प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने हर भाषणधसंबोधन में मतदाताओं को जोर देकर बताते हैं कि दुनिया भर में भारत के विकास और ऐतिहासिक उपलब्धियों की चर्चा हो रही है । अभी चुनावी सभाओं में विपक्ष की आलोचना से पहले प्रधानमंत्री देश की जनता को याद दिलाते हैं कि पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है । केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण आर्थिक उपलब्धियों का जिक्र करते हुए कहती हैं कि विश्व अर्थव्यवस्था में भारत का अभी पांचवां स्थान और जल्द ही तीसरे स्थान पर आ जाएगा ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मतदाताओं को बार-बार यह आश्वस्त करना चाहते हैं कि दुनिया भर में भारत के विषय में वही चर्चा हो रही है, जो वे बता रहे हैं । उनके अनुसार अंतरराष्ट्रीय जगत में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार की नीतियों की तारीफ हो रही है, क्योंकि सारे कदम ‘सबका साथ सबका विकास’ लक्ष्य पर केंद्रित है ।
प्रधानमंत्री के प्रचार अभियान एजेंडे में दुनिया में हो रही ऐसी चर्चा का स्थान नहीं है, जिसमें उनके किसी कदम की आलोचना हो । नरेंद्र मोदी के अनुसार ऐसी चर्चा करनेवालों को या तो सही जानकारी नहीं है या वे भारत के हितैषी नहीं हैं ।
विदेश मंत्रालय ऐसी चर्चाओं को भारत का आंतरिक मामला बताकर खारिज कर देता है और अनपेक्षित बताकर विदेशी टिप्पणीकार को छिड़क देता हे । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेशी मीडिया से भी भारतीय मीडिया की तरह अपेक्षा करते हैं कि उन्हीं बातों को प्रचारित करें जो वे चाहते हैं । जिन मामलों का अंतरराष्ट्रीय ताल्लुक है, उसमें भी नरेंद्र मोदी सरकार दुनिया को यह बताना चाहती है कि यह भारत का अंदरूनी मामला है और वैसी चर्चा को खारिज करके उसे भारत की जनता से सार्वजनिक या ‘मन की बात’ कार्यक्रमों में साझा नहीं किया जाता ।
नागरिकता संशोधन कानून(सीएए) की आम चुनाव ऐलान से पहले जारी अधिसूचना अभी ऐसा ही मामला बना हुआ है । सीएए लागू करने के नियम की अधिसूचना 11 मार्च को जारी होते ही अमेरिकी विदेश विभाग ने इसे अपनी रोजाना मीडिया ब्रीफिंग में शामिल कर लिया । अमेरिकी विदेश विभाग प्रवक्ता मैथ्यू मिलर ने 11 मार्च को ही कहा कि रमजान के महीने में जारी की गयी मुस्लिम समुदाय पर केंद्रित सीएए अधिसूचना भारतीय संविधान में सर्वधर्म समभाव की भावना के खिलाफ है । उसके बाद अमेरिकी सीनेट विदेशी सम्बन्ध कमिटी के अध्यक्ष बेन कार्डिन ने भी इसी से मिलती-जुलती टिप्पणी की । सीनेटर बेन कार्डिन ने सीएए अधिसूचना जारी होने के समय को रमजान महीने के साथ-साथ मानवाधिकार से भी जोड़ा । दोनों ही अमेरिकी टिप्पणी की प्रतिक्रिया में भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने ‘गलत जानकारी’ और ‘अवांछित’ बताकर खारिज कर दिया । विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी सफाई दी । लेकिन चर्चा समाप्त नहीं हुई ।
संयुक्त राष्ट्र महासभा हेडक्वार्टर न्यूयार्क से यह बात भारत आयी और दुनिया के अन्य देशों में भी बहस का विषय बनी । पाकिस्तान और चीन के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘इस्लामोफोबिया’ बताकर हुई वोटिंग वैसी ही ‘ऐतिहासिक’ है, जैसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के सभी नेता अपनी हर नीति को ऐतिहासिक बताते हैं । 193-सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ‘इस्लामोफोबिया रोकने के उपाय’ नाम देकर प्रस्ताव 16 मार्च को पास किया, जिसके समर्थन में 115 सदस्य देशों ने वोट डाले । एक भी वोट विरोध में नहीं पड़ा । यहां तक कि भारत ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया । मतदान में भाग नहीं लेनेवाले 44 देशों में भारत के अलावे ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, इटली, यूक्रेन और इंग्लैंड शामिल हैं । संयुक्त राष्ट्र संघ के 88 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है, जब भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में ‘इस्लामोफोबिया’ पर भारी बहुमत से प्रस्ताव पास किया गया ।
