जब से विभिन्न राज्यों में भाजपा की सरकारें बनने का सिलसिला शुरू हुआ है, तभी से धर्मान्तरण विरोधी कानून बनाने का विवादास्पद मामला सुर्खियों में आता रहा है । इसके पीछे एकमात्र कारण है, सियासी राजनीति के संघी एजेंडे, जिसकी आड़ में सामाजिक और धार्मिक आस्थाओं की धज्जियां उड़ायी जा रही हैं । धर्मान्तरण पहले भी होते रहे हैं । इसाई मिशनरियों द्वारा धर्मान्तरण कराए जाने की बात किसी से छिपी नहीं थी । आदिवासी बहुल पूर्वोत्तर और देश के अन्य जनजातीय इलाकों में मिशनरियां आजादी के पहले से यह काम करती आ रही हैं ।
हिन्दुत्व एजेंडे पर मुख्य रूप से टिकी भाजपा का जब सत्ता में आने का अवसर मिला तो सबसे पहले इसाई और फिर इस्लाम धर्म को लक्ष्य करके धर्मान्तरण के खिलाफ कानून बनाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया गया । अभी केंद्र में भाजपा के नेतृत्व में पूर्ण बहुमत की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक सरकार है । 2014 में भाजपा ने धर्मान्तरण विरोधी कानून बनाने का वायदा अपने चुनावी घोषणापत्र में किया था । दूसरी बार सत्ता में आने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा नहीं कर पा रहे हैं ।
जबकि विवादित धर्मान्तरण कानून बनाने की शुरूआत 2003 में गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने ही की थी । राजस्थान की भाजपा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी ऐसे कानून को लेकर मचे सियासी घमासान में नरेंद्र मोदी के साथ थी । सभी जानते हैं कि 2003 में केंद्र में भाजपा गठजोड़ सरकार थी और अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे ।
धर्मान्तरण विरोधी कानून को लेकर हाल में सबसे ज्यादा विवाद के घेरे में आए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2017 में पहली पसंद थे । अब 2022 में होनेवाले विधान सभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ के जितने काम को कसौटी पर मतदाता परखेंगे, उसमें 2020 का धर्मान्तरण रोक अध्यादेश भी है । यह पहला ऐसा धर्मान्तरण रोक अध्यादेश है, जिसमें ‘प्रलोभन’ देकर या ‘जबरन’ धर्मपरिवर्तन कराकर किया गया विवाह(निकाह) गैरजमानती अपराध होगा । अध्यादेश के अनुसार केवल धर्मपरिवर्तन के लिए शादी अमान्य होगी और सामूहिक धर्म परिवर्तन पर तीन से 10 वर्ष तक सजा तथा 50 हजार जुर्माने का प्रावधान है । इस अध्यादेश से जुड़े इलाहाबाद हाईकोर्ट के परस्पर विरोधी दो फैसले नवंबर, 2020 में ही आए, जब यह लागू हुआ ।
24 नवंबर, 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम युवक सलामत अंसारी के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दिया, जिस पर एक हिंदू युवती प्रियंका खरवार(आलिया) का कथित अपहरण करके शादी कराने का मामला दर्ज किया गया था । हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दो बालिग अपना जीवनसाथी चुनने को स्वतंत्र हैं ।
धर्मान्तरण के एक ऐसे ही मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने शाहजहांपुर(यूपी) निवासी हिंदू महिला को समुचित सुरक्षा देने का दिल्ली पुलिस को निर्देश इसी हफ्ते एक जुलाई को दिया है । महिला ने कोर्ट को कहा कि उसने अपनी मर्जी से इस्लाम धर्म अपनाया ।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 12 जून के अपने आदेश में कहा कि धर्म परिवर्तन कर शादी करनेवाले बालिगों को सुरक्षा प्रदान करने में धर्मान्तरण कानून महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है । दो बालिग धर्म परिवर्तन करके अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं या बिना किए भी साथ रह रहे हैं तो भी पुलिस को प्रमाण के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए ।
30 अक्टूबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला के हिन्दू धर्म अपनाकर हिंदू रीति-रिवाज से विवाह करने के मामले में कहा कि ‘शादी के लिए धर्मान्तरण स्वीकार्य नहीं है ।’ इस महिला ने अपने निजी मामले में कोई सरकारी हस्तक्षेप से बचने के लिए हाईकोर्ट से राहत मांगी थी । लेकिन कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी ।
उसी हाईकोर्ट में 24 नवंबर, 2020 को मुस्लिम युवक से शादी करने के लिए हिंदू युवती के इस्लाम अपनाने के खिलाफ दायर अर्जी पर सुनवाई के दौरान 30 अक्टूबर के फैसले का जब याचिकाकर्ता ने हवाला दिया, तो इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों की पीठ ने टिप्पणी की - ‘यह कानून अच्छा नहीं है ।’
