केंद्रीय सूचना आयोग में, केंद्रीय सूचना आयुक्त कार्यालय में और राज्य सूचना आयोग में कई महीनों से खाली पड़े रिक्त पदों पर सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जवाबतलब किया है । जस्टिस ए. के. सिकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने केंद्र सरकार से हलफनामा दायर करके चार हफ्ते के अंदर यह बताने का निर्देश दिया है कि कितने समय में ये नियुक्तियां हो जाएंगी । सुप्रीम कोर्ट पीठ के जजों ने कहा है कि केंद्रीय सूचना आयोग में इस वक्त चार पद रिक्त हैं और दिसंबर में चार अन्य रिक्त हो जाएंगे ।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और सात राज्यों को गत हफ्ते वैसे समय में यह निर्देश जारी किया है, जब केंद्रीय सूचना आयोग को लचर बनाने की चर्चा गर्म है । केंद्र सरकार ने एक साथ दो उपाय आजमाए और दोनों ही विवाद के घेरे में आ गए । सीआईसी(केंद्रीय सूचना आयोग) में रिक्तियों का मामला सुप्रीम कोर्ट में जाना सरकार के लिए कोई नई बात नहीं है । केंद्रीय सूचना आयोग के सर्वोच्च अधिकारी मुख्य सूचना आयुक्त का पद 2015 में कई महीनों तक खाली पड़ा रहा । केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार सीआईसी की नियुक्ति टालती रही । चयन प्रक्रिया दिल्ली हाईकोर्ट की इस सरकार के बाद शुरू हुई कि ‘कोर्ट का दखल होने तक लंबे समय के लिए महत्वपूर्ण पद खाली रखे जाते हैं’ । अप्रील, 2015 में सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट का बताया कि नियुक्ति प्रक्रिया में तीन महीने लगेंगे । जबकि उस समय मुख्य सूचना आयुक्त की खाली कुर्सी के नौ महीने गुजर चुके थे और उसके अलावे तीन सूचना आयुक्तों के भी पद रिक्त पड़े थे । आखिरकार दिसंबर, 2015 के अंतिम सप्ताह में पूर्व रक्षा सचिव आर. के. माथुर सीआईसी नियुक्त हुए ।
अभी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुपालन में भी सरकार किसी-न-किसी बहाने लोकपाल पद पर नियुक्ति की तरह सीआईसी की नियुक्तियां भी टालेगी । इसकी प्रबल संभावना है । क्योंकि सरकार सीआईसी को एक कमजोर और लचर संस्था बनाना चाहती है, ताकि सूचना का अधिकार(आरटीआई) के इस्तेमाल से सरकार को जनता के कटघरे में न खड़ा होना पड़े ।
आरटीआई एक्ट, 2005 के अंतर्गत जनता को दिया गया सूचना का अधिकार न तो रद्द किया जा सकता है, न वापस लिया जा सकता है । इसलिए सरकार ने आरटीआई संशोधन बिल का ऐसा मसौदा तैयार किया ताकि केंद्रीय सूचना आयोग संवैधानिक संस्था की जगह एक सरकारी संस्था की तरह काम करे । इसका प्रारूप अभी गोलमटोल रखा गया है । लेकिन संशोधन बिल में ऐसे नियम जोड़े गए हैं ताकि सीआईसी सरकार के पूर्ण नियंत्रण में हो और वैसी कोई सूचना सार्वजनिक करने का आदेश मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त किसी सरकारी विभाग को न दे पाएं जो सरकार न चाहे ।
दरअसल मार्च, 2017 में ही आरटीआई एक्ट में संशोधन का प्रस्ताव सरकार ने उछाला । जब चारों तरफ तीखी प्रतिक्रिया हुई तो केंद्रीय कार्मिक और जन शिकायत मंत्रालय ने सफाई दे दी कि ‘ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है ।’ लेकिन अंदर-अंदर सीआईसी को लचर बनाने की तैयारी चलती रही । सूचना आयुक्त और आरटीआई कार्यकर्ता को तो पता था । मगर जनता तक इसकी जानकारी अभी जुलाई, 2018 में पहुंची, जब संसद के चालू मानसून सत्र में सरकार को खंडन करना पड़ गया कि सूचना का अधिकार(संशोधन) बिल, 2018 संसद में पेश करने के लिए तैयार है । उससे भी बड़ी बात ये कि केंद्रीय सूचना आयोग क सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्यालू ने इस संबंध में वरिष्ठतम सूचना आयुक्त यशोवर्धन आजाद को लिखा गया पत्र प्रेस को जारी किया । श्रीधर आचार्यालू के पत्र में 19 जुलाई की तारीख अंकित है, जिसमें सभी सूचना आयुक्तों की बैठक बुलाने और सरकार को संशोधन बिल वापस लेने के लिए संयुक्त रूप से लिखने कहा गया है । सूचना आयुक्त आचार्यालू ने अपने साथी सूचना आयुक्तों के नाम लिखे गए पत्र में सीआईसी से भी आग्रह किया कि सरकार को आरटीआई (संशोधन) बिल, 2018 वापस लेने के लिए लिखें । पत्र में सरकार की प्रस्तावित योजना का तथ्यपूर्ण खुलासा श्रीधर आचार्यालू ने यों किया है - ‘केंद्र सरकार सीआईसी(मुख्य सूचना आयुक्त) का दर्जा सीईसी(मुख्य चुनाव आयुक्त) के कमतर मानती है । आरटीआई एक्ट के अनुसार यह “संवैधानिक अधिकार” है, लेकिन प्रस्तावित संशोधन बिल में सरकार ने इस अधिकार को नहीं माना है । संविधान की धारा 324(1) के अंतर्गत अपने अधिकारों का इस्तेमाल करनेवाला सीईसी अगर संवैधानिक संस्था है तो संविधान की धारा-19(1)(ए) के अंतर्गत मौलिक अधिकार लागू करनेवाला सीआईसी गैर-संवैधानिक निकाय कैसे हो सकता है?’
