भाजपा के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा का टिकट कटने के बाद मुंह खोला और अभिव्यक्ति की आजादी समेत ‘देशद्रोह’ को लेकर चल रहे विवाद पर अपनी पार्टी का रूख स्पष्ट किया । भाजपा स्थापना दिवस से दो दिन पहले पार्टी को नीति स्पष्ट करते हुए आडवाणी ने कहा कि उनकी पार्टी ने कभी भी मतभेद रखनेवालों को ‘राष्ट्रविरोधी’ या ‘दुश्मन’ नहीं, बल्कि सिर्फ राजनीतिक विरोधी माना । उन्होंने अपने ब्लॉग में लिखा - ‘देश पहले, पार्टी उसके बाद और स्व अंत में ।’ 91 वर्षीय आडवाणी ने वैसे ‘देशद्रोही’ की जगह ‘राष्ट्रविरोधी’ शब्द का इस्तेमाल किया है, मगर उनकी पार्टी राजनीतिक विरोधियों को माओवादी बताकर ‘देशद्रोह’ के जुर्म में जेल में डालने के कारण विवाद के घेरे में है । भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर सीधी टक्कर देनेवाली सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है, इसलिए भाजपा ने माओवादियों की कांग्रेस से मिलीभगत बतायी और भाजपा के ‘राष्ट्रवाद’ से मतभेद रखनेवाले सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा बुद्धिजीवियों को नक्सली संगठनों से कथित ताल्लुकात के आरोप में जेल में डाला । उन सबों को देशद्रोह की धारा-124 के अंतर्गत गिरफ्तार किया गया । केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार और भाजपा शासित राज्य सरकारों ने यह सिलसिला पूरे पांच साल तक चलाया । भाजपा के सम्मानित नेता आडवाणी ने पांच वर्षों तक होंठ सिले रखे । इसका मतलब उनकी अभिव्यक्ति पर रोक पार्टी के अंदरूनी दबाब में लगी थी अथवा आडवाणी के लिए ‘पार्टी पहले’ ‘देश बाद’ में था ।
आडवाणीजी की आंखों के सामने ही अगस्त, 2018 में सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतभेद सेफ्टी वाल्व की तरह होते हैं, अगर उन्हें रोका गया तो प्रेशर कूकर फट जाएगा ।’ चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने 29 अगस्त, 2018 को यह बात पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों की गिरफ्तारी पर रोक लगाने के समय कही । उनके खिलाफ महाराष्ट्र की भाजपा सरकार ने भाजपा शासित नक्सल प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ की मदद से ‘देशद्रोह’ का मामला ‘शहरी नक्सली’ कहकर बनाया था ।
दरअसल यह धरपकड़ अभियान 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के समय से ही देशभर में चलाया जा रहा था । 2017-18 में यह अपने चरम पर पहुंचा, जब जानेमाने बुद्धिजीवी विचारक इन शहरी नक्सलियों के समर्थन में आगे आए और ‘देशद्रोही’ कहलाए ।
भाजपा की स्थापना दिवस हर साल 6 अप्रील को मनाया जाता रहा । लालकृष्ण आडवाणी जी ने कभी अपने पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को ‘देश पहले, पार्टी बाद में’ वाली नीति की याद नहीं दिलायी ।
राजनीतिक विरोधियों को ‘राष्ट्रविरोधी’/ ‘देशद्रोही’ कहकर जलों में बंद करने के अभियान से आडवाणी सहमत थे या नहीं, ये लोग नहीं जानते थे । क्या आडवाणी ‘प्रेशर’ में थे और अपने राजनीतिक और पार्टी हित स्वार्थ के वशीभूत थे? आडवाणीजी जैसे दिग्गज नेता अच्छी तरह समझ रहे होंगे कि भाजपा विरोधी पार्टियों और संगठनों पर क्या गुजर रही होगी । लेकिन पांच साल तक आडवाणी जी चुप रहे । ‘प्रेशर कूकर’ तब फटा, जब अभी लोकसभा का उनका टिकट कटा । अगर टिकट मिल जाता तो आडवाणी जी के लिए ‘पार्टी पहले, स्वार्थ उसके बाद और देश अंत में’ वाला सिद्धांत बरकरार रहता । आडवाणीजी के मुंह खोलते ही भाजपा के दूसरे अभिशप्त वरि’ नेता मुरली मनोहर जोशी उनसे मिलने पहुंचे । क्योंकि जोशी जी का भी कानपुर लोकसभा सीट से टिकट काट दिया गया । आडवाणी जी की गुजरात में गांधीनगर लोकसभा सीट से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह उम्मीदवार बने हैं । अमित शाह भाजपा को ‘राष्ट्रवादी’ और भाजपा की नीतियों का विरोध करनेवालों को ‘राष्ट्रविरोधी’ बतानेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद दूसरे नेता हैं ।
