मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) का पद जरूर संवैधानिक है, क्योंकि किसी वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के सीईसी बनते ही उन्हें धारा 324 के तहत संवैधानिक अधिकार प्राप्त हो जाते हैं । लेकिन वास्तविकता ये है कि चुनाव आयोग का सेट.अप ही अन्य संवैधानिक संस्थाओं जैसा नहीं है, जिसके प्रमुख के रूप में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । वर्ना सुप्रीम कोर्ट को नियुक्ति प्रक्रिया में हस्तक्षेप करके इस संबंध में संसद से कानून बनाने का निर्देश देने की जरूरत नहीं पड़ती ।

जस्टिस के. एम. जोसेफ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ के आदेश पर सभी हलकों में मिली-जुली प्रतिक्रिया,ं सामने आ रही हैं । कई लोग इसे कार्यपालिका के काम में न्यायपालिका की दखलंदाजी और टकराव के नए मुद्दे के रूप में देख रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट सरकार और संसद के बीच पहले से चल रहे मतभेद में नया रार बताने वाली टिप्पणियां ज्यादा आ रही हैं । उसकी तुलना में सुप्रीम कोर्ट के चुनाव आयोग में अन्य संस्थाओं की तरह कॉलेजियम टाईप नियुक्ति समिति बनाने के फैसले की आलोचना ज्यादा हो रही है ।

चुनाव आयोग का सेट.अप पूरी तरह संवैधानिक बनाने के लिए सीईसी और ईसी(चुनाव आयुक्त) नियुक्ति प्रणाली स्वतंत्र हो । अर्थात् कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त हो । इस संबंध में दायर याचिकाओं पर 8 साल तक सुनवाई करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है । सरकार को जब अपना पक्ष प्रस्तुत करने कहा गया तो इसे कार्यपालिका, विधायिका के महकमे में टकराव का मुद्दा बनाने का प्रयास किया गया । सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह आदेश जारी किए कोई हफ्ता भर बीता है । विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तारीफ करते हुए कहा कि यह लोकतंत्र की जीत है और इससे देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का रास्ता साफ होगा । लेकिन सरकार ने चुप्पी साध रखी है । केंद्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू सुप्रीम कोर्ट के हर फैसले, नोटिस पर टिप्पणी करते हैं और न्यायपालिका को अपनी ‘सीमा’ में रहने की हिदायत देते हैं । कानून मंत्री लंबित मुकदमों के लिए न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराने के क़फ़म में यह भी बोल चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट का ज्यादा समय पीआईएल सुनवाई में गुजरता है ।

लेकिन अभी कानून मंत्री किरण रिजिजू ने चुनाव आयोग का सेट.अप बदलने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर कोई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया । 4.03.2023 को भुवनेश्वर में आयोजित एक सम्मेलन में कानून मंत्री ने उल्टे न्यायपालिका की तारीफ की और दूसरों पर ठीकरा मढ़ते हुए कहा कि न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश देश के बाहर और अंदर चल रही है । कानून मंत्री ने जोर देकर कहा. ‘हम संविधान के प्रति अपने दायित्वों से बंधे हैं ।’ पूर्वी राज्यों की केंद्र सरकार परिषदों का यह पहला सम्मेलन ‘न्याय यज्ञ’ ओडिशा में आयोजित था । सुप्रीम कोर्ट का फैसला 02.03.2023 को ऐसे समय में आया है जब कानून मंत्री किरण रिजिजू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ न्यायपालिका पर हमले को कोई अवसर नहीं चूकते । जगदीप धनखड़ के पद के साथ कार्यपालिका और विधायिका दोनों जुड़ा है । वे उपराष्ट्रपति के साथ-साथ संसद के उच्च सदन राज्यसभा के सभापति भी हैं । कार्यपालिका के सर्वोच्च अधिकारी सह संविधान संरक्षक राष्ट्रपति और उसके बाद दूसरे नंबर पर उपराष्ट्रपति हैं । जगदीप धनखड़ गत वर्ष जुलाई में उपराष्ट्रपति बनते ही संसद के मानूसन सत्र में राज्यसभा सभापति के रूप में अपने पहले ही संबोधन में सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए कहा कि संसद के दोनों सदनों से पास राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग एक्ट सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किया जाना जनादेश की अनदेखी और संसद की सर्वोच्चता की अवहेलना है । उसके बाद से कई आयोजनों में उपराष्ट्रपति ने इस बात को दुहराया है ।

सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग से संबंधित आदेश में न्यायपालिका और विधायिका दोनों को याद दिलाया है कि संविधान के प्रावधान को अमल में लाने के लिए 70 वर्षों में कानून नहीं बना । संविधान के अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग गठन, इसके अधिकार और कर्त्तव्यों का विस्तार से वर्णन है । धारा. 324(2) का भी हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए संसद कानून बनाए, जिसका स्पष्ट प्रावधान संविधान में है ।

लेकिन चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पूरी तरह सरकार के हाथ में होने की व्यवस्था को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया । शीर्ष कोर्ट ने चुनाव प्रक्फ़िरया की शुचिता पर जोर दिया और कहा कि लोकतंत्र की बुनियाद जिस चुनाव व्यवस्था पर टिकी है, उसका संचालन करनेवाले चुनाव आयोग को संवैधानिक ढांचे व कानून के दायरे में काम करना चाहिए । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा. धारा.324(2) के तहत यह प्रावधान विशिष्ट है और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति सरकार पर छोड़े रखना मौलिक मूल्यों के साथ-साथ मौलिक अधिकारों से भी जुड़ा है । हमारे विचार में यह उपयुक्त समय है, जब कोर्ट इसके लिए नियम तय करे’ ।

