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जनकवि बाबा नागार्जुन : सान्निध्य, संस्मरण एवं साहित्य संसार
जनकवि बाबा नागार्जुन के साथ वरिष्ठ पत्रकार शशिधर खान का बाल्यकाल व पत्रकारिता जीवन का अत्यंत आत्मीय, अंतरंग सान्निध्य रहा। यहाँ बाबा पर विभिन्न समय में लिखे गए सभी संस्मरण, साक्षात्कार एवं प्रमाणिक आलेख संगृहीत हैं।
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कलम रुकने का डर है नागार्जुन को
पटना, 16 नवम्बर (भाषा)। हिंदी के जाने-माने साहित्यकार बाबा नागार्जुन इस बात से दुखी हैं कि भारत में उन जैसे कलमजीवियों को अपने भरण पोषण के लिए प्रकाशकों की दया पर आज भी निर्भर रहना पड़ता है।
इस वर्ष साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता पाने वाले बाबा यहां राजेन्द्र शिखर सम्मान पाने के बाद ‘भाषा’ से बातचीत कर रहे थे। उन्होंने बताया कि 84 साल की उम्र में भी उदरपूर्ति के लिए कलम चलाना पड़ रहा है फिर भी उन्हें डर है कि कहीं सांस टूटने से पहले कलम रुक न जाये।
जे.पी. आंदोलन के दौरान नुक्कड़ों पर अपने काव्यपाठ से जनमानस को झकझोरने वाले बाबा को यह बात साल रही है कि जे.पी. आंदोलन के लक्ष्यों और उपलब्धियों को कूड़ेदान में फेंक दिया गया।
वे कहते हैं कि कोई भी अच्छा राजनीतिज्ञ किसी भी आंदोलन की उपलब्धियों की बंदरबांट में शामिल नहीं होता, यही कारण है कि आजादी के समय के माहौल से दुखी होकर महात्मा गांधी दिल्ली छोड़कर नोआखली चले गये थे।
लोगों के बीच बाबा के नाम से मशहूर नागार्जुन की राय में केन्द्र में स्थिरता कायम रह पायेगी क्योंकि प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव जोड़तोड़ की कला में पारंगत हैं। वामपंथियों को उन्होंने खिचड़ी और दिशाहीन राजनीति करने वालों की संज्ञा दी और भाजपा पर नयी पीढ़ी को सही रास्ते से विमुख करने का आरोप लगाया।
आज के साहित्य लेखन पर टिप्पणी करते हुए बाबा ने कहा कि आज के लेखकों को छपाए की बीमारी है किंतु स्तरीय लेखन गहरे अध्ययन और मनन की मांग करता है।
पर्यटन विकास निगम के कमरा नं. 102 में बाबा अपने चिरपरिचित बाल सुलभ सरलता से एक टोस्ट पर मक्खन की तरह च्यवनप्राश लगाते हैं और खाते हुए कहते हैं कि बड़ा मजेदार लग रहा है। ये च्यवनप्राश एक लाख इक्कावन हजार के राजेन्द्र शिखर पुरस्कार के साथ व्यवहार के लिए मुख्यमंत्री लालू प्रसाद ने भेंट किया है।
बाबा कहते हैं, च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, लेकिन इसका स्वाद तो गजब का है, सरकारी है न। बाबा बताते हैं कि मुख्यमंत्री ने उनसे कहा कि रउआ के जियावे के बा (आपको जिंदा रखना है) मगर अब क्या अब तो उनके जर्जर शरीर में सिर्फ चमड़ी ही बची है।
लालू प्रसाद के बारे में बाबा कहते हैं कि लोगों को मोहने की कला में वो माहिर हैं, देखना यह कला उसे दोबारा मुख्यमंत्री बना देगी।
इस उम्र में भीड़ में दूसरे दर्जे की रेल यात्रा से होने वाले कष्ट से भी बाबा दुखी हैं। वे कहते हैं कि रेलमंत्री अगर उन्हें दो आदमी का वीआईपी पास उपलब्ध करा दे तो बड़ी राहत मिलेगी। यायावरी प्रवृत्ति के बाबा वर्षों से भयंकर दमे से पीड़ित हैं जिसके चलते ठीक से बोल नहीं पाते और अब कान भी जवाब दे रहा है।
मैथिली भाषा में ‘यात्री’ के नाम से मशहूर बाबा अपने खास बेबाक अंदाज में स्पष्ट करते हैं कि उन्हें फर्जी स्वतंत्रता सेनानी या सर्वोदयी पास नहीं चाहिए लेकिन ऐसे लेखक के रूप में चाहिए जिसकी पुस्तकें देश के 18 विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं।
खांसी के वेग को रोकते हुए फंसी आवाज में वे आखिरकार कह देते हैं, ‘हमारे जैसे साहित्यकार वीआईपी का दर्जा नहीं पा सकते।’
लालूजी का च्यवनप्राश और बाबा नागार्जुन
हिंदी के वरिष्ठ कवि नागार्जुन को पिछले दिनों मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने बिहार सरकार की ओर से जब सम्मानित किया तो साथ में च्यवनप्राश का डिब्बा भी दिया। बाबा नागार्जुन ने च्यवनप्राश के ही बहाने शुरू हुई चर्चा में कई अंतरंग बातें कह डालीं......!
'लालू का दिया च्यवनप्राश खाने में तो बड़ा मजेदार लग रहा है।' ये शब्द हैं हिंदी, संस्कृत और बंगला में समान अधिकार रखने वाले ८३ वर्षीय साहित्यकार बाबा नागार्जुन के, जो उन्होंने पिछले महीने बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव द्वारा राजेन्द्र शिखर सम्मान प्रदान किए जाने के बाद व्यक्त किए। मुख्यमंत्री ने उन्हें एक लाख इक्यावन हजार के ड्राफ्ट के साथ-साथ च्यवनप्राश का एक किलो का डिब्बा भी भेंट किया। डिब्बा समारोह के दौरान ही जल्दबाजी में मँगाया गया। बिहार पर्यटन विकास निगम के कमरा नं. १०२ में एक चरमराते पलंग पर बैठे बाबा अपनी शैली में व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ च्यवनप्राश ब्रेड पर लगाकर खा रहे हैं और कह रहे हैं- 'च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, लेकिन इसका स्वाद तो गजब का है, सरकारी है न। गुणाकर मुले ने भी खाया, वे भी तारीफ करके राजगीर गए हैं। लालू कहते हैं 'रऊवा के, जियावे के बा, हेतना जल्दी हम जाए ना देब हेई लीं च्यवनप्राश के डिब्बा' (आपको जिंदा रखना है, इतनी जल्दी मैं जाने नहीं दूँगा, ये लीजिए च्यवनप्राश) बहुत बड़ा नौटंकीबाज है लालू, देखना इसकी नटलीला इसे दोबारा मुख्यमंत्री बना देगी, अभिनय में तो शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है ये। हाँ, हड्डी तो गल रही है, अब लालू शायद मेरी खलड़ी (चमड़ी) के लिए मुझे और जिंदा रखना चाहता है। देखो तो च्यवनप्राश किस ब्रांड का है, इतना प्रचार हो रहा है, उसे भुगतान करना चाहिए। हँसी छूटती है।
