प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा नेतृत्व की नीतियों का विरोध करनेवालों को यूएपीए(अनलॉफुल एक्टिविटीज प्रेवेंशन एक्ट - गैर कानूनी गतिविधियां रोक कानून), 1967 के अन्तर्गत जेल में डाल दिया जाता है और उनके खिलाफ ‘देशद्रोह / राजद्रोह’ का मामला बनाया जाता है । विरोध चाहे सैद्धांतिक हो या वैचारिक, विरोध करनेवाले कितने भी बड़े बुद्धिजीवी या सामाजिक कार्यकर्ता क्यों न हों, प्रधानमंत्री की नीतियों से असहमति ही पर्याप्त है । समाज में उनकी ऐसी छवि पुलिस बनाना चाहती है कि वे ‘देशद्रोही’ हैं। मानो सरकार की नीतियों से द्रोह ही देशद्रोह हो और देश का अर्थ सिर्फ प्रधानमंत्री तथा भाजपा नेतृत्व हो ।

जनवरी, 2018 से शुरू हुआ यह सियासो सिलसिला अब ऐसा रंग ले चुका है कि न्याय और संविधान के रक्षक अदालतों के सामने भी असहज स्थिति है । महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव हिंसा दिसंबर, 2017 से यह कथित ‘देशद्रोह’ मामला शुरू हुआ और उसके बाद नागरिकता(संशोधन) कानून का विरोध भी उसी के दायरे में आ गया ।

यूएपीए की धारा 124ए और 153ए की पहचान वैसे मामलों के रूप में कर दी गयी है, जो सरकार के खिलाफ बोलनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता ‘देशद्रोहो’ हैं और उन्हें जेल से किसी भी हालत में रिहा करना ‘देशहित’ में नहीं है । इस कानून के अन्तर्गत गिरफ्तारी में जमानत का प्रावधान नहीं है, चाहे कैदी के साथ कुछ भी हो जाए । 2018 से बीमा कोरेगांव हिंसा के आरोपी सामाजिक कार्यकर्ताओं को अभी तक जमानत नहीं मिली है । यहां तक कि कोरोना वायरस फैलने के बाद भी उन्हें जेलों में ठूंसकर रखा गया है । लगभग सभी बुजुर्ग समाजसेवी हैं और उनमें से कुछ कई असाध्य बीमारियों से जूझ रहे हैं । उनके मामले की जांच कर रही एनआईए(राष्ट्रीय जांच एजेंसी) बंबई हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट तक स्वास्थ्य के आधार पर भी यह कहकर विरोध कर रही हे कि यूएपीए कानून में पेरोल या जमानत का प्रावधान नहीं है । एनआईए ने इन बुद्धिजीवियों के खिलाफ प्रतिबंधित नक्सली गुट सीपीआई(माओवादी) से कथित ताल्लुकात पाए हैं ।

