17वीं लोकसभा के सदस्यों के शपथग्रहण के समय सदन के अंदर उस समय हंगामा हुआ, जब समाजवादी पार्टी से जीते शफीकुर्रहमान बर्क ने ‘भारत का संविधान जिंदाबाद’ का नारा तो दिया, मगर ‘वंदे मातरम्’ बोलने से इंकार कर दिया । उतना ही नहीं, सपा सांसद ने उस वक्त ‘वंदे मातरम्’ को इस्लाम के खिलाफ बताया, जब पूरा सदन भाजपा सदस्यों के ‘जय श्रीराम’ और ‘वंदे मातरम्’ शपथग्रहण नारों से गूंज रहा था । शफीकुर्रहमान बर्क की टिप्पणी पर भाजपा सदस्यों ने कड़ा एतराज जताया और कहा कि बर्क माफी मांगें । घटना 17 जून की है ।

हैदराबाद से जीते असदुद्दीन ओवैसी के शपथ लेने का नंबर आते ही भाजपा सदस्य जोर-जोर से ‘वंदे मातरम्’ और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाने लगे । उसके जवाब में ओवैसी ने ‘जय भीम, अल्लाह-हू-अकबर और जय हिंद’ के नारे लगाए ।

‘राष्ट्रीय भावना’ और ‘देशभक्ति’ का ऐसा तमाशा इसके पहले कभी लोकसभा गठन के समय सदस्यों के शपथ लेने में देखने को नहीं मिला था । जो कुछ भी हुआ वो पूरी तरह सियासी राजनीति से जुड़ा था । सर्वसाधारण यह ड्रामेबाजी देखकर अचंभित है कि राष्ट्रीय भावना का आखिर मतलब क्या है? राष्ट्रगीत वंदे मातरम को लेकर सदन के अंदर और बाहर हंगामा कोई नई बात नहीं है । लेकिन ऐसा पहली बार हुआ है, जब भाजपा ने अपने राजनीतिक नारे ‘जय श्रीराम’ को वंदे मातरम से जोड़कर मतदाताओं को दिग्भ्रमित कर दिया । सदन के अंदर नए सदस्यों ने शपथ लेने के समय और भी कई नारे लगाए जो सिर्फ राजनीतिक भावना का परिचायक है । लेकिन भाजपा सदस्यों ने इसे अपने एजेंडे के ‘राष्ट्रवाद’ और ‘देशभक्ति’ से मिलाने का प्रयास किया । ‘राष्ट्रीय भावना’ जबरन नहीं जगायी जा सकती, थोपी जा सकती है । वही प्रक्रिया चल रही है ।

गोरखपुर से भाजपा टिकट पर चुनकर आए रवि किशन ने शपथ लेने के समय ‘हर-हर महादेव’ कहा । पश्चिम बंगाल से भाजपा उम्मीदवार किस प्रकार जीतकर आए हैं, यह किसी से छिपा नहीं है । उसका परिचय सभी 18 सदस्यों ने ‘जय श्रीराम’ नारे के साथ शपथ लेकर किया । बंगाल में सत्तारूढ़ ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने जब ‘जय श्रीराम’ के जवाब में ‘जय बांग्ला जय बंगाली’ बोला । तृणमूल कांग्रेस की काकोली घोष दस्तीदार ने ‘जय श्रीराम’ के काट में बार-बार ‘जय बंगाल’ बोला । तृणमूल का ‘देश’ बंगाल तक की सीमित है । भाजपा के सदस्य अरूण कुमार सागर ने दो बार ‘भारत माता की जय’ बोला तो जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने शपथ लेने के समय ‘जयहिंद’ कहा।

इस तमाशे की खबर टीवी और अखबारों में देखने के बाद देशवासी राष्ट्रीय भावना का मतलब ही नहीं समझ पा रहे हैं । पहले से जो जानते थे उसके विषय में भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी है । किस नारे को धार्मिक, किसे राजनीतिक, किसे क्षेत्रीय और किसे राष्ट्रीय भावना से जुड़ा माना जाए ।