बाबा के साथ-साथ प्रसिद्ध कवि केदारनाथ सिंह और विज्ञान जैसे विषय को सरल हिन्दी में प्रस्तुत करने वाले जाने माने लेखक गुणाकर मुले भी सम्मानित किए गए। तीनों लेखकों को बिहार सरकार के राजभाषा विभाग की ओर से पर्यटन विकास निगम के होटल में ठहराया गया। बातचीत के दौरान ही होटल वाला दो बार बिल के बारे में पूछने आ जाता है और बाबा के साथ मौजूद उनके सबसे बड़े पुत्र शोभाकांतजी द्वारा यह कहे जाने पर कि भुगतान राजभाषा विभाग की ओर से किया जाएगा' - बैरा आश्वस्त नहीं होता। इधर बाबा को तेज खाँसी आ जाती है और बैरा बिल रखकर कमरे के बाहर निकल जाता है। बाबा दुखी होकर थोड़ी देर चुप लगा जाते हैं। कमरे का टेलीफोन काम नहीं कर रहा है कि राजभाषा विभाग के अधिकारियों को इस अव्यवस्था की जानकारी दी जा सके। जरासी झपकी नहीं आती कि ड्राइवर गाड़ी का बिल मांगने आ जाता है। राजभाषा विभाग ने बाबा के कहने पर उनके लिए टैक्सी की व्यवस्था कर दी और किनारे हो गए। ड्राइवर के आने पर बाबा बेचैनी महसूस करते हैं और सो नहीं पाते। राजेन्द्र शिखर पुरस्कार बाबा को देने की घोषणा तो पिछले वर्ष सितंबर में ही हो गई, लेकिन देने की बात टल गई क्योंकि राजभाषा विभाग के पास पैसे नहीं थे। बाबा को यह पुरस्कार दिलाने में उनके अनन्य मित्र और जद सरकार की सहयोगी पार्टी भाकपा के सांसद चतुरानन मिश्र ने मुख्य भूमिका निभाई जिनके अथक प्रयासों से सरकार ने कोष में पैसे दे दिए। अब अगले पुरस्कार की शायद घोषणा भी न हो। यों भी बाबा श्री मिश्र को छोड़कर किसी अन्य राजनीतिज्ञ से मिलना पसंद नहीं करते। आखिरकार १४ नवंबर ९४ को बाबा को पुरस्कार दिया गया और उसके एक दिन बाद यानी कि १५ नवंबर की दोपहर की ये बात है।
बाबा का कहना है कि उन्हें पैसा और सम्मान से ज्यादा अब सेवा तथा देखभाल की जरूरत है , लेकिन अफसोस की बात है कि इस मोर्चे पर सबके सब पिछड़ जाते हैं। बाबा अपने पुत्रों के व्यवहार से बड़े दुखी हैं- 'जब तक मैं जीवित रहूँगा ये लोग मेरी हड्डी चूसते रहेंगे और इस झूलती बुढ़ौती में मेरी गत देखो कि पेट भरने के लिए कलम चलाने को विवश हूँ। सम्मान की राशि से ज्यादा दिन पेट नहीं चलता, क्योंकि उसमें भी तो मेरे पुत्रों को हिस्सा चाहिए, लेकिन मेरा हाल पूछने वाला कोई नहीं। साहित्य अकादमी फेलोशिप के एवज में बहुत होगा तो कहीं जाने का खर्च देगा वह भी खास उद्देश्यों के लिए, अकादमी को मेरे बाकी खर्चों से क्या मतलब। बाबा के मुताबिक शोभाकांत को छोड़कर किसी को इतना भी नहीं पता कि मेरी कौन रचना किस प्रकाशक ने छापी है। उनका कहना है कि जब 'मेरे पास पैसा कहीं से आता है तो सब के सब मेरे इर्द-गिर्द रहते हैं और उसके बाद कोई एक गिलास पानी भी नहीं देने आता। आखिर में 'मिनी (श्रीमती उषा किरण खान का बचपन का नाम) का घर काम आता है। या फिर शोभाकांत के पास रहता हूँ।' बाबा को अपने चारों पुत्रों का खर्च चलाना पड़ता है। बाबा मानते हैं कि अगर थोड़ी बहुत सेवा भावना है तो शोभाकांत में है जो एक पैर से लाचार होने के बावजूद आखिर ख्याल तो रखता है।
शोभाकांतजी ने वर्षों मेहनत करके बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, सिन्हा लाइब्रेरी, नेशनल लाइब्रेरी, कलकत्ता और हिंदी साहित्य सम्मेलन भवन, इलाहाबाद सरीखे प्रमुख पुस्तकालयों में बैठकर बाबा की ऐसी-ऐसी दुर्लभ पुरानी रचनाएँ खोज निकालीं जिन्हें देखकर स्वयं बाबा को याद नहीं आई कि कब की हैं। उन रचनाओं की गंध पाते ही प्रकाशक टूट पड़े क्योंकि नागार्जुन उस लोकप्रिय जनकवि का नाम है जिनकी पुस्तकें लोग व्यक्तिगत स्तर पर खरीदकर पढ़ते हैं, पुस्तकालयों के भरोसे नहीं रहते। वह जादुई लेखनी अकेले बाबा के पास है जिन्होंने एक ओर जहाँ आंचलिक परिवेश को माध्यम बनाकर नई पीढ़ी को हाथ में मशाल थामने की प्रेरणा दी, वहीं दूसरी ओर देश के तमाम सामाजिक, राजनीतिक और प्रशासनिक पहलुओं पर पैनी खुरदरी टिप्पणियाँ कीं इसका तात्पर्य यह नहीं कि विशुद्ध साहित्य की उन्होंने उपेक्षा की। बाबा की साहित्यिक कविताओं के पढ़ते-पढ़ते लोग विभोर हो उठते हैं और ऐसी अधिकांश रचनाएँ उनकी काफी पुरानी हैं जिन्हें प्रकाश में लाने का श्रेय श्री शोभाकांतजी को है जो उनकी टिप्पणियों के साथ छपी हैं।
प्रकाशकों ने हमेशा बाबा की मजबूरी का फायदा उठाया और चूँकि बाबा के जीवनयापन का एकमात्र जरिया उनकी लेखनी है, इसलिए उन्हें हमेशा पैसे की जरूरत रहती है- खासकर, उनके घुमंतू स्वभाव होने के कारण और भी ज्यादा। अपनी बेहतर-से-बेहतर रचनाएँ बाबा को प्रकाशकों की शर्तों पर देनी पड़ीं और उसके बाद जो मिला तो उसे पैतृक संपत्ति के दावे पर बाँटने पुत्रगण पहुँच गए। यह सब बताते-बताते बाबा का स्वर अत्यंत करुण हो उठता है। कई वर्षों से भयंकर दमे से पीड़ित बाबा खाँसी का वेग रोक नहीं पाते और थोड़ी देर शांत रहने का इशारा करके लेट जाते हैं।
पटना में रह रहे अपने दो पुत्रों के डर से पुरस्कार के बतौर मिले ड्राफ्ट को बाबा राजधानी में नहीं भुनाते, लेकर दरभंगा चले जाते हैं जहाँ दमे के इलाज में कम से कम उन्हें साल में दो-चार बार आकर महीनों रहना पड़ता है। दरभंगा में वे शोभाकांतजी के यहाँ रहते हैं। १९८७ में यहीं बाबा की तकलीफ बेहद बढ़ गई, बिहार के लेखकों द्वारा हाय तौबा मचाने पर तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने काफी जद्दोजहद के बाद साहित्यकार कल्याण कोष से बाबा के इलाज के लिए दो हजार रुपए मंजूर किए और जब भुगतान का वक्त आया तो ट्रेजरी वालों ने बताया कि इस कोष के मद में पैसे ही नहीं हैं। तब तक मध्यप्रदेश सरकार का ड्राफ्ट आ चुका था। अभी बिहार सरकार मात्र ५०० रुपए पेंशन देती है जो बाबा को जून से नहीं मिली। वयोवृद्ध बाबा शायद अकेले ऐसे लेखक हैं जिन्हें बिहार में पैदा होने के लिए फख्र महसूस करने में संकोच होता है, क्योंकि सबसे ज्यादा उपेक्षा उनकी अपने ही प्रदेश में हुई है। उनसे भी ज्यादा उपेक्षित और अभाव की जिंदगी कविवर आरसी प्रसाद सिंह जी रहे हैं।