मुंबई के तलोजा जेल में बंद 81 वर्षीय जानेमाने कवि वारवरा राव को बेहोशी की हालत में 29 मई को उनकी बेटियों की अर्जी पर जे. जे. अस्पताल में भर्ती कराया गया । बाइकुला जेल में बंद 60 वर्षीया वकील और ट्रेड यूनियन नेता सुश्री सुधा भारद्वाज की स्वास्थ्य के आधार पर अंतरिम जमानत की अर्जी स्पेशल कोर्ट ने खारिज कर दी । विशेष पब्लिक प्रोजिक्यूटर प्रकाश शेट्टो ने कोर्ट को बताया कि भारद्वाज यूएपीए कानून के अंतर्गत आरोपित हैं और हाई पावर कमिटि में ऐसे कैदियों के लिए जमानत या पेरोल का प्रावधान नहीं है । 2 जून को स्पेशल कोर्ट ने उसी आधार पर वारवरा राव की भी अंतरिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी । आईआईटी खड़गपुर के छात्र रहे प्रख्यात इंजीनियर आनंद टल्टम्बडे की न्यायिक हिरासत की अवधि एनआईए की अर्जी पर मुंबई की विशेष अदालत ने पहले पांच जून तक बढ़ायी और उसके बाद फिर जमानत टाली । प्रो. शोमा सेन को भी जमानत नहीं मिल रही है । इनमें सबसे अजीबोगरीब मामला गौतम नवलखा का है । इन्हें मुंबई पुलिस ने अपने घर में नजरबंद रखा हुआ था । दो साल तक बंबई हाईकोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की दौड़ लगाने के बावजूद गौतम नवलखा खुद को बीमा कोरेगांव हिंसा उकसाने के आरोप से मुक्त कराने में सफल नहीं हो पाए । आखिरकार सुप्रीम कोर्ट के कहने पर 67 वर्षीय नवलखा ने 14 अप्रील को एनआईए के आगे आत्मसमर्पण किया और उन्हें तिहाड़ जेल में रखा गया । नवलखा के खिलाफ सुनवाई दिल्ली हाईकोर्ट में चल रही है । नवलखा ने कोरोना के मद्देनजर जमानत मांगी तो केंद्र सरकार की ओर से सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने विरोध किया । 27 मई को पेशी से एक दिन पहले अफरातफरी में एनआईए नाटकीय अंदाज में अफरातफरी में दिल्ली से मुंबई ले गयी, जिस पर हाईकोर्ट ने सवाल उठा दिया । एनआईए दिल्ली हाईकोर्ट के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी और सुप्रीम कोर्ट जज अरूण मिश्र ने 2 जून को हाईकोर्ट के नवलखा जमानत अर्जी की सुनवाई पर स्टे दे दिया। शीर्ष कोर्ट ने नवलखा को नोटिस जारी किया और 15 दिन बाद के लिए मामला सूचीबद्ध किया ।

महाराष्ट्र पुलिस ने अगस्त, 2018 में मानवाधिकार कार्यकर्ता अरूण पेरीरा, वर्नोन गोन्साल्वस, सुधा भारद्वाज, वारवरा राव और गौतम नवलखा के घरों पर छापेमारी की । नवलखा को छोड़ बाकी सब गिरफ्तार करके पुणे के एक जेल में बंद कर दिए गए । उसके पहले नागपुर के मानवाधिकार वकील सुरेन्द्र गाडलिंग, दलित अधिकारों के लिए संघर्षरत सुधीर ढावले, दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता रोना विल्सन, नागपुर यूनिवर्सिटी में अंगजी की प्रोफेसर शोमा सेन और पूर्व प्रधानमंत्री के ग्रामीण विकास विभाग सहयोगी महेश राउत को गिरफ्तार किया गया । इन सबों पर एक जनवरी, 2018 को भीमा कोरेगांव हिंसा ‘विवाद’ में शामिल होने और नक्सली संगठन सीपीआई(माओवादी) गुट से संपर्क का आरोप है । उसी समय से लेकर अभी तक इन सभी ‘देशद्रोहियों’ के लिए न्याय के रास्ते लगभग बंद हैं । अदालती प्रक्रिया मंथर गति से चल रही है । सुप्रीम कोर्ट तक के लिए तय करना कठिन हो रहा है कि वास्तव में ये ‘देशद्रोही’ हैं या नहीं और पुलिस का आरोप सही है या नहीं । इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने इनके मामले से पल्ला झाड़ने वाली नीति अपनायी हुई है । सबसे कमाल तो अक्टूबर, 2019 में देखने को मिला, जब न्याय के सबसे बड़े दरवाजे खुलते ही भड़भड़ाने लगे । अयोध्या रामजन्म भूमि विवाद, साबरीमाला मंदिर विवाद से संबंधित ‘ऐतिहासिक’ फैसले देनेवाले भारत के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने एक अक्टूबर को गौतम नवलखा के मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया । इसको चीफ जस्टिस ने देश का ऐसा मामला नहीं माना, जिसमें अभियुक्तों की फरियाद सुनी जाए । उसके बाद तीन सुप्रीम कोर्ट जजों की पीठ के सामने गौतम नवलखा का मामला गया और तीनों जजों ने भी अपने को सुनवाई से अलग का लिया । वे तीनों जज थे - एन. बी. रामना, आर. सुभाष रेड्डी और बी. आर. गवई । फिर पांचवें जज रवीन्द्र भट्ट के पास नवलखा का केस पहुंचा और वे भी इस विवाद की सुनवाई से पीछे हट गए । 13 सितंबर, 2019 को बंबई हाईकोर्ट ने नवलखा की प्राथमिकी रद्द करने की अर्जी खारिज कर दी । उनके खिलाफ 31 दिसंबर, 2017 को प्राथमिकी पुणे पुलिस ने दर्ज की । महाराष्ट्र तक सीमित होने के कारण यह मामला लो प्रोफाईल में चल रहा था । इसी बीच नागरिकता (संशोधन) कानून, 2019 आ गया। फिर इसका विरोध ‘देशद्रोह’ के अपराध में आ गया। फिर तो ‘राजद्रोह’ और ‘देशद्रोह’ राष्ट्रव्यापी हो गया । भाजपा की नीतियों का समर्थन न करनेवाले सभी यूएपीए एक्ट के दायरे में आ गए, जो पुलिस की भाषा में ‘देशद्रोह’ है । उसका जबर्दश्त विवादित चेहरा इस वर्ष जनवरी-फरवरी में दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाके में सामने आया । नागरिकता(संशोधन) एक्ट(सीएए) का सबसे ज्यादा विरोध असम में उभरा । इसमें भी एनआईए ने ‘देशद्रोहियों’ को जेल में बंद कर दिया । कानून के अंतर्गत निश्चित समय सीमा के अंदर आरोप पत्र दायर करने और अदालत में पेशी में कोई रूचि नहीं ली । कानूनी प्रावधान के मुताबिक एनआईए को 90 दिनों के अंदर आरोप पत्र दायर करना है । नागरिकता कानून का विरोध करनेवाले असम के एक सामाजिक कार्यकर्ता बिट्टू सोनोवाल ‘लेनिन’, ‘लाल सलाम’ और ‘कामरेड’ सोसल मीडिया पर लिखने के कारण ‘देशद्रोह’ आरोप में जेल में हैं । ये मजदूरों के अधिकारों के लिए लड़नेवाल कृषक मुक्ति संग्राम समिति(केएमएसएस) की छात्र यूनिट के अध्यक्ष हैं । इनके खिलाफ आरोप पत्र दायर करने में एनआईए ने 165 दिन लगाए ।