यूपी कानून के लाभकारी साबित होने का एक ही मामला इसी हफ्ते सामने आया, जब पुलिस ने मूक बधिरों का धर्मान्तरण करानेवालों को गिरफ्तार किया । मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब अध्यादेश लागू किया तो कर्नाटक, हरियाणा समेत कई भाजपा शासित राज्यों ने इसकी तारीफ करते हुए अपने यहां भी ऐसा कानून बनाने की इच्छा जतायी ।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) ने दिसम्बर, 2017 में विभिन्न जनसभाओं में भाजपा पर बंगाल में रुपये देकर लोगों का धर्मान्तरण कराने का सीधा आरोप लगाया । अप्रैल-मई, 2021 में हुए बंगाल विधान सभा चुनाव में दीदी को हराने के लिए जुटे भाजपा के स्टार प्रचारकों में योगी आदित्यनाथ भी थे ।
जम्मू व कश्मीर का हालिया मामला एक सिख लड़की मनमीत कौर का मुस्लिम युवक से निकाह कराने का है । इसको लेकर सिख नेताओं ने श्रीनगर से लेकर दिल्ली स्थित जम्मू व कश्मीर हाउस तक प्रदर्शन किया । उस लड़की का दूसरा विवाह तुरंत दिल्ली लाकर गुरुद्वारे में करा दिया गया । लेकिन इस बात की पुष्टि नहीं हुई कि लड़की ने अपना धर्म मर्जी से बदला या उसका धर्मान्तरण कराया गया । शिरोमणि अकाली दल(एसएडी) का आरोप था कि ‘जबरन शादी’ कराकर मनमीत कौर को मुस्लिम बनाया गया । इस प्रकार यह धर्मान्तरण का मामला बनता है । मगर उसके बाद मनमीत कौर को दिल्ली लाकर एक सिख युवक सुखप्रीत सिंह से गुरुद्वारा बांग्लासाहिब में शादी करा दी गयी । यह तो सिख लड़की मनमीत कौर का दो बार धर्मान्तरण का मामला बनता है ।
इस मुद्दे को लेकर कश्मीर के सिख नेता और दिल्ली से श्रीनगर पहुंचे एसएडी नेता आमने-सामने है । एसएडी अध्यक्ष परमजीत सिंह सरना ने आरोप लगाया कि चार सिख महिलाओं की जबरन धर्मान्तरण कराकर शादी हाल में करायी गयी है । कश्मीर के सर्वदलीय सिख समन्वय समिति के अध्यक्ष जगमोहन सिंह रैना और मीरवाइज उमर फारूक के नेतृत्ववाले मुताहिदा मजलिस-ए-उलेमा ने इस आरोप का खंडन किया है तथा दोनों नेताओं ने राजनीतिक मकसद से स्थानीय समुदायों में झगड़ा कराने के ‘बाहरी हस्तक्षेप’ के खिलाफ चेतावनी दी है ।
संविधान की धारा-25(1) के अंतर्गत हर नागरिक को अपनी मर्जी से धर्म अपनाने की आजादी है । धर्मान्तरण रोकनेवाला कानून तभी अपना काम कर सकता है, जब पुलिस के पास ऐसी शिकायत दर्ज हो । धर्म बदलने वाले पुरुष और महिला ने अगर मर्जी से ऐसा किया है, तब भी भाजपा शासित राज्यों की पुलिस को इसे धर्मान्तरण कानून के अंतर्गत लाना था । लेकिन पुलिस ऐसा कर नहीं पायी और कानून बनने के बावजूद धर्मान्तरण न रुका है, न रुकेगा । यह पूरी तरह राजनीतिक मुद्दा है ।
अभी लखनऊ-नोएडा में यूपी पुलिस ने मूक-बधिरों का धर्मान्तरण करानेवाले गिरोह के दिल्ली निवासी दो सदस्यों - मुफ्ती काजी जहांगीर आलम कासमी और मुहम्मद उमर गौतम को पकड़ा है । एडीजी प्रशांत कुमार के अनुसार मोहम्मद उमर गौतम ने खुद भी धर्म बदला है, उसके पिता का नाम धनराज सिंह गौतम है ।
इस गिरोह को पुलिस ने देश में हजारों का धर्मान्तरण कराने में लिप्त पाया है । पुलिस की यह कार्रवाई सराहनीय है । मगर मूक-बधिरों के धर्मान्तरण के ताजा मामले में यह साबित कैसे होगा कि इन्होंने मर्जी से धर्म बदला या जबरन बदलवाया गया ।
मई, 2006 में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने जो धर्मान्तरण रोक बिल पास किया । जिस पर तत्कालीन राज्यपाल प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने स्वीकृति नहीं दी । मार्च, 2008 में दूसरी बार बिल पास करके राष्ट्रपति भवन भेजा, जब प्रतिभा देवी सिंह पाटिल राष्ट्रपति थी । उसके पहले राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने भी उस बिल पर विचार नहीं किया । 2003 में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने धर्मान्तरण रोक कानून बनाए । जयललिता को दलितों को बौद्ध बनाने पर एतराज था और नरेंद्र मोदी आरएसएस अजेंडे पर काम कर रहे थे । तमिलनाडु में अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों को बौद्ध बनाने वाले उदित राज(रामराज) 2014 में भाजपा के टिकट पर दिल्ली से लोकसभा चुनाव जीते । मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी द्वारा पास गुजरात बिल में हिंदू के साथ-साथ बौद्ध और जैन धर्म अपनाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति का प्रावधान नहीं रखा गया । हिंदू धर्म की कोटि में शामिल किए जाने के विरोध में बौद्धों और जैनियों के बवाल के बाद बिल वापस लेना पड़ा ।
धर्मान्तरण कानून 1963 में मध्य प्रदेश सरकार ने और 1967 में धार्मिक आजादी एक्ट कहकर ओडिशा सरकार ने बनाया । ओडिशा हाईकोर्ट ने 1972 में इसे संविधान के खिलाफ बताकर निरस्त कर दिया । हाईकोर्ट में इसाई समुदाय की ओर से दलील दी गयी कि धर्मान्तरण कराकर धर्मप्रचार इसाई धर्म का हिस्सा है । लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 1977 में संविधान की धारा-25(1) का हवाला देकर कहा कि कानून किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने के लिए उकसाने का अधिकार नहीं देता ।