सबसे ज्यादा हंगामा ओवैसी और बर्क के नारों को लेकर हुआ । ओवैसी ने अल्लाह-हू-अकबर कहा और शफीकुर्रहमान बर्क ने वंदे मातरम को इस्लाम के खिलाफ बताया । लेकिन ओवैसी ने ‘जयहिंद’ भी बोला और बर्क ने ‘भारतीय संविधान जिंदाबाद’ का नारा दिया । इसे राष्ट्रीय भावना से जुड़ा नहीं माना गया । शपथ दिला रहे पीठासीन अध्यक्ष के. सुरेश ने ऐसे नारे लगाने से मना किया और कहा कि शपथ के अलावे जो कुछ भी कहा गया है, वो रिकार्ड में नहीं आएगा । लेकिन मतदाताओं के रिकार्ड में सारी अशोभनीय बातें आ चुकी हैं, जिन लोगों ने इन सदस्यों को चुनकर भेजा है ।

राष्ट्रगीत वंदे मातरम पर बर्क की टिप्पणी कोई नयी बात नहीं है । 2013 में कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ शासनकाल में ऐसे ही रवैए के कारण उस वक्त लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने बर्क को सदन से बाहर कर दिया । हुआ यों कि ‘वंदे मातरम’ गाए जाने के समय बर्क ने सावधान की मुद्रा में खड़े होने से इंकार कर दिया और मजहब की दुहाई देकर सदन से बाहर निकल जाना बेहतर समझा । ऐसा करने के एवज में बर्क ने तर्क दिया - ‘मैं मातृभूमि का आदर करता हूँ और भारत माता की जय मुस्लिमों की मातृभूमि पर लागू नहीं होता । विपक्षी भाजपा को छोड़ किसी भी दल ने इसका विरोध नहीं किया । बसपा नेता मायावती कांग्रेस गठजोड़ का समर्थन कर रही थी, तो कांग्रेस सदस्य भी चुप्पी साधे रहे । कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल में कई आयातित वाद हावी थे, मगर ऐसा राष्ट्रवाद नहीं था, जिसमें ‘भारत’ हो । कांग्रेस सदस्यों ने राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद को किसी पंथ या समुदाय की ठीकेदारी नहीं बनने दिया । लेकिन राष्ट्रीय भावना कुल मिलाकर शासकीय और कानूनी भावना बनकर रह गयी, जो आज चरम पर है । क्योंकि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा गठजोड़ के पहले शासनकाल और फिर दूसरी बार बरकरार रहने तक राष्ट्रीय भावना एक खास पंथ से जुड़ गयी । जनसाधारण में एक छवि बन गयी कि राष्ट्रध्वज फहराना और ‘वंदे मातरम’ बोलना सिर्फ भाजपा का शासकीय अजेंडा है । इसे राजनीतिक रंग देकर राष्ट्रीय भावना के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है । राष्ट्रध्वज फहराना और राष्ट्रगान गाया जाना पहले भी सिर्फ सरकारी समारोह था, लेकिन जबरन थोपने की नीति से थोड़ी बहुत राष्ट्रीय भावना की जगह दुर्भावना न ले ली है । इसका सबसे बड़ा प्रमाण देश के सबसे सम्मानित संवैधानिक जनमंच संसद में ही पेश किया गया । डंडे मारकर राष्ट्रीय भावना जगाने की कोशिश में सुप्रीम कोर्ट को भी कामयाबी नहीं मिली । सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान गाया जाना अनिवार्य करना और उस समय सावधान की मुद्रा में खड़े होने का आदेश जारी करने के बाद सुप्रीम कोर्ट को उसमें फेरबदल करना पड़ा । कांग्रेस शासित मध्यप्रदेश में एक विधायक आरिफ मसूद ने गत एक मार्च को एक जनसभा में ‘वंदे मातरम’ गाने से इन्कार कर दिया । उन्होंने भी शरियत की दुहाई दी लेकिन विधायक ने यह भी कहा कि ‘मैं सीमा पर देश के लिए जान गंवाने को तैयार हूं, जहां नेता नहीं, सेना के जवान लड़ते हैं । मगर वंदे मातरम थोपना मंजूर नहीं ।’ गत वर्ष स्वतंत्रता दिवस के दिन की दो घटनाएं मिशनरी संचालित स्कूलों से जुड़ी है । एक गुवाहाटी की है, दूसरी भोपाल की । गुवाहाटी के मोरीगन जिले में संत यूजेन इंगलिश स्कूल के प्रिंसिपल फादर जेम्स जैवियेर को 15 अगस्त के दिन झंडा न फहराए जाने के कारण गिरफ्तार कर लिया गया । मध्य प्रदेश के जबलपुर में एक मिशन स्कूल टीचर को बजरंग दल और विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ताओं ने झंडा न फहराए जाने के कारण माफीनामा के लिए मजबूर किया । दोनों ही स्कूलों की ओर से बारिश के कारण बच्चों को झंडोत्तोलन के लिए न बुलाए जाने की सफाई दी गयी । राष्ट्रीय भावना जगानेवाली 2016 की दो घटनाएं देखिए । बंबई हाईकोर्ट की नागपुर पीठ को आखिर कहना पड़ा कि क्या ‘भारत सिर्फ हिन्दुओं का है?’ कोर्ट ने यह सवाल भाजपा संचालित नागपुर नगर निगम से 6 अप्रील, 2016 को पूछा । मामला था, एड्स जागरूकता अभियान हनुमान चालीसा गाकर चलाए जाने का । कोर्ट ने पूछा कि हनुमान चालीसा ही क्यों, कुरआन, बाइबिल या अन्य धार्मिक ग्रंथों से क्यों नहीं । एड्स के खिलाफ जागरूकता अभियान का ठेका हनुमान चालीसा को देने का क्या मतलब? 2016 में ही केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार को संसद में सफाई देनी पड़ी कि राष्ट्रगीत सरकारी स्कूलों में अनिवार्य करने का प्रस्ताव नहीं है । उसके बाद 2017 में राष्ट्रध्वज की ऊंचाई की गुजरात से लेकर भारत-पाक सीमा के अटारी और जेएनयू में ऐसी प्रतिस्पर्धा चली कि लोगों का ध्यान सिर्फ इसके राजनीतिक इस्तेमाल पर गया । राष्ट्रध्वज का स्टारों और मनोरंजन सेलिब्रिटी के लिए इस्तेमाल का मामला आए दिन सामने आता है । इसका मतलब राष्ट्रीय भावना सिर्फ मजे लेने तक सीमित है । 2015 में इलाहाबाद हाईकोर्ट को मदरसों में राष्ट्रध्वज फहराए जाने और राष्ट्रगान गाने का उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश देना पड़ा । समाजवादी पार्टी की सरकार ने मदरसों का बचाव किया । योगी आदित्यनाथ क मुख्यमंत्री बनने के बाद राष्ट्रगान गाने से छात्रों को रोकनेवाले एक मदरसा की मान्यता अगस्त, 2018 में समाप्त कर दी गयी । 2015 में ही राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह ने ‘जन गण मन’ के आगे का अधिनायक शब्द हटाने का सुझाव दे डाला । इस संबंध में 2005 में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस आर. सी. लाहोटी की यह पंक्ति ध्यान देने योग्य है । राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ से ‘सिंध’ हटाने के संबंध में दायर याचिका पर चीफ जस्टिस ने कहा - ‘गुरूदेव की यह रचना राष्ट्रीय धरोहर है, इसके साथ छेड़छाड़ राष्ट्रीय भावना का अपमान होगा । इसे क्षेत्रीयता से जोड़ना संकीर्णता है ।’