सीबीआई(केंद्रीय जांच ब्यूरो) के 55 वर्ष के इतिहास में ऐसी अप्रत्याशित हरकतें पहले कभी सामने नहीं आयी । देश में पहली बार ऐसा हुआ है, जब सीबीआई के मुद्दे पर एक ही साथ सरकार, सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई के रोजमर्रे के कामकाज पर निगरानी रखनेवाला केंद्रीय सतर्कता आयोग(सीवीसी) तक विवाद के घेरे में है ।

अक्टूबर, 2018 से केंद्रीय वित्तमंत्री अरूण जेटली ने कई मौकों पर यह बात दुहरायी है कि जब सीबीआई प्रमुख नंबर 1 आलोक कुमार वर्मा और नंबर 2 राकेश अस्थाना दोनों को ही रिश्वतखोरी में आपस में ही लड़ने के कारण सरकार ने जिम्मेदारी से मुक्त करके छुट्टी पर भेज दिया । दुहाई देने के लिए सीबीआई संवैधानिक है और इस पर नियंत्रण सरकार अपने किसी विभाग की तरह रखना चाहती है । यही है घमासान के चरम पर पहुंचने का मूल कारण, जिसमें सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की भी परवाह नहीं की। और तो और, सीवीसी ने भी सीबीआई विवाद में वैसा ही किया जैसा सरकार ने चाहा । जबकि सीवीसी बजाप्ता वैधानिक संस्था है और 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी शासनकाल में पारित सीवीसी एक्ट के तहत इसका गठन हुआ है । अगर यह बवाल नहीं मचता तो लोग जान भी नहीं पाते कि सीबीआई के अंदर क्या-क्या होता है और सरकार इसे कैसी संस्था बनाकर रखना चाहती है । रसूखदार घोटालेबाजों के मामले की जांच की लीपापोती और तथ्यों को मिटाने के लिए तो सीबीआई बहुत दिनों से बदनाम है । लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि सीबीआई प्रमुख नंबर 1 और 2 दोनों न एक-दूसरे पर रिश्वत खाने का आरोप लगाया हो और दोनों को सरकार ने अचानक छुट्टी पर भेजा हो । जिस समय सीबीआई के अंदर यह रिश्वत उपद्रव भड़का, उसी समय सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस जे. चेलमेश्वर रिटायर हुए । रिटायर होने के बाद उन्होंने पहला बयान यही दिया कि सीबीआई के अंदर अराजक स्थिति है, क्योंकि ऐसा काई कानूनी ढांचा नहीं है, जो सीबीआई को संचालित करे । जस्टिस चेलमेश्वर ने कहा कि सीबीआई के अधिकार और कर्त्तव्य की कोई परिभाषा संविधान में नहीं है । 70 वर्षों में किसी सरकार ने इस बिंदु पर नहीं सोचा । इसलिए सिर्फ दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टेब्लिशमेंट एक्ट(डीएसपीईए) का हवाला देकर सीबीआई को राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किया जाता है ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जस्टिस चेलमेश्वर की कही बात की पुष्टि कर दी । सीबीआई प्रमुख नंबर 1 डायरेक्टर आलोक वर्मा ने अचानक छुट्टी किए जाने के सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए मानदंड के अनुसार दो साल का कार्यकाल पूरा किए बगैर सीबीआई डायरेक्टर को हटाया नहीं जा सकता । डायरेक्टर की नियुक्ति के लिए चयन प्रक्रिया की तरह हटाने की भी वैधानिक प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट ने ही तय की हुई है । 23 अक्टूबर को सीवीसी और केंद्र सरकार ने सीबीआई निदेशक आलोक कुमार वर्मा को छुट्टी कर दी । आलोक कुमार वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी, 2019 तक था । सरकार के फैसले पर विपक्ष ने हंगामा मचाया । सीवीसी की कार्यशैली पर भी ऊंगली उठी । इसलिए सुप्रीम कोर्ट आलोक कुमार वर्मा की याचिका पर सुनवाई करते हुए उनके खिलाफ लगे आरोपों की जांच करने तो सीवीसी के. वी. चौधरी को ही कहा मगर उसकी निगरानी शीर्ष कोर्ट के ही रिटायर जज ए. के. पटनायक के जिम्मे दे दी । 31 जनवरी आने से पहले के नाटकीय घटनाक्रम इस विवाद को ऐतिहासिक बनाने में सहायक साबित हुए । चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एस. के. कॉल और जस्टिस के. एम. जोसेफ की पीठ ने आठ जनवरी को आलोक कुमार वर्मा को वापस सीबीआई डायरेक्टर पद पर बहाल कर दिया । