गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाने के केंद्र सरकार के फैसले को लेकर बवाल मचा हुआ है । सीबीआई डायरेक्टर घमासान को लेकर दो साल से विवादित राकेश अस्थाना फिर से विवाद के घेरे में हैं। अभी ताजा विवाद का कारण है राकेश अस्थाना की दिल्ली पुलिस कमिश्नर के रूप में उस समय नियुक्ति, जब उनके रिटायर होने में सिर्फ चार दिन शेष रह गए थे । अस्थाना को दिल्ली पुलिस आयुक्त बनाकर केंद्र सरकार ने कई नए विवाद खड़े कर दिए हैं। यह नियुक्ति एक ही साथ केंद्रशासित क्षेत्रों के काडर और पुलिस प्रमुख बनाने के सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मानदंडों की भी खुली अवहेलना है । उसमें भी वैसे समय में, जब सुप्रीम कोर्ट ने दो महीना पहले राकेश अस्थाना की सीबीआई डायरेक्टर पद की दावेदारी इस आधार पर खारिज कर दी कि उनके रिटायरमेंट में छह महीने से भी कम समय बचा है । 2019-20 में सीबीआई के अंदर हाईप्रोफाईल रिश्वतखोरी को लेकर मचे घमासान के समय राकेश अस्थाना स्पेशल डायरेक्टर थे और केंद्र सरकार उन्हीं को डायरेक्टर बनाना चाहती थी । लंबे समय तक चले उस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद केंद्र सरकार को राकेश अस्थाना को सीबीआई से हटाना पड़ा ।
राकेश अस्थाना के बारे में सबसे ज्यादा चर्चा का विषय है कि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफी करीबी माने जाते हैं ।
अभी वैसे समय में राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस का प्रमुख बना दिया गया, जब दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच ‘पावर’ की लड़ाई ठनी हुई है । राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र(एनसीटी) दिल्ली की निर्वाचित सरकार दिल्ली पुलिस अपने अधीन लाने और राज्य का दर्जा पाने की जीतोड़ कोशिश में जुटी है और केंद्र सरकार दिल्ली सरकार के सारे अधिकार छीनकर उपराज्यपाल के हाथ में देने पर तुली है । फरवरी, 2020 से ही आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंख का कांटा बने हुए हैं । दिल्ली दंगा के बाद नरेंद्र मोदी ने दिल्ली विधान सभा चुनाव को ‘निजी प्रतिष्ठा’ का प्रश्न बना लिया । भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी, उसके बावजूद आम आदमी पार्टी को जीत मिली और अरविंद केजरीवाल दोबारा प्रचंड बहुमत से मुख्यमंत्री बने ।
दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के अधीन है । दिल्ली सरकार और केंद्र की भाजपा सरकार के बीच ठने रहने का सबसे बड़ा कारण यही है । 2019 के अंत में नागरिकता संशोधन बिल को लेकर चले लंबे धरना, प्रदर्शन, दंगे में इस तनातनी का खामियाजा दिल्ली की जनता ने भुगता और अभी तक विभिन्न फर्जी मुकदमों में फंसाए गए सामाजिक कार्यकर्ता कोर्ट के जरिए मुक्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं ।
