यह लेख मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता की आवश्यकता पर केंद्रित है। इसमें संसद में पेश किए गए प्राइवेट मेम्बर बिलों और सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई का उल्लेख है, जो नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र चयन समिति के गठन की मांग करते हैं। लेख न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच टकराव और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सरकारी प्रभाव के आरोपों पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने की संभावना पर केंद्रित है, जिसे चुनाव आयोग के लिए एक बड़ी चुनौती बताया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ओ.पी. रावत ने स्पष्ट किया है कि संवैधानिक संशोधन और पर्याप्त वीवीपीएटी मशीनों के बिना यह संभव नहीं है। भाजपा सरकार इस पर दबाव बना रही है, जबकि विपक्षी दल इसे असंवैधानिक और अव्यावहारिक मानते हैं, और ईवीएम छेड़छाड़ के मुद्दे पर भी चिंता व्यक्त कर रहे हैं।
यह लेख राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों पर केंद्रित है। इसमें बताया गया है कि कैसे राजनीतिक दल दागियों को टिकट देने से नहीं रुकते, जबकि आयोग और कोर्ट बार-बार इस पर रोक लगाने की गुहार लगाते हैं। लेखक प्रधानमंत्री मोदी की 'मन की बात' पर भी सवाल उठाता है कि उसमें इस महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे को क्यों नहीं उठाया गया।
यह लेख चुनाव आयोग की उस लाचारी पर प्रकाश डालता है जिसमें वह दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को इस संबंध में 'तार्किक आदेश' जारी करने का निर्देश दिया है, जबकि चुनाव आयोग का मानना है कि यह अधिकार उसके पास नहीं है और इसके लिए जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता है। राजनीतिक दल इस मुद्दे पर कानून बनाने से बचते रहे हैं, जिससे राजनीति का अपराधीकरण जारी है।
यह लेख पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग की भूमिका पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की आपत्तियों का विश्लेषण करता है। माकपा ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर काम कर रहा है और उन क्षेत्रों को निशाना बना रहा है जहां वाम मोर्चा का वोट अधिक है। लेख में चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता और राजनीतिक दलों द्वारा अपने स्वार्थ के लिए उस पर सवाल उठाने की प्रवृत्ति पर प्रकाश डाला गया है, साथ ही चुनावी सुधारों और राजनीतिक अपराधों से संबंधित चुनौतियों पर भी चर्चा की गई है।
पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ने चुनाव आयोग पर तृणमूल कांग्रेस के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया है। माकपा का कहना है कि आयोग वाम मोर्चा के गढ़ों को निशाना बना रहा है और उसके शीर्ष अधिकारियों के बार-बार दौरे दलीय राजनीति से प्रेरित हैं। लेख में अन्य राज्यों के उदाहरणों के साथ माकपा के आरोपों की पड़ताल की गई है और चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता पर जोर दिया गया है।
चुनाव आयोग बिहार विधानसभा चुनाव को कोरोना और बाढ़ संकट के बीच कराने को लेकर राजनीतिक दलों से सुझाव मांग रहा है। जद(यू) और भाजपा चुनाव के पक्ष में हैं, जबकि राजद, लोजपा और अन्य विपक्षी दल इसे टालने की मांग कर रहे हैं। आयोग को डिजिटल प्रचार, दागी उम्मीदवारों और संवैधानिक संकट जैसे कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
यह लेख बिहार विधानसभा चुनाव के संदर्भ में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों द्वारा अपने दागी रिकॉर्ड का प्रचार न करने पर चुनाव आयोग की कार्रवाई पर केंद्रित है। यह बताता है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद, राजनीतिक दल और उम्मीदवार इन आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं, और चुनाव आयोग के पास ऐसे उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने का अधिकार नहीं है। लेख इस बात पर जोर देता है कि कानून बनाने की जिम्मेदारी संसद की है, लेकिन सरकार और पार्टियां दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए