लोकसभा चुनाव कार्यक्रम ऐलान से पहले केंद्र की भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार ने सीएए लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी । इसके साथ ही नागरिकता संशोधन एक्ट(सीएए), 2019 को चुनावी मुद्दा बनाने की भाजपा की योजना पर कानूनी मुहर लग गयी । केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत केंद्रीय गृह मंत्रालय और अन्य केंद्रीय मंत्री पहले से ही सीएए को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के बाद दूसरा वोट मुद्दा बनाने का वायदा कर रहे थे । इसमें निशाने पर मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस सरकार है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मजबूती भाजपा को खटक रही है । पश्चिम बंगाल में बांग्लादेश से आए अल्पसंख्यकों की आबादी असम के बाद दूसरे नंबर पर है । असम में तो भाजपा को वोट ध्रुवीकरण का सियासी लाभ मिला है और दूसरी बार भाजपा सत्ता में आयी है । लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी(दीदी) को अपदस्थ करने में भाजपा को सफलता नहीं मिल रहा है । इस लोकसभा चुनाव में दीदी को ज्यादा शिकस्त देने के लिए भाजपा ने पश्चिम बंगाल से ही यह जुमला खेला, ताकि बांग्लादेश से आकर बसे हिन्दू अल्पसंख्यकों को नागरिकता देकर उन्हें अपना वोटर बनाया जाए ।
क्योंकि पिछले लोक सभा चुनाव और पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में भाजपा को अच्छी खासी सीटें जीतने में कामयाबी मिली । नवंबर, 2023 से जनवरी, 2024 के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल में एक खास समुदाय को मोहरा बनाकर गैर-भाजपा शासित राज्यों को याद दिलाना शुरू किया कि भाजपा 2024 आम चुनाव में सीएए को चुनावी मुद्दा बनाएगी । अमित शाह ने बंगाल जाकर कहा कि लोकसभा चुनाव से पहले सीएए लागू करने के नियम जारी हो जाएंगे । उसके बाद केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्र ने बंगाल के मतुआ बहुल आबादी वाले उत्तरी 24 परगना जिले में कहा कि सीएए लागू के नियम का अंतिम मसौदा 30 मार्च तक तैयार हो जाएगा । फिर उसके बाद तीसरे केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर ने 28-29 जनवरी को मतुआ समुदाय के बीच पहुंचकर कहा कि सीएए सात दिनों में लागू हो जाएगा । शांतनु ठाकुर बोनगांव लोकसभा सीट से जीते हैं, जहां मतुआ की आबादी ज्यादा है । 1950 के आसपास बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए हिंदू आस्था वाले मतुआ अनुसूचित जाति के हैं और इन्होंने पिछले चुनावों में भाजपा को वोट दिया था ।
केंद्रीय मंत्रियों की इन वोट आरक्षण आश्वासनों की गैर-भाजपा शासित तीन राज्यों में जनवरी में ही तीखी प्रतिक्रिया हुई । केरल और तमिलनाडु में भाजपा को पैर जमाने में राजनीतिक अड़चनों का सामना इसलिए करना पड़ रहा है क्योंकि इन दोनों राज्यों में मुसलमान तथा इसाईयों का वोट निर्णायक होता है । जैसी कि संभावना थी, सीएए नियमों की अधिसूचना जारी होते ही घमासान मच गया । केरल के वाममोर्चा मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन और तमिलनाडु के डीएमके मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने भी जवाब दे दिया कि वे सीएए लागू नहीं करेंगे । स्टालिन ने कहा कि श्रीलंका से प्रताड़ित होकर आए तमिलों को नागरिकता क्यों नहीं, क्योंकि वे हिंदू नहीं? अमित शाह के दौरे के बाद दीदी ने मतुआ समुदाय की प्रतिनिधि ममता बाला ठाकुर को राज्य सभा का उम्मीदवार बना दिया और फिर उत्तरी 24 परगना जाकर कहा कि भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ उठाने नहीं दिया जाएगा । गैर-भाजपा गठजोड़ शासित झारखंड में पुलिस अलर्ट कर दिया गया है ।
राजनीतिक विवाद सीएए नियम की अधिसूचना जारी होने के समय को लेकर खड़ा हुआ है । भाजपा ने योजनाबद्ध तरीके से यह कदम उठाया है ताकि इसका चुनावी लाभ उठाया जा सके । वास्तव में नागरिकता संशोधन एक्ट(सीएए) 2019 बनने के समय से ही विवादित है और इसको लेकर देश में दंगा, हिंसा भड़क चुका है । मुख्य रूप से असम, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में 2020 में हिंसा भड़की । हिंसा को लेकर सबसे ज्यादा तूफान दिल्ली में मचा, जहां के शाहीन बाग में 100 दिनों तक धरना, प्रदर्शन चला । 50 से ज्यादा लोग मारे गए ।