आचार्यालू के अनुसार आरटीआई(संशोधन) बिल, 2018 एक ही साथ आरटीआई एक्ट, 2005 कानून बनने के असली मकसद को और भारतीय संविधान की मूल भावना संघवाद को समाप्त कर देगा ।
केंद्रीय सूचना आयोग को कमजोर करने की केंद्र सरकार की योजना को लेकर आयोग के अंदर मतभेद है । इसका मतलब है कि सरकार ने आवश्यक तैयारी कर ली है ताकि सूचना आयोग में विरोध हो भी तो कमजोर पड़ जाए । जुलाई के अंतिम सप्ताह के इस प्रकरण के समय सीआईसी छुट्टी पर थे । वरिष्ठतम सूचना आयुक्त यशोवर्धन आजाद इस विषय में प्रेस के सामने कुछ बोलने से कतराए और महज यह टिप्पणी करके बच निकले कि - ‘आचार्यालू मुझे लिख सकते हैं । हम आपस में अपनी बैठक बुला सकते हैं । लेकिन बिल पर ससंद में क्या हुआ, इस पर विचार करना बेतुका है । हम इसके लिए बैठक नहीं करने जा रहे हैं ।’
फिलहाल तो लगता है कि आचार्यालू के पत्र के आलोक में सूचना आयुक्तों की आपसी बैठक तय नहीं है और सीआईसी भी बैठक बुलाने तथा फिर सरकार को बिल वापस लेने के लिए लिखने में शायद ही दिलचस्पी लें । लेकिन केंद्रीय सूचना आयोग के साथ क्या होनेवाला है, उसका परत-दर-परत खुलासा श्रीधर आचार्यालू ने कर दिया है । इससे सरकार की यह मंशा का भी पता चलता है कि सरकार आरटीआई को मौलिक अधिकार मानने का तैयार नहीं है, जिसमें कटौती नहीं की जा सकती । आचार्यालू के अनुसार पता नहीं कैसे सरकार धारा 19(1)(ए) को दरकिनार करना चाहती है, जिसमें जनता को वोटिंग के जरिए अपनी पसंद बताने और सूचना पाने का अधिकार शामिल है । उन्होंने साफ-साफ अपने पत्र में लिखा है - ‘सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार समय-समय पर कहा है कि आरटीआई वोट डालने के अधिकार की तरह ही मौलिक अधिकार है । काफी विचार-विमर्श के बाद आरटीआई एक्ट में यह प्रावधान किया गया कि सीआईसी का संवैधानिक दर्जा सीईसी के समकक्ष होगा और संसद ने सीईसी की निश्चितता तथा पद पर निर्धारित समय तक बने रहने का भी प्रावधान किया है । इसके अनुसार सूचना आयुक्त 65 वर्ष की उम्र या जो पहले हो तक पांच साल के लिए अपने पद पर बने रह सकते हैं ।
सूचना आयुक्त आचार्यालू ने जो कुछ लिखा और उसे सार्वजनिक किया, उसका संकेत जनवरी, 2018 में चार सुप्रीम कोर्ट जजों द्वारा आहूत खुले संवाददाता सम्मेलन में ही मिल गया था । सुप्रीम कोर्ट के चार जजों ने चीफ जस्टिस के पास पीठ आवंटन के एकाधिकार पर संवाददाता सम्मेलन आयोजित किया और इसके विरोध में अपना असंतोष जताया । सरकार वैसा ही सीआईसी के साथ चाहती है ताकि कोई सूचना आयुक्त ऐसा आदेश पारित न कर पाएं जिसमें सरकार को फजीहत का सामना करना पड़े । श्रीधर आचार्यालू सरकार के निशाने पर हैं । क्योंकि इन्होंने प्रधानमंत्री से लेकर भाजपा बिरादरी तक को असहज कर देनेवाला आदेश पारित कर दिया है । इसीलिए सरकार ने नया नियम 15 संशोधन बिल में जोड़ा है, जिसमें सीआईसी को यह तय करने का पूर्ण अधिकार होगा कि किस अपील की सुनवाई कौन सूचना आयुक्त करेंगे । गैर-सरकारी और केंद्रीय सूचना आयोग के अंदर भी चर्चा है कि इसीलिए आचार्यालू को नोटिस नहीं लेने की नीति सरकारी दबाव में अपनायी गयी है ।