लालकृष्ण आडवाणी भाजपा के संस्थापकों में से रहे हैं और सबसे लंबे समय तक पार्टी के अध्यक्ष रहे । 1991 से लगातार छहबार गांधीनगर का प्रतिनिधित्व करनेवाले आडवाणी जी ने अपने मतदाताओं के प्रति ‘कृतज्ञता’ व्यक्त करते हुए पार्टी के अंदर और देश के अंदर अभिव्यक्ति तथा मत विभिन्नता पर बढ़ते अंकुश पर चिंता जतायी । मुरली मनोहर जोशी ने तो अपने अंदर के आक्रोश से मतदाताओं को अवगत करा दिया । लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन ने भी इंदौर से टिकट नहीं मिलने के प्रति विरोध जताया । यह सारा 75 वर्ष की उम्र पार कर चुके नेताओं को टिकट न देने की नीति के तहत हुआ या विरोधियों को चलता करने के इरादे से हुआ, यह तो अंदर की बात है । अभिनता शत्रुध्न सिन्हा ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल होकर पटना की पाटलिपुत्र सीट से अपनी दावेदारी बरकरार रखने के बाद बोला कि यशवंत सिन्हा, अरूण शौरी जैसे नेताओं के साथ भाजपा ने क्या व्यवहार किया ये सभी जानते हैं । यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी लगातार नरेंद्र मोदी की नीतियों का खुला विरोध करते रहे, मुरली मनोहर जोशी खामोश तमाशा देखते रहे । लोकसभा का टिकट कटने के बाद आडवाणी जी के प्रेशर फटने का नरेंद्र मोदी पर कोई असर नहीं पड़ा । नरेंद्र मोदी ने आडवाणी के ब्लॉग के जवाब में पार्टी का ‘सही मकसद’ बताने के लिए ट्वीट करके ऐसे महान नेता के प्रति ‘गर्व व्यक्त किया । और उनके टिकट कटने पर कोई टिप्पणी किए बगैर राष्ट्रवादी अभियान में जुटे रहे । उसके तुरंत बाद नरेंद्र मोदी ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा के नक्सल प्रभावित इलाकों में बार-बार कहा कि ‘देशदोहियों’ की मदद करने में कांग्रेस लगी है । प्रधानमंत्री ने तीखा हमला करते हुए कहा कि कांग्रेस उनलोगों को बचाने में जुटी है, जो आतंकवादियों और माओवादियों को शरण देते हैं । नवंबर, 2018 में छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव के समय भी नरेंद्र मोदी ने अपने प्रचार अभियान में लगातार कहा कि कांग्रेस माओवादियों और देशद्रोहियों से मिली हुई है । आडवाणी जी की पार्टी प्रतिबद्धता नसीहत को किसी ने तबज्जो नहीं दी । कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणापत्र में आईपीसी की धारा-124 खतम करने का प्रस्ताव रखा तो उसके विरोध में भाजपा राष्ट्रीय माहसचिव तरूण चग ने कहा - प्रत्येक ‘राष्ट्रवादी’ को कांग्रेस के इस प्रस्ताव से आश्चर्य हुआ । क्योंकि आईपीसी-124 वास्तव में ‘राष्ट्रविरोधी’ और ‘देशद्रोही’ गतिविधियों के लिए सजा के प्रावधान वाली धारा है । उससे बेखबर भाजपा ने आठ अप्रील को जारी अपने ‘संकल्प पत्र’ में धारा-124 का कोई जिक्र नहीं किया और ‘राष्ट्रवाद’ की दुहाई दी । धारा-124 का इस्तेमाल भाजपा विरोधी जिन बुद्धिजीवियों के खिलाफ हुआ है और जिसका जिक्र छत्तीसगढ़ विधान सभा चुनाव में प्रधानमंत्री ने उन्हें कांग्रेस समर्थित ‘देशद्रोही’ के रूप में किया, उसका असर हुआ । 2003 स लगातार मुख्यमंत्री बननेवाले भाजपा के रमन सिंह सत्ता से बाहर हो गए । पूर्वोत्तर के विद्रोहियों की तरह नक्सल इलाकों से भी फर्जी मुठभेड़ की खबरें दबाने क बावजूद बाहर आ जाती हैं । छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ऐसी खबरें दबाने और नक्सलियों के खिलाफ गांववालों को सरकारी नक्सली बनाने(सलवा जुडूम) में अब्बल रहे । 