संसद के बजट सत्र का पहला चरण समाप्त होने के बाद अंतराल के दिनों में ही केंद्र सरकार ने सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो) डायरेक्टर का चयन टालने के लिए अतिरिक्त डायरेक्टर प्रवीण सिन्हा को अंतरिम डायरेक्टर बना दिया । बजट सत्र का दूसरा चरण शुरू होने से पहले बीच में जितना समय था, वो सीबीआई डायरेक्टर का विधिवत् चयन करने के लिए पर्याप्त था । कायदे से तो सीबीआई डायरेक्टर के रिटायर होने से पहले चयन हो जाना चाहिए था । लेकिन सरकार को सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार चयन समिति के जरिए सीबीआई डायरेक्टर का चयन टालने में ज्यादा भरोसा है । सरकार को सीबीआई प्रमुख का पद संभालने के लिए ऐसे आईपीएस अधिकारी चाहिए जो सरकार के निर्देशों पर चले और उनका किसी-न-किसी रूप में गुजरात से लिंक हो । इसलिए ऐसे सीबीआई अधिकारी को अंतरिम डायरेक्टर बनाकर सरकार चयन समिति की बैठक कोई-न-कोई बहाने लंबित रखती है । सीबीआई डायरेक्टर चयन समिति के अध्यक्ष प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस तथा लोकसभा में विपक्ष के नेता दो अन्य सदस्य होते हैं । चयन समिति में केंद्र सरकार अपनी पसंद के दावेदार पर मुहर नहीं लगवा सकती । इसलिए अंतरिम डायरेक्टर के ही भरोसे छोड़ दिया जाता है । अभी सरकार के पास सबसे अच्छा बहाना था, संसद का बजट सत्र । 3 फरवरी का ही सीबीआई डायरेक्टर आर. के. शुक्ला रिटायर हो गए । सीबीआई के तीन अतिरिक्त डायरेक्टरों में सबसे सीनियर प्रवीण सिन्हा को अंतरिम डायरेक्टर बना दिया गया ।
और फिर वही हुआ, जो नरेंद्र मोदी शासन में पहले से होता आ रहा है । नियमित डायरेक्टर नियुक्त करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर केंद्र सरकार को 12 मार्च को नोटिस जारी कर दी गयी । कॉमन कॉज की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट जज एल. नागेश्वर राव और एस. रवीन्द्र भट्ट की पीठ के सामने याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट के सेक्शन 4ए के अनुसार आर. के शुक्ला के रिटायर होने से एक-दो महीने पहले ही नियमित डायरेक्टर का चयन हो जाना चाहिए । लेकिन उसकी जगह सरकार ने अंतरिम डायरेक्टर नियुक्त कर दिया, जिसका प्रावधान एक्ट में नहीं है । सीबीआई को नियंत्रित करनेवाले कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग(डीओपीटी) ने अपने आदेश में कहा कि मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति ने नए डायरेक्टर की नियुक्ति या अगले आदेश तक प्रवीण सिन्हा को सीबीआई डायरेक्टर के रूप में काम करने को मंजूरी दे दी ।
प्रवीण सिन्हा 1988 बैच के गुजरात काडर के आईपीएस अधिकारी हैं । लंबे समय तक वे अंतरिम डायरेक्टर बने रहते । लेकिन सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के बाद सरकार की यह मंशा शायद पूरी न हो ।
चयन समिति की बैठक पहले भी तब बुलायी गयी, जब सुप्रीम कोर्ट में मामला गया और शीर्ष कोर्ट की फटकार पड़ी ।
2018 में सीबीआई के अंदर मचे हाई प्रोफाईल उठापटक सुप्रीम कोर्ट में मामला जाने के बाद भी सलट नहीं पाया । अंतरिम डायरेक्टर की बदौलत सीबीआई चलाने और गुजरात लिंक वाली सरकार की कमजोरी के कारण विवाद भड़का । भ्रष्टाचार की जांच करनेवाली सीबीआई के अंदर का वो घमासान भ्रष्टाचार में लिप्त रसूखवाले दबंगों की मुठ्ठी में सीबीआई डायरेक्टरों के होने के कारण पूरे वर्ष सुर्खियों में रहा ।