दिसंबर, 2019 में संसद में सीएए पेश हुआ और जनवरी, 2020 में लागू होते ही इसके विवादित प्रावधानों को लेकर बवाल मच गया । उसका चुनावी लाभ भाजपा को उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और असम में मिला । आम आदमी पार्टी को दिल्ली में मिला । जबकि 2020 में विवादित प्रावधानों के अनुसार नागरिकता प्रदान करने के नियम नहीं बने थे । सीएए के तहत मात्र तीन पड़ोसी देशों से धार्मिक प्रताड़ना के शिकार होकर 31.12.2014 तक भारत आए गैर-मुस्लिम समुदायों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया है । इस्लामी देश पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से भारत आए हिंदू, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी समुदायों को नागरिक बनाने का प्रावधान किया गया । पड़ोसी बौद्ध देश म्यांमार, श्रीलंका से आए किसी भी समुदाय के लिए सीएए में प्रावधान नहीं था । सीएए के अंतर्गत नागरिकता प्रदान करने के नियम बनाने का काम केंद्र सरकार टालती रही । चार वर्षों बाद आम चुनाव के समय अधिसूचना जारी करने का मकसद स्पष्ट है कि भाजपा को अब विवाद के आलोक में मजहबी आधार पर वोटों का सामाजिक विभाजन देखना है । दिसंबर, 2019 में ही केरल के बाद पंजाब, राजस्थान और पश्चिम बंगाल विधान सभाओं से सीएए के विरोध में प्रस्ताव पारित हो चुका है । इसमें सिर्फ राजस्थान में सरकार बदली है और भाजपा सत्ता में लौटी है । दिल्ली के आम आदमी पार्टी मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वही कहा जो भाजपा देखना चाहती है । मतदाता चुनाव में जवाब देंगे । अमित शाह ने सीएए अधिसूचना जारी होने के बाद 11 मार्च को कहा कि सरकार ने अपनी प्रतिबद्धता पूरी की, लेकिन अंदेशा है कि इससे अशांति फैलेगी और शांतिपूर्ण मतदान में बाधा आएगी । भाजपा शासित असम में अतिरिक्त पुलिसकर्मियों की तैनाती तुरंत हो गयी । बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों को लेकर 1979 में छात्र आंदोलन असम में ही शुरू हुआ था । ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन ने कह दिया कि वह कानूनी लड़ाई लड़ेगा । 1955 में बने नागरिकता कानून में यह छठा संशोधन है और सुप्रीम कोर्ट की सीधी मानीटरिंग के बावजूद असम का यह विवाद नहीं सुलझा है । सीएए, 2019 की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठानेवाली कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की गयीं । सीएए लागू होने के बाद उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ सरकार के तोड़फोड़ में उचित रूप से शामिल मुसलमानों के प्रति सख्त रवैए का मामला भी सुप्रीम कोर्ट में गया और शीर्ष कोर्ट से उन्हें राहत मिली । दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया छात्रों पर पुलिस कार्रवाई में फंसे छात्र अभी तक छुटकारा पाने के लिए अदालतों में दौड़ रहे हैं ।
इन विवादों के कारण केंद्र सरकार को सीएए नियम अधिसूचित करने में चार साल से ज्यादा लग गए । इस पर विवाद कर रही संसदीय समिति से केंद्र ने 9 बार विस्तार मांगा । संवैधानिक प्रावधान के अनुसार सीएए लागू होने के 6 महीने के अंदर केंद्र को नियम बनाने हैं । ऐसा नहीं कर पाने पर अवधि का विस्तार मांगना होता है, जो एक बार में 6 महीने से ज्यादा का नहीं मिलता ।
सीएए में प्रावधान तो अन्य अल्पसंख्यक समुदायों का भी है । मगर यह मामला हिंदू-मुस्लिम तनाव का ही बना । दंगे, हिंसा में भी यही दोनों समुदाय आमने-सामने थे । कांग्रेस समेत सभी गैर-भाजपा दल इसे भाजपा का विभाजनकारी और मतों का ध्रुवीकरण रवैया बता रहे हैं । पूर्वोत्तर में भाजपा सरकार परचम पर केंद्र की नजर है । इसलिए असम, मेघालय और त्रिपुरा के आदिवासी इलाकों तथा अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम, नगालैंड में आईएलपी (इनर लाईन परमिट) के अंतर्गत वाले क्षेत्रों को सीएए नियम से बाहर रखा गया है । नागरिकता आवेदन करनेवालों को पहले की तरह 11 साल के बजाए 6 साल प्रवास का प्रमाण देना होगा ।
चुनावी बांड पर सुप्रीम कोर्ट से झटका मिलने के बाद केंद्र सरकार ने चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले नागरिकता आवेदन का पोर्टल लॉन्च कर दिया, ताकि आचारसंहिता बाधक न बने । इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया ने 12 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में अर्जी देकर सीएए अधिसूचना तथा पोर्टल लॉन्च पर रोक की मांग कर डाली ।