रिश्वतखोरी के कथित आरोपी सीबीआई प्रमुख नंबर एक आलोक वर्मा और नंबर दो राकेश अस्थाना को अचानक जिम्मेदारी से मुक्त करके छुट्टी पर भेजे जाने के मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट ने दो हफ्ते के अंदर पूरी करने कहा । जांच का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता आयोग को दिया है, जिसे दिवाली के बाद रिपोर्ट पेश कर देनी है । सीवीसी(केंद्रीय सतर्कता आयोग) के काम की निगरानी का जिम्मा सुप्रीम कोर्ट ने अपने पूर्व जज जस्टिस ए. के. पटनायक को दिया । क्योंकि भ्रष्टाचार की जांच करनेवाली देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई की निगरानी के लिए बने केंद्रीय सतर्कता आयोग खुद इस प्रकरण में विवाद के घेरे में है ।

इस अप्रत्याशित विवाद की जड़ में है वित्तीय घोटाला, घपला, हाई प्रोफाईल रिश्वतखोरी और रसूखवाले घोटालेबाजों का कानून के शिकंजे में आने से बचाने के लिए कानून की धज्जियां उड़ाने का प्रयास । सरकार की ओर स केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ‘सार्थक डेवलपमेंट’ बताया । अन्य मंत्रियों और भाजपा नेताओं ने लगभग चुप्पी साधे रखी । लेकिन वित्तमंत्री अरूण जेटली ने बड़े बेमन और असहज भाव से सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ‘सार्थक’ कहा । 26 अक्टूबर को केंद्रीय वित्त मंत्री ने सीबीआई के हाईप्रोफाईल भिड़न्त विवाद की जांच सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनी निगरानी में कराने के आदेश का ‘स्वागत’ किया और अगले ही दिन उनकी यह असहजता उजागर हो गयी । अवसर था - इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में आयोजित प्रथम अटल बिहारी वाजपेयी मीमोरियल लेक्चर समारोह । अरूण जेटली की लेक्चर क्या था - बस, सुप्रीम कोर्ट पर प्रहार था, सिर्फ नाम नहीं लेना था । सुप्रीम कोर्ट पर सीधी टिप्पणी से परहेज करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने स्पष्ट रूप में कहा - ‘कोई संस्था देश, संसद से ऊपर नहीं है, जिसे चलाना निर्वाचित जन प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है, जो जनता के प्रति जवाबदेह है । देश, संसद ‘सर्वोपरि’ है और इसे दरकिनार करना लोकतंत्र को कमजोर करना है ।’ शब्द लुभावने और उसूल आदर्श बघाड़ने वाले लगते हैं, मगर वास्तव में हैं नहीं । केंद्रीय वित्त मंत्री के कथन का सीधा तात्पर्य था कि जनप्रतिनिधियों की सरकार जो कुछ कर रही है और सभी संवैधानिक संस्थाओं को चाहिए कि सरकार के हिसाब से चले तथा सरकार के हर काम को सही ठहराए । केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट से भी उम्मीद कर रही थी कि आनेवाले चुनावों और खासकर लोकसभा चुनाव का ख्याल रखा जाए । राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद पर सुनवाई के लिए तारीख जनवरी तक टालने के सुप्रीम कोर्ट के 29 अक्टूबर के फैसले से समस्त भाजपा का पूरा संघ परिवार बिफर उठा । भाजपा के पक्षकार सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस रंजन गोगोई से उम्मीद कर रहे थे कि वे सरकार की चुनावी प्राथमिकता को तवज्जो दें । उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से बतौर वकील पेश केंद्र सरकार के अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट से दिवाली बाद सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अपील रखी और इसके एवज में दलील दी कि अयोध्या भूमि विवाद सौ साल पुराना है तथा इससे सम्बन्धित सभी कागजात तैयार हैं । लेकिन शीर्ष कोर्ट ने साफ कह दिया कि यह हमारी प्राथमिकता नहीं है और उचित पीठ जनवरी के पहले सप्ताह में तय करेगी । सीबीआई के अंदरूनी कलह और उसमें सरकार की भूमिका को लेकर उठे विवाद को निबटाना सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकता समझी । इसलिए दस दिनों के अंदर जांच पूरी करने का निर्देश दिया गया, जो सरकार को अच्छा नहीं लगा । लेकिन अयोध्या विवाद पर आम चुनाव से पहले सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने की संभावना कम हो जाने से इसका चुनावी फायदा मिलना मुश्किल है ।