2018 घमासान की जड़ गुजरात काडर के ही 1984 बैच के आईपीएस अधिकारी राकेश अस्थाना अभी सीबीआई डायरेक्टर के सबसे प्रबल दावेदार माने जाते हैं । 2018 में अस्थाना सीबीआई डायरेक्टर नंबर-2 थे और रिश्वतखोरी में फंसे होने के बावजूद सरकार के चहेते थे । सीबीआई प्रमुख नंबर-1 आलोक कुमार वर्मा और नंबर-2 राकेश अस्थाना दोनों के बीच चली उठापटक के कारण केंद्रीय सतर्कता आयुक्त(सीवीसी) सरकार और सुप्रीम कोर्ट के अंदर भारी अफरातफरी ठनी रही । राकेश अस्थाना अभी एक ही साथ सीमा सुरक्षा बल और नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो दोनों के प्रमुख हैं ।
वर्ष 2018 सीबीआई के 55 वर्ष के इतिहास का यादगार अध्याय के रूप में दर्ज हो गया । जिस सीबीआई का संवैधानिक आधार नहीं है, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट, सीवीसी और सरकार के बीच वैसी अप्रत्याशित रार पहले कभी देखने को नहीं मिली ।
3 फरवरी, 2021 को अंतरिम डायरेक्टर के हाथ में सीबीआई की कमान सौंपे जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और सीबीआई से इसके अधिकार क्षेत्र को चुनौती देनेवाली याचिका पर जवाब मांगा । उस याचिका में कलकता हाईकोर्ट के एक आदेश को चुनौती दी गयी, जिसमें पश्चिम बंगाल में एक कथित अवैध खनन मामले में सीबीआई जांच का आदेश दिया गया था । याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि पश्चिम बंगाल सरकार ने 2018 में ही सीबीआई को राज्य में किसी भी मामले की जांच का अधिकार देने से मना कर दिया था, इसलिए एफआईआर दर्ज करना सीबीआई के अधिकार क्षेत्र से बाहर है । पश्चिम बंगाल के बाद आंध्र प्रदेश और फिर महाराष्ट्र, पंजाब सरकार ने भी अपने यहां सीबीआई के प्रवेश पर रोक लगा दी । इसी बीच गत हफ्ते पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के नंदीग्राम से पर्चा भरने के दौरान कथित रूप से चोटिल होने की घटना की सीबीआई से जांच कराने की मांग प्रदेश भाजपा यूनिट के अध्यक्ष दिलीप घोष ने कर डाली ।
सीबीआई के पास ऐसा ठोस संविधान सम्मत कानूनी अधिकार नहीं है, जिसके आधार पर यह संस्था सरकारी दायित्व से इतर कुछ कर सके । सीबीआई का गठन संसद से पारित एक्ट के तहत नहीं हुआ है, जिस पर राष्ट्रपति की मुहर हो और वो संविधान का हिस्सा बने । सीबीआई को ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष’ जांच एजेंसी कहकर महिमामंडित करना जनता को झांसा देना है । दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों की बदौलत सीबीआई काम करती है । संसद में इस एक्ट का बिल न तो कभी पेश हुआ, न ही इस पर चर्चा हुई । वर्तमान में सीबीआई डीओपीटी(कार्मिक और प्रशिक्षण मंत्रालय) के अधीन काम करती है । डायरेक्टर के लिए नाम का चयन और चयन प्रक्रिया इसी मंत्रालय के जिम्मे है । इसलिए सीबीआई की हैसियत एक सरकारी संस्था से बेहतर नहीं है । 