सीबीआई(केंद्रीय जांच ब्यूरो) को भ्रष्टाचार के मामले की जांच की इजाजत नहीं देने वाला मेघालय नौवां राज्य है । यह मामला मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड संगमा के भाई जेम्स पी. के. संगमा के भ्रष्टाचार में लिप्त होने का है, जिसकी जांच के लिए सीबीआई को मिली सामान्य अनुमति वापस ले ली गयी । मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी(एनपीपी) की सरकार है, जो केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ में शामिल है । उसके बावजूद सीबीआई को मेघालय में सरकारी योजना में घपला मामले की जांच करने से रोक दिया गया । सीबीआई को किसी भी राज्य में भ्रष्टाचार के मामले की जांच के लिए प्रवेश की इजाजत रहती है । मगर कोई राज्य सरकार यह इजाजत वापस ले ले तो केन्द्रीय जांच एजेंसी को हर एक मामले की अलग से राज्य सरकार के पास जांच की अनुमति के लिए आवेदन करना पड़ता है ।

मेघालय का मामला ताजा है । इसके पहले 8 राज्य अपने यहां प्रवेश से सीबीआई को रोक चुके हैं । सबके अलग-अलग राजनीतिक पेंच हैं, मगर सारे मामले भ्रष्टाचार से जुड़े हैं । इसके साथ-साथ संवैधानिक कारण भी हैं । अगर कोई राज्य सरकार सीबीआई को किसी मामले की जांच की अनुमति मांगने पर भी न दे तो सीबीआई के पास राज्य पर दवाब डालने का संवैधानिक अधिकार है या नहीं, यह मामला उलझा हुआ है । यह उलझन कानूनी है । सीबीआई ऐसे संवैधानिक हथियार से लैस नहीं है, जिसका इस्तेमाल किसी राज्य सरकार के खिलाफ कर सकती है । इसलिए सीबीआई का दावा वहां आकर कमजोर पड़ जाता है, जहां कोई राज्य सरकार इस केंद्रीय जांच ब्यूरो के संवैधानिक अधिकार पर ऊंगली उठा देती है ।

आजादी के अमृत महोत्सव में भी भारत की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट(डीएसपीईए), 1946 से संचालित होती है । यह एक्ट संसद से पास अन्य कानूनों की तरह नहीं है, जो राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद प्रभावी और लागू होता है । संघीय ढांचे के अंतर्गत पूरे देश में लागू होनेवाले किसी भी कानून के लिए यही संवैधानिक प्रक्रिया अपनायी जाती है । डीएसपीईए, 1946 के अंतर्गत ही यह प्रावधान है कि किसी भी राज्य में किसी अपराध की जांच शुरू करने से पहले सीबीआई को उस राज्य से अनुमति लेनी होगी । जबकि दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 से सम्बन्धित बिल आजतक संसद से पारित नहीं हुआ, नहीं इस पर राष्ट्रपति की मुहर है । यह संवैधानिक और विवादित तथ्य है, जिसका स्पष्ट जवाब सीबीआई या केंद्र सरकार के पास नहीं है । इसी आधार पर गुवाहाटी हाईकोर्ट ने 2013 में सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया । गुवाहाटी हाईकोर्ट के जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा साह की खंडपीठ ने कहा कि सीबीआई को अधिकार देनेवाले इस एक्ट डीएसपीईए से संबंधित बिल न तो कभी संसद में पेश हुआ, न ही इस पर कभी बहस हुई, जो संविधान सम्मत प्रक्रिया है । दोनों जजों ने नवेन्द्र कुमार बनाम संघीय सरकार वाले मुकदमे में यह फैसला सुनाया, जिसमें सीबीआई के संवैधानिक औचित्य को चुनौती दी गयी थी । 06.11.2013 को गुवाहाटी हाईकोर्ट के इस फैसले को 09.11.2013 को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम और जस्टिस रंजना देसाई के साथ चीफ जस्टिस ने शाम को कोई का समय समाप्त होने के बाद अपने आवास पर सुनवाई करके तुरंत स्टे दे दिया । उसके बाद अगली सुनवाई फिर नहीं हुई । सीबीआई उसी स्टे पर काम कर रही है ।

जब एक नागरिक को सीबीआई की संवैधानिक असलियत मालूम थी, जिसने गुवाहाटी हाईकोर्ट में चुनौती दी, तो विपक्ष शासित राज्य सरकारों के लिए केंद्र सरकार पर सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल का आरोप लगा कर इस जांच एजेंसी की संवैधानिक हैसियत को नकारना आसान है ।