दिल्ली सरकार के पास अधिकार भले कुछ न हो, लेकिन जनादेश का ख्याल करके दिल्ली विधान सभा न राकेश अस्थाना की नियुक्ति के खिलाफ तुरंत प्रस्ताव पारित करके विरोध किया । 28 जुलाई को राकेश अस्थाना को दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाया गया और अगले दिन 29 जुलाई को ही दिल्ली विधान सभा ने इस नियुक्ति के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया । आम आदमी पार्टी के कई सदस्यों ने इस नियुक्ति को यह कहकर गलत बताया कि इसमें एग्मट- ळडन्न(अरूणाचल प्रदेश, गोआ, मिजोरम केंद्र शासित काडर) की उपेक्षा की गयी है । नियमतः दिल्ली पुलिस आयुक्त वैसे आईपीएस अधिकारी बनाए जाते हैं, जो दिल्ली यूटी(केंद्रशासित क्षेत्र) काडर के होते हैं । सदस्यों ने कहा ऐसे अधिकारी को दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाया गया, जिसे दिल्ली पुलिस की जानकारी नहीं है । यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘खास दिल्ली मिशन’ मकसद दर्शाता है । दिल्ली विधान सभा के 29-30 जुलाई मानसून सत्र में इस बात पर भी चर्चा हुई कि संसद से पारित कराए गए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली(संशोधन) एक्ट, 2021 ‘संविधान की हत्या का प्रयास’ है । दिल्ली विधान सभा अध्यक्ष राम निवास गोयल ने कहा कि इससे दिल्ली के मतदाताओं को ‘ठेस’ पहुंची, जिन्होंने दिल्ली के मान-सम्मान की रक्षा के लिए जनादेश दिया । गोयल ने, कहा कि संसद में मार्च में पास इस एक्ट से ‘मुझे बेहद तकलीफ हुई, जिसमें विधान सभा और इसकी कमिटियों को रोजमर्रे के प्रशासनिक कामकाज या प्रशासनिक निर्णयों की जांच के अधिकार से वंचित कर दिया गया ।’
विधान सभा के बाहर भी कई जाने-माने रिटायर अधिकारियों और सिविल सोसायटी सदस्यों ने राकेश अस्थाना को एक साल का कार्यकाल विस्तार देकर रिटायर होने से चार दिन पहले दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाए जाने को अनुचित ठहराया है । पुलिस सुधार के सुझावों के लिए चर्चित रिटायर आईपीएस अधिकारी प्रकाश सिंह बनाम संघ सरकार वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में फैसला दिया कि जिस अधिकारी के रिटायरमेंट में कम-से-कम छह महीना बचा हो, सिर्फ उन्हीं को डीजीपी(पुलिस कमिश्नर) बनाने पर विचार किया जाए । अधिकांश राज्यों में पुलिस प्रमुख डीजीपी कहलाते हैं, लेकिन दिल्ली में उन्हें पुलिस कमिश्नर कहा जाता है ।
राकेश अस्थाना काफी समय से सुप्रीम कोर्ट के निशाने पर रहे हैं । उसके बावजूद केंद्र सरकार ने उन्हें सुप्रीम कोर्ट आदेश की अवहेलना करके दिल्ली पुलिस आयुक्त बना दिया । सीबीआई की तरह दिल्ली पुलिस को भी केंद्र सरकार ऐसे आईपीएस अधिकारी के हाथ में रखना चाहती है, जिसका गुजरात से लिंक हो । सीबीआई डायरेक्टर तो देश के किसी भी काडर के अधिकारी हो सकते हैं । मगर राज्यों और यूटी(केंद्रशासित क्षेत्रों) में पुलिस प्रमुख का उसी काडर का होना आवश्यक है ।
अब जरा राकेश अस्थाना और प्रधानमंत्री के गुजरात प्रेम का ऑन दि रिकार्ड तथ्य टटोला जाए । ताजा मामला ये है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय विधिवत सीबीआई डायरेक्टर चयन पैमाना टालने के लिए अंतरिम डायरेक्टर के जरिए ही सीबीआई को चलाना चाहती थी । संसद के बजट सत्र का पहला चरण समाप्त होने के बाद अंतराल के दिनों में एडीशनल सीबीआई डायरेक्टर गुजरात काडर के आईपीएस प्रवीण सिन्हा को अंतरिम डायरेक्टर बना दिया गया और चयन प्रक्रिया टलती रही । जबकि 2 फरवरी को ऋषि कुमार शुक्ला के रिटायर होने के समय से ही सीबीआई डायरेक्टर का पद रिक्त था । इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर जब केंद्र को शीर्ष कोर्ट की मार्च में नोटिस मिली