भारत के प्रधान न्यायाधीश बी. आर. गवई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने धर्मान्तरण रोकने के लिए कानून लागू करनेवाले राज्यों से पूछा है कि कौन बताएगा धर्मान्तरण धोखा से हुआ या कराया गया ।
धर्मान्तरण पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने की होड़ के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को नोटिस जारी करके इस पर सवाल का जवाब मांगा है ।
धोखाधड़ी से धर्म परिवर्तन के खिलाफ बने कानूनों के साथ-साथ धर्मान्तरण पर भी रोक लगानेवाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने यह जानना चाहा है, कि आखिर कौन तय करेगा कि धर्मान्तरण वाली शादी झांसा देकर धोखे से हुई ।
इन याचिकाओं में राज्यों द्वारा लागू किए गए ऐसे कानूनों की संवैधानिक वैधता को शीर्ष कोर्ट में चुनौती दी गयी है । याचिका लगानेवालों में तीस्ता सीतलवाड़ संचालित पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज(पीयूसीएल) भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की महिला शाखा- नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन वीमेन और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द हैं । इन याचिकाओं में राज्य सरकारों द्वारा बनाए गए कानूनों में धर्मान्तरण के मामले में मुख्य रूप से वैसी शादी करनेवालों के खिलाफ कड़े प्रावधानों के आरोप लगाए गए हैं, जिन्होंने शादी से पहले या शादी के बाद धर्म बदला है । इन कानूनों को इस तरह से लागू किया गया है, ताकि धर्मान्तरण की हर सारी धोखाधड़ी से या जबरन शादी का मामला बने और जोड़ों को जुर्माने तथा जेल का भागीदार बनना पड़े ।
धर्मान्तरण विरोधी कानून राज्यों में ज्यादातर भाजपा शासित हैं, जिनके कारण यह विवाद विभिन्न हाईकोर्टों से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा । चीफ जस्टिस बी. आर. गवई और जस्टिस के. वी. विनोद चंद्रन की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने ऐसे 10 राज्यों को नोटिस भेजकर अक्टूबर मध्य तक जवाब देने कहा है, जिन्होंने धर्मान्तरण विरोधी कानून ‘धर्म की आजादी एक्ट’ नाम देकर बनाया है । कड़े से कड़े प्रावधान जोड़ने में भाजपा शासित राज्यों में ही आपस में प्रतिस्पर्धा चल रही है । भाजपा शासित राज्यों की संख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए धर्मान्तरण-विरोधी कानून भी बढ़ रहे हैं ।
धर्मान्तरण विरोधी कानून बनानेवाले राज्य हैं: उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, ओडिशा, उत्तराखंड, महाराष्ट्र(अभी भाजपा शासित), झारखंड, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश । ‘धर्म की आजादी एक्ट’ नामवाले इन कानूनों में धमकी, प्रलोभन, धोखाधड़ी और किसी के प्रभाव में हुए धर्मान्तरण को रोकने के प्रावधान जोड़े गये हैं । अब इन राज्यों को सुप्रीम कोर्ट में बताना है कि आखिर कैसे पता चलेगा और कौन तय करेगा कि अमुक धर्मान्तरण धोखाधड़ी या उपरोक्त तरीकों के जरिए हुआ । ऐसे कानूनों पर रोक लगाने वाली अर्जियों की ओर से सीनियर एडवोकेट सी. यू. सिंह ने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देकर सुप्रीम कोर्ट को बताया कि इन कानूनों में इतने कड़े प्रावधान किए गए हैं कि किसी को जमानत मिलना भी कठिन है । उत्तर प्रदेश ने धर्मान्तरण-विरोधी कानून में किए गए हालिया संशोधन में इस कानून के तहत अभियुक्त के लिए न्यूनतम 20 साल जेल का प्रावधान कर दिया है ।