कानून बनाने से कतरा रही हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने दागी सांसदों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों को तेजी से निपटाने और राज्य सरकारों द्वारा हाईकोर्ट की अनुमति के बिना मुकदमे वापस लेने पर रोक लगाने के लिए कड़े निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के आपराधिक रिकॉर्ड का खुलासा करने की समय-सीमा भी 48 घंटे कर दी है। यह लेख राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में न्यायपालिका के प्रयासों और राजनीतिक दलों व सरकारों की अनिच्छा को उजागर करता है।
यह लेख 17वीं लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका और आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन से जुड़े विवादों का विश्लेषण करता है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह को क्लीन चिट दिए जाने, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के नाथूराम गोडसे संबंधी बयान, और 'भारतीय जिन्ना पार्टी' जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है। लेख चुनाव आयोग की सीमित शक्तियों और उसकी निष्पक्षता पर उठे सवालों पर भी चर्चा करता है।
यह लेख 17वीं लोकसभा चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता के व्यापक उल्लंघन और चुनाव आयोग की भूमिका पर केंद्रित है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के खिलाफ आचार संहिता उल्लंघन के आरोपों, चुनाव आयोग के भीतर मतभेदों (सुनील अरोड़ा और अशोक लवासा के बीच), और विभिन्न राजनीतिक नेताओं के विवादित बयानों का उल्लेख है। लेखक का तर्क है कि आचार संहिता एक मज़ाक बन गई है और चुनाव आयोग सत्ताधारी दल के प्रति नरम रहा है।
यह लेख गुजरात राज्यसभा चुनाव में 'नोटा' (नन ऑफ द अबव) विकल्प के राजनीतिक इस्तेमाल पर हुए विवाद का विश्लेषण करता है। कांग्रेस और भाजपा दोनों ने चुनाव आयोग पर दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन आयोग ने नोटा अधिसूचना रद्द करने से इनकार कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने भी नोटा पर रोक लगाने से मना कर दिया, हालांकि इसकी संवैधानिक वैधता पर विचार करने को तैयार है।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। लेख सरकार द्वारा इन नियुक्तियों में राजनीतिक प्रभाव और कोलेजियम प्रणाली की अनुपस्थिति पर प्रकाश डालता है। यह 2017 और 2022 में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, अरुण गोयल की नियुक्ति में जल्दबाजी और पूर्व सीईसी के राजनीतिक संबंधों जैसे उदाहरणों का हवाला देता है, जिसमें चुनाव आयोग को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
यह लेख चुनाव सुधारों पर केंद्रित है, विशेष रूप से आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के मुद्दे पर। यह बताता है कि कैसे चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के प्रयासों के बावजूद, राजनीतिक दल इस मुख्य मुद्दे को टालते रहे हैं, जबकि अन्य सुधारों जैसे चुनावी बॉन्ड और मुफ्त चुनावी वादों पर चर्चा होती रहती है। लेख में दागी नेताओं की जीत और उनके खिलाफ लंबित मुकदमों पर भी प्रकाश डाला गया है।
यह लेख चुनाव सुधारों पर केंद्रित है, विशेष रूप से दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के मुद्दे पर। यह बताता है कि कैसे चुनाव आयोग के कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव, जैसे दागी उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने का अधिकार, सरकार द्वारा अनदेखा कर दिया गया है, जबकि वोटर आईडी को आधार से जोड़ने जैसे प्रस्तावों को तुरंत मंजूरी मिल गई। लेख इस बात पर प्रकाश डालता है कि राजनीतिक दलों के हित जनहित पर हावी होते हैं, जिससे राजनीति का अपराधीकरण जारी है।