बाबा बताते हैं, 'दरभंगा के जिला मजिस्ट्रेट मेरे निवास पर सिर्फ पुरस्कार की सूचना देने गए- मुख्यमंत्री के निर्देश पर। न उसके पहले कभी खोजखबर ली न उसके बाद लेंगे। अब लगता है मैं सिर्फ समारोह में इस्तेमाल की वस्तु बनकर रह गया हूँ। शुक्र है उस विश्व संस्था का, जिसका ध्यान मेरे गाँव की ओर गया।
यूनिसेफ ने बाबा के पैतृक गाँव तरौनी (जिला दरभंगा) को 'मॉडल गाँव' चुनकर वहाँ बाबा के झोपड़ीनुमा घर को पक्का करने, सामुदायिक विकास भवन बनवाने और जिला मुख्यालय तक पक्की सड़क से जोड़ने के लिए राशि उपलब्ध कराई है ताकि बाबा उस गाँव में पुनः जाकर रह सकें जहाँ के पात्र उनके सभी उपन्यासों में बोलते हैं। आज तब बिहार सरकार का कोई परिंदा उस गाँव में झाँकने तक नहीं गया।
बिहार राष्ट्रभाषा परिषद के वर्तमान निदेशक प्रो. महेन्द्र प्रसाद यादव को बाबा की संपत्ति के बारे में विस्तृत जानकारी है। उन्हें पता है कि दिल्ली में बाबा के पास काफी जमीन है, आलीशान मकान है और पैसे की कमी नहीं है। गरीब लेखकों में बाबा नहीं आते और परिषद ने हाल में गरीब लेखकों की मदद की योजना बनाई है।
बिहार सरकार से बाबा को कोई उम्मीद नहीं, लेकिन मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश सरकारों के प्रति आभारी हैं। केंद्रीय रेल मंत्री जाफर शरीफ से उनकी गुजारिश है कि अगर दो आदमी का प्रथम श्रेणी का पास उपलब्ध करा दें तो बड़ी मेहरबानी हो, क्योंकि सारी उमर तो तृतीय श्रेणी के डिब्बों के रेलमपेल में कट गई, अब यह जर्जर शरीर द्वितीय श्रेणी के धक्के नहीं बर्दाश्त कर पाता। लेकिन बाबा यह खबरदार करना नहीं भूलते कि उन्हें फर्जी स्वतंत्रता सेनानीवाला या सर्वोदयी पास नहीं चाहिए, एक ऐसे साहित्यकार के रूप में चाहिए जिसकी पुस्तकें देश के १८ विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती हैं। हिंदी और बंगला में माध्यमिक कक्षा से लेकर एम.ए. तक बाबा की रचनाएँ चलती हैं तथा संस्कृत में भी उनके श्लोक काफी पसंद किए गए हैं।
राजनीतिज्ञों से मिलना और राजनीति के संबंध में बात करना बाबा को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता है। चर्चा करने पर संक्षेप में बोल जाते हैं- जेपी आंदोलन को उनके अनुयायियों ने कूड़ा करके रख दिया। (यहाँ यह बात दीगर है कि जेपी के नेतृत्व वाले १९७४ के छात्र आंदोलन के समर्थन में बाबा नागार्जुन ने नुक्कड़ों पर झूमझूमकर 'इंदूजी इंदूजी क्या हुआ आपको, सत्ता के मद में भूल गई बाप को' सरीखी कविताओं का पाठ किया, और जेल भी गए। उनकी दृष्टि में भारतीय जनता पार्टी तलैया में पैदा होने वाले मच्छर की तरह है जो नई पीढ़ी को गुमराह कर रही है। प्रधानमंत्री नरसिंहराव खूब मजे में सरकार चला लेंगे, क्योंकि ये जोड़तोड़ की कला में पारंगत हैं। आखिर उन्हीं की बदौलत तो रामलखन सिंह यादव का वैधव्य छूटा और अजीत सिंह को भी बड़ी चतुराई से मिला लिया।')
कुछ वामपंथियों के नाम से भी बाबा काफी चिढ़ते हैं। उनके मुताबिक उनका चरित्र भ्रष्ट हो गया है, न कोई नीति है न सिद्धांत, जैसी बहे बयार पीठ तब तैसी कीजै वाली 'कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। कहते हैं इन वामपंथियों को उस जमीन की जानकारी नहीं 'जहाँ खेतों में बंदूकें बनती हैं टके सेर तो बम बिकता है- याद है कि नहीं?'
बाबा फिर घूमकर जेपी के अनुयायियों पर आ जाते हैं और कहते हैं कि इन लोगों ने जिस तरह से आंदोलन के आदर्शों, उपलब्धियों को कूड़ा किया तो अब इन पर तरस भी नहीं आता। बाबा के मुताबिक, 'अच्छे राजनीतिज्ञ कभी किसी व्यापक जनांदोलन की उपलब्धियों की बंदरबाँट में शामिल नहीं होते। आजादी के बाद के माहौल से दुखी होकर महात्मा गाँधी ने दिल्ली छोड़ दी थी, नोआखली चले गए थे। अब नहीं बोला जाता' पुनः खाँसी आ जाती है और बाबा अपनी चिरपरिचित मुस्कान के साथ प्रेम से स्लाइस में लालू प्रसाद वाला च्यवनप्राश लगाने लगते हैं।
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### [परिशिष्ट: मूल अंक में प्रकाशित नागार्जुन की कविताएं]
### गेहूँ दो, चावल दो!
गेहूँ दो, चावल दो! इतना दिया, और दो, पुष्कल दो! गंगा बेकार है, हडसन का जल दो! चारा दो, फल दो! हिलेगी कैसे, दुम में बल दो! गेहूँ दो, चावल दो!!
जीत हम जाएँ, सवालों का हल दो बटोर लिए हैं राजा-रानी, मोर-पंख झल दो! धोखा खा जाए पड़ोसी, ऐसी अकल दो! उगे हैं बगावत के अँखुए, उनको मसल दो! रंगी हैं तरुण निगाहें, जादुई काजल दो!
जपे हैं नाम बहुत, उसका फल दो! फिलहाल गेहूँ दो, चावल दो! और दो, अधिक दो, पुष्कल दो! कानों को भले बराबर मल दो! हिलेगी खूब, दुम में बल दो!
### हम भी साझीदार थे
लगता है प्रजातंत्र का रथ उतर गया है पटरी से लगता है सारी-की-सारी पार्टियों के नेता रुचिपूर्वक खेल रहे हैं दलीय स्वार्थों के शतरंज अंधे धृतराष्ट्र की मोह-माया भली-भाँति प्रवेश कर गई है दलपतियों के अंतःकरण में
लगता है बुद्धिजीवियों की हमारी अपनी बिरादरी भी शत-प्रतिशत लिप्त है सुविधाएँ बटोरते जाने की द्यूत-क्रीड़ा में जी हाँ, अँगूठा दिखला रहे हैं हमारे पुत्र-पौत्र, स्वजन-परिजन सुरक्षित है हमारी आशीष उन्हीं के निमित्त... जी हाँ, अपने तो स्थितप्रज्ञ ठहरे कोई अँगूठा दिखलाए अथवा अर्पित करे फूल-माला अच्छा ही तो लगता है! लगता है हम भी साझीदार थे राजघाट वाली उस बेहयाई में! अभी तो उतर गया प्रजातंत्र का रथ पटरी से...