मेघालय का मामला इसलिए सुर्खियों में आया, क्योंकि वहां की सत्तारूढ़ दल एनपीपी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ का हिस्सा है । इसके साथ दो और रोचक पहलू जुडे हैं । मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक हैं तो भाजपा के, मगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की आलोचना करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते । राज्य सरकार के खिलाफ अगर सीबीआई कोई जांच करना चाहे तो उसके लिए राज्यपाल की अनुमति चाहिए । अगर ऐसी नौबत आयी तो फिर संवैधानिक से ज्यादा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है । दूसरा रोचक पहलू ये है कि मेघालय में मुख्य विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) है । टीएमसी सुप्रीमो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पहले से ही सीबीआई से पंगा ले रखा है । 2018 में दीदी(ममता बनर्जी) ने सीबीआई की सामान्य अनुमति वापस ले ली और सीबीआई अधिकारियों को अपने यहां घुसने से मना कर दिया । उसके कुछ ही घंटे पहले नवंबर, 2018 में ही आंध्र प्रदेश की तेलगू देसम पार्टी सरकार ने वैसा ही किया था ।

2015 में सीबीआई से यह इजाजत सबसे पहले वापस लेनेवाली मिजोरम की कांग्रेस शासित लाल थनवला की सरकार थी । 2018 में मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार बनी, जिसने एनडीए का हिस्सा होने के बावजूद सीबीआई को इजाजत नहीं लौटायी । विपक्ष शासित राज्यों में महाराष्ट्र, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, केरल हैं, जहां सीबीआई को जांच की इजाजत से वंचित किया गया है । इसमें राजनीतिक मुद्दा सर्वोपरि है । नवंबर 2018 में छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सत्ता में आयी और जनवरी, 2019 में सीबीआई से इजाजत वापस ले ली । 2020 में पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, केरल, झारखंड ने उसी का अनुसरण किया । 2019 में आंध्र प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ । कांग्रेस से अलग हुए गुट के नेता वाई एस जगनमोहन रेड्डी की सरकार बनी और उन्होंने सीबीआई की इजाजत लौटा दी।

अब जरा मेघालय की ओर लौटते हैं, जहां अगले वर्ष विधान सभा चुनाव होनेवाले हैं, मुख्यमंत्री कोनराड संगमा के भाई पर ‘सौभाग्य योजना’ के अंतर्गत घर-घर बिजली कनेक्शन देने के काम में घपला करने और अवैध खनन तथा कोयला बाहर भेजने में भी कमाई के आरोप हैं । कांग्रेस ने सीबीआई जांच की मांग उठायी है ।

नवंबर, 2021 में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफना मादायर करके बताया कि जिन आठ राज्यों में सामान्य इजाजत वापस ले ली है, उनसे भ्रष्टाचार मामलों की जांच की अनुमति के 150 आग्रह 2018 से लंबित हैं । सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस एसण् केण् कॉल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसपर चिंता जतायी । बस इससे ज्यादा कुछ नहीं हो पाया । सीबीआई ने अपनी कैफियत इन आरोपों के मद्देनजर दी, जिसमें मुकदमे की जांच टलते रहने के लिए जांच एजेंसी को दोषी ठहराया जाता है ।

लेकिन सीबीआई के अधीन मुकदमे में सिर्फ कोर्टों के स्टे देर का कारण नहीं है, जो सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट में कहा । सीबीआई खुद ही स्टे पर 9 साल से काम कर रही है ।

फरवरी 2022 में सीबीआई ने गुजरात की जहाज बनाने वाली कंपनी के 22842 करोड़ के घपले का मामला दर्ज किया तो कांग्रेस ने सवाल उठाया कि सीबीआई को एफआईआर में पांच साल क्यों लगे, जबकि यह कंपनी 2017 से गोलमाल कर रही थी ।

अभी चित्रा रामकृष्णा के खिलाफ जो मामला सीबीआई ने दर्ज किया, उसमें भी यह सवाल उठा कि 2013-2016 के बीच नेशनल स्टाक एक्सचेंज की सीईओ-सह-एमडी के रूप में चित्रा रामकृष्णा किसी ‘हिमालय’ वासी ‘योगी’ के निर्देश पर अनियमितता में संलग्न थी।

जिस सीबीआई के गठन का एक्ट संविधान सम्मत नहीं है, उसके निदेशक का सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय दो साल का कार्यकाल दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट में संशोधन बिल केंद्र सरकार ने दिसंबर, 2021 में संसद से पास कराकर पांच साल बढ़ा दिया ।