केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार के सबसे ज्यादा विवादास्पद फैसले नागरिकता(संशोधन) एक्ट, 2019 (सीएए) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर(एनआरसी) तैयार करने का थोपा गया अभियान चलाया जाना कोरोना विपदा के कारण नरम पड़ा है । मगर नागरिकता(संशोधन) एक्ट(सीएए) को लेकर विवाद थमा नहीं है । 2019 में सीएए लाने की नौबत असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों की बहुतायत से आबादी संतुलन बिगड़ने के कारण आयी । मगर केंद्र सरकार ने अपने हिन्दुत्व एजेंडे के अंतर्गत जो सीएए संसद से पारित कराया, उससे बात और बिगड़ गयी । ऐसी बिगड़ी कि असम से निकलकर सीएए विरोध पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा के रूप में छा गया ।
लाख शुक्र है कोरोना दैवी आपदा का, जिसके चलते अशांत माहौल ने दूसरा रंग ले लिया और हिंसा /नफरत की राजनीति दब गयी । सीएए पर विवाद भड़कने का असली कारण था, इस कानून में विवादित प्रावधान का जोड़ा जाना । राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने असम में एनआरसी तैयार करने का कटऑफ इयर अपनी सत्ता नीति की सुविधा से तय किया । सीएए के अनुसार भाजपा सिर्फ उन्हीं बांग्लादेशियों को नागरिकता प्रदान करना चाहती थी, जो 25 मार्च, 1971 और 31 दिसंबर, 2014 के बीच आए तथा जिनका नाम असम में अपडेट राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में शामिल नहीं किया गया । धर्म के आधार पर नागरिकता प्रदान करने का दूसरा प्रावधान था पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लोदश के सिर्फ उन गैर-मुस्लिम समुदायों को देश का नागरिक बनाना, जो 31 दिसंबर, 2014 को या उसके पहले भारत आए । इसी आधार पर पूरे देश में राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर(एनपीआर) बनाने पर भी अमित शाह तुले थे ।
11 दिसंबर, 2019 को संसद से सीएए पास हुआ और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने तुरंत 12 दिसंबर को ही मंजूरी दे दी । एक महीने के बाद गृह मंत्रालय ने अधिसूचना जारी किया कि नागरिकता(संशोधन) एक्ट, 2019 10 जनवरी से प्रभावी होगा ।
सीएए का मसौदा तब तैयार हुआ, जब 2016 में असम में कांग्रेस को हराकर भाजपा सत्ता में आयी, और सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने । सीएए मसौदा तैयार होने के दौरान सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एनआरसी असम में तैयार हो रहा था । नागरिकता विवाद पुराना है, कांग्रेस शासनकाल के समय से ही चला आ रहा है । भाजपा नेता के रूप में सर्बानंद सोनोवाल ही इसे सुप्रीम कोर्ट ले गए । जब सुप्रीम कोर्ट बार-बार केंद्र सरकार को एनआरसी प्रकाशित करने की डेडलाईन दे रही थी, उस वक्त तक सर्बानंद सोनोवाल असम के मुख्यमंत्री बन चुके थे और केंद्र की उनकी अपनी सरकार सुप्रीम कोर्ट से बार-बार डेडलाईन की तारीख बढ़ाने की मांग कर रही थी ।
2014 से अब तक जितनी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी असम के दौरे पर गए और 2019 में गृहमंत्री बने अमित शाह भी जब-जब गुवाहाटी गए, दोनों ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी निर्णय में असम समझौते का ख्याल रखा जाएगा । गौरतलब है कि 1979-1985 के दौरान विदेशी(घुसपैठिए) विरोध में जबर्दश्त खूनी छात्र आंदोलन चला । इस आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले ऑल असम छात्र संघ(आसू) के साथ 1985 में हुए समझौते के बाद आंदोलन थमा । इस आंदोलन से उपजे असम गण परिषद का सत्ता में आने के बाद भाजपा गठजोड़ से चुनावी तालमेल भी हुआ । आसू नेता आज तक 1951 को आधार वर्ष मानकर एनआरसी तैयार करने और असम समझौते के उपबंध-6 के अनुसार ही असम की सारी व्यवस्था तय करने पर अड़े हैं । विदेशियों की पहचान के लिए बने ट्रिब्यूनल विवाद के घेरे में है । एनआरसी में जिनका नाम छूटा और जिनका नाम शामिल हुआ, उसे लेकर भी आपाधापी मची है ।