धर्मान्तरण विरोधी कानूनों पर रोक वाली याचिकाओं के साथ एक अर्जी वकील-सह-याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने यह कहकर लगायी कि उनकी याचिका प्रलोभन या धोखाधड़ी से धर्मान्तरण के खिलाफ है । उन्होंने संविधान की धारा-25 का हवाला देकर शीर्ष कोर्ट में कहा कि इस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी को भी अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार है, मगर धोखाधड़ी से या जबरन धर्मान्तरण का अधिकार है ।
इसी दलील पर सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस ने पूछा, ‘मगर कौन यह पता लगाएगा कि धर्मान्तरण धोखे से हुआ या जबरन।’ धर्मान्तरण-विरोधी कानूनों पर स्टे की मांगवाली याचिकाओं के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में पेश वकील इंदिरा जयसिंग और वृन्दा गोवर ने इस बात पर बल दिया कि ‘धर्म की आजादी एक्ट’ नामवाले कानूनों में राज्य सरकारों ने धर्म की आजादी खतम करनेवाले प्रावधान किए हैं । इन दोनों वकीलों ने राजस्थान का जिक्र किया जिसने धर्मान्तरण-विरोधी कानूनों में साथी भाजपा समेत अन्य सभी राज्य सरकारों को पछाड़कर कड़े प्रावधान का नया इतिहास बना दिया । राजस्थान विधान सभा ने हाल में एक धर्मान्तरण-विरोधी बिल पास किया, जिसमें एक करोड़ रुपया तक जुर्माना और उम्र कैद का प्रावधान है । गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेधाम ने बिल के समर्थन में कहा कि इससे समाज में ‘शांति और सद्भाव’ बनाए रखने में सहूलियत होगी । बिल में एक प्रावधान यह भी जोड़ा गया कि जो अपने ‘पूर्वज धर्म’ में वापस लौटते हैं, वे इस कानून के दायरे में नहीं आएंगे । राजस्थान ने उत्तर प्रदेश सरकार को पछाड़ दिया, जहां से धर्मान्तरण विरोधी कानूनों को लेकर विवाद समाज के बीच से निकलकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा । अभी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध होने का कारण राजस्थान प्रतीत होता है । राजस्थान सरकार के कानून में यह भी प्रावधान है कि सामूहिक धर्मान्तरण के मामले में सारी चल-अचल संपत्ति जब्त की जाएगी और गिरा दी जाएगी । 09 सितंबर को राजस्थान विधान सभा ने यह बिल पास किया और 16 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में धर्मान्तरण विरोधी कानूनों पर सुनवाई हुई । राजस्थान सरकार ने फरवरी में ऐसा बिल पेश किया, पर जब लगा कि प्रावधान कड़े नहीं हैं तो फिर नया बिल लाया गया । उसी समय मार्च के पहले सप्ताह में महाराष्ट्र विधान सभा में भी अलग-अलग धर्मवालों के बीच धर्मान्तरण से जुड़ी शादी को ‘जबरन धर्मान्तरण’ कहकर इसे रोकने का बिल पेश हुआ । 