2013 में गुवाहाटी हाईकोर्ट के जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की खंडपीठ ने इसी आधार पर सीबीआई को असंवैधानिक घोषित कर दिया। केंद्र सरकार ने तुरंत सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम ने सुप्रीम कोर्ट का समय समाप्त होने के बावजूद अपने आवास पर सुनवाई करके गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे दे दिया । आज स्टे पर ही सीबीआई काम कर रही है । उस स्टे की अभी तक सुप्रीम कोर्ट में एक भी सुनवाई नहीं हुई । जब सुप्रीम कोर्ट के स्टे पर सीबीआई का कानूनी अस्तित्व टिका है तो अंतरिम डायरेक्टर पर काम चलाने में कोई अचरज नहीं होना चाहिए । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ही बनी डायरेक्टर चयन समिति अड़चन खड़ी करती है, जिसके सदस्य सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी है ।
अब देखिए कि विधिवत् चयनित डायरेक्टर अनिल सिन्हा के दिसंबर, 2016 में रिटायर होने के बाद क्या हुआ, जब नरेंद्र मोदी सरकार ने राकेश अस्थाना को अंतरिम सीबीआई डायरेक्टर बनाकर चयन टालना चाहा । सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जनवरी, 2017 में ही चयन समिति की बैठक बुलानी पड़ गयी । बैठक में मौजूद सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस की मुहर लगने के बाद केन्द्र सरकार का दिल्ली पुलिस आयुक्त आलोक वर्मा को सीबीआई डायरेक्टर पद पर नियुक्ति करनी पड़ी । लेकिन राकेश अस्थाना को स्पेशल डायरेक्टर बनाकर केंद्र सरकार ने आलोक वर्मा के समानान्तर बिठा दिया । इन दोनों के बीच दो साल तक तनातनी का मूल कारण राकेश अस्थाना का सरकार का चहेता होना था । उसका विस्फोट 2018 में हुआ और सीबीआई का हाई प्रोफाईल मामला सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच आ गया । दोनों डायरेक्टरों का एक-दूसरे पर रिश्वतखोरी के आरोपों ने इतना तूल पकड़ा कि सुप्रीम कोर्ट को कमान हाथ में लेनी पड़ी । कहने के लिए सीबीआई पर नियंत्रण रखनेवाली संवैधानिक संस्था सीवीसी के. वी. चौधरी ने सरकार की मर्जी के अनुसार आलोक वर्मा की छुट्टी कर दी । अभी जो प्रवीण सिन्हा अंतरिम डायरेक्टर बनाये गए वे 2018 में सीवीसी में नंबर-2 थे ।
अक्टूबर, 2018 में चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने आलोक वर्मा को फिर से सीबीआई डायरेक्टर बहाल कर दिया । जनवरी, 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चयन समिति की अफरातफरी में बैठक बुलायी गयी । इसमें सीवीसी की जांच रिपोर्ट को ‘आधार’ बनाकर आलोक वर्मा को दोबारा सीबीआई डायरेक्टर पद से हटा दिया गया और एम. नागेश्वर राव को अंतरिम डायरेक्टर बना दिया गया । सुप्रीम कोर्ट ने आलोक वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच सीवीसी को सौंपा । लेकिन उसकी भूमिका संदिग्ध होने के कारण जस्टिस ए. के. पटनायक को निगरानी करने कहा । आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना की ओर से एक-दूसरे के खिलाफ दर्ज करायी गयी एफआईआर का मामला दिल्ली हाईकोर्ट में गया । दिल्ली हाईकोर्ट ने राकेश अस्थाना के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने और आलोक वर्मा को दोषी मानने से इन्कार कर दिया । इस चक्कर में सरकार ने 2019 में सीवीसी की नियुक्ति के लिये भी चयन समिति की बैठक टाली । उसमें भी एक मात्र सत्तर्कता आयुक्त शरद कुमार को अंतरिम सीवीसी बनाकर राम भरोसे छोड़ दिया ।