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार और सीवीसी के आदेश को निरस्त किया लेकिन आलोक कुमार वर्मा को सिर्फ रूटिन काम देखने की इजाजत दी । सुप्रीम कोर्ट ने आलोक कुमार वर्मा को तबतक कोई प्रमुख नीतिगत निर्णय लेने से मना कर दिया, जबतक कि सीबीआई डायरेक्टर चयन के लिए बनी उच्चाधिकार कमिटी उनके भविष्य पर फैसला नहीं ले लेती । सुप्रीम कोर्ट ने कमिटी को जल्द-से-जल्द यानी एक हफ्ते के अंदर फैसला लेने कहा । इस उच्चाधिकार कमिटी में प्रधानमंत्री, भारत के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित कोई सुप्रीम कोर्ट जज और लोकसभा में विपक्ष के अथवा सबसे बड़ी पार्टी के नेता होते हैं । आलोक कुमार वर्मा के सारे अधिकार छीन लेने के मुद्दे पर ही मुख्य रूप से इस कमिटी को विचार करना था और तीनों सदस्यों की आम राय से सभी पहलुओं पर गौर करके निर्णय पर पहुंचना था । लेकिन वैसा हुआ नहीं । 10 जनवरी को उच्चाधिकार कमिटी की बैठक हुई और आलोक कुमार वर्मा को हटाकर एम. नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक नियुक्त कर दिया गया । इसे सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का फैसला माना गया । क्योंकि सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस द्वारा नामित जज ए. के. सीकरी सीवीसी की रिपोर्ट से सहमत नहीं थे, जिसके आधार पर आलोक कुमार वर्मा को सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल किए जाने के बावजूद दोबारा हटा दिया गया । उनकी जगह एम. नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बनाने का फैसला ले लिया गया, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने आठ जनवरी को हटाने का आदेश दिया । लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के नेता मलिकार्जुन खड़गे ने सीबीआई अंतरिम प्रमुख को अवैध बताया और नए सीबीआई प्रमुख की नियुक्ति के लिए चयन समिति की तत्काल बैठक बुलाने की मांग कर डाली । खड़गे ने प्रधानमंत्री को कड़ा विरोध पत्र लिखा । 10 जनवरी बैठक की कार्यवाही और सीवीसी की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग पर भी वे अड़े हैं । सीवीसी ने 16 नवंबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गयी अपनी जांच रिपोर्ट में आलोक कुमार वर्मा को क्लीन चिट नहीं दी । सुप्रीम कोर्ट की ओर से जांच की निगरानी कर रहे जस्टिस ए. के. पटनायक ने अलग से एक नोट शीर्ष कोर्ट को सौंपी । रिपोर्ट है कि उसमें आरोपों की पुष्टि नहीं की गयी । इसलिए कांग्रेस नेता सीवीसी की रिपोर्ट, जस्टिस ए. के. पटनायक की रिपोर्ट और 10 जनवरी की बैठक की मिनट्स सार्वजनिक करने पर जोर दे रहे हैं । इसी बीच सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे दी गयी । चुनौती देनेवाली एजेंसी और कॉमन कॉज की ओर से याचिका दायर करनेवाले वकील प्रशांत भूषण ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि एम. नागेश्वर राव को सीबीआई अंतरिम निदेशक बनाना गैर कानूनी है और दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट के उस प्रावधान का उल्लंघन है, जो संशोधन करके लोकपाल व लोकायुक्त एक्ट, 2013 में जोड़ा गया । 10 जनवरी के आदेश में कहा गया कि मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने पहले की व्यवस्था की तरह नागेश्वर राव को अंतरिम निदेशक बनाने का मंजूरी दे दी । 23 अक्टूबर, 2018 को आलोक कुमार वर्मा को हटाकर नागेश्वर राव का अंतरिम निदेशक बनाया गया था, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने किसी नतीजे पर पहुंचने तक कोई बड़ा नीतिगत फैसला लेने से मना पर दिया था ।

अब इसी हफ्ते उच्चाधिकार कमिटी की भी बैठक हो रही है, जो नए सीबीआई प्रमुख के चयन पर विचार करेगी और सुप्रीम कोर्ट में नागेश्वर राव के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई होगी । आलोक कुमार वर्मा ने यह कहकर अपना पद छोड़ दिया कि उन्हें अपनी बात कहने का मौका न देकर स्वाभाविक न्याय से वंचित रखा गया और सरकार द्वारा की गयो दूसरे पद पर प्रतिनियुक्ति ठुकरा दी ।