2007 में सुप्रीम कोर्ट की फटकार का भी कोई असर नहीं हुआ । मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से लेकर पत्रकार, लेखक सबको देशद्रोही कानून में फंसाकर बंद कर दिया गया । छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बाघेल भाजपा ही नहीं, कांग्रेस के लिए भी एक उदाहरण हैं । बाघेल सरकार में मंत्री कवासी लखमा ने अपने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर एक नक्सली मुठभेड़ को फर्जी बताया, जिसमें एक महिला की मृत्यु का कारण सीआरपी ने ‘क्रॉसफायर’ कहा । नक्सल प्रभावित सुकमा से लगातार पांचवीं बार विधायक बने कवासी लखमा 25 मई, 2013 के माओवादी हमले के एकमात्र जीवित बचे कांग्रेसी नेता हैं । उस घटना में कांग्रेस के सारे शीर्ष नेता मारे गए । उस समय से अब तक कांग्रेस को जीवित रखनेवाले नक्सल गांव निवासी भूपेश बाघेल दिसंबर, 2018 में मुख्यमंत्री बने । दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, जेएनयू प्रोफेसर अर्चना प्रसाद, कम्यूनिस्ट नेता संजय पटारे समेत तीन अन्य को भूपेश बघेल सरकार ने हत्या के आरोप से बरी कर दिया । नक्सल इलाके में भाजपा की नीतियों के खिलाफ काम करने के जुर्म में इन बुद्धिजीवियों को हत्या और आपराधिक षडयंत्र में फंसाया गया था ।
29 अगस्त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने जिन पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी पर रोक लगायी वे हैं - कवि बारावारा राव, वकील सुधा भारद्वाज, बर्नोन गोंजाविल्स, अरूण फरेरिया और गौतम नवलखा । इनकी ओर से सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगानेवाले बुद्धिजीवी थे - प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक, देवकी जैन, समाशास्त्री सतीश देशपांडे और मानवाधिकार वकील माजा दारूवाला । सुप्रीम कोर्ट से निकलकर रोमिला थापर ने ‘शहरी नक्सली’ की भाजपाई परिभाषा पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या भाजपा का विरोध करनेवाले ‘देशद्रोही’ हैं?
औपनिवेशिक शासनकाल में 1860 में बने आईपीसी की धारा-124 का हिस्सा ‘देशद्रोह’ नहीं था । 1870 में इसे धारा-124ए बताकर सिर्फ स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज बंद करने और उन्हें जेल में बंद करने के लिए जोड़ा गया । इस संबंध में आजादी के बाद का दो उदाहरण गौर करने लायक है । डीएमके संस्थापक मद्रास (आज का तमिलनाडु) के पूर्व मुख्यमंत्री सी. एन. अन्नादुरई ने हिन्दी थोपने के विरोध में 1962 में संसद में कहा - ‘हमें आत्मनिर्णय का अधिकार है’ और अलग तमिल ‘राष्ट्र’ की मांग की । प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उनके खिलाफ देशद्रोह का आरोप नहीं लगाया ।
नवंबर, 2015 में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने लोकगायक कोवन को नक्सली बताकर ‘देशद्रोह’ के जुर्म में जेल में डाल दिया । कोवन का ‘देशद्रोह’ था, गांव-गांव में सरकारी शराब दुकानों के ठेके का विरोध करना ।
संविधान सभा में जब देशद्रोह वाला विषय बहस के लिए आया तो के. एम. मुन्शी ने आईपीसी 124 ए को खतम करने का संशोधन पेश किया । उसे स्वीकार किया गया और इसे संविधान में नहीं जोड़ा गया । एक स्टेच्यूट के हिस्से के रूप में इस आईपीसी धारा का दुरूपयोग हो रहा है । जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत कई छात्र अफजल गुरू की फांसी का विरोध करने के कारण ‘देशद्रोह’ मुकदमे में फंसे हैं । असमिया विद्वान हीरेन गोहेन को जनवरी, 2019 में धारा-124ए के अंतर्गत ‘देशद्रोह’ मामले में गिरफ्तार कर लिया गया ।