हिमाचल प्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए मतदान की तारीख करीब आने से पहले चुनाव आयोग के गुजरात विधान सभा चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी । हिमाचल प्रदेशा में 12 नवंबर को वोटिंग है, और गुजरात में दो चरणों का मतदान एक दिसंबर तथा 5 दिसंबर को होगा ।
चुनाव आयोग हिमाचल विधान सभा चुनाव कार्यक्रम का 14 अक्टूबर को जब एलान कर रहा था, उस समय दागी सांसदों/विधायकों के खिलाफ वर्षों से लंबित मुकदमे के संबंध में सुप्रीम कोर्ट से सभी हाईकोर्टों को निर्देश भेजा जा रहा था ।
सुप्रीम कोर्ट ने देशभर के सभी हाईकोर्टों को 10 अक्टूबर को कहा कि जिन संसद सदस्यों/विधायकों के खिलाफ 5 वर्ष या उससे ज्यादा समय से आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, उसकी जानकारी दें । शीर्ष कोर्ट ने यह जानकारी सभी हाईकोर्टों से हलफनामे पर मांगी और उसके लिए चार हफ्ते का समय दिया । नवंबर का पहला सप्ताह बीत गया, यह सूचना उपलब्ध नहीं है कि निर्धारित अवधि में हाईकोर्टों ने आपराधिक मुकदमे में 5 वर्षों से भी ज्यादा समय से फंसे होने के बावजूद चुनाव लड़नेवाले और जीतनेवाले संसद सदस्यों/विधायकों के मामले का वर्तमान स्टेटस सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे पर बताया अथवा नहीं ।
चुनाव हो रहे हैं, दागी उम्मीदवार टिकट ले रहे हैं, आगे भी उन्हें मिलता रहेगा । 2023 में 9 राज्यों में विधान सभा चुनाव होने हैं । फिर 2024 में लोकसभा चुनाव के साथ 5 राज्यों में चुनाव होंगे । मुकदमे का निष्पादन लंबित है ।
2019 में लोकसभा पहुंचे 539 सदस्यों में से 233 दागी जीते । बाहुबलियों(दागियों) की जीत का प्रतिशत 43ः रहा ।
जून, 2022 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित 40 सांसद आपराधिक मामलों में फंसे थे । 57 राज्यसभा सदस्यों में से 23 यानी 40 फीसदी के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं । उनमें से 9 भाजपा के और 4 कांग्रेस के थे । चुनाव आयोग से प्राप्त विवरण के आधार पर यह आंकड़ा चुनाव अधिकार समूह एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) ने उपलब्ध कराया है ।
चुनाव सुधार से संबंधित चुनाव आयोग द्वारा केंद्र सरकार को भेजे गए सुझावों की फाईल दो दशकों से धूल फांक रही है । चुनाव सुधार हमेशा चर्चा में रहता है और अभी फिर सुर्खियों में है । चुनाव आयोग के सुझावों में पहले नंबर पर है वैसा कानून बनाना, जिसमें निर्वाचन आयोग को दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार मिले । चुनाव आयोग ने हमेशा से इस बात पर जोर दिया कि दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मिले, सरकार ऐसा कानून बनाये । सत्ताधारी और विपक्षी किसी भी दल ने इसे गंभीरता से नहीं लिया । दागियों को टिकट न देने का चुनाव आयोग का आग्रह अनसुना कर दिया गया । यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट में इस पर वर्षों चली सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट की फटकार का भी केंद्र सरकारों पर कोई असर नहीं हुआ । सरकारें बार-बार कोई-न-कोई सफाई देकर कभी चुनाव आयोग पर फेंककर तो कभी कोई अन्य बहाने बनाकर दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला बिल लाने से कतराती रही । इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों में आपस में कोई मतभेद नहीं है ।
आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने भी सीधे मतदाताओं के ही कटघरे में मामला डाल दिया और चुनाव आयोग को मतदाताओं के विवेक जगाने वाले निर्देश लागू करने के अधिकार दिए । 25.09.2018 को चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पांच जजों की सुप्रीम कोर्ट पीठ ने आदेश दिया कि सभी उम्मीदवारों को अपने आपराधिक रिकार्ड का ब्योरा चुनाव आयोग को देना अनिवार्य होगा । शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि दागियों का आपराधिक ब्योरा प्रमुखता से इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के जरिए बार. बार प्रसारित धप्रकाशित किया जाए ताकि ज्यादा से ज्यादा वोटरों का उस तरफ ध्यान जाए । उसी आदेश के आधार पर चुनाव आयोग ने फार्म.26 में संशोधन करके राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को अपना दागी रिकार्ड विवरण प्रकाशित करने का निर्देश दिया था । उस समय से अब तक लोकसभा समेत जितने विधान सभा चुनाव हुएए सबमें दागी चुनाव जीतकर आए हैं ।
भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में 2016 से सुनवाई चल रही है । चुनाव सुधार के इस असली मुद्दे को गर्त में डाले रखने के लिए मतदाताओं के ही विवेक पर छोड़ने वाले ढकोसले उछाले जा रहे हैं । जनप्रतिनिधियों के जगने और चेतने की जरूरत नहीं है । मतदाता सोचे नहीं हैं, लेकिन उन्हें जगकर ज्यादा से ज्यादा संख्या में जुटकर अपने विवेक से वोट डालने के लिए जागरूकता अभियान चुनाव के समय तेज हो जाता है । चुनाव आयोग अपना स्थापना दिवस 25 जनवरी मतदाता दिवस के रूप में मनाता है ।
मतदाता किसी प्रलोभन में न आएं और मुफ्त की चुनावी रेवड़ियां बांटनेवाले दलों के बहकावे में न आएं, यह विषय अभी चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक चर्चा में है । चुनावी बॉन्ड, राजनीतिक फंडिंग, नफरत वाली चुनावी बयानबाजी सब पर रोक पर विचार हो रहा है ।
14 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट ने चुनावी बॉन्ड, राजनीतिक फंडिंग के संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई की, अगली सुनवाई 6 दिसंबर को है । उसके पहले अगस्त में सुप्रीम कोर्ट में चुनावी रेवड़ी पर सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस एन. वी. रमना ने जब इस पर विचार करने के लिए एक कमिटी बनाने का सुझाव दिया तो चुनाव आयोग ने कह दिया कि एक संवैधानिक संस्था होने के नाते इस कमिटी में चुनाव आयोग का होना उचित नहीं होगा । चुनाव आयोग के बाद कैग(बळ).भारत सरकार के महालेखा परीक्षक व नियंत्रक ने भी कहा कि चुनाव रेवड़ी से सबसिडी, कर्जमाफी बोझ बन जाती है ।
चुनाव सुधारों की सूची में घृणा भाषण हाल में जुड़ा है । चुनाव आयोग ने साफ कहा कि नफरत भाषण परिभाषित नहीं है और इस पर अंकुश चुनाव के अधिकार में नहीं है ।
लेकिन असली मुद्दा दागियों को चुनाव लड़ने से रोकना इन तमाम रेवड़ियों में गुम है । अगस्त, 2022 में एक और याचिका पर सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा कि दंडित दागी नेताओं को जीवन भर के लिए अयोग्य घोषित करना मुश्किल है । याचिकाकर्ता ने दो साल या उससे ज्यादा की सजा मिलने पर नेताओं को जीवनभर के लिए अयोग्य घोषित करने की मांग की थी । मौजूदा व्यवस्था में सजायाप्ता को 6 वर्ष तक चुनाव लड़ने से रोक है ।
जब पांच साल से ज्यादा समय तक दागियों के मुकदमे का निष्पादन ही नहीं हो पाया है, तो सजा क्या होगी । तभी तो सुप्रीम कोर्ट को हाईकोर्टों से ताजा स्टेटस मांगना पड़ा है । वोटर चेतें तो वोट दें किसे । इसीलिए वैसे वोटर नोटा(छब्न)(उपरोक्त में से कोई नहीं) का इस्तेमाल कर किसी को वोट नहीं देते । राजनीतिक दलों को दागियों की जीत ही सुनिश्चित लगती है । अगर कोई दागी सजा होने के बाद अयोग्य घोषित हो जाता है तो उसी के घर के किसी सदस्य को उम्मीदवार बना दिया जाता है ।
हालिया उपचुनावों में बिहार की मोकामा विधान सभा सीट से बाहुबली अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी जीती । दागी अनंत सिंह जेल में हैं, उनकी विधायकी समाप्त होने के कारण उपचुनाव की नौबत आयी । दूसरी गोपालगंज विधान सभा सीट पर 2170 वोट नोटा को गया, भाजपा की कुसुम देवी उससे भी कम मात्र 1794 वोट से जीती । मोकामा में राजद के नीलम देवी के मुकाबले भाजपा ने भी टक्कर के बाहुबली की पत्नी को खड़ा किया था ।
मुंबई की अंधेरी(पूर्व) विधान सभा सीट पर बड़ी संख्या में नोटा पर वोट जाने की रिपोर्ट है, जहां से शिवसेना(उद्धव गुट) की रितुजा लटके जीती हैं । वहां से रिपोर्ट है कि नोटा के लिए धनबल का इस्तेमाल किया गया और उसी से जीत दर्ज की गयी ।
चुनाव आयोग ने एक से ज्यादा सीट पर चुनाव लड़ने से रोकने के लिए भी कानून में संशोधन की मांग उठायी है ।
