों में तो भेजा ही जाएगा’ ।

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने हालिया फैसले में कहा है कि कोर्ट संविधान सम्मत प्रक्रिया और साक्ष्य कानून से चलता है, जबकि ट्रिब्यूनल अपने हिसाब से सिर्फ सरकारी खानापूरी वाली सिविल प्रक्रिया से चलता है । तमिलनाडु सरकार ने सीएए को रोका हुआ है ।

इस द्विविधा और आशंकाओं में लोगों के संवैधानिक अधिकार दांव पर हैं । व श्रेणी की तलवार लटक रही है कि कौन सी और कितनी सूचना देने पर व श्रेणी वायरस से बचेंगे ।

कोरोना बाहर से आया और सीएए विरोध का वायरस भारत से बाहर गया । बंगाल के जादवपुर यूनिवर्सिटी के पोलैंड वासी छात्र कामिल सिएडसिंस्की और विश्व भारती यूनिवर्सिटी के बांग्लादेशी छात्र अफसारा अनिका मीम को सीएए विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के कारण 15 दिनों में भारत छोड़ने का अल्टीमेटम मिला । संविधान की धारा 14, 20 और 21 का इस्तेमाल करते हुए दोनों छात्रां ने कलकता हाईकोर्ट से स्टे ले लिया । किसी विदेशी को सरकार के असंवैधानिक फैसले को कोर्ट में चुनौती देने का अधिकार प्राप्त है । प्रधानमंत्री ने उसी समय कोरोना वायरस का दक्षिण एसियाई देशों से विमर्श किया ।