2006 में राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने धर्मान्तरण-विरोधी कानून बनाया, जिसका कांग्रेस, मानवाधिकारी और अल्पसंख्यक संगठनों ने विरोध किया । तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने वो बिल लौटा दिया । उसके बाद संशोधन करके राष्ट्रपति भवन भेजा गया बिल भी 2008 में केंद्र के पास अटका रह गया । उस वक्त केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्ववाली गठजोड़ सरकार थी । अभी सारी स्थितियां अनुकूल हैं । धर्मान्तरण-विरोधी कानूनों में तेजी दरअसल 2020 से आयी है, जब राज्यों में धड़ाधड़ भाजपा के सत्ता में आने और सत्ता बरकरार रहने का सिलसिला बढ़ा । इसके विषय में विस्तृत ब्योरा से पहले यह देखें कि किस प्रकार अभी अर्थात् 2025 के दशहरा में धार्मिक और सामाजिक सद्भाव का माहौल बिगड़ा । धर्मान्तरण-विरोधी कानूनों की चर्चा के थोड़ा बहुत असर से इन्कार नहीं किया जा सकता । 16 सितंबर को धर्मान्तरण विरोधी कानूनों की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने मैसूरू दशहरा से संबंधित एक याचिका पर संविधान के प्रस्तावना और धर्मनिरपेक्षता का हवाला दिया । कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने बूकर पुरस्कार विजेता लेखिका बाबू मुश्ताक को ऐतिहासिक मैसूरू दशहरा उत्सव के उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया । इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करनेवाले ने यह दलील दी कि चामुंडेश्वरी मंदिर में दशहरा महोत्सव का उद्घाटन और गर्भगृह में दीप प्रज्वलित करना पूरी तरह हिन्दू धार्मिक तथा आध्यात्मिक कार्य है । याचिकाकर्ता के वकील ने एक मुस्लिम महिला बाबू मुश्ताक को ऐसे उत्सव के लिए न्योता कर्नाटक सरकार का राजनीतिक काम बताया । वकील पी. बी. सुरेश ने संविधान की धारा-25 का हवाला देकर इस परंपरागत पूजा का उद्घाटन किसी हिन्दू द्वारा किए जाने की गुहार सुप्रीम कोर्ट में लगायी । सुप्रीम कोर्ट जज विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि संविधान में प्रस्तावना की बुनियादी विशेषता धर्मनिरपेक्षता के केंद्र में राष्ट्रीय एकता के लिए आस्था, समानता और भाईचारा संविधान का आदर्श है । कर्नाटक सरकार धर्मनिरपेक्ष है जो इस अवधारणा को कायम रखे है कि उसका अपना कोई धर्म नहीं है’ । 22 सितंबर को लेखिका बाबू मुश्ताक ने मैसूरू दशहरा उत्सव का विधिवत् उद्घाटन किया । लेकिन उसके पहले 20 सितंबर को पड़ोसी महाराष्ट्र से दशहरे का ही अप्रिय समाचार आया । विश्व हिन्दू परिषद ने एक एडवाइजरी जारी की, जिसमें कहा गया कि राज्य में गरबा समारोहों में प्रवेश की इजाजत सिर्फ हिन्दुओं को दी जाएगी । उसमें माहौल बिगाड़ने वाला प्वाइंट यह था कि इसके लिए विश्व हिन्दू परिषद आधार कार्ड की पहचान करेगी । संगठन के प्रवक्ता शिराज नायर ने कहा कि गरबा नृत्य या मनोरंजन नहीं, पूजा है । इसलिए विहिप और बजरंग दल के कार्यकर्ता मॉनिटर करेंगे कि प्रवेशकर्ताओं ने पूजा किया, जिसके बाद उन्हें तिलक लगाएंगे । महाराष्ट्र के राजस्व मंत्री चन्द्रशेखर बवानकुले ने इस एडवाइजरी का समर्थन किया है । धर्मान्तरण-विरोधी कानूनों को विवाद की सुर्खियों की शुरूआत 2020 में उत्तर प्रदेश से हुई, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक अध्यादेश जारी करके ‘प्रलोभन’ देकर या ‘जबरन’ धर्मान्तरण शादी(विवाह) को गैरजमानती अपराध घोषित कर दिया । ऐसा पहला धर्मान्तरण अध्यादेश था, जिसमें जमानत का प्रावधान गोल कर दिया गया । इसके अनुसार धर्मान्तरण के लिए शादी अमान्य होगी और सामूहिक धर्मान्तरण पर तीन से 10 वर्ष की कैद तथा 50,000 जुर्माना लागू किया गया । इस अध्यादेश का विवाद पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट में देखने को मिला, जब नवंबर, 2020 में लागू होते ही हाईकोर्ट के अलग-अलग फैसले आए । 