124ए(देशद्रोह) और 153ए समेत विभिन्न धाराओं के अंतर्गत ‘देशद्रोह’ के आरोप लगाकर जेल भेजे जानेवाले वैसे बुद्धिजीवी चिंतक, सामाजिक कार्यकर्ता, वकील, प्रोफेसर हैं जिनकी विचारधारा भाजपा से मेल नहीं खाती । राजनीतिक मतभेद वालों के खिलाफ संविधान की ऐसी धाराओं के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट तक के लिए किसी निश्चित नतीजे पर पहुंचना कठिन हो रहा है। महाराष्ट्र से लेकर दिल्ली तक की पुलिस कोई ऐसा मामला उठा लेती है, जिसमें सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या भाजपा का विरोध हो और उसके बाद सबूत जुटाने के लिए कोर्ट का समय जाया करती है । मौलिक अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी की ऐसी व्यवस्था थोपने की कोशिश चल रही है, जिसमें सत्ता-विरोध का प्रावधान हो ।

इसमें एक ओर जहां वामपंथी सोचवाले ‘देशद्रोहियों’ को ‘शहरी नक्सली’ कहकर जेल में डाला गया वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी पर टिप्पणी करनेवाले या उनकी नीतियों की आलोचना करनेवालों के खिलाफ ‘देशद्रोह’ का मामला बनाया गया ।

अभी ऐसे समय में ‘राष्ट्रद्रोह’ के ये मामले उफार पर हैं, जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 150वीं जयंती मनायी जा रही है । संयोग से गत वर्ष एक अक्टूबर से मचे इस बवाल ने एक अक्ट्बर, 2019 के बीच एक ही साथ बंबई हाईकोर्ट, दिल्ली हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को पसोपेस में डाला हुआ है । एक जनवरी, 2018 से महाराष्ट्र के भीमा-कोरेगांव हिंसा से उपजा यह विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है । दिल्ली हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को भी तय करना कठिन हो रहा है कि महाराष्ट्र पुलिस गलत है या ये सारे सामाजिक कार्यकर्ता ।

‘शहरी नक्सली’ का राजनीतिक इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं कांग्रेस के खिलाफ अप्रील, 2018 में छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश विधान सभा चुनाव के समय कर चुके हैं । उन्होंने अपने भाषणों में शहरी नक्सलियों से कांग्रेस की मिलीभगत बताया । अभी ऐसे समय में कई तरफ से ‘देशद्रोह’ के मामले सुर्खियों में हैं, जब महाराष्ट्र में चुनाव है, जहां से ‘देशद्रोह’ दिसंबर, 2017 में उपजा । जितने बुद्धिजीवी इसमें फंसे हैं, उनमें ज्यादातर दलित हैं और दबे-कुचले दलित-आदिवासियों के बीच उनकी गहरी पैठ है । उनकी आवाज को दबाने-कुचलने के प्रयास पर कोई फैसला लेने में सुप्रीम कोर्ट के अंदर भी असहजता है । अभिव्यक्ति की आजादी पर कुठाराघात के खिलाफ बार-बार फैसला सुनाने के बावजूद बात बन नहीं रही है ।