-नागार्जुन
कभी किसी को नहीं बख्शा
हिंदी में 'नागार्जुन' और मातृभाषा में 'यात्री' नाम से सर्वाधिक प्रसिद्धि पाने वाले पं. वैद्यनाथ मिश्र साहित्य जगत के एकमात्र हस्ताक्षर हैं जिनका न केवल संस्कृत, बंगला में भी हिंदी के समान अधिकार था, बल्कि लोकप्रियता की दौड़ में उन्होंने अपने समय के सभी रचनाकारों को पीछे छोड़ दिया। उम्र ढलने से पहले ही नागार्जुन 'बाबा' के नाम से मशहूर हो गए थे और चूंकि वे हिंदी साहित्य के एकमात्र औघड़ थे, इसलिए बाबा कहने से ही लोग समझ जाते थे कि किस साहित्यकार की बात हो रही है। भारत की किसी भी भाषा में बाबा जैसी हस्ती की दूसरी मिसाल नहीं मिलती, जिनकी रचनाशीलता में एक ही साथ कालिदास, तुलसीदास, कबीरदास की शैली की स्पष्ट झलक मिलती हो। बाबा के जीवन जीने के स्टाइल और लिखने के अंदाज में सबसे ज्यादा कबीर का प्रभाव मिलता है, इसलिए इन्हें आधुनिक कबीर कहा ही जाता है।
सुविधासंपन्न जिंदगी से उन्हें नफरत थी। वे उन्हीं गरीब, उपेक्षित आम लोगों के बीच उठना-बैठना पसंद करते थे जिन्हें उन्होंने अपनी रचनाओं का पात्र बनाया। दिल्ली जैसे महानगर की चकाचौंध बाबा को कभी आकर्षित नहीं कर पाई। उनका बुढ़ापा भी यों तो युवावस्था की तरह ही घूमते-फिरते गुजरा, मगर हर जगह से घूम-घामकर वे फिर ज्यादा समय दिल्ली के स्लम इलाके में गुजारते थे। जिस ऐश के लिए राजनीति में जाने का इन दिनों फैशन है, उसमें शामिल किसी भी व्यक्ति को बाबा ने बख्शा नहीं। विचारों से थोड़ी कम्युनिस्ट सोच बाबा की जरूर थी मगर वे कम्युनिस्ट नहीं बने। बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद के उस बिंदु को बाबा भलीभांति समझते थे जहां ईश्वर के अस्तित्व को नकारा गया है, लेकिन उन्होंने नास्तिकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। हां, पूजापाठ के नाम पर कायम हिंदू समाज की कुरीतियों को दर्शाने वाले कथानक उनकी कृतियों के मुख्य विषय रहे।
कम्युनिस्ट नेता और वामपंथी रुझान वाले साहित्यकारों ने जब बाबा को कम्युनिस्ट के रूप में प्रचारित कर दिया तो उन्होंने ऐसे लोगों को जमकर लताड़ा तथा 'प्रगतिशील' शब्द पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। बाबा कहते थे कि यहां के कम्युनिस्टों की सोवियत सोच से उनकी भारतीयता विलुप्त हो गई है और अपनी कविता 'अब तो बंद करो हे देवी यह चुनाव का प्रहसन' में उन्हें भी लपेटा - 'वोल्गा तट पर करें रात दिन गंगा-पुत्र विहार, वामपंथ के पथिक तुम्हारी सूरत रहे निहार।' उनका मानना था कि जनता के बीच रहकर जनसाधारण के हित में काम करने के लिए किसी वाद को अपनाने की जरूरत नहीं है। शोषण, उत्पीड़न और राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ अपनी लेखनी से आजीवन खौलता लहू उगलने वाले बाबा खून की होली में विश्वास रखने वाले नक्सली विचारों के हिमायती नहीं थे। दरअसल उन्होंने निम्न और मध्य आयवर्गीय जिंदगी को काफी करीब से महसूस किया था उसे चित्रित करते समय वे अच्छी तरह समझ रहे थे कि समाज के इस वर्ग का जीवनस्तर किसी भी व्यवस्था में बदलाव आने से सुधर नहीं सकता। भूख और अभाव को बाबा ने बचपन से देखा तो मृत्युपर्यंत उनके जीवन के अंग बने रहे। बाबा नागार्जुन का साहित्य संसार बताता है कि एक ओर जहां उन्होंने अपने समय की तमाम समसामयिक घटनाओं पर तीखी, खुरदरी टिप्पणियां कीं और इतनी की कि उनकी छवि ऐसे ही साहित्यकार के रूप में बन गई, वहीं दूसरी ओर तुलसी व कालिदास की शैली में विशुद्ध साहित्यिक पद्यों की रचना करके बाबा ने अपनी विद्वता की धाक जमाई। बाबा के व्यंग्य का खुरदरापन उनके हर काम से झलकता था। एक बार का किस्सा मुझे याद आता है। बात 1992 की है जब बिहार सरकार ने बाबा को राजेन्द्र शिखर सम्मान से सम्मानित किया।
तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सम्मान प्रदान करने के साथ-साथ बाबा को च्यवनप्राश का एक डिब्बा यह कहते हुए भेंट किया- 'मैं अपनी मां के लिए ला दिया करता था। रौआ के हम मरे ना देब, रौआ के जियाबे के बा (आपको हम मरने नहीं देंगे, आपको जिलाना है)'। पुरस्कार समारोह की समाप्ति के बाद पर्यटन विभाग के होटल के कमरे में च्यवनप्राश ब्रेड पर लगाकर खाते हुए बाबा ने कहा- 'च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, मगर इसका तो मजा ही कुछ और है, सरकारी है न, इसीलिए। गजब का स्वाद है प्यारे। अभिनय में शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है लालू, देखना, इसकी नटलीला इसे दोबारा मुख्यमंत्री बना देगी।' बाबा उन गिने चुने साहित्यकारों में से थे जिनकी किताबें लोग व्यक्तिगत रूप से खरीदकर पढ़ते थे और पुस्तकालयों के भरोसे नहीं रहते थे। फणीश्वर नाथ रेणु और राजकमल चौधरी नागार्जुन पीढ़ी की अगली कड़ी थे जिन्हें बाबा काफी पसंद भी करते थे। जब उनके उपन्यास 'जमनिया का बाबा' का अमेरिका में अंग्रेजी में अनुवाद हुआ और मैनचेस्टर विश्वविद्यालय में भारतीय साहित्य पढ़ाने वाले जैक वेहिकिल्स उनसे मिलने आए तो अपनी चौकी पर मुड़े-तुड़े बिस्तर में पड़े-पड़े उन्हें जरा भी हीनभावना का अनुभव नहीं हुआ। जापानी लेखिका कीयो कुरु तो हमेशा आती थीं और कई-कई दिन उनके पास रहती थीं। सतत यात्रा पर सन्नद्ध रहना और एक छोटा ट्रांजिस्टर कान से लगाए रखना बाबा की हॉबी थी। ट्रांजिस्टर पर बाबा विभिन्न प्रदेशों के लोक गीत सुना करते थे। किसी व्यवस्था के अनुकूल समझौता करना बाबा ने कभी सीखा ही नहीं, इसलिए लेखनजीवी रहकर जिंदगीभर प्रकाशकों के शोषण का शिकार बने रहे, शोषण के खिलाफ लिखते रहे, मगर अपने उसूल नहीं छोड़े। बाबा को पत्नी (अपराजिता देवी) भी वैसी ही जीवट वाली मिली थी। वे सही मायने में अपराजिता थीं। जब बाबा किशोर उम्र में शादी के बाद घर से भागकर श्रीलंका चले गए थे तो गांव के लोगों को उनके लौटने की उम्मीद नहीं थी मगर 'काकी' के रूप में मशहूर अपराजिता जी को पक्का भरोसा था कि उनके पति अवश्य एक दिन लौटेंगे और वे बाबा के जीवनकाल में ही स्वर्ग सिधार गईं। प्रेमचंद के अनुसार पति के जीवनकाल में मृत्यु भाग्यशालिनी पत्नियों को प्राप्त होती है। प्रेमचंद ने भी अपने जीवन का काफी समय विधुर के रूप में गुजारा।
बाबा नागार्जुन ने कभी समझौता नहीं किया
बाबा नागार्जुन जयंती (10 मई) के लिए विशेष
- शशिधर खान