24 नवंबर, 2020 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम युवक सलामत अंसारी के खिलाफ एफ आई आर रद्द कर दिया, जिस पर एक हिन्दू युवती प्रियंका खरवार(आलिया) का कथित अपहरण करके शादी करने का मामला दर्ज किया गया था । हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दो बालिग अपना जीवन साथी चुनने को स्वतंत्र हैं । संविधान की धारा-25 में हर बालिग नागरिक को अपनी मर्जी से धर्म अपनाने/चुनने की आजादी है । उसी समय दिल्ली हाईकोर्ट ने शाहजहांपुर(यूपी) निवासी हिन्दू महिला को उचित सुरक्षा प्रदान करने का निर्देश दिल्ली पुलिस को दिया । फिर जून, 2021 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ही अपने एक आदेश में कहा कि धर्म बदलकर शादी करनेवाले बालिगों को सुरक्षा देने में धर्मान्तरण कानून महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है । दो बालिग धर्मान्तरण करके अपनी मर्जी से शादी कर रहे हैं या बिना शादी के ही साथ रह रहे हैं, तो भी पुलिस को प्रमाण के लिए बाध्य करना चाहिए । लेकिन फिर उसी हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम महिला के हिन्दू धर्म अपनाकर हिन्दू रीति-रिवाज से विवाह के मामले में कहा, ‘शादी के लिए धर्मान्तरण स्वीकार्य नहीं है।’ धर्मान्तरण कानून इस अवधारणा को ध्यान में रखकर बनाया गया है कि कोई धर्मान्तरण मर्जी से नहीं होता, कराया जाता है । चाहे तो शादी के लिए हो या न हो । इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि कौन पता लगाएगा कि वास्तव में धर्मान्तरण हुआ कैसे। खासकर शादी वाले धर्मान्तरण पर कानून के डंडे से समाज में दहशत है, लगभग अराजक स्थिति है । राजस्थान सरकार ने भी धारा-25 का हवाला दिया है । 2024 आनेतक धर्मान्तरण लागू होने का दंश झेल रहे लोगों की अर्जियां विभिन्न हाईकोर्टों में इतनी जमा हो गयीं कि सुप्रीम कोर्ट को सारे मामले अपने पास मंगवाने पड़े ताकि एक ही जगह सुनवाई हो । ऐसी अर्जी 2023 में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में लगायी, जो गुजरात सरकार द्वारा पास कानून के खिलाफ दायर याचिकाकर्ता की ओर से पेश हुए थे । गुजरात सरकार ने 2021 में ऐसा ‘धर्म की आजादी एक्ट’ बनाया जिसमें दो बालिगों की धर्मान्तरण शादी के खिलाफ उनके परिवारजनों को भी पुलिस और कोर्ट जाने का प्रावधान कर दिया । गुजरात हाईकोर्ट ने यह कहकर स्टे दे दिया किया यह किसी के अपनी मर्जी से जीवन साथी चुनने के अधिकार पर हमला है । गुजरात सरकार उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गयी । ऐसी शादी में परिवारजनों को दरकिनार करके अपनी मर्जी से निर्णय लेनेवाली दो लड़कियों की दास्तान देखिए । केरल के हिन्दू परिवार में जन्मी हादिया ने एक मुस्लिम शोफिर जहान से शादी करके इस्लाम धर्म अपना लिया । फिर कुछ दिन बाद हादिया शोफिर से अलग होकर दूसरी शादी मुस्लिम से ही करके नए शौहर के साथ रहने लगी और उसके विषय में सारी जानकारी गुप्त रखी । हादिया के माता-पिता ने केरल हाईकोर्ट में बेटी के लापता होने की अर्जी लगायी । उसके जवाब में हादिया ने पिता की चिंता पर ही सवाल उठाते हुए कहा, ‘मैं कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं करना चाहती ।’ यह वाकया दिसंबर, 2023 का है । वाममोर्चा शासित केरल में हादिया महीनों तक पुलिस सुरक्षा में रही । उसके पहले 2017 की लद्दाख की ऐसी एक घटना है । लद्दाख के लेह में बौद्ध लोगों की आबादी ज्यादा है और कारगिल में मुस्लिम समुदाय की । एक बौद्ध महिला ने इस्लाम धर्म अपनाकर कारगिल के मुस्लिम युवक से शादी कर ली । लद्दाख बौद्ध संघ(एलबीए) ने इस पर धर्मान्तरण का संदेह जताया तो दोनों ने गुप्त शादी रचायी । एलबीए ने पहले तो विरोध में लेह बंद आयोजित किया और वहां के मुस्लिम वाशिदों को अन्यत्र जाने कहा ।
परिवारजनों ने लड़की के लापता होने का मामला बनाया, जिसके जवाब में उस लड़की को सुरक्षा देनेवाली जम्मू की महिला पुलिस अधिकारी ने कहा, ‘वो परिवारजनों से बात नहीं करना चाहती ।’ लद्दाख बौद्ध संघ ने माना कि धारा-25 इसकी आजादी देता है और साथ में यह भी कहा कि पिछले 25 वर्षों में बौद्ध महिलाओं के इस्लाम धर्म अपनाने के 90 मामले आए ।
2017 में जम्मू व कश्मीर में महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व में गठबंधन सरकार थी, जिसमें भाजपा भी शामिल थी 2017 में ही उत्तर प्रदेश में पहली बार मुख्यमंत्री बने योगी आदित्यनाथ और 2022 में उनके दोबारा सत्ता में आने तक भाजपा शासित राज्यों में धर्मान्तरण विरोधी कानूनों की झड़ी लग गयी । सियासी राजनीति के लिए सामाजिक जनभावना को तोड़-मरोड़ में इलाहाबाद हाईकोर्ट भी 2024 में आ गया । जुलाई, 2024 में जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने एक धार्मिक सभा में कथित धर्मान्तरण के मामले में जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा, ‘धर्मान्तरण नहीं रोका तो बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यक हो जाएगी ।’ सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने सितंबर, 2024 में उस टिप्पणी को हटाते हुए कहा, ‘ऐसी टिप्पणी की जरूरत नहीं थी ।’
2023 में सुप्रीम कोर्ट के पास एससी एसटी(दलित) समुदाय के ऐसे लोगों का मामला पहुंचा, जो इसाई धर्म अपनाने के बावजूद एससी एसटी वाले आरक्षण का लाभ जारी रखना चाहते थे । विवाद तमिलनाडु सरकार द्वारा विधानसभा में पेश एक प्रस्ताव के कारण पैदा हुआ, जो इसाई बने दलितों को आरक्षण के दायरे में लाने के लिए था ।
धर्मान्तरण कानूनों में निशाने पर तो मुस्लिम और इसाई हैं । अगस्त, 2024 में यूपी के बरेली में दो युवकों के घर से बाइबिल बरामद होने का मामला पुलिस ने धर्मान्तरण कानून के तहत दर्ज कर लिया । कोर्ट ने दोनों को इस आरोप से बरी करके एफ आई आर दर्ज करनेवाले पुलिस अधिकारी और शिकायतकर्ता पर धर्मान्तरण कानून के दुरुपयोग की कार्रवाई का आदेश दिया ।
अभी सितंबर, 2025 में सुप्रीम कोर्ट में धर्मान्तरण पर सुनवाई के समय रायपुर से भी एक बाइबिल वाला मामला आया । बिलासपुर में 150 इसाइयों ने एक जगह प्रार्थना के लिए जुटकर कथित रूप से बाइबिल बांटने को लेकर आसपास तनाव हो गया । कुछ लोगों ने इसे धर्मान्तरण का प्रयास बताकर बजरंग दल कार्यकर्ताओं को बुला लिया । झड़प में 13 लोग घायल हो गए । पुलिस ने तीन अलग-अलग मामले दर्ज किए ।