यह लेख चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त एक स्वतंत्र नियुक्ति प्रणाली की आवश्यकता पर जोर दिया है, जबकि सरकार इस पर चुप्पी साधे हुए है। लेख में न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच चल रहे टकराव और चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के ऐतिहासिक प्रयासों पर भी प्रकाश डाला गया है।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने विधानसभा को समय से पहले भंग कर दिया, जिससे चुनाव आयोग एक नई चुनौती में फंस गया। आयोग को अब तेलंगाना विधानसभा चुनाव मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के साथ कराना होगा, जबकि तेलंगाना विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने में आठ महीने से अधिक का समय बचा था। यह कदम संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों के तहत चुनाव आयोग के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करता है, खासकर एक साथ चुनाव कराने की राष्ट्रीय बहस के बीच।
सुप्रीम कोर्ट बिहार में निर्वाचन आयोग की विशेष गठन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर रहा है, जहाँ लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं। कोर्ट ने आयोग से हटाए गए नामों का विवरण और कारण स्पष्ट करने को कहा है, साथ ही मतदाताओं को अपील का उचित अवसर देने का निर्देश दिया है। यह विवाद आधार कार्ड को पहचान पत्र के रूप में मानने और नागरिकता से जुड़े घुसपैठिया अभियान तक फैला हुआ है, जिसके राष्ट्रीय प्रभाव हो सकते हैं।
यह लेख चुनाव प्रक्रिया, विशेषकर ईवीएम और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी को लेकर राजनीतिक दलों द्वारा लगाए गए आरोपों पर केंद्रित है। मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए मतदाताओं से दुष्प्रचार से बचने का आग्रह किया है। लेख में बताया गया है कि कैसे विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस और आप, हार के बाद ईवीएम और मतदाता सूची पर सवाल उठाते हैं, जबकि चुनाव आयोग और अदालतों ने इनकी विश्वसनीयता को बार-बार प्रमाणित किया है।
यह लेख 'एक देश एक चुनाव' के प्रस्ताव को लागू करने में चुनाव आयोग के सामने आने वाली दुविधाओं पर प्रकाश डालता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस विचार के प्रबल समर्थक हैं, लेकिन आयोग को विधायी और संवैधानिक बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जिन्हें राजनीतिक दल संबोधित करने को तैयार नहीं हैं। लेख हरियाणा और महाराष्ट्र के साथ झारखंड और दिल्ली के चुनावों को एक साथ न करा पाने, जम्मू-कश्मीर में चुनाव न होने और संवैधानिक संशोधनों की आवश्यकता जैसे उदाहरणों के माध्यम से इन चुनौतियों का विश्लेषण करता है।
यह लेख पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली 'एक साथ चुनाव' पर उच्चस्तरीय समिति के गठन और उसके राजनीतिक समर्थन पर केंद्रित है। समिति विवादों में घिरी हुई है, खासकर विपक्षी दलों द्वारा इसे भाजपा का एजेंडा बताए जाने के कारण। लेख चुनाव सुधारों, विशेषकर राजनीति के अपराधीकरण को रोकने में सरकार की अनिच्छा और चुनाव आयोग व सुप्रीम कोर्ट की भूमिका पर भी प्रकाश डालता है।
यह लेख गुजरात में दो राज्यसभा सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने के चुनाव आयोग के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और 'एक देश एक चुनाव' के प्रधानमंत्री के विचार के बीच के विरोधाभास पर केंद्रित है। लेखक तर्क देता है कि चुनाव आयोग भाजपा की राजनीतिक सुविधा के अनुसार काम कर रहा है, जिससे 'एक देश एक चुनाव' के नारे की विश्वसनीयता पर सवाल उठते हैं। इसमें संवैधानिक बाधाओं और राजनीतिक दलों की अरुचि का भी उल्लेख है।
यह लेख 2024 के लोकसभा चुनावों के संदर्भ में मतदाताओं की बढ़ती उदासीनता पर प्रकाश डालता है, जबकि चुनाव आयोग भागीदारी बढ़ाने के लिए अथक प्रयास कर रहा है। यह उदासीनता के कारणों की पड़ताल करता है, जिसमें राजनीतिक दलों का स्वार्थ, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों की उपस्थिति और ईवीएम की विश्वसनीयता पर विवाद शामिल हैं। लेख बिहार और यूपी जैसे राज्यों में कम मतदान प्रतिशत पर विशेष चिंता व्यक्त करता है और मणिपुर व पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा के उदाहरण देता है।