हिन्दी में 'नागार्जुन' और मातृभाषा मैथिली में 'यात्री' नाम से सर्वाधिक प्रसिद्धि पाने वाले पं. वैद्यनाथ मिश्र साहित्य जगत के एकमात्र हस्ताक्षर हैं जिनका न केवल संस्कृत, बंगला में भी हिन्दी के समान अधिकार था, बल्कि लोकप्रियता की दौड़ में उन्होंने अपने समय के सभी रचनाकारों को पीछे छोड़ दिया । उम्र ढलने से पहले ही नागार्जुन 'बाबा' के नाम से मशहूर हो गए थे । चूंकि वे हिन्दी साहित्य के एकमात्र औघड़ थे, इसलिए बाबा कहने से ही लोग समझ जाते थे कि किस साहित्यकार की बात हो रही है । भारत की किसी भी भाषा में बाबा जैसी हस्ती की दूसरी मिसाल नहीं मिलती जिनकी रचनाशीलता में एक ही साथ कालिदास, तुलसीदास, कबीरदास की शैली की स्पष्ट झलक मिलती हो । बाबा के जीवन जीने के स्टाईल में और लिखने के अंदाज में सबसे ज्यादा कबीर का प्रभाव मिलता है, इसलिए उन्हें आधुनिक कबीर कहा ही जाता है ।
बाबा नहाते नहीं थे, न ही कभी दांत साफ करते थे और सुविधासम्पन्न जिंदगी से उन्हें नफरत थी । वे उन्हीं गरीब, उपेक्षित आम लोगों के बीच उठना बैठना पसंद करते थे जिन्हें उन्होंने अपनी रचनाओं का पात्र बनाया । दिल्ली जैसे महानगर की चकाचौंध बाबा को कभी आकर्षित नहीं कर पाई । उनका बुढ़ापा भी यों तो युवावस्था की तरह ही घूमते-फिरते गुजरा, मगर हर जगह से घूम-घामकर वे फिर ज्यादा समय दिल्ली के स्लम इलाके में गुजारते थे । पहले टैगोर पार्क में रहे और फिर बाद में सादतपुर (करावलनगर) में रहने लगे । उनसे मिलने के लिए रिक्शा से और फिर पैदल जाना पड़ता था । कहा जाता है कि बाबा के पास इतने पैसे ही नहीं होते थे कि वे बेहतर स्थिति में रहे सकें, मगर सच्चाई यह है कि बाबा की सारी जिन्दगी समाज के छिद्रों को खुरचने के लिए समर्पित थी, इसलिए उन्होंने ऐशो-आराम की कभी चाहत नहीं की ।
जिस ऐश के लिए राजनीति में जाने का इन दिनों फैशन है, उसमें शामिल किसी भी व्यक्ति को बाबा ने बख्शा नहीं । वो चाहे जवाहर लाल नेहरू हों, इंदिरा गांधी हों, जयप्रकाश नारायण हों अथवा कम्युनिस्ट लोग हों । विचारों से थोड़ी कम्युनिस्ट सोच बाबा की जरूर थी और वो कुछ दिनों तक बौद्ध भिक्षु की तरह भदन्त आनंद कौसल्यायन तथा राहुल सांकृत्यायन के संसर्ग में आने के कारण हो सकती है, मगर वे कम्युनिस्ट नहीं बने । बौद्ध दर्शन और मार्क्सवाद के उस बिन्दु को बाबा भली भांति समझते थे जहां ईश्वर के अस्तित्व को नकारा गया है, लेकिन उन्होंने नास्तिकता को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया । हां, पूजापाठ के नाम पर कायम हिन्दू समाज की कुरीतियों को दर्शाने वाले कथानक उनकी कृतियों के मुख्य विषय रहे । कम्युनिस्ट नेता और वामपंथी रूझान वाले साहित्यकारों ने जब बाबा को कम्युनिस्ट के रूप में प्रचारित कर दिया तो उन्होंने ऐसे लोगों को जमकर लताड़ा तथा 'प्रगतिशील' शब्द पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की । उनका मानना था कि जनता के बीच रहकर जनसाधारण के हित में काम करने के लिए किसी वाद को अपनाने की जरूरत नहीं है । शोषण, उत्पीड़न और राजनीतिक अव्यवस्था के खिलाफ अपनी लेखनी से आजीवन खौलता लहू उगलने वाले बाबा खून की होली में विश्वास रखने वाले नक्सली विचारों के हिमायती नहीं थे । दरअसल उन्होंने निम्न और मध्य आयवर्गीय जिन्दगी को काफी करीब से महसूस किया । उसे चित्रित करते समय वे अच्छी तरह समझ रहे थे कि समाज के इस वर्ग का जीवनस्तर किसी भी व्यवस्था में बदलाव आने से सुधर नहीं सकता । भूख और अभाव को बाबा ने बचपन से देखा, जो मृत्युपर्यन्त उनके जीवन के अंग बने रहे । गरीबी में जीने के बावजूद उनके मन में गरीबों के लिए दर्द था । साइकिल रिक्शा वाले को भाड़ा के अलावे दस-बीस रूपए दे दिया करते थे । बाबा नागार्जुन का साहित्य संसार बताता है कि एक ओर जहां उन्होंने अपने समय की तमाम समसामयिक घटनाओं पर तीखी, खुरदरी टिप्पणियां की और इतनी की कि उनकी छवि ऐसे ही साहित्यकार के रूप में बन गई, वहीं दूसरी और तुलसी व कालिदास की शैली में विशुद्ध साहित्यिक पद्यों की रचना करके बाबा ने अपनी विद्वता की धाक जमाई । ऐसे साहित्य बाबा ने कॉलेजों में हिन्दी पढ़ाने वालों को जवाब देने के लिए लिखे, जिन्हें वे 'तथाकथित' लेखक कहा करते थे । यह इसलिए भी करारा झटका था क्योंकि बाबा कहते थे - 'भई, अपने पास तो हिन्दी में एम.ए., पीएचडी की डिग्री नहीं है', हम क्या साहित्य लिखेंगे, कमाल है, हिन्दी पढ़ाने क्या लग गए, अपने को लेखक मान लिया । इस मामले में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी को अपवाद मानते थे ।
बाबा के व्यंग्य का खुरदरापन उनके हर काम से झलकता था और कभी-कभी काफी गहराई लिए होता था । एक बार का किस्सा मुझे याद आता है । बात 1992 की है, जब बिहार सरकार ने बाबा को राजेन्द्र शिखर सम्मान से सम्मानित किया । तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने सम्मान प्रदान करने के साथ-साथ बाबा को च्यवनप्राश का एक डिब्बा यह कहते हुए भेंट किया - 'मैं अपनी माँ के लिए ला दिया करता था । रौआ के हम मरे ना देब, रौआ के जियाबे के बा (आपको हम मरने नहीं देंगे, आपको जिलाना है) ।' पुरस्कार समारोह की समाप्ति के बाद पर्यटन विभाग के होटल के कमरे में च्यवनप्राश ब्रेड पर लगाकर खाते हुए बाबा ने कहा - 'च्यवनप्राश तो मैंने पहले भी खाया है, मगर इसका तो मजा ही कुछ और है, सरकारी है न इसलिए । गजब का स्वाद है प्यारे ।' अभिनय में शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है लालू, देखना, इसकी नटलीला इसे दुबारा मुख्यमंत्री बना देगी । 'बाबा का कहना सही निकला ।
कस्बानुमा शहर दरभंगा के अस्पताल में उचित चिकित्सा और देखभाल के अभाव में बाबा अंतिम सांस लेने के दिन से कई महीने पहले अधमरे हो गए थे । लेकिन जिस बिहार को बाबा ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति दी, वहां की सरकार का कोई परिंदा उनका कभी हालचाल लेने नहीं गया, न ही कोई आर्थिक मदद पहुंचायी । जबकि लालू प्रसाद उसी जेपी आंदोलन की उपज हैं जिसमें आपातस्थिति के खिलाफ श्रीमती इंदिरा गांधी पर कविता पढ़ने के कारण बाबा को जेल जाना पड़ा । बिहार के कुछ साहित्यकारों द्वारा काफी शोरशराबा किए जाने के बाद बड़ी मुश्किल से सरकार ने बाबा के इलाज के लिए दो हजार का चेक काटा लेकिन ट्रेजरी में पैसे न होने के कारण चेक भुनाया नहीं जा सका । इससे घृणित स्थिति की कल्पना नहीं की जा सकती । ये 1992 के उस समय की बात है जब बाबा अपने जिले (दरभंगा) के अस्पताल में बिल्कुल संज्ञाहीन बेजान की तरह बिस्तर पर पड़े रहते थे । न सुन पाते थे, न ही किसी परिचित को गौर से देखने के बाद भी पहचान पाते थे । शुक्र है, मध्यप्रदेश सरकार का, जिसने बिहार सरकार का रूख जानने के बाद बाबा के इलाज का सारा खर्च अपने जिम्मे ले लिया । मध्यप्रदेश में बाबा ने काफी समय गुजारा है ।