नागरिक अधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा को पुणे पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगानी पड़ी । 15 अक्टूबर को उनके मामले की अगली सुनवाई सुप्रीम कोर्ट करेगी । गौतम नवलखा एल्गार परिषद - भीमा-कोरेगांव हिंसा के नौ अभियुक्तों में से हैं। दो अक्टूबर के समय केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और अन्य संस्था,ं गांधी जयंती समारोह में जुटी थी । उस उपलक्ष में केंद्र सरकार ने 611 कैदियों को रिहा करने का फैसला किया । 2 अक्टूबर, 2018 से 2 अक्टूबर, 2019 तक कई कैदियों को रिहा करने की रिपोर्ट जारी की गयी और गांधी जयंती के ही समय सुप्रीम कोर्ट में गौतम नवलखा को लेकर अफरातफरी मची थी । गौतम नवलखा बंबई हाईकोर्ट से गिरफ्तारी से मिली सुरक्षा की मियाद पूरी होने के कारण सुप्रीम कोर्ट से राहत की दौड़ लगा रहे थे । उधर सुप्रीम कोर्ट में गौतम नवलखा की सुनवाई के लिए गठित पीठ के जज ही इस सुनवाई से पीछा छुड़ाना चाहते थे । इस पीठ स सबसे पहले चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ही खुद को अलग किया । उसके बाद बाकी तीन जजों एन. वी. रामाना, आर. सुभाष रेड्डी और बी. आर. गवई ने भी पीछा छुड़ा लिया । आखिरकार सुप्रीम कोर्ट में तीन अक्टूबर को जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता ने सुनवाई की । दोनों जजों ने 15 अक्टूबर तक नवलखा की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी और कहा कि इस मामले में विस्तृत सुनवाई की जरूरत है । गौतम नवलखा ने अपने खिलाफ दर्ज प्राथमिकी रद्द करने की अर्जी बंबई हाईकोर्ट द्वारा ठुकरा दिए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की । सुप्रीम कोर्ट न अभियोग पक्ष को अब तक की जांच के पूर कागजात प्रस्तुत करने कहा है । एक अक्टूबर, 2018 को भी दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश से गौतम नवलखा को अपने घर में नजरबंदी से मुक्त किया गया । नवलखा समेत नौ अन्य मानवाधिकार और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं को पुणे पुलिस ने 31 दिसंबर, 2017 को एल्गार परिषद जमावड़े में मौजूदगी के कारण देश के विभिन्न हिस्सों से गिरफ्तार किया । पुलिस का आरोप है कि उनके भाषणों से एक जनवरी, 2018 को जातीय हिंसा भड़की । उस समय से लेकर अभी तक ये सभी बंबई कोर्टो से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक न्याय के लिए दौड़ रहे हैं । इन्हीं के मामले में सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने अगस्त, 2018 पर गिरफ्तारी पर रोक लगाकर कहा था - ‘लोकतांत्रिक व्यवस्था में सेफ्टी वाल्व मतभेद पर अगर अंकुश लगाया गया तो प्रेशर कूकर फट जाएगा ।’ महाराष्ट्र सरकार के लिए ‘शहरी नक्सली’ इन सामाजिक कार्यकर्ताओं के खिलाफ ‘देशद्रोह’ के अंतर्गत आनेवाले मामले के पुख्ता सबूत महाराष्ट्र पुलिस नहीं जुटा पायी है ।

गौतम नवलखा के मामले की सुनवाई करनेवाले सुप्रीम कोर्ट जज दीपक गुप्ता का सात सितंबर, 2019 को अहमदाबाद में दिया गया वक्तव्य गौरतलब है । भारत में ‘देशद्रोह कानून और अभिव्यक्ति की आजादी’ पर वकीलों की ओर से आयोजित वर्कशॉप में जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि नागरिक के रूप में भारतीयों को सरकार की आलोचना का अधिकार है । आलोचना को देशद्रोह का मामला नहीं बनाया जा सकता । ऐसा करने पर हमारी पूरी व्यवस्था पुलिस राज हो जाएगी । उन्होंने साथ में यह स्पष्टीकरण भी दिया - ‘यह विचार मेरा निजी है, बतौर सुप्रीम कोर्ट जज नहीं ।’

इसी समय बिहार के मुजफ्फरपुर जिले से रिपोर्ट आयी कि कोर्ट ने एक वकील की अर्जी पर देश की 49 जानीमानी हस्तियों के खिलाफ देशद्रोह के मामले में एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया । इतिहासकार रामचंद्र गुहा, फिल्म निर्माता श्याम बेनेगल, अदूर बालाकृष्णन, शास्त्रीय संगीत गायिका शुभा मुद्गल जैसी नामचीन हस्तियों का अपराध ये था कि इनलोगों ने दो महीना पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखकर उनकी नीतियों की आलोचना की थी । एक स्थानीय वकील ने मुजफ्फरपुर के सीजेएम के पास अर्जी लगाकर उस पत्र को ‘देशद्रोह’ का मामला बनाया और दलील दी कि इनलोगों ने अपने पत्र में ‘प्रधानमंत्री के प्रभावशाली उपलब्धि और देश की छवि को बदनाम करने का प्रयास’ किया ।

