तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने इसाई बने दलितों को अनुसूचित जाति(एससी) के लिए आरक्षण के दायरे में लाने का प्रस्ताव विधान सभा में पेश कर दिया है । मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने यह प्रस्ताव सदन में रखते हुए कहा कि इसाई धर्म अपनाने वाले दलित आज भी छूआछूत और जातिगत जुल्म के शिकार बने हुए हैं । उन्होंने कहा कि द्रमुक सरकार द्वारा पहले भी ऐसी मांग उठायी गयी है । इस प्रस्ताव से दलित इसाईयों को भी बौद्ध और सिख धर्म ग्रहण करनेवालों की तरह आरक्षण का लाभ मिलना चाहिए ।

तमिलनाडु सरकार ने सिर्फ इसाई बने दलितों को एससी के लिए संविधान से प्राप्त आरक्षण का लाभ देने के लिए यह प्रस्ताव लाया है । इस सरकार को इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलित-हरिजन से कोई मतलब नहीं है । जबकि विवाद इसाई के साथ-साथ मुस्लिम बने दलितों को भी एससी समुदाय को प्राप्त आरक्षण का लाभ देने को लेकर है । इस संबंध में दायर कई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है । भाजपा शासित और गैर-भाजपा राज्य सरकारों ने अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत किया है । संघ परिवार को इसाई के साथ-साथ मुस्लिम बने दलितों को भी एससी वाला आरक्षण देने पर एतराज है ।

केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार का मानना है कि गैर-भाजपा शासित राज्य सरकारें और भाजपा विरोधी दल जबरन/प्रलोभन देकर दलित हिन्दुओं को इसाई, मुस्लिम बना रहे हैं । केंद्र की दलील है कि इस तरह धर्मान्तरण कराए गए दलितों को एससी वाला आरक्षण लाभ नहीं मिलना चाहिए । केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट को बता चुकी है कि धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए जस्टिस रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशें लागू करने के पक्ष में नहीं है, जिसमें इसाई तथा मुस्लिम बने दलितों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव दिया गया है ।

तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में इस पहलू पर विचार करने का आग्रह किया कि दलित इसाई और मुस्लिम एससी वाले आरक्षण के लाभ से वंचित न हों ।

यह मामला संवैधानिक या अदालती कम, राजनीतिक ज्यादा है, जिसने अभी तूल पकड़ा है । तमिलनाडु सरकार ने इसीलिए दलित इसाई को आरक्षण का लाभ देनेवाला प्रस्ताव विधानसभा में पेश कर दिया । क्योंकि सुप्रीम कोर्ट से बात बनी नहीं और भाजपा इसाई बहुल आबादी वाले केरल में अपना वोट बैंक बनाने के प्रयास में जुटी है । वहां इसाई समुदाय कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक है । दक्षिण भारतीय राज्यों में केरल और तमिलनाडु का रिश्ता हमेशा सगे भाइयों जैसा रहा है । इन दोनों राज्यों में गैर-भाजपा दलों की गहराई तक पकड़ ढीली करने में भाजपा के केंद्रीय नेताओं को सफलता नहीं मिल रही है ।

केरल के वाम मोर्चा मुख्यमंत्री पिनारायी विजयन और तमिलनाडु के द्रमुक मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन की हाल-फिलहाल विपक्षी एकता प्रयासों तथा अन्य बहाने भी कई मुलाकातें हुई हैं । इन दोनों कट्टर भाजपा विरोधियों में खूब छनती भी हैं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो दिनी(24-25 अप्रैल) केरल दौरे पर तिरुवनंतपुरम पहुंचने से पहले तमिलनाडु सरकार ने दलित इसाईयों के आरक्षण वाला प्रस्ताव सदन में रखा । प्रधानमंत्री के 2024 लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर तैयार केरल दौरे में विभिन्न विकास योजनाओं के शिलान्यास के अलावे रोड शो और चर्च पादरियों से मुलाकात का भी कार्यक्रम शामिल किया गया था ।

अभी भाजपा के निशाने पर वैसे मुस्लिम हैं, मगर आरक्षण वाले पहलू को लेकर विवाद के घेरे में इसाई भी हैं । जबरन/प्रलोभन देकर धर्मान्तरण के मसले पर तमिलनाडु सरकार की दलील पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी से भाजपा का राजनीतिक मंसूबा बढ़ा हुआ है ।

जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस सी. टी. रवि कुमार की सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने 09.01. 2023 को सुनवाई के दौरान राजनीतिक रंग सामने आया । तमिलनाडु सरकार के वकील पी. विल्सन को फटकार लगाते हुए शीर्ष कोर्ट जजों ने कहा, ‘धर्मान्तरण गंभीर मसला है, इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए । प्रलोभन, जबरन या धोखे से धर्मान्तरण बहुत गंभीर मामला है और यह पूरे देश के लिए चिंता का विषय है ।’

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने यह तल्ख टिप्पणी उस वक्त की, जब पी. विल्सन ने जजों को बताया कि इस संबंध में याचिका दायर करनेवाले वकील अश्विनी उपाध्याय ‘भाजपा के प्रवक्ता हैं, जिनके खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा चल रहा है और यह मुकदमा राजनीति से प्रेरित है ।’

