असम के बाद दूसरा सबसे बड़ा राज्य बंगाल है, जहां बांग्लादेशी घुसपैठियों के चलते आबादी के साथ-साथ राजनीतिक संतुलन भी बिगड़ा हुआ है । वैसे तो पहले से ही भाजपा बंगाल में नागरिक रजिस्टर तैयार करने पर जोर दे रही है । लेकिन 31 अगस्त को असम में एनआरसी प्रकाशित होने के बाद पूर्वोत्तर से भी ज्यादा घमासान पश्चिम बंगाल में छिड़ गया । 6 सितंबर को पश्चिम बंगाल विधान सभा में नियम 185 के अंतर्गत इस पर बहस कराने की नौबत आ गयी । बहस का जवाब देते हुए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कह दिया कि वे किसी भी कीमत पर बंगाल में एनआरसी लागू करने की इजाजत नहीं देंगी । मुख्यमंत्री ने कहा कि ‘हम भाजपा की यह योजना कामयाब नहीं होने देंगे ।’
उसके चार दिन बाद 10 सितंबर को केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कोलकाता पहुंचकर ममता बनर्जी के विरोध का विरोध किया कि भाजपा देश के हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है ।
उसी दिन यानी कि 10 सितंबर को ही मेघालय विधान सभा में एनआरसी बहस के दौरान पारिवारिक संतुलन बिगड़ने वाले मुद्दे उठाए जाने की खबर आयी । पूर्व मुख्यमंत्री मुकुल संगमा ने सवाल उठाया कि फाइनल एनआरसी में अन्य राज्यों से आयी सारी दुल्हनों का नाम हट गया । विधान सभा में विपक्ष के नेता मुकुल संगमा ने कहा कि सबसे ज्यादा दुखद स्थिति ये है कि भारत के असली नागरिकों का ही नाम गोल है । पश्चिम बंगाल, नगालैंड, बिहार, मेघालय में जन्मी दुल्हनों का नाम एनआरसी में नहीं है ।
उसके दो दिन पहले 8 और 9 सितंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह नॉर्थ इस्ट काउंसिल(एनईसी) में 68वें सम्मेलन में भाग लेने गुवाहाटी पहुंचे । पूर्वोत्तर की क्षेत्रीय पार्टियों को मिलाकर भाजपा के नेतृत्व में बनाए गए नॉर्थ इस्ट डेमोक्रेटिक काउंसिल(नेडा) का भी चौथा सम्मेलन उसी समय आयोजित था । अमित शाह गए तो थे पूर्वोत्तर के लोगों को यह आश्वस्त करने कि कश्मीर से 370 और 35-ए समाप्त किए जाने से उत्तर पूर्व को चिंतित होने की जरूरत नहीं है । केंद्रीय गृह मंत्री ने नॉर्थ इस्ट काउंसिल सम्मेलन में जुटे सभी मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों को आश्वासन दिया कि धारा 371 के । से लेकर श्र तक नगालैंड समेत पूर्वोत्तर राज्यों को प्राप्त विशेष दर्जा के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं होगी ।
लेकिन वास्तविकता ये थी कि पूर्वोत्तर राज्यों की चिंता का यह विषय ही नहीं था । सारे मुख्यमंत्री एनआरसी को लेकर चल रहे झमेले का समाधान चाहते थे । सबसे ज्यादा असंतोष असम की भाजपा यूनिट ने व्यक्त किया । प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रंजीत दास ने इस संबंध में अमित शाह को एक ज्ञापन सौंपा । अमित शाह गृहमंत्री के साथ-साथ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं । ज्ञापन सौंपने के बाद रंजीत दास ने संवाददाताओं से कहा - ‘फानइल एनआरसी सूची में 19 लाख लोगों का नाम नहीं है, जिनमें असली नागरिक ज्यादा हैं और कई अवैध विदेशी घुसपैठियों का नाम शामिल है । गृहमंत्री और पार्टी अध्यक्ष को हमने अपने असंतोष से अवगत करा दिया है । हम इसलिए भी चिंतित हैं कि गोरखों का नाम हटा दिया गया है और ऐसे लोग भी हैं जिनके पूर्वजों के मुहाजिर दस्तावेज अस्वीकार कर दिये गये । ज्ञापन के अनुसार विदेशी घोषित होने की आशंका वाले मूल बंगाल के असमिया मुसलमान और असम में रह रहे बंगाली हिन्दू हैं ।
असम क एनआरसी कोऑर्डिनेटर कार्यालय से जारी नोट के अनुसार जिनके नाम शामिल नहीं हुए हैं, उन्हें सर्टिफाईड कॉपी दी जाएगी ताकि वे फिर से अपील कर सकें । इसका निदान निकट भविष्य में निकलने के आसार नहीं हैं । क्योंकि 31 अगस्त से पहले प्रकाशित एनआरसी सूचियों में भी यही समस्या सामने आयी । 26 जून को इसका मसौदा छपा, फिर 5 जुलाई को छपा । सीधे सुप्रीम कोर्ट की मानीटरिंग में चल रहे काम के बावजूद असंतोष बरकरार रहा । लोग अपील करते रहे और 31 अगस्त को अंतिम सूची के बाद भी जारी है ।