लगभग 50 वर्षों से चुनाव आयोग का संचालन करनेवाले आयुक्तों की नियुक्ति के लिए स्वतंत्र प्रक्रिया अपनाने की मांग उठ रही थी । इस संबंध में यदा.कदा कई कमिटियां बनी । लेकिन किसी भी रिपोर्ट पर किसी भी सरकार ने विचार करना जरूरी नहीं समझा । क्योंकि सत्ता में होने पर अपने चहेते अधिकारी को चुनाव आयोग में बिठाना और हार के बाद उसके लिए चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराना सभी दलों के लिए राजनीतिक मुद्दा था । चुनाव आयोग के जरिए राजनीति कई बार सही साबित हुई है ।

1975 में जस्टिस तारकुंडे कमिटी, 1990 में दिनेश गोस्वामी कमिटी और 2007 में दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सरकार को चुनाव सुधार के विभिन्न उपायों में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संवैधानिक तरीके से करने के लिए धारा.324(2) के अंतर्गत संसद में बिल लाने का सुझाव दिया । ये तीनों कार्यकाल कांग्रेस शासनकाल के थे । भाजपा गठजोड़ शासन में विधि आयोग ने अपनी 255वीं रिपोर्ट में मार्च, 2015 में यही सुझाव दिया । उसपर सरकार ने जब गौर नहीं किया, तब सुप्रीम कोर्ट में याचिका आयी । उसके बावजूद भाजपा सरकार ने जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट में सफाई दी. ‘यदि संसद कहती है कि इसके लिए कोई कानून बनाने की जरूरत नहीं है तो क्या सुप्रीम कोर्ट विधायिका के महकमे में हस्तक्षेप कर सकती है घ क्या यह उचित होगा घ केंद्र सरकार की ओर से सोलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने यह दलील चीफ जस्टिस जे. एस. खेहर और जस्टिस डी. वाई. चन्द्रचूड़ की नोटिस के जवाब में पेश की ।

नोटिस में सरकार से पूछा गया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति अन्य संवैधानिक पदों की तरह क्यों नहीं की जाती और इसके लिए कोई कानून क्यों नहीं बनाया जा रहा है ।

सरकार से जवाब-तलब की नौबत उस समय आयी, जब गुजरात काडर के आईएएस अधिकारी अचल कुमार ज्योति को सीईसी नियुक्त किया गया । उन्हें गुजरात से लाकर चुनाव आयुक्त पहले ही बना दिया गया था । नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब ए. के. ज्योति उनके काफी निकट थे । ज्योति की सीईसी पद पर नियुक्ति की अधिसूचना 04.07.2017 को कानून मंत्रालय ने जारी की और इसके खिलाफ तुरंत सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर हुई । शीर्ष कोर्ट ने तत्काल 05 जुलाई को सुनवाई की । गुजरात विधान सभा चुनाव करीब था और सीईसी ए. के. ज्योति पर आरोप लगे कि उन्होंने प्रधानमंत्री की चुनाव घोषणाओं को ध्यान में रखकर मतदान तारीखों में फेरबदल किया ।

5 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया ताकि संविधान के अंतर्गत सुप्रीम कोर्ट जज का दर्जा प्राप्त सीईसी की नियुक्ति सरकारी अधिकारी की तरह न हो । सरकार जजों की नियुक्ति भी अपने हाथ में लेने को बेचैन है । सीईसी को हटाने का प्रावधान सुप्रीम कोर्ट जज की तरह संसद के दो तिहाई बहुमत से महाभियोग वाला है, लेकिन नियुक्ति सरकार के हाथ में है । सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों को सरकार के रहमो-करम पर छोड़ दिया ।

देखिएए 2007 की चुनाव आयोग के अंदर की राजनीतिक घटना । एन. गोपालास्वामी भाजपा गठजोड़ शासनकाल में चुनाव आयुक्त बनाए गए और 2006 में वरीयता के आधार पर उनके सीईसी बनने तक कांग्रेस सत्ता में आ चुकी थी । उसके पहले 2005 में नवीन चावला चुनाव आयुक्त बनाए जा चुके थे, जो कांग्रेस समर्थक माने जाते थे । 2009 में लोकसभा चुनाव के समय नवीन चावला का सीईसी बनना तय था । उसके पहले 2007 में ही भाजपा नेता जसवंत सिंह और अरूण जेटली ने नवीन चावला को चुनाव आयुक्त पद से हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दी । सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीईसी एन. गोपालास्वामी के पास यह कहकर भेजा कि संविधान से सीईसी को इसका अधिकार प्राप्त है । एन. गोपालास्वामी ने तत्काल नवीन चावला को हटाने की सिफारिश राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल के पास भेज दी । राष्ट्रपति कार्यालय से वो सिफारिश मंत्रिमंडल के पास गयी और खारिज हो गयी । 2009 में भाजपा ने सीईसी नवीन चावला को हार के लिए दोषी ठहराया ।