बाबा दमे के मरीज थे, यह बात किसी से छिपी नहीं है और उनकी राजनीतिक कविताएँ भी जन-जन की जुबान पर है । जिन्हें उद्धत करना कोई बहुत आवश्यक नहीं । मैं उन गिने-चुने भाग्यशालियों में से हूं जिन्हें बचपन से ही बाबा का सान्निध्य मिला । इसलिए मैं बाबा के कतिपय वैसे अंतरंग संस्मरणों पर ही केन्द्रित कर रहा हूँ जिनसे जुड़ी बातें अभी-भी जनसाधारण तक नहीं पहुंची है । बाबा ने जनकवि बनने के लिए वैसी भाषा और बोली का इस्तेमाल किया जो कबीर व तुलसी ने अपनाया था । हिन्दी साहित्य के काव्य संसार में धारा की विविधताएं बाबा को विलक्षण प्रतिभा का परिचय देती है ।
'भस्मांकुर' काव्य तुलसीदास के 'बरवे रामायण' की तर्ज पर लिखी हुई है । बाबा के संस्कृत श्लोकों में वर्णित शिव-पार्वती विवाह का प्रसंग पढ़ते समय लगता है कि मानो कालिदास का 'कुमारसंभवम्' सामने हो । कालिदास ने जिस उपजाति छंद का इस्तेमाल किया है उसका ज्ञान बाबा ने किशोरावस्था में ही हासिल कर लिया था । क्योंकि कर्मकांडी ब्राह्मण कुल में पैदा होने के कारण उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा संस्कृत माध्यम से हुई । प्राकृत, पालि, बंगला और अंग्रेजी उन्होंने अपने हुनर से सीखी । यह भी आश्चर्य है कि बिल्कुल पोंगापंथी पंडिताई वाले माहौल में पढ़े बाबा की रगों में अन्याय व अत्याचार के खिलाफ विद्रोह की भावना कूट-कूटकर भरी थी । क्रांति तो इस तरह से उनकी सोच में रची बसी थी कि उन्होंने 'ऊँ शांतिः शांतिः' की अपने ढंग से 'ऊँ क्रांतिः क्रांतिः' के रूप में व्याख्या करके जनता के सामने पेश किया और बुढ़ापे में भी नौजवानों के हाथ में धू-धू जलती मशाल थमाने का माद्दा रखते थे । उन्हें नौजवानों के बीच रहना बहुत भाता था । नागार्जुन की लेखनी में सांप की फुफकार जैसा दंश था ।
बुढ़ापे में भीड़भाड़ में ट्रेन में चढ़ने उतरने में बाबा को काफी दिक्कत होती थी । इसलिए उन्होंने पीवी नरसिंह राव के शासनकाल में रेलमंत्री सी. के. जाफर शरीफ से प्रथम श्रेणी के पास की गुहार की, मगर सर्वोदयी या फर्जी स्वतंत्रता सेनानी वाला नहीं, एक ऐसे साहित्यकार के रूप में जिसकी रचनाएं देश के 18 विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल है । उनका अक्खड़पन और अड़ियल स्वभाव सर्वजनीन है । तभी तो कोई भी सरकारी उपाधि या पुरस्कार बाबा को सरकार का पिट्ठू नहीं बना पाया । साहित्य अकादमी द्वारा नवरत्न में शामिल किए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया में बाबा ने कहा था - 'मुझे सम्मान की नहीं, पैसे की जरूरत है और हमेशा यह डर मन में रहता है कि जिस दिन लेखनी बंद हो जाएगी, खाने के लाले पड़ जाएंगे' मैंने 1996 में साहित्य अकादमी के सचिव के. सच्चिदानंदन जी से बाबा के लिए कुछ विशेष आर्थिक सहायता के प्रावधान का आग्रह किया था । अकादमी इस पर विचार करती रह गई, बाबा दुनिया से चले गए ।
2011 में बाबा की जन्मशती उनके अपने ही राज्य बिहार में बिल्कुल फीकी रही । महात्मा गांधी हिन्दी यूनिवर्सिटी, वर्धा से नागार्जुन प्रेमियों ने पटना आकर तीन दिनों की बाबा संगोष्ठी आयोजित की ।
जब बाबा नागार्जुन देर रात कविता सुनाते थे
बाबा नागार्जुन एकमात्र ऐसे जनकवि साहित्यकार हैं, जिनके नाम का उच्चारण करते ही साहित्य और पत्रकारिता में गहरी रुचि रखनेवाले व्यक्तियों की जुबान पर भी उनकी एकाध पंक्तियां आ जाती हैं । सिर्फ हिन्दी में ही नहीं, बांग्ला, मैथिली, संस्कृत में भी बाबा नागार्जुन की काव्य पंक्तियां जनमानस में कबीर के दोहे, तुलसीकृत रामचरित मानस की चौपाइयां और उर्दू शायरी की तरह छायी रहती हैं । ऐसी अतुलनीय प्रभावशाली लोकप्रियता के शिखर स्तंभ पर विराजमान शलाका पुरुष हैं, बाबा नागार्जुन । उन्हें आधुनिक कबीर कहा ही जाता है । बाबा का व्यक्तित्व और कृतित्व यथार्थ में लोकचरित मानस पर केन्द्रित है ।
बिल्कुल अभावग्रस्त आम आदमी की भांति जन-जन के बीच रमे-जमे रहनेवाले औघड़ बाबा जिस फक्कड़ता में जिए उसी को अपनी लेखनी में उतारा. ‘ज्यों-की-त्यों धरि दीन्हीं चदरिया ।’ बाबा का निजी, पारिवारिक और साहित्यिक जीवन खुली किताब की तरह था । अंदर कुछ और बाहर कुछ वाली छद्म जिंदगी बाबा के उसूलों के खिलाफ थी । इसलिए बाबा की साहित्यिक शैली और जनसरोकार यात्राओं से जुड़े सारे पहलू स्पष्ट हैं. उनमें कोई दुराव छिपाव नहीं है । बाबा ने जो जिया, भोगा और अपने समाज तथा देश-दुनिया के जिन घटनाक्रमों ने उन्हें उद्वेलित किया, वही जीवनपर्यंत उनकी रचनाधर्मिता बनी रही । देश-समाज के हर वर्ग और समसामयिक उतार चढ़ावों के बीच पहरेदार की तरह बाबा सजग चेते रहते थे । इसके लिए बाबा नागार्जुन अखबारों के अलावा, देश, विदेश की विभिन्न पत्रिकाएं पैसे के अभाव में भी खरीदते थे ।
घुमंतू बाबा नागार्जुन कहीं रवाना होने से पहले यह सोच-विचार नहीं करते थे कि कहां जाएं, किसके यहां ठहरें किसके घर 10-15 दिन या महीना दिन गुजारें । बस एक छोटा बक्सा, जिसके आधे में किताबें, पत्रिकाएं रहती थीं और एक छोटा रेडियो उठाया, बैठ गए ट्रेन के स्लीपर क्लास में । कहीं भी चल दिए, किसी भी साहित्य प्रेमी के घर पहुंच गए । उसके पद और हैसियत से नहीं, पारिवारिक परिवेश से सरोकार रखना बाबा का ध्येय था । इसलिए देश भर में ऐसे व्यक्तियों की संख्या अनगिनत हैं, जिनके पास बाबा के साथ बिताए क्षणों और अनुभवों के संस्मरण हैं । बाबा नागार्जुन के संपर्क में जो भी आए, जिनका भी बाबा से अंतरंग संबंध बना उसके जीवन में बाबा अमिट छाप छोड़ गए ।
बाबा नागार्जुन कदाचित् इस मायने में भी अद्वितीय थे कि वैसे तो हर उम्र के व्यक्तियों के साथ रम जाते थे, मगर युवकों के बीच बैठना ज्यादा पसंद करते थे । समाज की बुर्जुआ सोच कहीं से भी नहीं उन्हें छू पायी थी । उनकी कविताएं भी बुजुर्गों से ज्यादा युवाओं के बीच लोकप्रिय हुई हैं । कहीं किसी के घर रहते हुए या कॉफी हाउसों में भी बाबा नागार्जुन नौजवानों से घिरे रहते थे ।
बाबा के साथ गुजारे दिनों और आत्मीय संसर्ग के मेरे पास की कुछ संस्मरण हैं । कई अवसर आए, जब बाबा नागार्जुन ने अपने निराले व्यक्तित्व की अनूठी यादें छोड़ी । वो अद्भुत स्मृतियां मानस पटल पर आज भी ऐसे अंकित है मानो हाल-फिलहाल की बात हो । बिना किसी प्रयास के यह धरोहर तरोताजा बनी हुई है । मैं यह दावा तो नहीं कर सकता कि ऐसा अनुभव सिर्फ मुझी को प्राप्त हुआ है । हो सकता है, अन्य महानुभावों के पास भी हो । क्योंकि बाबा का संबंध सरोकार काफी विस्तृत और देशव्यापी था । एक यात्रा पूरी करने के बाद कहीं किसी के यहां पड़ाव डाले हुए बाबा अगली यात्रा की तैयारी में जुटे रहते थे । मैथिली साहित्य में बाबा नागार्जुन ‘यात्री’ नाम से ही प्रसिद्ध हैं । चिट्ठी-पत्री लिखने का सिलसिला तो बाबा की दिनचर्या का एक हिस्सा था ।