सीबीआई के 55 वर्ष के इतिहास में ऐसी अप्रत्याशित घटना कभी नहीं हुई । इस विवाद को निबटाना सरकार की प्राथमिकता नहीं है । क्योंकि सरकार सीबीआई को ऐसी जांच एजेंसी बनाए रखना चाहती है, जो एक सरकारी विभाग की तरह भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करे और वेसे मामले उजागर न होने दे, जिसे सरकार दबाना चाहे । सीबीआई निदेशक के लिए चयन प्रक्रिया में इसीलिए सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा और एक चयन समिति बनायी गयी, जो संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों के लिए बनी हुई है । लेकिन सरकार ने इसका पालन करना कभी जरूरी नहीं समझा । सीबीआई को राजनीतिक दवाब में यह तय करना होता है कि किस भ्रष्ट के खिलाफ सबूत जुटाने हैं और किसके खिलाफ मिटाने हैं । इसके लिए सीबीआई को सूचना अधिकार के दायरे से बाहर कर दिया गया । यह काम पिछले कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल में हुआ ताकि घोटालों की राजनीतिक जांच से जुड़ी कोई सूचना मतदाता न मांग सके । कमाल की बात है कि सूचना अधिकार के दायरे में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई की निगरानी करनेवाला सीवीसी तक आता है । मगर सीबीआई से जनता कोई सूचना नहीं मांग सकती, जो अब बिना मांगे लोगों को मिल रही है । अब तो सुप्रीम कोर्ट के जरिए ही पता चलेगा कि आधी रात के बाद भारी अफरातफरी में अंतरिम निदेशक के रूप में एम. नागेश्वर राव के कार्यभार ग्रहण करने की कौन सी इमर्जेंसी थी? आलोक वर्मा और राकेश अस्थाना विवाद प्रकरण से जुड़े अधिकारियों का तत्काल तबादला करना किस प्रकार जनहित में था । सीबीआई का पानी गंदा करने के जुर्म में एक अधिकारी को काला पानी वाली जगह पोर्ट ब्लेयर भेजने की नौबत क्यों आयी? इन सब सवालों का जवाब सुप्रीम कोर्ट के माध्यम से पहुंचना देशहित में होगा या नहीं यह क्या जनप्रतिनिधि तय करेंगे? अगर ऐसा था तो 2003 में भाजपा शासनकाल में बने सीवीसी एक्ट को डंप क्यों रखा गया । ठीक लोकपाल की तरह सीवीसी एक्ट संसद के दोनों सदनों से पास होकर पड़ा रहा । लेकिन भाजपा सरकार ने सीवीसी का गठन जरूरी नहीं समझा । इसका एकमात्र कारण आम लोगों की समझ में यही आता है कि सरकार ऐसी कोई संस्था नहीं चाहती थी, जो सीबीआई को नियंत्रित करे और सीबीआई की तरह ही पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में न हो । सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सीवीसी का गठन हुआ । 2003 में ही सुप्रीम कोर्ट न सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए भी एक आदर्श मोडल तय किया । इस पद पर बेदाग पुलिस अधिकारी की नियुक्ति के लिए शीर्ष कोर्ट ने सीवीसी की अध्यक्षता में एक चयन समिति बनाने का निर्देश दिया, जिसमें गृह सचिव और कैबिनेट सचिव भी रखे गए ।

2004 में भाजपा सत्ता से बाहर हो गयी और कांग्रेस सरकार ने सुनियोजित तरीके से सीवीसी तथा सीबीआई दोनों का राजनीतिकरण शुरू कर दिया । कांग्रेस गठजोड़ के दूसरे कार्यकाल में तो ये हाल हो गया कि सभी आदर्शों को धता बताकर रंजीत सिन्हा की सीबीआई निदेशक पद पर नियुक्ति की गयी । 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले और कोल ब्लॉक आवंटन में धांधली की जांच में रंजीत सिंहा की भूमिका का ये हाल हो गया कि सुप्रीम कोर्ट को पूरी जांच प्रक्रिया की मॉनीटरिंग अपने हाथ में लेनी पड़ी । रंजीत सिंहा और सरकार क सोलिसिटर जनरल सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई को ‘स्वतंत्र’ और ‘निष्पक्ष’ जांच एजेंसी बताते रहे । यह वर्ष 2011 की बात है, जब सीवीसी पद पर भी दागी पी. जे. थॉमस की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट को रद्द करनी पड़ी । सीबीआई निदेशक रंजीत सिंहा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि सीबीआई को सीवीसी के नियंत्रण से बाहर रखा जाए ताकि निष्पक्षता और स्वतंत्रता सुनिश्चित रह सके और उन्हीं के खिलाफ जांच के लिए जनवरी 2017 में सुप्रीम कोर्ट को विशेष टीम गठित करनी पड़ी । उसके बाद सुप्रीम कोर्ट को सीबीआई निदेशक की नियुक्ति के लिए भी सीवीसी और केंद्रीय सूचना आयुक्त वाली चयन प्रक्रिया अपनाने की व्यवस्था करनी पड़ी । सुप्रीम कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि सीबीआई निदेशक को दो साल से पहले अपने पद से हटाया न जाए और प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली चयन समिति में चीफ जस्टिस भी हों ।

2014 में भाजपा गठजोड़ के सत्ता में आने के बाद से लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं का ये हाल करने की प्रक्रिया शुरू हुई कि या तो काम न कर सकें और करें तो सरकार की मर्जी के खिलाफ न जाएं । आज जिस कारण से सीवीसी की जांच पर नजर रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट को अपने पूर्व जज को तैनात करना पड़ा, उसके पीछे सीवीसी का भी सरकारीकरण है । सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार सीबीआई निदेशक का दो साल से पहले तबादला भी नहीं किया जा सकता । लेकिन सरकार के सामने ऐसी स्थिति पैदा हो गयी कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना दोनों को कार्यभार से मुक्त करके अवकाश पर भेज दिया गया । यह तो अच्छा हुआ कि लोकपाल गठन सरकार ने पूरे पांच साल तक सुप्रीम कोर्ट की बार-बार फटकार के बावजूद लटकाये रखा । लोकपाल एक्ट प्रारूप में प्रावधान है कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच सीवीसी के पास लोकपाल भेजेगा और उसके बाद सीवीसी सीबीआई को जांच का निर्देश देगी । आज लोकपाल की क्या गत होती, जिसके पास सीवीसी या सीबीआई के खिलाफ कोई कार्रवाई करने का अधिकार एक्ट में नहीं दिया गया है ।