संयुक्त राष्ट्र स्थित भारत की स्थायी प्रतिनिधि रूचिरा काम्बोज ने क्रिश्चियानोफोबिया समेत विश्व के अन्य धार्मिक उन्माद वाले फोबियों का उदाहरण देते हुए भारत का पक्ष रखते हुए कहा कि अन्य देशों के ‘रेलिजियोफोबिया’ (धार्मिक फोबिया) से बाकी समुदाय के लोग प्रभावित होते आए हैं । सीएए की विवादित अधिसूचना पर भारत की प्रतिनिधि विश्व मंच पर अपने देश का बचाव नहीं कर पायीं । आखिरकार रूचिरा काम्बोज को कहना पड़ा कि इस्लोमोफोबिया का मुद्दा बेशक मायने रखता है, लेकिन हमें यह भी मानना चाहिए कि अन्य धर्मों के लोग भी भेदभाव और हिंसा झेल रहे हैं । उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि सभी सदस्य देशों को विश्वभर में फैले धार्मिक भेदभाव के बारे में भी विचार करना चाहिए । लेकिन भारतीय प्रतिनिधि की आवाज प्रस्ताव के समर्थन में जुटे बहुमत के बीच दब गयी । यह ड्राफ्ट प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र महासभा में पाकिस्तान ने चीन के सहयोग से चर्चा के लिए रखा । प्रस्ताव में भारत के सीएए नागरिकता नियम अधिसूचना पर संयुक्त राष्ट्र सदस्यों को बताया गया कि सिर्फ एक धर्म को अलग कर हिन्दू, बौद्ध, इसाई, सिख, जैन, पारसी के हिंसा और भेदभाव का शिकार बताकर उनके खिलाफ ‘रेलियोफोबिया’ वास्तव में ‘इस्लामोफोबिया’ है । गौरतलब है कि सीएए के अंतर्गत नागरिकता प्रदान करने की नीति में इस्लामी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार होकर भारत आए हिन्दू, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का प्रावधान है । कुछ वर्षों में भारत की अभूतपूर्व प्रगति को दुनिया भर में भारत पर चर्चा का विषय बार-बार बतानेवाले नरेंद्र मोदी सीएए पर चुप हैं । ऐसे धार्मिक आधार पर नागरिकता प्रदान करने के प्रावधान पर संयुक्त राष्ट्र में हुई चर्चा को नरेंद्र मोदी के ‘प्यारे देशवासियों’ को भारत के विषय में चर्चा नहीं माननी चाहिए । क्योंकि प्रधानमंत्री के मुंह से इस चर्चा पर एक शब्द नहीं निकल रहा । संयुक्त राष्ट्र में इस प्रस्ताव पर वोट डालनेवाले सारे अरब और इस्लामी देश हैं, यह तो कहने की जरूरत नहीं । नरेंद्र मोदी ने अपने 10 वर्षों के कार्यकाल में किसी भी अन्य प्रधानमंत्री के ज्यादा विदेशी दौरे किए हैं और अरब देशों से नजदीकी स्थापित की है । सारे इस्लामी देशों ने साबित कर दिया कि भारत के बारे में सिर्फ वही चर्चा नहीं हो सकती, जो नरेंद्र मोदी अपने देशवासियों को बताते हैं । चुनावी बांड पर एसबीआई की पेशी के दिन 18 मार्च को सुप्रीम कोर्ट पीठ के एक जज बी. आर. गवई ने मुकुल रोहतगी को कहा कि ‘सारा कुछ दुनिया जान रही है ।’ रोहतगी चुनावी बांड खुलासा पर रोक लगाने की सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन अर्जी की ओर से पेश हुए थे । नरेंद्र मोदी के गृह राज्य गुजरात के यूनिवर्सिटी होस्टल में 19 मार्च को रमजान की नमाज के समय रात को अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान और श्रीलंका के छात्रों पर हुए हमले की चर्चा दुनिया के अन्य देशों में नहीं हुई, ऐसा कैसे माना जा सकता है? इसे ‘इस्लामोफोबिया’ कहा जाए तो गलत क्या है? सुप्रीम कोर्ट में सीएए नियम अधिसूचना पर रोक लगाने के लिए दायर 20 अर्जियों में असदुद्दीन ओबैसी की भी अर्जी है । उन्होंने एक नया पहलू उठा दिया है । ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन नेता ओबैसी ने इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर रोक लगाने की गुहार लगायी है कि सीएए नियम अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश में रह रहे अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को फास्ट ट्रैक भारतीय नागरिकता पाने के लिए हिन्दू धर्म अपनाने का प्रलोभन देनेवाला है । बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक नहीं लगायी और केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए तीन हफ्ते का समय दिया । इस पर दुनिया में क्या और कैसी चर्चा होगी? ‘एक देश एक चुनाव’ पर विचार के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में गठित कमिटी की रिपोर्ट आ जाने के बावजूद जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ न कराए जाने पर वहां के नेता के बयानों पर दुनिया की चर्चा को किस रूप में देखा जाए । अपने कार्यकाल में नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र में स्थायी सीट का भारतीय दावा डंप कर दिया, जो उनसे पहले की सभी सरकारों ने हमेशा दुनिया भर में चर्चित रखा । क्या यह भी भारत की प्रगति की चर्चा में आएगा?