केंद्रीय सूचना आयोग के बारे में संसद में दिए गए सरकार के बयानों से आम मतदाता दिग्भ्रमित हैं । सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 में संशोधन बिल लोकसभा और राज्यसभा से जैसी अफरातफरी तथा भारी तमाशे के बीच पारित कराया गया, उसे तो संसद सत्र समाप्त होने के बाद लोग भूल जाएंगे । मगर जिस बात को लेकर बहस जारी रहेगी वो ये है कि अब केंद्रीय सूचना आयोग की हैसियत क्या रह जाएगी ।

केंद्रीय राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने लोकसभा में जितने बयान दिए, उनमें सबसे ज्यादा विवाद केंद्रीय सूचना आयुक्त(सीआईसी) के दर्जे को लेकर छिड़ा हुआ है । पहली गलत जानकारी संसद को यह दी कि केंद्रीय सूचना आयोग को भारत निर्वाचन आयोग की तरह संवैधानिक दर्जा प्राप्त नहीं है । पीएमओ(प्रधानमंत्री कार्यालय) में राज्यमंत्री ने कहा कि सूचना अधिकार(आरटीआई) एक्ट, 2005 के अंतर्गत स्थापित केंद्रीय सूचना आयोग और राज्य सूचना आयोग स्टेच्युटरी निकाय है । यह तो आम लोगों के समझ से बाहर का है कि संवैधानिक संस्था और स्टेच्युटरी संस्था के अधिकारों में क्या फर्क है । लेकिन इतना तो स्पष्ट हो गया कि परस्पर विरोधाभास वाली सफाई देकर सरकार ने येन-केन-प्रकरण आरटीआई एक्ट, 2005 में संशोधन बिल केंद्रीय सूचना आयोग को एक सरकारी संस्था बनाने के लिए पारित कराया । जितेंद्र सिंह ने अपराध बोध के बचाव में संसद को बताया कि लगता है, 2005 में कांग्रेस गठजोड़ सरकार ने आरटीआई बिल बहुत जल्दबाजी में पारित कर दिया । आरटीआई एक्ट (संशोधन) बिल, 2019 वैसी कुछ कमियों को दूर करने के लिए लाया गया है, जिसकी ओर कांग्रेस सरकार ने ध्यान नहीं दिया ।

केंद्रीय राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह को या तो तथ्यों की जानकारी नहीं है अथवा उन्होंने जान बूझकर देश के सबसे बड़े संवैधानिक जनमंच संसद के जरिए मतदाताओं को गुमराह करने की कोशिश की । वास्तविक तथ्य ये है कि सूचना अधिकार बिल का मसौदा अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली भाजपा गठजोड़ शासनकाल में तैयार हो गया था । 2004 आम चुनाव में अगर भाजपा की सरकार दोबारा बन जाती तो आरटीआई बिल पास करने और सूचना अधिकार एक्ट बनाने का श्रेय एनडीए सरकार का ही मिलता । आरटीआई बिल का सब कुछ तैयार था । 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़(यूपीए) सरकार बनी, फटाफट आरटीआई बिल एक्ट, 2005 पास हो गया और लागू हो गया ।

2009 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के चुनाव प्रचार का सबसे बड़ा मुद्दा था जनता को सूचना का अधिकार देना और उसके काट में भाजपा का सबसे बड़ा मुद्दा ये था कि आरटीआई बिल का मसौदा तो भाजपा गठजोड़ शासन का तैयार किया हुआ है । केंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण(डीओपीटी) राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने सीआईसी(केंद्रीय सूचना आयुक्त) को सुप्रीम कोर्ट जज के समकक्ष दर्जा देने के प्रावधान को बेतुका बताकर इसे भी कांग्रेस शासनकाल की खिंचाई का मुद्दा बनाया । मंत्री ने मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) से तुलना करते हुए कहा कि सीआईसी को सुप्रीम कोर्ट जज का दर्जा दे दिया और इसके फैसले को हाईकोर्टों में चुनौती दी जा सकती है । ऐसा कैसे चल सकता है । केंद्रीय मंत्री को इतना तो पता होगा ही कि सुप्रीम कोर्ट जज का दर्जा प्राप्त सीईसी के फैसले को भी हाईकोर्टों में चुनौती दी जाती है और निर्वाचन आयोग उसे मानने को बाध्य है । भारत निर्वाचन आयोग वाला संविधान चल रहा है और केंद्रीय सूचना आयोग वाले संविधान में संशोधन करके मंत्री ने संसद सदस्यों को गलत सूचना दी ।