बाबा से जुड़ा मेरा संस्मरण संभव है, पाठकों को थोड़ा भिन्न लगे । क्योंकि मुझे बचपन से लेकर पढ़ाई पूरी करने और पत्रकार बनने तक बाबा के संसर्ग में रहने का सौभाग्य मिला है । मेरा संबंध दरअसल नागार्जुन चचा से था । क्योंकि वे मेरे स्वतंत्रता सेनानी पिता श्री बहादुर खां के अनन्य मित्र थे । साहित्य पुरोधा बाबा नागार्जुन से मेरा परिचय बहुत बाद में हाईस्कूल की पढ़ाई करने के बाद हुआ ।
इस बैकग्राउंड को ध्यान में रखते हुए अब आते हैं सीधे मुद्दे पर । बात 1978-79 की है, जब मैं पटना यूनिवर्सिटी से राजनीतिशास्त्र में एम. ए. कर रहा था । साहित्यिक माहौल मुझे पारिवारिक विरासत में मिला था । पिता साहित्य और संस्कृत शास्त्र के मर्मज्ञ । बड़े भाई रामचन्द्र खान आईपीएस अधिकारी होने के बावजूद साहित्य चिंतक । भाभी उषाकिरण खान । बाबा नागार्जुन उन दिनों दिल्ली प्रवासी हो गये थे, लेकिन उनका पटना आना-जाना हमेशा लगा रहता था । पटना में बाबा के रहने-ठहरने के कई स्थान थे । लेकिन वे प्रायः मेरे बड़े भाई के आवास में पहुंचते थे और ज्यादा समय वहीं रहते थे । उस आवास में भी बाबा नागार्जुन मेरे कमरे में ही सोना पसंद करते थे । मेरे वाले कमरे में ही बाबा के लिए एक चौकी पर बिस्तर लगा दिया जाता था । रात को सबके सो जाने के बाद हमारी रात की बात शुरू होती थी । विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं के गीत रेडियो पर सुनने के बाद बाबा सो जाते हैं । दमा पीड़ित होने के कारण सांस फूलने पर बाबा जगते हैं और बलगम इधर-उधर नहीं फेंककर एक अखबार में लपेटकर बिस्तर के नीचे डालते जाते हैं । सुबह मैं उसे फेंक दिया करता हूं । रात के डेढ़-दो बजे जगकर मसहरी में टॉर्च जलाकर लिखते मैंने बाबा को कई बार देखा । मेरी नींद में बाधा न पड़े, इसलिए लाइट की स्विच नहीं दबाते थे । कभी-कभी ऐसा भी हुआ, जब बाबा ने कविता लिखकर रात में ही जगाकर मुझे सुनाया ।
बाबा को बाएं हाथ में टॉर्च जलाए लिखते समय मेरी नींद खुलती है और मैं देखकर फिर सो जाता हूं । उनसे कभी नहीं पूछा कि लाइट जला दूं या नहीं । ज्यों ही मैं सोता हूं कि बाबा जगाते हैं. उठो, बहुत सोते हो, आज तो तुम सबेरे सो गए थे, सुनो. ‘खेतों में बंदूकें बनती टके सेर तो बम बिकता है
मेरी छिटपुट कविताएं छपी थीं और अखबारों में लेख नियमित छपने लगे थे । बाबा सब पढ़ लेते थे । उसके आधार पर बाबा नागार्जुन ने रात को ही सीख दी. ‘तुम्हारे गद्य लेखन में प्रवाह है, कविता में बीच-बीच में ठहराव आ जाता है, जो ठीक नहीं है । इसलिए लेख पर केंद्रित करो, तुम्हारे लिए सफल गद्यकार बनना आसान है ।’ और मैं अखबारी लेखन और पत्रकारिता के रास्ते पर चल पड़ा । जब कदम बढ़ाया तो पीछे मुड़कर देखने की नौबत नहीं आयी ।
बाबा के साथ मध्य रात्रि संवाद के कई यादगार प्रसंग हैं । सबको समेटें तो पूरी पोथी तैयार हो जाएगी । लेकिन यहां सीमित समय और शब्दों में उन चंद पलों का जिक्र कर रहा हूं जो बाबा के काव्य कर्म का प्रथम या रात के दूसरे पहर के भाग्यशाली श्रोता के रूप में गुजरे ।
बाबा नागार्जुन ने अघोरपंथ से मिलता-जुलता जीवनवृत्त अपनाया था । न वे नहाते थे, न दांत साफ करते थे । कपड़े या बिस्तर की साफ-सफाई की भी परवाह नहीं करते थे । बाबा नास्तिक नहीं थे, पर पूजा-पाठ पोंगा पंडित में भरोसा नहीं करते थे । बाबा वामपंथी रुझान के थे, मगर कम्युनिस्ट नहीं थे । कम्युनिस्ट कट्टरपंथ से वे चिढ़ते थे । एक रात बाबा ने संस्कृत में लिखे पद्य सुनाए, जो कालिदास रचित महाकाव्य ‘कुमारसंभवम्’ सदृश शिव-पार्वती विवाह से संबंधित थे । वो कविता मुझे ठीक याद नहीं है । लेकिन बाबा ने बताया था कि उन्होंने इसमें कालिदास की शैली वाले छंद का प्रयोग तपस्यारत पार्वती के सौंदर्य वर्णन के लिए किया है । बाबा का ‘भस्मांकुर’ प्रबंध काव्य उसी उपजाति छन्द पर लिखा गया है ।
पढ़ाई खत्म करने के कुछ महीनों बाद मैं दिल्ली आ गया और जीवन का दूसरा अध्याय पत्रकारिता के रूप में शुरू किया । बाबा नागार्जुन ने पहले से ही दिल्ली को निवास स्थान बनाया हुआ था । वे वहीं से ही घुमक्कड़ी से लौटकर दिल्ली में आकर टिकते थे । 1983-84 के वर्षों में बाबा उत्तर पूर्वी दिल्ली के यमुना विहार में रहते थे । बाद में पुरानी दिल्ली के सादतपुर में रहने लगे, जो उनका स्थायी निवास हो गया । सादतपुर को अब नागार्जुननगर के नाम से जाना जाता है । 1985-86 में नवभारत टाइम्स छोड़कर मैं पीटीआई भाषा, दिल्ली में संवाददाता नियुक्त हुआ और लक्ष्मीनगर के कृष्णकुंज मुहल्ले में रहने लगा । एक दिन तय हुआ कि बाबा को सादतपुर से लाया जाए और उनका प्रिय भोजन मछली-भात खिलाया जाए । हम और मुकेश कुमार साथ रहते थे । हमलोग जब पहुंचे तो बाबा पुत्रवत स्नेहवश तुरत तैयार हो गए । हम एक बंगाली मोशाय के मकान में रहते थे । बाबा को देखते ही बंगाली परिवार गदगद हो गया । मैंने पूछा कि कैसे बाबा नागार्जुन का नाम और चेहरा पहचाना । बंगाली मोशाय की बेटी ने जवाब दिया. बाबा की कविता मेरे बांग्ला कोर्स की किताब में है और उसमें उनकी ऐसी ही खद्दर कुर्ता पायजामा वाली तस्वीर छपी हुई है । लड़की ने बाबा को बांग्ला कविता की एक-दो पंक्ति सुना भी डाली । संभवतः कुछ पाठकों को पता न हो कि बाबा की कविताएं बांग्ला में स्कूल से लेकर कॉलेज तक के पाठ्यक्रम में शामिल है । स्वयं बाबा ने ही मुझसे कहा था कि यात्रा में अब इस बुढ़ौती में बड़ी दिक्कत होती है । सरकारी मदद अनुदान नहीं चाहिए । अगर प्रथम श्रेणी का पास रेल मंत्रालय उपलब्ध करा दे तो काफी हद तक सहूलियत हो जाएगी और आराम हो जाएगा । लेकिन स्वतंत्रता सेनानी वाला फर्जी पास नहीं चाहिए । मैं स्वतंत्रता आंदोलन में शरीक रहा हूं, मगर भारत सरकार को इसका प्रमाण नहीं दे सकता । मेरी ख्वाहिश एक ऐसे साहित्यकार के रूप में प्रथम श्रेणी रेल पास पाने की है, जिसकी पुस्तकें देश की 18 यूनिवर्सिटी में पढ़ाई जाती है ।
बहरहाल, बाबा ने भोजन समाप्त करने के बाद बांग्ला पाठिका की श्रद्धा और आदर से प्रभावित होकर उसके लिए बांग्ला में कविता की दो-तीन पंक्तियों के साथ अपने ऑटोग्राफ दे दिए ।