यह लेख लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के प्रस्ताव पर केंद्रित है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, विधि आयोग और नीति आयोग द्वारा इस विचार के समर्थन को उजागर किया गया है, जो चुनाव खर्च और प्रशासनिक बाधाओं को कम करने के उद्देश्य से है। हालांकि, गैर-भाजपाई दल इस प्रस्ताव पर चर्चा करने में अनिच्छुक रहे हैं, जिससे संवैधानिक संशोधनों और राजनीतिक सहमति की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
चुनाव आयोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने की जल्दबाजी दिखा रहा है, जबकि केंद्र सरकार इस पर राजनीतिक सहमति चाहती है। यह लेख गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों की तारीखों की घोषणा में आयोग के कथित राजनीतिक दबाव और विरोधाभासी कदमों पर भी सवाल उठाता है। विपक्षी दल आयोग के इरादों पर सवाल उठा रहे हैं, खासकर प्रधानमंत्री के गुजरात दौरों के संदर्भ में।
यह लेख महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों सहित विभिन्न उपचुनावों में कम मतदाता उत्साह पर प्रकाश डालता है। यह राजनीतिक दलों द्वारा उम्मीदवारों के चयन के तरीकों (वंशवाद, धन, सहानुभूति) और मतदाताओं की बढ़ती जागरूकता, 'नोटा' के उपयोग और स्थानीय मुद्दों के महत्व पर जोर देता है। लेख चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाता है, विशेषकर सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग के मामले में, और जम्मू-कश्मीर के प्रखंड विकास परिषद चुनावों में मतदाताओं के रुझान का विश्लेषण करता है।
यह लेख 17वीं लोकसभा चुनाव 2019 के परिणामों का विश्लेषण करता है, जिसमें नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की रिकॉर्ड जीत और कई नए राजनीतिक घटनाक्रमों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें महिला प्रतिनिधित्व में वृद्धि, विपक्षी दलों द्वारा चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना, और विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दलों के प्रदर्शन जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की गई है। लेख मोदी लहर को अभूतपूर्व बताता है और इसे नेहरू-गांधी युग के करिश्मे से अलग करता है।
यह लेख भारतीय चुनावों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की चुनौतियों पर केंद्रित है। इसमें चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के बीच अविश्वास, ईवीएम-वीवीपैट विवाद, सुप्रीम कोर्ट की भूमिका, चुनावी बांड, आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों और आदर्श आचार संहिता के नियमों में बदलाव जैसे मुद्दों पर चर्चा की गई है। लेखक का तर्क है कि चुनाव आयोग की जगह अब सुप्रीम कोर्ट पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी आ गई है।
यह लेख लोकसभा और विधानसभा चुनावों को एक साथ कराने के प्रस्ताव पर केंद्रित है, जिसे विधि आयोग और चुनाव आयोग ने समर्थन दिया है, लेकिन प्रमुख राजनीतिक दलों ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। इसमें एक साथ चुनाव कराने में आने वाली राजनीतिक, संवैधानिक और कानूनी चुनौतियों का विस्तार से वर्णन किया गया है, जिसमें संविधान के कई अनुच्छेदों और जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन की आवश्यकता शामिल है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम. एन. वेंकटचलैया जैसे विशेषज्ञों ने संघीय सिद्धांतों और स्थानीय मुद्दों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंता व्यक्त की है।
यह लेख आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने के चुनाव आयोग के अधिकार की कमी पर केंद्रित है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दागी नेताओं के मुकदमों को शीघ्र निपटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का निर्देश दिया है, क्योंकि राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने से नहीं हिचकते। लेख में बताया गया है कि सरकार और राजनीतिक दल दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के पक्ष में नहीं हैं, जिससे चुनाव सुधारों में बाधा आ रही है।