सरकार ने सदस्यों के जबर्दश्त विरोध की बिल्कुल अनदेखी करते हुए सदन को सीआईसी की स्वायत्तता का भरोसा दिलाया, जो सरकारी नियंत्रण वाला प्रावधान है । वर्तमान आरटीआई एक्ट(संशोधन) बिल, 2019 के अनुसार भाजपा गठजोड़ सरकार ने आरटीआई एक्ट, 2005 के अनुच्छेछ 13, 16 और 27 को बदल दिया । बिल पेश करनेवाले पीएमओ राज्यमंत्री ने कहा कि इस संशोधन से केंद्रीय सूचना आयुक्तों का दर्जा चुनाव आयुक्तों वाला और राज्य सूचना आयुक्तों का दर्जा राज्यों के मुख्य सचिवों के समकक्ष हो जाएगा । सरकार की सबसे कमाल की दलील है सूचना आयुक्तों के कार्यकाल, वेतन और भत्ते की समीक्षा का अधिकार अपने हाथ में ले लेना । यह संविधान के संघीय ढांचे पर भी खतरा है । क्योंकि राज्य निर्वाचन आयुक्तों और सूचना आयुक्तों का वेतन, भत्ता राज्य सरकारों का महकमा है । अभी तक केंद्रीय सूचना आयुक्तों और राज्य सूचना आयुक्तों का पांच साल या 65 वर्ष तक की उम्र तक का कार्यकाल फिक्स था । यह प्रावधान अटल बिहारी वाजपेयो शासनकाल में किया गया था । उस वक्त जिस संसदीय समिति ने यह फार्मूला तैयार किया था, उसके सदस्य रामनाथ कोविंद थे, जो अभी राष्ट्रपति हैं । सूचना आयुक्तों को सरकार के रहमो-करम से मुक्त होकर जनता के मौलिक अधिकार की रक्षा करने का प्रावधान समाप्त कर दिया गया । अब सरकार किसी भी समय अपनी मर्जी के मुताबिक नहीं चलनेवाले सूचना आयुक्तों का कार्यकाल समाप्त कर सकती है और साथ में दावा भी किया गया कि अब सूचना आयुक्त ‘स्वतंत्र’ रूप में काम कर सकेंगे । कार्मिक राज्य मंत्री के तर्क के अनुसार कांग्रेस शासनकाल में जल्दीबाजी में पारित आरटीआई एक्ट, 2005 में सरकार को कोई ‘नियम बनाने का अधिकार’ नहीं दिया, इसलिए सरकार उस त्रुटि में सुधार कर रही है ।

सुप्रीम कोर्ट ने कई बार केंद्रीय सूचना आयुक्तों को आरटीआई का ‘अभिभावक’ कहा है । जनता को मौलिक अधिकार देनेवाला ऐसा एकमात्र कानून है आरटीआई, जिसमें बदलाव नहीं किया जा सकता । सुप्रीम कोर्ट ने आरटीआई को धारा-19 के अंतर्गत आनेवाले स्वतंत्र अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार का हिस्सा बताया है ।