उन्हीं दिनों साहित्य अकादेमी का वार्षिक पुरस्कार समारोह कवर करने के दौरान तत्कालीन साहित्य अकादेमी सचिव के. सच्चिदानंदन से मेरी लंबी बातचीत हुई । बाबा गंभीर रूप से अस्वस्थ रहने लगे थे । मैंने सच्चिदानंदन से आग्रह किया कि बाबा नागार्जुन साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त साहित्यकार हैं और हिन्दी, मैथिली, बांग्ला के चोटी के गिने-चुने मनीषियों में से हैं । अर्थाभाव के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पा रहा है । साहित्य अकादेमी की ओर से बाबा के लिए मानदेय की व्यवस्था अगर हो जाती तो बड़ा पुण्य का काम होता । सचिव महोदय ने कहा कि इसके लिए विमर्श किया जाएगा । यह टालनेवाली बात थी । बाबा स्वर्ग सिधार गए, साहित्य अकादेमी मानदेय पर विचार करती रह गयी । शायद अकादेमी ने इसे विचारयोग्य समझा भी न हो । लेकिन उसी साहित्य अकादेमी से 1998 में बाबा की मृत्यु के बाद जब मैंने शोक सभा के लिए जगह मांगी तो तुरंत देने को तैयार हो गया । उस शोक सभा का रोचक और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह था कि साहित्य अकादेमी के कोई अधिकारी उसमें शामिल नहीं हुए । प्रमुख व्यक्तियों में डा. वेदप्रताप वैदिक और दिवंगत प्रभाकर श्रोत्रियजी की उपस्थिति उल्लेखनीय रही । बाबा का देहावसान अपने गृह जिला दरभंगा के मुख्यालय लहेरियासराय में नवंबर, 1998 में हुआ । अंतिम समय तक उनका हालचाल लेने कोई सरकारी गुमाश्ता नहीं गया । बिहार सरकार के सर्वोच्च सम्मान राजेंद्र शिखर पुरस्कार बाबा नागार्जुन को प्रदान करने की कहानी सुनिए । मैं उसका प्रत्यक्षदर्शी था चश्मदीद गवाह हूं । उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद थे और मेरा दिल्ली से पटना तबादला हुआ था । ध्यान रहे कि लालू प्रसाद उसी जे पी आंदोलन से उपजे नेता हैं, जिसमें भाग लेकर इंदिरा गांधी के खिलाफ कविता पढ़ने के कारण बाबा जेल गए थे । बाबा की तबीयत बिगड़ जाने के कारण उनके बड़े पुत्र शोभाकांत जी के साथ जाकर 1975 में इमरजेंसी में बाबा की अग्रिम जमानत मैंने करायी थी । लालू प्रसाद यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री थे, उस वक्त बाबा नागार्जुन ज्यादा ही बीमार रहने लगे । शोभाकांतजी दरभंगा में रहते थे, इसलिए बाबा दिल्ली छोड़कर दरभंगा में स्थायी निवास करने लगे । यात्रा करने की स्थिति में नहीं थे । घटना 1994 की है । मैं दिल्ली से तबादला होकर पीटीआई भाषा संवाददाता के रूप में पटना ब्यूरो कार्यालय आ गया था । उसी समय बिहार सरकार ने अपना सर्वोच्च साहित्य पुरस्कार राजेन्द्र शिखर सम्मान बाबा को प्रदान करने का फैसला किया । निर्देश के अनुसार दरभंगा के जिला मजिस्ट्रेट ने बाबा को इसकी जानकारी दी और उन्हें दरभंगा से पटना लाने की व्यवस्था की गयी । बाबा नागार्जुन ‘स्टेट गेस्ट’(राजकीय अतिथि) थे, इसलिए उन्हें राजकीय अतिथि की तरह पटना में ठहराया गया । राजेन्द्र शिखर सम्मान बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद को प्रदान करना था । पुरस्कार समारोह का आयोजन स्थानीय श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में किया गया । पुरस्कार राशि के चेक के साथ लालू प्रसाद ने बाबा नागार्जुन को च्यवनप्राश का एक डिब्बा पेश किया और शॉल ओढ़ाया । उस अवसर पर लालू प्रसाद ने अपनी चिरपरिचित भोजपुरी में आह्लाद व्यक्त किया. रौआ के हम जाए न देब बाबा, रौआ के जियावे के बा(हम आपको जाने नहीं देंगे बाबा, आपको जिलाए रखना है) ।
पुरस्कार समारोह समाप्त होने के बाद बाबा के साथ मैं राजकीय अतिथि गृह के कमरे तक आया । बाबा ने कुछ खाने की इच्छा व्यक्त की । ब्रेड मंगवाया गया, लेकिन साथ में मक्खन या और कुछ लाने से बाबा ने मना कर दिया । अब आगे का आंखोंदेखा हाल पढ़िए । बाबा च्यवनप्राश का डिब्बा खुलवाते हैं और खुद ब्रेड का पैकेट फाड़ते हैं । ब्रेड का एक स्लाइस हाथ में लेकर अपने से चम्मच से च्यवनप्राश निकालते हैं और मक्खन की तरह, ब्रेड में लगाकर खाने लगते हैं । दूसरे स्लाइस में च्यवनप्राश लगाते हुए बाबा अपने निराले व्यंग्यात्मक अंदाज में टिप्पणी करते हैं. इस च्यवनप्राश का स्वाद तो गजब का है प्यारे, सरकारी है न । च्यवनप्राश तो मैंने खाए हैं । मगर ऐसा कमाल का मजेदार स्वाद पहले कभी नहीं मिला । अभिनय में लालू प्रसाद शत्रुघ्न सिन्हा का नाना है, देखना लालू की नटलीला इसे दुबारा मुख्यमंत्री बना देगी ।’
जो पाठक बाबा नागार्जुन की तीखी और खुरदरी व्यंग्य की विशिष्ट शैली से परिचित हैं, उन्हें भी सरकारी उपहार में प्राप्त च्यवनप्राश ब्रेड में लगाकर खाने वाला प्रयोग शायद पहले से पता नहीं होगा । टिप्पणियों में सरकारी से लेकर हर राजनीतिक, सामाजिक कुरीतियों को निशाना बनाते थे । बाबा को पद्य और गद्य दोनों ही गहराई तक छेदते थे । सबसे ज्यादा बाबा ने सरकारी व्यवस्था की बुराइयों को उभाड़ा । इसलिए सम्मान के नाम पर बाबा से व्यवहार भी वैसा ही किया गया । शिखर सम्मान समारोह के ही दिन शाम को अतिथिगृह के स्टाफ ने बाबा नागार्जुन और उनके पुत्र शोभाकांतजी से कमरा खाली करा लिया । कहा गया. ‘बुकिंग गत रात से लेकर सम्मान समारोह तक के लिए थी ।’ यह मेरे जेहन का कभी न सूखनेवाला जख्म है । जितनी बातें बाबा की हमेशा याद रहती हैं उनमें कविताओं की तरह पत्र लिखने की भी उनकी विशिष्ट शैली है । नाम पहले. ‘शशिधर, प्रिय’ जैसे स्नेहपूर्ण लहजे में बाबा अपने से छोटे को पत्र लिखते थे । इसमें 1966 में पटना के भिखनापहाड़ी में रहते हुए ‘काकी’ के हाथ से भूंजा खाना भी याद आता है । उस वक्त मैं मिडिल स्कूल का छात्र था और चचा नागार्जुन निकट ही महेन्दू मोहल्ला में शास्त्री भवन में रहते थे ।
बाबा के साथ-साथ कवि केदारनाथ सिंह और गुणाकर मुले भी सम्मानित किए गए । तीनों को राजभाषा विभाग की ओर से पर्यटन विकास निगम के होटल में ठहराया गया । होटल के कमरा नं. 102 में एक चरमराते पलंग पर बैठे 83 वर्षीय बाबा ब्रेड पर च्यवनप्राश लगाते हैं और अपनी व्यंग्यात्मक स्टाइल छेड़ते हैं । लालू समारोह में कहता है. ‘रउआ के जियावे के बाबा, हेतना जल्दी हम जाए ना देब, हई ली च्यवनप्राश के डिब्बा ।’ इसके बाद बाबा के उद्गार. ‘हां, हड्डी तो गल रही है, अब लालू मेरी खलड़ी(चमड़ी) के लिये मुझे जिंदा रखना चाहता है । देखो तो च्यवनप्राश किस ब्रांड का है, इतना प्रचार हो रहा है, उसे भुगतान करना चाहिए ।’
कमरे में बाबा से बातचीत के दौरान होटलवाला दो बार बिल के बारे में पूछने आ गया । बाबा के सबसे बड़े पुत्र, शोभाकांतजी के यह कहने पर कि ‘भुगतान राजभाषा विभाग की ओर से किया जाएगा’ । बैरा आश्वस्त नहीं होता । थके बाबा को जरा-सी झपकी आयी कि टैक्सी वाला भुगतान मांगने आ गया । बाबा ने अपनी लाचारी बताकर राजभाषा विभाग से पटना आने के लिए वाहन की व्यवस्था करने कहा तो सरकारी गाड़ी की जगह टैक्सी भिजवाकर विभाग ने किनारा कर लिया ।
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