वकील पी. विल्सन ने तमिलनाडु सरकार के पक्ष में दलील पेश करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय का आरोप गलत है कि तमिलनाडु में गैर-कानूनी धर्मान्तरण कराए जा रहे हैं । 2002 का धर्मान्तरण कानून तमिलनाडु में रद्द किया जा चुका है । संविधान के अनुसार धर्मान्तरण समवर्ती सूची के तहत राज्य का मामला है । यह मुद्दा विधान सभा पर छोड़ दें, हमारे राज्य में धर्मान्तरण का कोई खतरा नहीं है । अश्विनी उपाध्याय ने राजनीतिक मकसद से राज्य सरकार को एक पक्ष बनाया है । , उसके पहले 03.01.2023 को सुप्रीम कोर्ट की इसी पीठ ने भाजपा शासित मध्य प्रदेश की एक याचिका सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए कहा कि सारे धर्मान्तरण गैरकानूनी नहीं हो सकते । राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें जिलाधिकारी को दूसरे धर्म के विवाहित जोड़े के खिलाफ मुकदमा चलने से रोक दिया गया था । मध्य प्रदेश सरकार ने जिला मजिस्ट्रेटों को अधिकार दिया था कि शादी करनेवाले ऐसे जोड़े के खिलाफ मुकदमा चलाया जाए, जो धर्मान्तरण की लिखित सूचना न दे । दरअसल यह मामला किसी मुस्लिम युवक से हिंदू लड़की के धर्म बदलकर/बदलवाकर विवाह सूत्र में बंधने को लेकर सुर्खी में आया ।

ताजा विवाद मुख्य रूप से दलितों के धर्म बदलकर मुस्लिम और इसाई बनाने को लेकर उपजा है, ताकि उन्हें एससी के अंतर्गत नौकरी, शिक्षा तथा अन्य क्षेत्रों में मिलनेवाले आरक्षण का लाभ मिलता रहे ।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर केंद्र ने इस पर विचार करने के लिए पूर्व सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस के. जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता में अक्टूबर, 2022 में एक आयोग का गठन किया जो 2024 तक अपनी रिपोर्ट देगा । इसाई बने दलितों की संस्था नेशनल काउंसिल ऑफ दलित क्रिश्चियन्स की ओर से 2020 में दायर याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में आयोग गठित करने का निर्देश केंद्र को दिया । बालाकृष्णन आयोग को तय करना है कि हिन्दू, सिख और बौद्ध धर्म छोड़कर अन्य धर्म अपनाने वाले दलितों के अनुसूचित जाति दर्जे का क्या होगा ।

अभी केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मुस्लिमों के आरक्षण को चुनावी मुद्दा बनाया हुआ है । कर्नाटक विधान सभा चुनाव प्रचार के क्रम में उन्होंने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है । कांग्रेस सरकार ने कर्नाटक में मुसलमानों को चार प्रतिशत आरक्षण दिया था, जिसे भाजपा ने खतम कर दिया । हैदराबाद में अमित शाह ने कहा कि तेलंगाना में चुनाव जीते तो मुस्लिम आरक्षण खतम कर देंगे ।

मार्च, 2023 में संघ परिवार की जनसंचार शाखा विश्व संचार केंद्र ने दिल्ली में दो दिन का सम्मेलन आयोजित करके दलित इसाईयों और मुस्लिमों को आरक्षण मांग का विरोध किया । उस अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकारी अध्यक्ष अनिल अग्रवाल ने कहा कि अनुसूचित जाति आस्था का अनुच्छेद है, जो दर्जा धर्म बदलने वाले को नहीं दिया जा सकता ।

सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में अल्पसंख्यक दर्जा के अंतर्गत प्राप्त आरक्षण भी विवादित है । यह याचिका भी अश्विनी उपाध्याय ने ही दायर की, जिसमें जम्मू व कश्मीर में अल्पसंख्यक हिंदुओं समेत अन्य वैसे राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में रह रहे हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देने को लेकर है, जहां उनकी संख्या अन्य समुदायों से कम है । राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग(एनसीएम) के जरिए काफी दिनों तक चली फेंका-फेंकी के बाद आयोग की एक सदस्य सैयद शहजादी ने इस हफ्ते कह दिया, ‘हमारा रुख स्पष्ट है । अगर केंद्र सरकार जम्मू व कश्मीर में पंडित समेत हिंदुओं को अल्पसंख्यक दर्जा देना चाहती है, संसद कानून बनाती है तो हमें उससे कोई लेना-देना नहीं, हमारे पास इस संबंध में अधिकार नहीं । संसद कानून बनाए और सुप्रीम कोर्ट निर्णय ले’ ।

बौद्धों के पहले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर कहा कि बुद्ध ने उपदेश में युद्ध का समाधान है । 20/04 को दिल्ली में हुए इस सम्मेलन के चार दिन बाद प्रधानमंत्री केरल पहुंचे । बौद्ध भी खुद को हिन्दुओं से अलग मानते हैं, फिर भी भाजपा को बौद्ध दलितों के आरक्षण पर आपत्ति नहीं है ।

अभी इसाई समुदाय की नाराजगी का कारण एक और विवाद है, जो 20 अप्रैल को ही राष्ट्रपति भवन के सूत्रों से बाहर आया । इसाई नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने गया और उन्हें इसाई समुदाय पर हो रहे हमले के संबंध में ज्ञापन दिया । दिल्ली के इसाई समुदाय ने एक प्रेस विज्ञप्ति जारी करके कहा कि. ‘राष्ट्रपति ने 1999 में ओडिशा में इसाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और दो बच्चों की निर्मम हत्या को याद करके दुख जताया और कहा कि पड़ोसी होने के बावजूद मैं इसे रोक नहीं पायी । इसाईयों पर हमले की रिपोर्ट पढ़ी है’ । राष्ट्रपति भवन ने इस विज्ञप्ति पर एतराज किया ।