इस बार संविधान दिवस मनाने के लिए 26 नवंबर को खास समारोह का आयोजन किया गया है । संसद के दोनों सदनों के विशेष संयुक्त अधिवेशन को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद संबोधित करेंगे । लोकसभा और राज्यसभा का तीन घंटे तक चलनेवाला यह विशेष सत्र संविधान दिवस की 70वीं वर्षगांठ के लिए आहूत है । इस ऐतिहासिक आयोजन का माहौल ऐसा है, जब संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और आजादी पर लटकती तलवार की चर्चा जोरों पर है । संसद के बजट सत्र में पास संविधान बिल को लेकर उठे विवाद थमने का नाम नहीं ले रहे हैं । खासकर जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करनेवाला संविधान संशोधन बिल और नागरिकता संशोधन बिल से उपजे विवाद ने शीतकालीन सत्र का पीछा किया । अभी चल रहे संसद के शीतकालीन सत्र की शुरूआत ही कश्मीर से जुड़े हंगामे के साथ हुई । लोकसभा में सदस्यों ने कश्मीर से लोकसभा सदस्य फारूक अब्दुल्ला को सदन की कार्यवाही में हिस्सा लेने के संवैधानिक अधिकार की बात उठायी । जम्मू व कश्मीर संविधान संशोधन बिल, 2019 के एक्ट बनने के बाद पांच अगस्त को राज्य को विशेष दर्जा देनेवाला अनुच्छेद 370 समाप्त करके दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया । उसके बाद से फारूक अब्दुल्ला नजरबंद हैं ।
जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन बिल संवैधानिक है या नहीं, यह तो अब सुप्रीम कोर्ट तय करेगा । इसके खिलाफ दायर याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली गयी है । लेकिन संविधान के इस अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के बाद से नगालैंड समेत तमाम पूर्वोत्तर राज्यों में भय समाया हुआ है । नगालैंड को अनुच्छेद 371 ए के तहत विशेष संवैधानिक दर्जा प्राप्त है और मिजोरम समेत समूचे पूर्वोत्तर को 371 ए से एफ तक कुछ-न-कुछ खास दर्जा मिला हुआ है । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अगस्त में कश्मीर का दर्जा खतम करने के बाद गुवाहाटी जाकर पूर्वोत्तर मुख्यमंत्रियों को आश्वस्त किया, मगर संशय मिटा नहीं है । नगा विद्रोही गुट नेशनल सोसलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड(एनएससीएन-आईएम) नेता मुइवा से अंतिम समझौता वार्ता के रास्ते में मुख्य अड़ंगा है - ‘अलग नगालिम संविधान और झंडा’ पर मुइवा का अड़ियल रवैया ।
संयोग से इसी समय राज्यसभा के ऐतिहासिक 250वें सत्र का भी विशेष आयोजन 18 नवंबर को हुआ । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण के बाद पूर्व प्रधानमंत्री राज्यसभा सदस्य मनमोहन सिंह ने जो कुछ कहा वो ऊपरी सदन की घटती संवैधानिक अहमियत और संविधान दिवस दोनों के लिए महत्वपूर्ण है । वरि’ कांग्रेस नेता मनमोहन सिंह ने उन्हीं विवादित संविधान संशोधन बिलों को लक्ष्य किया, जो राज्यसभा को दरकिनार करके जल्दीबाजी में पास कराए गए । बजट सत्र में जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन बिल के अलावे आरटीआई एक्ट 2005 संशोधन बिल, 2019 भी अफरातफरी में पास कराया गया । आरटीआई संशोधन से जनता के संवैधानिक अधिकारों पर जनप्रतिनिधियों के राजनीतिक अधिकारों का वर्चस्व कायम हो गया । जिस नागरिकता संशोधन बिल को असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर तैयार करने में लगातार विवादों का सामना करना पड़ रहा है, उसे पूरे देश में लागू करने पर सरकार आमादा है । मुख्य रूप से असम के लिए ही यह संविधान संशोधन बिल लाया गया, जहां सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में भी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर कायदे से तैयार नहीं हो सका । उस बिल को सरकार फिर से संशोधन करके लाना चाहती है । अयोध्या एक्ट का भी मसौदा तैयार था, अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ठीक संसद सत्र से पहले नहीं आया होता तो वह बिल सदन में रखा जाता ।