केरल हाईकोर्ट के जज मुहम्मद मुश्ताक ने 2015 में नक्सलियों से संबंधित एक मुकदमे में कहा कि माओवादी होना कोई अपराध नहीं है । मतभेद के कारण किसी को ‘देशद्रोही’ बताकर यूएपीए के अन्तर्गत जेल में नहीं डाला जा सकता ।

तेलंगाना की ऊस्मानिया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चिंताकिंडी कासिम को यूएपीए के अंतर्गत चार साल जेल में पड रहे । पत्नी स्नेहलता की फरियाद पर तेलंगाना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस राघवेन्द्र चौहान ने पुलिस को 18 जनवरी, 2020 को अपने आवास पर प्रो. कासिम को पेश करने कहा । दिल्ली में सीएए विरोध में शामिल महिला छात्राओं के लिए कार्यरत संस्था पिंजरा टोड से जुड़ी जेएनयू छात्रा नताशा नरवाल समेत सात लोग यूएपीए के अंतर्गत जेल में हैं ।

सीएए विरोध के बाद कोरोना सक्रमंण में भी सत्ता विरोध वायरस घुस गया और उसमें पत्रकारों को भी ‘देशद्रोहियों’ की तरह जेल में डाला गया । एक देश तो है, मगर कानूनी प्रक्रिया अलग-अलग है । अलग देश, अलग झंडा के लिए हिंसक आंदोलन करनेवाले नगा विद्रोही गुट और असम के उल्फा के नेता आराम से सरकार से सीधा टकराव मोल लेकर समानान्तर वार्ता चला रहे हैं । नगाओं की अपनी पुलिस और सेना है, उनपर ‘देशद्रोह’ कानून लागू नहीं होता ।