दागी सांसद डंके की चोट पर अपना आपराधिक रिकार्ड चुनाव आयोग को देने और प्रचारित करने के बावजूद जीतते हैं । फिर अपने ‘विशेषाधिकार’ का इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं होने देते ।
इस वर्ष संसद के मानसून सत्र के दौरान कुछ राज्य सभा सदस्यों ने सत्र का हवाला देकर गिरफ्तारी से छूट मांगी । तत्कालीन सभापति और उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने दो टूक कहा कि सत्र के दौरान आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी या पूछताछ से सांसदों को कोई छूट नहीं मिली है ।
गैर भाजपा शासित झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के खिलाफ चुनाव आयोग की कार्रवाई राजनीतिक कारणों से चल रही है । हेमंत सोरेन जिस गठजोड़ सरकार के प्रमुख हैं, उसमें कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल भी है । सोरेन के खिलाफ मामला ये है कि वे खानमंत्री रहते हुए एक खनन लीज के मालिक थे । चुनाव आयोग ने अगस्त में ही झारखंड के राज्यपाल रमेश बैस को अपना मंतव्य भेजा, जिसमें हेमंत सोरेन के संभावित अयोग्य घोषित होने की बात है । अभी तक राज्यपाल उस पर फैसला नहीं ले पाए हैं । 27 अक्टूबर को राज्यपाल ने मीडिया कर्मियों से बातचीत में कहा कि उन्होंने चुनाव आयोग से दूसरा मंतव्य मांगा है । भाजपा नहीं चाहती कि झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस इसका राजनीतिक फायदा उठा पाए । झारखंड में 2024 में चुनाव है ।
जून में चुनाव आयोग ने 87 राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द की, जिनमें से कई वन मैन पार्टी बनकर आयकर में 100 फीसदी छूट ले रहे थे । अगस्त में एडीआर की रिपोर्ट आयी कि 2004.05 से 2020.21 के बीच राष्ट्रीय दलों ने अज्ञात स्रोतों से 15077 करोड़ रुपये जुटाए ।
अक्टूबर में चुनाव आयोग ने प्रतिबंधित आचरण में नया संशोधन करते हुए कहा कि चुनाव प्रचार खत्म होने पर मतदाताओं को रेस्तरां में मुफ्त भोजन के साथ शराब पिलाना अपराध माना जाएगा और आचारसंहिता के दायरे में 18 साल तथा उससे ऊपर के वे लोग भी आएंगे, जिनका नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं है ।
गुजरात की भाजपा सरकार का वोट डालना अनिवार्य बनाने का दूसरा प्रयास नाकामयाब रहा । केंद्रीय कानून और न्याय राज्यमंत्री एस. पी. सिंह बाघेल ने संसद के मानसून सत्र में अगस्त में कहा कि ऐसा करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है । गुजरात विधान सभा से पारित इस प्रस्ताव पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी । उम्मीदवार कैसा भी हो, जनता को उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनना है । संवैधानिक अधिकारों से लैस चुनाव आयोग अपराध में लिप्त उम्मीदवारों के आगे अवश है ।
चुनावी रेवड़ी को सुप्रीम कोर्ट ने अपने 05.07.2013 के आदेश में कहा कि जनप्रतिनिधि कानून के अंतर्गत यह भ्रष्टाचार’ नहीं माना जा सकता । अभी सुप्रीम कोर्ट इस पर पुनर्विचार कर रही है ।
शुक्र है, सुप्रीम कोर्ट का । दागी ‘लामेकरों’(सांसद/विधायक) के जेल में रहते हुए चुनाव लड़ने की विशेषाधिकार धारा 8/4 को 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया । उस समय की कांग्रेस गठजोड़ सरकार ने तुरंत अध्यादेश लाकर इसका काट प्रस्तुत करना चाहा । लेकिन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने ऐसे अध्यादेश के औचित्य पर सवाल उठा दिया और सरकार को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा । बाद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उस अध्यादेश को ‘बकवास’ बताकर सार्वजनिक रूप से उसकी प्रतियां फाड़ी ।
झारखंड विवाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर को उन याचिकाओं पर सुनवाई से इन्कार कर दिया, जो हेमंत सोरेन के खिलाफ दायर की गयी थी । शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें उन जनहित याचिकाओं को सुनवाई योग्य माना गया था ।
सोरेन के खान लीज आवंटन और खनन पट्टे में अनियमितता में फंसे होने का मामला उलझ गया, जब चुनाव आयोग ने कह दिया कि राज्यपाल ने दूसरी सलाह नहीं मांगी ।