राज्यसभा के 250वें सत्र के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘भारतीय राजनीति में राज्यसभा की भूमिका’ विषय पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं ने दो सदनों वाली बड़ी अच्छी व्यवस्था दी। उन्होंने राज्यसभा को इतिहास रचनेवाला सदन बताया और संविधान निर्माता डा. बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर को भी याद किया । लेकिन पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बिल्कुल सटीक बात कही कि राज्यसभा को दूसरे दर्जे का सदन न बनाया जाए, संविधान के अनुसार राज्यसभा बराबर का दूसरा सदन है । उन्होंने कहा कि कार्यपालिका ने संविधान के अनुच्छेद 110 का दुरुपयोग कर कई महत्वपूर्ण बिल बिना चर्चा के पारित कराया । मनमोहन सिंह ने राज्यसभा को दरकिनार करके धन विधेयकों को पारित करने की हालिया प्रवृत्ति को अनुचित बताया । उन्होंने राज्य सभा में आने वाले बिलों को प्रवर समिति में भेजने पर बल दिया, ताकि बिलों का जांच परख हो सके । ये चर्चाएं संविधान दिवस के दिन संयुक्त अधिवेशन में भी जरूर होंगी ।
आधार संशोधन बिल को धन बिल के रूप के रूप में पास कराने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने भी सवाल उठाया है । राज्यसभा सभापति एम. वेंकैया नायडू ने राज्यसभा का अतीत बताते हुए 1952 से लेकर 2019 तक पारित महत्वपूर्ण बिलों में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों की रक्षा वाला तीन तलाक बिल और जम्मू व कश्मीर पुनर्गठन बिल का जिक्र किया । मगर आरटीआई एक्ट, 2005 संशोधन बिल, 2019 का नाम नहीं लिया । प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने 19 जुलाई को संसद में आरटीआई एक्ट संशोधन बिल पेश करते समय जो तर्क दिया वो संविधान का मजाक उड़ानेवाला और आम जनता का गुमराह करनेवाला है । जितेन्द्र सिंह ने सदन को गलत जानकारी दी कि कांग्रेस शासनकाल में 2005 में आरटीआई बिल जल्दीबाजी में पारित कराया गया और केंद्रीय सूचना आयोग को संवैधानिक दर्जा नहीं दिया । आरटीआई संशोधन बिल, 2019 के अनुसार भाजपा गठजोड़ सरकार ने मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का फिक्स कार्यकाल पांच वर्ष या 65 वर्ष की उम्र तक समाप्त करके उसकी समीक्षा का प्रावधान कर दिया । उनके वेतन, भत्ते भी सरकारी समीक्षा के दायरे में आ गए । साथ में केंद्रीय राज्यमंत्री ने ये भी कहा कि अब सीआईसी(केंद्रीय सूचना आयुक्त) का संवैधानिक दर्जा सीईसी(मुख्य चुनाव आयुक्त) के समकक्ष हो गया, जो सरासर गलत है । सीईसी का संवैधानिक दर्जा सुप्रीम कोर्ट जज के समकक्ष है और उनके कार्यकाल की समीक्षा का अधिकार सरकार के पास नहीं है । आरटीआई संशोधन बिल को बिना चर्चा के पारित कराना भी ऐतिहासिक है । उसके लिए राज्यसभा में अपनाए गए वोटिंग तरीके पर सभापति और उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने खेद जताया । उस ‘जल्दीबाजी’ के खिलाफ 17 विपक्षी दलों ने सभापति को पत्र दिया, जिससे वे स्वयं सहमत थे ।
अवाम के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि संविधान का मतलब राजनीतिक मकसद से जब मर्जी आए, संशोधन कर देना । इसे धर्म आधारित राजनीति से भी जोड़ दिया गया है । सुप्रीम कोर्ट का फैसला तो संविधान का हिस्सा बन जाता है । अगर सुप्रीम कोर्ट मर्जी के मुताबिक न चले, तो अध्यादेश का विकल्प के लिए सरकार तत्पर रहती है ।
राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ताजा है और उसी समय सुप्रीम कोर्ट को केरल के साबरीमला मंदिर वाला अपना फैसला दूसरी बेंच को भेजना पड़ा । लोकसभा चुनाव, 2019 के लिए जनवरी में अयोध्या पर अध्यादेश लाने की चर्चा गरम थी । क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सितंबर, 2018 में सुनवाई की अगली तारीख जनवरी में दी । सुप्रीम कोर्ट ने अपने अस्तित्व में आने के समय 1950 से चले आ रहे इस विवाद को विराम देनेवाला फैसला संविधान की 70वीं वर्षगांठ के समय सुनाया । केरल के साबरीमला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर रोक हटाने का फैसला भी सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2018 में ही दिया । उस समय केरल की वाममोर्चा सरकार ने इस फैसले को लागू करके महिलाओं को सुरक्षा दी, जबकि संवैधानिक अधिकार पर हावी भाजपा की हिंदू आस्था में कांग्रेस भी शामिल हो गयी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध किया । अभी उसी केरल सरकार ने 16 नवंबर को आंध्र प्रदेश से दर्शनार्थ आयी 10 युवा महिलाओं को सुरक्षा देने से इंकार करके वापस भेज दिया । क्योंकि सुप्रीम कोर्ट को अपने 2018 फैसले के खिलाफ दायर अर्जियां सुनवाई के लिए दूसरी बड़ी पीठ को सौंपनी पड़ी । सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जजों की नियुक्ति को लेकर संविधान के दोनों अंग कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में टकराव हमेशा बना रहता है । 6 नवंबर को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली नौ जजों की पीठ ने 1993 के सुप्रीम कोर्ट फैसले की समीक्षा की अर्जी ठुकरा दी । उसी फैसले में जजों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट संचालित कोलेजियम प्रणाली शुरू हुई । उसके काट में केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट बनाया, जिसे अक्टूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक घोषित कर दिया । इस फैसले पर पुनर्विचार याचिका भी दिसंबर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने ठुकरा दी ।
भ्रष्टाचार मामलों की जांच करनेवाली देश की सबसे बड़ी एजेंसी सीबीआई(केंद्रीय जांच ब्यूरो) की संवैधानिक हैसियत पर संशय बना हुआ है और यह एजेंसी काम किए जा रही है । नवंबर, 2013 में गुवाहाटी हाईकोर्ट ने यह कहकर सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया कि इसका गठन संसद से पारित एक्ट के तहत नहीं हुआ है । केंद्र सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । तत्कालीन चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम ने इस पर तुरंत बिना सुनवाई के स्टे दे दिया उसी स्टे पर सीबीआई का काम चल रहा है ।
जुलाई, 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जन प्रतिनिधित्व कानून के अनुच्छेद 8(4) को समाप्त कर दिया, जिसके अंतर्गत अपराध में लिप्त जनप्रतिनिधियों को चुनाव लड़ने और ‘ला मेकर’ बने रहने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त था । सारे राजनीतिक दल बिफर उठे । उसकी काट में सर्वदलीय सहमति से अध्यादेश लाने का मसौदा तैयार हो गया । राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने वैसे अध्यादेश के औचित्य पर ऊंगली उठा दी और संविधान की मर्यादा बरकरार रखी ।
70 वर्षों में ऐसा कोई संवैधानिक पद गठित नहीं हो पाया, जिसके पास भ्रष्टाचार के खिलाफ सीधी कार्रवाई करने का पूरा अधिकार हो । इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, बहुप्रचारित और बहुविवादित लोकपाल । पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राज्यसभा में जो कहा, वो पूरी तरह लोकपाल गठन प्रक्रिया पर लागू होता है । सुप्रीम कोर्ट की बार-बार फटकार के बावजूद लोकसभा में विपक्षी नेता की जगह सबसे बड़ी पार्टी के नेता को लोकपाल चयन समिति में शामिल करनेवाला संविधान संशोधन बिल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूरे शासनकाल में लटका रहा । कांग्रेस को लोकसभा में विपक्षी नेता का दर्जा प्राप्त नहीं था, लेकिन सबसे बड़ी पार्टी थी । आखिर इसके बगैर ही मार्च, 2019 में लोकपाल गठन तो हुआ । पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस पिनाकी चन्द्र घोष पहले लोकपाल बने । मगर किसी को पता नहीं कि लोकपाल काम क्या कर रहा है ।