उससे भी महत्वपूर्ण बात ये है कि सीएए बने अमूमन एक साल होने के बावजूद अभी तक केंद्रीय गृह मंत्रालय सीएए के नियम तैयार नहीं कर पाया है । नियम तय हुए और इसकी अधिसूचना जारी किए बगैर सीएए न तो प्रभावी हो सकता है, न लागू किया जा सकता है । सीएए के पूरक विधेयक पर संसद की स्थायी समिति से केंद्र सरकार दो बार समय मांग चुकी है । जिस कानून को लागू करने के नियम तैयार अभी तक नहीं हो पाए हैं, उसके विरोध में हुई विभिन्न हिंसक वारदातों में तकरीबन 70 लोग मारे जा चुके है । देशव्यापी विरोध में सैकड़ों लोग गिरफ्तार किए गए । भाजपा शासित राज्य सरकारों ने सबों के खिलाफ ‘देशद्रोह’ का मामला बनाया । सबसे ज्यादा सीएए विरोधी उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ शासन में गिरफ्तार किए गए । मार्च में कोरोना लॉकडाउन के बाद विरोध, प्रदर्शन बंद हो पाया । दिल्ली में महीनों तक चले शाहीनबाग घटना तो ऐतिहासिक है । कोरोना देश की जनता के लिए भले अभिशाप(दैवी प्रकोप) हो, मगर सीएए विरोधियों के लिए वरदान साबित हुआ । बहुचर्चित कैदी गोरखपुर के डॉक्टर कफील खान को तुरंत रिहा करने का आदेश इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सितंबर को जारी किया । हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून(एनएसए) के अंतर्गत डॉ. कफील खान की गिरफ्तारी को गैरकानूनी घोषित कर दिया । डॉ. खान को दिसंबर, 2019 में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में सीएए के विरोध में दिए गए कथित भड़काऊ भाषण के कारण गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ एनएसए लगाया गया । दिल्ली में जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी समेत अन्य गिरफ्तारियों का भी विभिन्न कोर्टों में ट्रायल चल रहा है । गुवाहाटी में राष्ट्रीय जांच एजेंसी(एनआईए) की स्पेशल कोर्ट ने सीएए विरोधी कृषक मुक्ति संग्राम समिति (अखिल गोगोई गुट) के सदस्य बिट्टू सोनोवाल को जमानत दे दी। उसके पहले चार और विरोधी रिहा किए गए ।
सीएए को लेकर असम में उपजे झमेले से पहले यह देखिए कि केंद्र सरकार अपने किए कराए के कानूनी उलझन में किस तरह फंसी है । संसदीय समिति से गृह मंत्रालय ने दो अगस्त को तीन महीने की बढ़ोतरी मांगी, जब संसद की स्थायी समिति ने पूछा कि सीएए नियम अभी तक क्यों नहीं बने । संसदीय कार्य मैनुअल के मुताबिक कोई भी एक्ट लागू होने की तारीख से छह महीने के अंदर सरकार को उसके स्टेच्यूटरी नियम, रेग्यूलेशन, बाइ-लॉज तैयार करने हैं । अगर सरकार समय मांगती है तो उसका कारण संसदीय समिति को बताना होगा और एक बार में तीन महीने से ज्यादा समय नहीं दिया जा सकता । सरकार ने जो संसदीय समिति से समय लिया है, वो अक्टूबर तक है ।
लेकिन असम का राजनीतिक/सामाजिक विवाद केंद्र सरकार के लिए ज्यादा बड़ा सिरदर्द है । 2021 में असम में चुनाव होने हैं । एनआरसी तैयार होने की प्रक्रिया के दौरान ही असम समझौते के अनुसार ‘असमियों की परिभाषा’ तय करने के लिए उच्चस्तरीय कमिटी बनायी गयी । कमिटी के अध्यक्ष जस्टिस(सेवानिवृत्त) बिप्लव कुमार शर्मा तक गृह मंत्रालय के रवैए से खिन्न हैं । 25 फरवरी को जस्टिस शर्मा ने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री ने उनसे कहा कि वे मुख्यमंत्री के जरिए रिपोर्ट सौंप दें । 25 फरवरी को रिपोर्ट सौंपे जाने के समारोह में कमिटी में आसू के तीन सदस्य समारोह में शामिल नहीं हुए । आसू के मुख्य सलाहकार समुज्जल कुमार भट्टाचार्य ने 11 अगस्त को गुवाहाटी में बोला - ‘हमें नहीं पता कमिटी की रिपोर्ट कहां है, दिल्ली पहुंची भी कि नहीं, हमें लगता है कि सरकार मामले की उपेक्षा कर रही है ।’
14 सदस्यीय कमिटी असम समझौते के उपबंध 6 पर ही सुझाव देने के लिए बनी, जिस पर तय होना है कि असम निवासियों में असमियों की परिभाषा क्या हो । असम समझौते के गोपनीय उपबंध-6 के प्रावधान आसू नेता प्रचार कर रहे हैं, जिसमें असमियों के सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान और धरोहरों की रक्षा के लिए प्रशासनिक कवच की बात है । सात फरवरी को बोरो समझौते के अवसर पर कोकराझार में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि असम समझौते का उपबंध-6 पूरी तरह लागू होगा । संसद में सीएए बिल पर बहस के दौरान गृहमंत्री अमित शाह ने भी यही बात कही ।
कोरोना के बावजूद असम में तनाव व्याप्त है । अगस्त के पहले सप्ताह में सेना को फ्लैग मार्च करना पड़ा । एनआरसी में जिनके नाम नहीं आए हैं, उनका भविष्य अधर में लटका है । ऐसे 19 लाख लोग हैं, जो 30 अगस्त को विरोध प्रदर्शन पर आमादा थे । एक साल हो गए, उन्हें नाम ठुकराने की पर्ची नहीं मिली है, ताकि वे विदेशी ट्रिब्यूनल के पास फिर से अपनी नागरिकता स्टेटस पर विचार करने के लिए एप्रोच कर सकें । 31 अगस्त को असम सरकार ने सदन में एक सवाल के जवाब में बताया कि असम विदेशी ट्रिब्यूनलों के पास 83,000 मामले लंबित हैं । इन ‘डी’(डाउटफुल, संदिग्ध) नागरिकों का भविष्य अनिश्चित है । सरकार के अनुसार छह बंधक कैंपों में 425 लोग हैं ।
सीएए को चुनौती देनेवाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं । लेकिन जब सरकार सीएए लागू करने के नियम ही सात महीने से तैयार नहीं कर पा रही है तो फिर सुप्रीम कोर्ट विचार क्या करेगी ।