आचार्यालू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की स्नातक डिग्री को चुनौती देनेवाली आरटीआई अपील सुनवाई के लिए स्वीकार कर ली और उसकी जांच का आदेश दे डाला । एक आरटीआई आवेदक ने प्रधानमंत्री द्वारा अपने चुनाव हलफनामे में दिए गए योग्यता विषयक विवरण में खुद को दिल्ली यूनिवर्सिटी से 1978 में बीए पास बताने को चुनौती दी । उस पर सूचना आयुक्त आचार्यालू ने 1978 की दिल्ली यूनिवर्सिटी के बीए डिग्री रिकॉर्ड खंगालने और उसकी जांच का आदेश दे डाला । यह सीधे तौर पर प्रधानमंत्री के दावे की जांच कराने की जुर्रत थी । उतना ही नहीं, केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी के स्कूल परीक्षा प्रमाण पत्र को चुनौती देनेवाले आरटीआई आवेदन पर भी श्रीधर आचार्यालू ने केंद्रीय माध्यामिक परीक्षा बोर्ड(सीबीएसई) को आदेश दे डाला कि स्मृति इरानी के बोर्ड परीक्षा परिणाम सार्वजनिक करे । दिल्ली यूनिवर्सिटी और सीबीएसई की अपील पर दोनों ही आदेशों को दिल्ली हाईकोर्ट से स्टे मिल गया ।
केंद्रीय सूचना आयोग को सीमित दायरे में रखने के पक्ष में सभी दल हैं । क्योंकि सूचना आयोग पार्टियों के अंदरूनी चुनाव फंड, चंदा कारोबार पर ऊंगली उठाकर उसे सार्वजनिक करने का आदेश जारी कर चुका है । 2012 में सीआईसी सत्यानंद मिश्र ने यह आदेश जारी किया और सुप्रीम कोर्ट जजों को भी सार्वजनिक पद पर होने के कारण अपनी संपत्ति बताने को कहा । उनके मुताबिक यह सूचना पाने का अधिकार जनता को है । दरअसल उसी समय से सीआईसी पर अप्रत्यक्ष सरकारी नियंत्रण की तैयारी शुरू हो गयी, ताकि यह संवैधानिक मजबूती का दावा न करे । 2013 में सीआईसी ने संसद सदस्यों को ‘इन्कम टैक्स रिटर्न’ का खुलासा करने कह दिया । वो तो संसद की ‘सर्वोच्चता’ और ‘विशेषाधिकार’ पर हमला था । सब के सब बौखला गए । आरटीआई एक्ट का प्रशासनिक नियंत्रण सीआईसी का प्रबंधन अपने हाथ में लेने का ड्राफ्ट 2012 में तैयार हुआ । उसको 2007 का काट माना गया, जब सीआईसी ने ‘स्वतंत्र’ बनने के लिए अपना प्रबंधन नियम बनाया । दिल्ली हाईकोर्ट ने 2018 में उसे रद्द कर दिया । सीआईसी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, मामला चल रहा है । मार्च, 2017 में सरकार ने उसी मसौदे को आड़ी-तिरछी करके जनता से राय मांगी, जो आज खुला विवाद बन गया ।
सरकार नहीं चाहती कि दलाली, घपला, सुरक्षा बलों की फर्जी मुठभेड़ और घोलमट्ठा वाली सूचनाएं मांगने के लिए आरटीआई का इस्तेमाल हो, इसके लिए अर्जी की फीस बढ़ाने और छंटनी में भी सरकारो हस्तक्षेप प्रस्तावित है ।
सेना और अर्द्धसैनिक बलों की फर्जी मुठभेड़ों की सूचना जनता तक कोर्टों के जरिए पहुंचती है । गत 30 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई डायरेक्टर आलोक कुमार वर्मा को बुलाकर मणिपुर में कथित रूप से 1528 फर्जी मुठभेड़ मामलों की जांच का विवरण मांगा । 2017 के जुलाई में ही सुप्रीम कोर्ट ने विशेष जांच दल गठित करके सीबीआई से इन मामलों में आरोप पत्र दायर करने कहा था । ऐसे ही विवादित माहौल में विधि आयोग ने बीसीसीआई को आरटीआई दायरे में लाने कहा है । विधि आयोग के अनुसार सरकारी फंड से चलनेवाले इस क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का प्रबंधन ‘निजी संस्था’ की तरह चल रहा है, जबकि करोड़ों में यह टैक्स छूट लेता है । जुलाई, 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने विधि आयोग को इस पर विचार करने कहा था कि बीसीसीआई को आरटीआई के दायरे में लाया जा सकता है या नहीं । विधि आयोग ने संविधान की धारा-12 के अंतर्गत इसे ‘स्टेट’ की श्रेणी में रखकर आरटीआई दायरे में लाने की रिपोर्ट कानून मंत्रालय को दी हुई है ।