इस बार संविधान /कानून दिवस के 69वें वर्ष में देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई(केंद्रीय जांच ब्यूरो) को लेकर सबसे ज्यादा विवाद छिड़ा हुआ है । विवाद तो दरअसल सीबीआई के अंदर मची हाई प्रोफाइल उठापटक और भ्रष्टाचार की जांच करनेवाली इस जांच एजेंसी के खुद ही भ्रष्टाचार में कथित रूप से लिप्त होने की खबरों से उपजा है । लेकिन इसी बवाल में वो दबी कुचली संवैधानिक / कानूनी भ्रांतियां खुलकर सामने आ गयीं जो सीबीआई के संवैधानिक / कानूनी औचित्य पर ही सवाल खड़े करती है । सीबीआई को बार-बार स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच एजेंसी बताकर आम जनता को झांसे में रखा गया । इसका मकसद सिर्फ इतना था कि लोग डरें और सीबीआई के राजनीतिक इस्तेमाल की बात आम लोगों तक नहीं पहुंचे । जनसाधारण को इससे ज्यादा मालूम ही नहीं होने दिया गया कि सीबीआई बहुत तगड़ा कानून है और इसकी पकड़ से बड़ा से बड़ा भ्रष्टाचारी या अपराधी नहीं बच सकता । लोग यहां तक तो जान गए कि सीबीआई प्रभावशाली और रसूखवाले भ्रष्टाचारियों के आगे कमजोर पड़ जाती है । सत्तारूढ़ दल में शामिल भ्रष्टाचारी या उनके लगुवों-भगुओं के मामले दबा दिए जाते हैं, यह अब आम चर्चा का विषय है । लेकिन जो अहम बात दबी रही और डंप रखी गयी वो है, सीबीआई की वास्तविक हैसियत । बहुप्रचारित और बहुविवादित सीबीआई का ठोस संवैधानिक आधार नहीं है । सीबीआई जिस कानून के अंतर्गत काम करती है, वो संविधान सम्मत है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है । संविधान में ऐसी कोई धारा नहीं है जो सीबीआई के कानूनी और संवैधानिक आधार की जानकारी देती हो । दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 के अंतर्गत प्राप्त अधिकारों की बदौलत सीबीआई कानूनी कार्रवाई करती है । जाहिर है कि यह एक्ट आजादी से पहले का है और इसके तहत काम करनेवाली सीबीआई को संविधान सम्मत स्वायत्त या स्टेच्युटरी संस्था का दर्जा प्राप्त नहीं है । क्योंकि ऐसा कोई एक्ट का बिल संसद में आज तक न तो पेश किया गया न इस पर कोई चर्चा हुई । दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 नामक बिल संविधान का नहीं, सिर्फ सरकार का हिस्सा है । 1946 में इस एक्ट के अंतर्गत गठित स्पेशल पुलिस बल का 1963 में गृह मंत्रालय न नाम बदलकर केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) कर दिया और सार्वजनिक उपक्रम के अंदर की अनियमितताओं समेत आतंकवाद, हत्या तथा जघन्य अपराधों की जांच का अधिकार दे दिया । सीबीआई लगातार उसी एक्ट से अधिकार प्राप्त करके केंद्रीय कार्मिक, जन शिकायत और पेंशन मंत्रालय(डीओपीटी) के अधीन काम करती आ रही है ।