जिन असली नागरिकों का नाम हटा है, उसका तार बंगाल से जुड़ा है । उनमें बंगाली मुसलमान से ज्यादा हिन्दू हैं और गोरखा भी हैं । भाजपा को इसी बिंदु पर ममता बनर्जी ने आड़े हाथों लिया है । यह बात गत हफ्ते तृणमूल कांग्रेस और भाजपा की रैलियों में खुलकर सामने आयी । भाजपा के केंद्रीय नेता एक ओर तो बार-बार कह रहे हैं कि एनआरसी सुप्रीम कोर्ट के आदेश और निगरानी में तैयार हुई है, भाजपा का इससे कोई लेना देना नहीं है । दूसरी ओर एनआरसी के एकमात्र राज्य असम में लागू होने से पैदा हुए असंतोष से बेखबर अन्य भाजपा शासित ऐसे राज्यों के मुख्यमंत्री एनआरसी लागू करने को बेताब हैं, जहां असम और बंगाल जैसी समस्या नहीं है । हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर एनआरसी लागू करना चाहते हैं । उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी कहा कि जरूरत पड़ी तो एनआरसी लागू करेंगे ।
बिहार से भाजपा केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह एनआरसी लागू करना चाहते हैं । बंगाल में एनआरसी को लेकर भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के बीच मची रार सलटने के आसार नहीं लगते । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 18 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने दिल्ली पहुंची । समझा जाता है कि ममता बनर्जी और प्रधानमंत्री के बीच अन्य मुद्दों के अलावे एनआरसी पर भी चर्चा हुई । इसके पहले दोनों नेता 25 मई, 2018 को शांति निकेतन में मिले थे । अभी ऐसे समय में दीदी ने नरेंद्र मोदी से मुलाकात की, जब बंगाल में राजनीतिक माहौल अशांत है । 14 सितंबर को संसदीय समितियों के गठन में तृणमूल कांग्रेस को महत्वपूर्ण मंत्रालय न दिए जाने के कारण पहले से ही तृणमूल सांसदों में नाराजगी थी ।
12 सितंबर को कोलकाता में दीदी और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष दिलीप घोस ने एक दूसरे पर सीधा हमला किया । दिलीप घोष ने कहा कि बंगाल में ‘अवांछित मुसलमानों’ के लिए कोई जगह नहीं है । भाजपा के अनुसार ऐस दो करोड़ लोगों का नाम हटाया जाना है । इसके जवाब में ममता बनर्जी ने कहा कि दो करोड़ तो क्या दो आदमी भी बंगाल से हटाने की कोशिश नहीं चलने दी जाएगी ।
एनआरसी का बंगाल में विरोध कांग्रेस, वाम दल भी कर रहे हैं । विधान सभा में विपक्षी नेता अब्दुल मन्नान और सीपीएम नेता मुहम्मद सलीम विभिन्न रैलियों में एनआरसी के खिलाफ बोले । सिलीगुड़ी में 14 सितंबर को आयोजित सीपीएम रैली में बांग्लादेशी कवि डॉ. समीम रजा ने भी बंगाल और बंगलाभाषियों पर एनआरसी के प्रभाव की निंदा की ।
ममता बनर्जी ने दावा किया कि फाइनल एनआरसी सूची से हटाए गए नाम में से 12 लाख हिंदू हैं । उन्होंने कहा कि बौद्ध और मुसलमानों को भी नही बख्शा गया। लेकिन गोरखों का नाम नहीं लिया ।
उत्तरी बंगाल और गोरखालैंड का एनआरसी चैप्टर शेष बंगाल से अलग है । इसका तार सीधा असम और पूर्वोत्तर से जुड़ा है । यह भाजपा का मामला इसलिए भी है कि दार्जीलिंग लोकसभा सीट से जीते राजू बिस्टा दार्जीलिंग के नहीं मणिपुर के हैं । ये गोरखालैंड आंदोलन पार्टी गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से भाजपा के टिकट पर जीते हैं । गोरखों का नाम फाइनल लिस्ट से हटने का जिक्र असम भाजपा यूनिट ने अमित शाह को सौंपे ज्ञापन में दिया है ।
राजू बिस्टा ने 11 सितंबर को गुवाहाटी जाकर असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल से मुलाकात की और गोरखों को ‘मूल वाशिंदे’ घोषित करने का आग्रह किया । बिस्टा के साथ गए प्रतिनिधि मंडल में दार्जीलिंग के भाजपा विधायक नीरज जिंबा भी थे । ये लोग उन गोरखा परिवारों से भी मिले, जिनके नाम हटाए गए हैं ।
उत्तरी बंगाल में कूचबेहार के संगठन एनआरसी के पक्ष में हैं । गोरखालैंड की तरह कूचबेहार का भी अलग राज्य और एनआरसी मुद्दा छिन्न-भिन्न है । कांग्रेस, वाम मोर्चा और तृणमूल कांग्रेस के बाद भाजपा के खेमे में भी गोरखालैंड डंप है । उसके बावजूद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा(जीजेएम) नेता बिमल गुरूंगा एनआरसी समर्थक हैं । अलग कूचबेहार और कामतापुर राज्य का आंदोलन भी पुराना है । ग्रेटर कूचबेहार पीपुल्स एसोसिएसन और कामतापुर पीपुल्स पार्टी के संयुक्त संगठन ने इसलिए एनआरसी का समर्थन किया है ताकि उत्तरी बंगाल में ऐसा अलग राज्य बने जिसमें बाहरी न हों । उसमें मालदा और असम के अविभाजित गोलपाड़ा जिले को छोड़कर सभी उत्तरी बंगाल जिले शामिल हों ।
जीजेएम के तृणमूल कांग्रेस सहयोगी विनय तमांग सितंबर के पहले सप्ताह से ही यह कहकर एनआरसी के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं कि करीब 1,63000 लोग फाइनल लिस्ट से हटा दिये गये जो असम के ‘मूल वाशिंदे’ थे । कूचबेहार में भी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा एनआरसी पर भिड़े हुए हैं ।