तो चयन प्रक्रिया शुरू होने से पहले ही सबसे प्रबल दावेदार राकेश अस्थाना हो गए । अप्रील-मई में जब चयन समिति की बैठक हुई तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने नियम के तहत राकेश अस्थाना का दावा खारिज कर दिया, क्योंकि उनके रिटायरमेंट में छह महीने से कम समय बचे थे । सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गयी व्यवस्था के अनुसार सीबीआइ डायरेक्टर चयन समिति में प्रधानमंत्री, सुप्रीम चीफ जस्टिस या उनके द्वारा नामित कोई जज और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी होते हैं । चयन समिति की बैठक में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एन. वी. रमण ने शीर्ष कोर्ट के 2019 नियमन का हवाला देते हुए राकेश अस्थाना को डायरेक्टर बनने से वंचित कर दिया ।
2018 में राकेश अस्थाना सीबीआई प्रमुख नंबर दो बने थे । विधिवत् चयनित सीबीआई प्रमुख नंबर वन(डायरेक्टर) आलोक कुमार वर्मा को हटाने के लिए उन्होंने उन पर रिश्वतखोरी का आरोप लगाया । जवाब में आलोक वर्मा ने भी राकेश अस्थाना पर वही आरोप लगाए । 2018 के अंत में नौबत ये आ गयी कि दोनों ही को सरकार ने छुट्टी पर भेजने का एलान किया । लेकिन केंद्र सरकार राकेश अस्थाना को डायरेक्टर बनाना चाहती थी । इसलिए छुट्टी वास्तव में आलोक वर्मा की हुई थी । सीबीआई को थोड़ा बहुत नियंत्रित करनेवाले केंद्रीय सतर्कता आयुक्त(सीवीसी) के. बी. चौधरी भी सरकारी पिठ्ठू की तरह काम कर रहे थे । यह बात सुप्रीम कोर्ट में उजागर हो गयी ।
आलोक वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी, 2019 तक था और सुप्रीम कोर्ट निर्धारित मानदंड के अनुसार दो साल का कार्यकाल पूरा किए बगैर सीबीआई डायरेक्टर को नहीं हटाया जा सकता । 23/10/2018 को आलोक वर्मा की केंद्र और सीवीसी ने छुट्टी कर दी। आलोक वर्मा ने सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । शीर्ष कोर्ट ने आलोक वर्मा को फिर से सीबीआई डायरेक्टर बहाल कर दिया । राकेश अस्थाना के चलते केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच ठनी । आलोक वर्मा को हटाने पर तुली केंद्र सरकार ने 10 जनवरी, 2019 को फिर से आलोक वर्मा को हटा दिया और एम. नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बना दिया ।
2002 में जब नरेंद्र मोदी गुजरात में मुख्यमंत्री थे, उस समय भी गोधरा ट्रेन अगलगी मौत कांड की जांच में राकेश अस्थाना विवाद के घेरे में आए ।
जब नरेंद्र मोदी 2014 में प्रधानमंत्री थे, उसी समय से वे राकेश अस्थाना को दिल्ली लाने के लिए सीबीआई डायरेक्टर बनाने में जुटे । दिसंबर, 2016 में सीबीआई डायरेक्टर अनिल सिन्हा के रिटायर होने के बाद राकेश अस्थाना को अंतरिम निदेशक बना दिया गया । जनवरी, 2017 में सुप्रीम कोर्ट के फटकार के बाद चयन समिति की बैठक बुलायी गयी । उस वक्त दिल्ली पुलिस कमिश्नर आलोक कुमार वर्मा का सीबीआई डायरेक्टर के रूप में चयन हुआ और राकेश अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर बनाकर आलोक वर्मा के समानान्तर बिठाया गया । इन दोनों के बीच दो साल तक चली तनातनी का विस्फोट 2018 में हुआ । सीबीआई डायरेक्टर बनने से वंचित राकेश अस्थाना को केंद्र सरकार ने आलोक वर्मा के बाद ही सही दिल्ली पुलिस कमिश्नर बनाकर ही दम लिया ।