मजे की बात ये है कि गांधी जयंती के ही दिन इन 49 मशहूर हस्तियों के खिलाफ देशद्रोह की धारा 124ए के अलावे देश को ‘तोड़नेवाली’ विभिन्न धाराओं 153बी, 160 और शांति में बाधा पहुंचाने वाली धारा 290, 504 समेत विभिन्न धाराओं के अंतर्गत मुकदमा दर्ज किया गया । मुजफ्फरपुर पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने मुंबई तथा अन्य स्थानों का दौरा करेगी । उनमें से ज्यादातर लोग मुंबई में रहते हैं । इन लोगों ने अपने हस्ताक्षर से 23 जुलाई को प्रधानमंत्री को लिखे गये खुले पत्र में लिंचिंग, जय श्रीराम की बढ़ती घटनाओं पर चिंता जतायी, क्योंकि इसमें दलितों, मुस्लिमों को निशाना बनाया जा रहा है । पत्र में वही बात कही गयी जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विरोध में बोलनेवालों को ‘देशद्रोही’ और ‘शहरी नक्सली’ बताकर जेल में डालने की प्रवृत्ति पर रोक लगायी जानी चाहिए, क्योंकि फिर तो लोकतंत्र नाम की कोई चीज रह नहीं जाएगी । प्रधानमंत्री को पत्र लिखनेवालों में मणि रत्नम, अपर्णा सेन, कोंकण सेन, अनुराग कश्यप समेत 49 नामचीन कलाकार हैं । उनका यह अपराध ‘देशद्रोह’ का मामला बन गया । गिरफ्तारी से बचने के लिए ये लोग भी कोर्ट जाएंगे और फिर कोर्ट भी खुद को असहज महसूस करेगी । सिर्फ यही मामला केंद्र सरकार को प्रतिक्रिया देने लायक लगा । केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने दशहरा के दिन आठ अक्टूबर को सफाई दी कि नामचीन हस्तियों के खिलाफ बिहार में ‘देशद्रोह’ का मुकदमा दर्ज होने के मामले से प्रधानमंत्री का कोई लेना-देना नहीं है । जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के खिलाफ ‘देशद्रोह’ मामला 2016 से चल रहा है, और अभी तक दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस के बीच कन्हैया तथा अन्य के खिलाफ अभियोग चलाने के लिए कोर्ट में फेंकाफेंकी चल रही है । 18 सितंबर को दिल्ली के चीफ मेट्रोपोलियन मजिस्ट्रेट मनीष खुराना ने कोर्ट का समय बर्बाद करने के लिए फटकार लगायी और एक महीना में अंतिम निर्णय लेने कहा और 25 अक्टूबर तक का समय दिया ।

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर के बारे में 19 सितंबर को दिल्ली पुलिस न कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री के खिलाफ निंदनीय शब्द बोलना ‘देशद्रोह’ में नहीं आता । उनके खिलाफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘नीच आदमी’ बोलने के कारण धारा 124ए/153ए के अंतर्गत देशद्रोह का मुकदमा चल रहा है । इसकी अगली सुनवाई 16 दिसंबर को होनी है । जम्मू व कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट नेता शेहला राशिद को ‘देशद्रोह’ अपराध में गिरफ्तारी से बचने के लिए 10 सितंबर को दिल्ली की एक कोर्ट ने अंतरिम सुरक्षा दी । इन्होंने कश्मीर पर विवादित ट्वीट किया । दिल्ली पुलिस ने यह कहकर कोर्ट से जांच के लिए छह हफ्ते का समय लिया कि शेहला के खिलाफ सेना से कोई शिकायत नहीं मिली है ।