2013 में सीबीआई स्थापना के स्वर्णजयंती वर्ष में जब भारी-भरकम समारोह के फूल मुरझाए तब गुवाहाटी हाईकोर्ट ने सीबीआई की असलियत देश को बतायी । गुवाहाटी हाईकोर्ट के जस्टिस इकबाल अहमद अंसारी और जस्टिस इंदिरा शाह की खंडपीठ ने सीबीआई के गठन को असंवैधानिक करार दिया । दोनों जजों ने गृह मंत्रालय के उस प्रस्ताव को ही गैरकानूनी बताकर रद्द कर दिया, जिसके अंतर्गत सीबीआई का गठन करके इसे अधिकार प्राप्त जांच एजेंसी का नाम दे दिया गया । सीबीआई की कानूनी हैसियत को गुवाहाटी हाईकोर्ट में चुनौती देनेवाले नवेन्द्र कुमार ने खंडपीठ के सामने अपनी दलील में कहा कि सीबीआई स्टेच्युटरी संस्था नहीं है, क्योंकि इसका गठन केंद्रीय गृह मंत्रालय के महज एक एक्जिक्यूटिव आदेश / प्रस्ताव नंबर 4/31/61-तारीख 01-04-1963 के अंतर्गत हुआ है, जबकि पुलिस राज्य का विषय है । भ्रष्टाचार के एक मामले में सीबीआई ने नवेन्द्र कुमार के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था, जिसके जवाब में आरोपित ने सीबीआई के संवैधानिक आधार पर ही सवाल उठा दिया । याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट को बताया कि संविधान की धारा-21 के अंतर्गत किसी व्यक्ति को कानूनी प्रावधान के तहत तय प्रक्रिया से इतर किसी अन्य तरीके से जीवन और आजादी से वंचित नहीं किया जा सकता । एफआईआर दर्ज करना, गिरफ्तारी, अपराधों की जांच, आरोप पत्र दायर करना, धारा-21 के अंतर्गत संविधान से प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है । सीबीआई का गठन किसी कानून के तहत नहीं हुआ है इसलिये सीबीआई ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल नहीं कर सकती है । नवेन्द्र कुमार ने सीबीआई के बुनियादी ढांचे पर सवाल उठाकर संविधान के हवाले से हाईकोर्ट को आश्वस्त कर दिया । गुवाहाटी हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि गृह मंत्रालय के प्रस्ताव में दिल्ली स्पेशल पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 1946 के प्रावधानों का कोई हवाला नहीं दिया गया, जो सीबीआई के अधिकार का स्रोत है । इसलिए सीबीआई का गठन कानून सम्मत नहीं कहा जा सकता । जजों ने सीबीआई का गठन असंवैधानिक बताते हुए गठनवाले प्रस्ताव को निरस्त कर दिया और कहा कि यह कानूनी आधार नहीं बनता । गुवाहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि यह प्रस्ताव न तो संसद से पारित है न ही अभी तक इस पर राष्ट्रपति की मुहर है, इसलिए सीबीआई गठन को भारत सरकार का निर्णय नहीं माना जा सकता ।

केंद्र सरकार ने अफरातफरी में तुरंत गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी । सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस पी. सदाशिवम ने कोर्ट का समय समाप्त होने के बाद वैसी ही अफरातफरी में अपने कृष्ण मेनन मार्ग स्थित आवास पर सुनवाई की और तत्काल स्टे दे दिया । उसी स्टे पर जिस प्रकार कांग्रेस गठजोड़ सरकार सीबीआई का राजनीतिक इस्तेमाल कर रही थी ठीक उसी तरह भाजपा गठजोड़ सरकार कर रही है । आज तक किसी वकील या एनजीओ या सामाजिक कार्यकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में उस स्टे की सुनवाई के लिए याचिका दायर नहीं की । संविधान / कानून की दुहाई तो सब देते हैं । लेकिन किसी ने भी यह सवाल नहीं उठाया कि गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने के बाद उसे डंप क्यों रखा गया । नवंबर, 2013 की ये बात है और इस पांच साल में उस पर सुनवाई की कोई तारीख नहीं दी गयी, स्टे पर विचार ही नहीं किया गया । 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच में सीबीआई की संदिग्ध भूमिका के कारण सुप्रीम कोर्ट ने जांच की मानीटरिंग अपने हाथ में ले रखी थी । सुप्रीम कोर्ट ने ही सीबीआई को ‘सरकार की भाषा बोलनेवाला पिंजड़े में बंद तोता’ कहा । लेकिन इसके संवैधानिक / कानूनी भविष्य को अधर में ही लटका रहने दिया ।

1978 में गठित एल. पी. सिंह कमिटी ने सीबीआई का सेटअप बदलने का सुझाव दिया था । संसदीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट(1991-92) में सीबीआई के संचालन के लिए नया विधेयक लाने का परामर्श दिया । आज तक सब डंपिंग फाईल में ही है ।

सीबीआई के दोनों निदेशकों में ठनने और उसके अंदर की रिश्वतखोरी की जांच का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय सतर्कता आयोग(सीवीसी) को दिया । सीवीसी का गठन 2003 में संसद से पारित एक्ट के अंतर्गत हुआ है । सीवीसी ने भी उसी दिल्ली पुलिस इस्टैब्लिशमेंट एक्ट का हवाला देकर कहा कि इस कानून के पालन और उसकी निगरानी का अधिकार उसे प्राप्त है । सीवीसी ने दावा किया कि इस एक्ट के अनुच्छेद 4(1) और 8(1) का हवाला देते हुए सीबीआई निदेशकों के कामकाज और जांच प्रक्रिया की निगरानी का अधिकार हासिल है ।