यह लेख भारतीय राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर प्रकाश डालता है, जिसमें आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों के जनप्रतिनिधि बनने की समस्या पर चर्चा की गई है। इसमें इंजीनियर राशिद और अमृतपाल सिंह जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणियों और निर्देशों पर जोर दिया गया है। लेख चुनाव आयोग की सीमाओं और केंद्र सरकार की निष्क्रियता को उजागर करता है, साथ ही जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार की आवश्यकता पर भी बल देता है।
यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'एक साथ चुनाव' के आह्वान का विश्लेषण करता है, जिसमें कहा गया है कि इसके लिए केवल राजनीतिक चर्चा नहीं बल्कि संवैधानिक संशोधन आवश्यक हैं। चुनाव आयोग ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि संविधान के कई अनुच्छेदों में बदलाव के बिना एक साथ चुनाव संभव नहीं है। लेखक जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने और वहां चुनाव न कराने के सरकार के फैसले को 'एक साथ चुनाव' के प्रति उसकी वास्तविक प्रतिबद्धता पर सवाल उठाने के लिए एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करता है।
यह लेख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक साथ चुनाव कराने पर दिए गए जोर की आलोचना करता है, जबकि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने वाले महत्वपूर्ण चुनाव सुधारों को नजरअंदाज किया जा रहा है। लेखक विभिन्न राजनीतिक दलों के स्वार्थी हितों पर प्रकाश डालता है और बताता है कि कैसे वे जनहित के बजाय अपने राजनीतिक लाभ के लिए चुनाव सुधारों का विरोध या समर्थन करते हैं। इसमें 2013 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(4) को रद्द करने का भी उल्लेख है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया है कि सरकारी अधिकारियों को राज्य चुनाव आयुक्त (एसईसी) नहीं बनाया जा सकता, इसे संविधान का मखौल बताया है। यह निर्णय गोवा सरकार द्वारा अपने कानून सचिव को एसईसी का अतिरिक्त प्रभार देकर नगरपालिका चुनाव में मनमानी करने के प्रयास के संदर्भ में आया है। लेख में इस फैसले के दूरगामी परिणामों, चुनाव आयोग की स्वतंत्रता, नोटा विकल्प और राजनीति के अपराधीकरण जैसे मुद्दों पर प्रकाश डाला गया है, जो निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में न्यायपालिका की भूमिका पर जोर देता है।
यह लेख ईवीएम में कथित छेड़छाड़ के विवाद पर केंद्रित है, जो 2019 के आम चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा उठाया गया था। इसमें बताया गया है कि कैसे विभिन्न दल, अपनी चुनावी हार-जीत के आधार पर, ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं या उसका बचाव करते हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए ईवीएम को 'फुलप्रूफ' बताया और चुनाव आयोग को राजनीतिक फुटबॉल न बनाने की अपील की।
यह लेख बताता है कि ईवीएम में छेड़छाड़ के आरोप अक्सर चुनाव हारने वाली पार्टियों द्वारा लगाए जाते हैं, जबकि जीतने वाली पार्टियां जनादेश का हवाला देती हैं। गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनावों के बाद यह फिर साबित हुआ कि यह एक राजनीतिक मुद्दा है। सुप्रीम कोर्ट ने वीवीपीएटी के बावजूद छेड़छाड़ की आशंकाओं को खारिज कर दिया, और चुनाव आयोग ने लगातार ईवीएम को 'फूलप्रूफ' बताया है, जबकि विभिन्न राजनीतिक दल अपनी सुविधा के अनुसार ईवीएम पर अपना रुख बदलते रहे हैं।
यह लेख पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर 2018 के पंचायत चुनावों के दौरान राज्य निर्वाचन आयोग को अपनी मर्जी के अनुसार चलाने के आरोपों पर केंद्रित है। इसमें कलकत्ता हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप, विपक्षी दलों की शिकायतों और चुनाव आयोग के कथित पक्षपातपूर्ण आचरण का विवरण दिया गया है। लेख में 2013 और 2016 के चुनावों में भी ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच हुए विवादों का उल्लेख है।
यह लेख पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस॰ वाई॰ कुरेशी की विवादास्पद सार्वजनिक यादों के बहाने चुनाव आयोग की निष्पक्षता, संवैधानिक गरिमा, मतदाता सूची पुनरीक्षण, विपक्षी आरोपों और मुख्य चुनाव आयुक्तों के राजनीतिक विवादों की पड़ताल करता है।