इस विवाद में भ्रष्टाचार से जुड़े दूसरे मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ दिल्ली हाईकोर्ट भी उलझा है । उठापटक के चरम पर पहुंचने के दौरान ही दिल्ली हाईकोर्ट ने राकेश अस्थाना के खिलाफ दायर एफआईआर खारिज करने से इन्कार कर दिया और डायरेक्टर आलोक कुमार वर्मा को दोषी नहीं माना । आलोक कुमार वर्मा और राकेश अस्थाना दोनों न ही एक-दूसरे के खिलाफ एफआईआर दर्ज करायी थी । इसी अफरातफरी में मलिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री को लिखे गये पत्र के बाद सीबीआई चयन समिति की 24 जनवरी को बैठक बुलाने का एलान हुआ । आलोक वर्मा हटा दिए गए और राकेश अस्थाना का कार्यकाल घटा दिया गया । उसके साथ-साथ सीबीआई के तीन अन्य अधिकारियों के कार्यकाल में भी कटौती कर दी गयी ।

गुजरात काडर के आईपीएस राकेश अस्थाना को सीबीआई की कमान नरेंद्र मोदी सरकार सौपना चाहती है, यह बात दिसंबर, 2016 में ही स्पष्ट हो गयी । जब डायरेक्टर अनिल सिन्हा के दो दिसंबर को रिटायर हुए तो अस्थाना को अन्तरिम निदेशक बना दिया गया । जनवरी 2017 में सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद चयन समिति की बैठक बुलायी गयी । दिल्ली पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा का सीबीआई डायरेक्टर के रूप में चयन हुआ और राकेश अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर बनाकर लगभग उनके समानान्तर बिठा दिया गया । इन दोनों के बीच दो साल तक चली तनातनी का अभी विस्फोट हुआ है ।

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोवाल के फोन सीबीआई द्वारा टेप करने को लेकर भी दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार और सीबीआई दोनों को नोटिस भेजा है । अभी तक जितनी बातें सामने आयी हैं, उनमें गौर करने लायक ये है कि राकेश अस्थाना खुद को बचाने के लिए अजीत डोवाल के पास गुहार लगा रहे थे । यह तो अच्छा हुआ कि लोकपाल का गठन सुप्रीम कोर्ट के दवाब के बावजूद नरेंद्र मोदी सरकार टालती रही । लोकपाल एक्ट के मुताबिक लोकपाल द्वारा सीवीसी के पास भ्रष्ट लोगों की जांच की सिफारिश भेजेगा और सीवीसी सीबीआई को देगी । अब सीवीसी को हटाने की मांग जोर पकड़ रही है ।

सुप्रीम कोर्ट ने 4 जनवरी को केंद्र से हलफनामा दायर करके बताने कहा कि लोकपाल खोजबीन समिति का क्या हुआ । इस मामले की सुनवाई कर रही चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने फिर 17 जनवरी को निर्देश दिया कि फरवरी तक नाम सुझाए । लोकपाल खोजबीन समिति की प्रमुख सुप्रीम कोर्ट की पूर्व जज रंजना देसाई हैं ।

सीबीआई के मौजूदा घमासान से एक बार फिर यह संशय गहरा गया कि सीबीआई आखिर किसके प्रति जवाबदेह है । पहला नियंत्रण सीवीसी का, जिसकी सिफारिश का हवाला केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने आठ जनवरी को सुप्रीम कोर्ट फैसले के बाद दिया । दूसरा नियंत्रण केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्रालय का, जिसका निर्देश मानने को सीवीसी बाध्य नहीं है । अभी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार का भी नाम उछला है, जो सुपरपावर की तरह सीबीआई में दखल दे रहे थे । 23 दिसंबर को सीबीआई के अभियोग निदेशक ओ पी वर्मा का कार्यकाल समाप्त हुआ । उसके लिए नाम सुझाने के लिए कार्मिक मंत्रालय ने 15 जनवरी को सभी सरकारी विभागों के सचिव को लिखा । सीबीआई को इस अराजक स्थिति से उबारने में सुप्रीम कोर्ट को भी कोई दिलचस्पी नहीं है । 2013 से स्टे पर काम चल रहा है, जब गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई को असंवैधानिक घोषित किया और केंद्र की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने स्टे दे दिया ।