अब सूचना आयुक्त अपनी नौकरी बचाएंगे कि जनता के मौलिक अधिकार की रक्षा करेंगे । मनमोहन सिंह सरकार को घोटालों में सराबोर और खुद को घोटाले से मुक्त होने का दावा करनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पहले ही शासनकाल में आरटीआई का स्वतंत्र अस्तित्व समाप्त करना चाहते थे । 2018 में यह संशोधन लाने की तैयारी हो चुकी थी । केंद्रीय सूचना आयोग से राय मांगने की महज खानापूरी हुई । सूचना आयुक्तों के विरोध की सरकार ने परवाह नहीं की । लेकिन विपक्षी सदस्यों के विरोध के बाद संसद में पेश किया गया आरटीआई संशोधन बिल वापस ले लिया गया । 2019 से लोकसभा चुनाव का भी सामना करना था । भाजपा गठजोड़ के प्रचंड जनादेश से सत्ता में दोबारा आने के बाद देश का सबसे लोकप्रिय और सशक्त पारदर्शिता कानून को लचर बनाने का इंतजाम लग गया । चुनाव प्रचार के दौरान पारदर्शिता की नरेंद्र मोदी ने सबसे ज्यादा दुहाई दी । नयी लोकसभा के पहले ही सत्र में सरकार ने आरटीआई(संशोधन) बिल, 2019 बिना चर्चा के पारित कर लिया । बाकी बिल तो संसद की प्रवर समिति में भेजे गए, मगर आरटीआई(संशोधन) बिल के बारे में संसद सदस्यों ने कहा कि संविधान और संसदीय मर्यादाओं को ताक पर रखकर इस बिल को पास कराने के लिए वोटिंग करायी गयी । राज्यसभा में अपनाए गए वोटिंग तरीके पर सभापति एम. वेंकैया नायडू ने खेद जताया । 26 जुलाई को आरटीआई और अन्य बिल पारित कराने की सरकार की ‘जल्दीबाजी’ के खिलाफ 17 विपक्षी पार्टियों ने सभापति को विरोध पत्र दिया, जिससे वे स्वयं सहमत थे ।

सरकार आरटीआई(संशोधन) बिल को संसदीय समिति में न जाने देने पर अड़ी रही । जबकि विपक्षी दल उन विसंगतियों पर चर्चा कराने पर जोर दे रहे थे, जो इस सरकार ने पैदा की हैं । वाजपेयी शासनकाल में व्यापक विचार-विमर्श के बाद इसका मसौदा तैयार हुआ था । मनमोहन सिंह सरकार ने भी संसदीय समिति गठित की । नरेंद्र मोदी सरकार ने सीआईसी को अपने नियंत्रण में लेकर ‘स्वतंत्र अस्तित्व’ प्रदान करनेवाले संशोधन पर संसद में बहस की जरूरत नहीं समझी ।

संविधान से प्राप्त अधिकारों का इस्तेमाल करके सीआईसी ने सरकार को विचलित करनेवाले कई आदेश जारी किए । मनमोहन सिंह सरकार ने तो झेल लिया । मगर नरेंद्र मोदी सरकार के लिए बर्दाश्त करना कठिन हो गया ।

2018 में सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यालू ने नरेंद्र मोदी की दिल्ली यूनिवर्सिटी से प्राप्त बीए डिग्री को चुनौती देनेवाली आरटीआई अपील पर यूनिवर्सिटी के 1978 का रिकार्ड खंगालने का आदेश दे दिया । यह सवाल गत हफ्ते लोकसभा में कांग्रेस सदस्य शशि थरूर ने उठा दिया । सूचना आयुक्त आचार्यालू ने 2018 में ही केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी के स्कूल प्रमाण पत्र के खिलाफ आए आरटीआई आवेदन पर सीबीएसई को स्मृति इरानी का बोर्ड परीक्षा परिणाम सार्वजनिक करने कहा ।

अक्टूबर, 2018 में सीआईसी आर. के. माथुर ने पीएमओ से 2014 से 2017 के दौरान मंत्रियों के खिलाफ मिली भ्रष्टाचार की शिकायतों का खुलासा करने कहा । यह विदेशों से वापस लाए गए काले धन में घपला से संबंधित था ।