भ्रांति के अंदर भ्रांति और उलझन के अंदर उलझन से आम जनता को दिग्भ्रमित करनेवाले ये पचड़े सरकारों की नजर में कानून सम्मत हैं । उससे भी अचरज की बात है लोकपाल एक्ट का प्रावधान, जो इसी संवैधानिक पचड़े में समाया है । लोकपाल गठन तो अभी तक नहीं हुआ, जबकि जनवरी, 2014 में ही इस बिल को राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी। कब होगा, वर्तमान भाजपा गठजोड़ सरकार के पांच साल का कार्यकाल अगले साल समाप्त होने तक होगा भी या नहीं, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता । लेकिन लोकपाल एक्ट के प्रावधान के अनुसार लोकपाल भ्रष्टाचार के मामले सीवीसी के पास भेजेगा और सीवीसी के निर्देश पर सीबीआई उसकी जांच करेगा । यह संवैधानिक / कानूनी व्यवस्था आम मतदाता की समझ से बाहर है । सीबीआई निदेशक की नियुक्ति में सरकार की दखलंदाजी कम करने के लिए 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने ही चयन समिति बनाने के निर्देश दिए । जिस समिति को नामों के चयन का अधिकार दिया गया उसके अध्यक्ष सीवीसी होंगे । सीबीआई के कानूनी अधिकार पर तलवार लटक रही है ।

पश्चिम बंगाल और उसके बाद आंध्र प्रदेश सरकार ने जो सीबीआई के अपने यहां प्रवेश पर अभी रोक लगाया है, यह संविधान के मूलभूत संघीय ढांचे पर खतरा है । दिल्ली हाईकोर्ट ने किस आधार पर सीबीआई को अधिकार दे दिया कि इन दोनों राज्यों में अभी भी किसी की जांच कर सकती है, यह गोलमटोल है ।

दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को हाल ही में दिया । लेकिन दागियों के मामले की जांच करनेवाली एजेंसी सीबीआई स्टे पर ही चल रही है। शीर्ष कोर्ट ने इसका अलग से कानून बनाने का निर्देश देना जरूरी नहीं समझा ।

सीबीआई के साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक(आरबीआई) एक्ट भी विवाद के घेरे में है । आरबीआई एक्ट की धारा-7 का पहली बार इस्तेमाल करके सरकार ने केंद्रीय बैंक को वैसा करने कहा है, जो सरकार चाहती है । लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि सीबीआई को स्वायत्तता देनेवाला एक्ट क्या है और उसी एक्ट की धारा का इस्तेमाल करके सरकार अपने अनुसार चलने का निर्देश ‘जनहित’ में कैसे बता रही है ।

केंद्र सरकार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से क्लियरेंस लेकर सीबीआई एक्ट के तहत प्राप्त विशेषाधिकार का इस्तेमाल किया । लेकिन जब दागियों के मुकदमे में फंसे होने और जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने / सदस्य बने रहने के विशेषाधिकार वाली जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8(4) को 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया तो उस पर रोक लगाने के लिए अध्यादेश लाने में सभी दल एकमत थे । शुक्र है, संविधान के संरक्षक तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का, जो इसपर सहमत नहीं हुए ।

अभी जम्मू व कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक द्वारा विधान सभा भंग किये जाने पर भी संवैधानिक बखेड़ा खड़ा हो गया है । भाजपा विरोधी सभी पार्टियां इसे असंवैधानिक बताकर कश्मीर के विशेष दर्जे वाली धारा 370 और 35ए से जोड़ रही हैं, जो पहले से विवादित है । भाजपा ने राज्यपाल के कदम को संवैधानिक बताया है ।

आर्म्स फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट, 1959 बनने के समय से ही विवाद के घेरे में है । इस पर भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है । किसी क्षेत्र को उपद्रवग्रस्त घोषित करने के बाद से इस एक्ट के अंतर्गत सेना और अर्द्धसैनिक बलों को उपद्रव शांत करने के नाम पर कानून सम्मत तनाव पैदा करने का अधिकार मिल जाता है ।