लोकसभा और विधान सभाओं का चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव को विधि आयोग ने पास कर दिया । चुनाव आयोग ने भी इसे ‘वांछनीय’ और ‘हासिल करने योग्य’ लक्ष्य बताकर सहमति दे दी। लेकिन देश की कोई प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टी ने इस प्रस्ताव को विचारणीय या चर्चा करने लायक नहीं माना । यहां तक कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा ने भी विधि आयोग को राय औपचारिक रूप से नहीं दी । जबकि एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का है और उन्हाने अपने चार साल के कार्यकाल में बार-बार इस प्रस्ताव पर राष्ट्रीय बहस कराने पर जोर दिया है । ‘एक देश एक चुनाव’ नरेंद्र मोदी का ही नारा है । यह भी चार साल की प्रमुख उपलब्धियों में वस्तु और सेवा कर की तरह है । मगर गिनायी इसलिए नहीं जा रही है, क्योंकि एक साथ चुनाव कराने के रास्ते में राजनीतिक और संवैधानिक पचड़े हैं । विधि आयोग द्वारा कार्यपत्र मसौदा सार्वजनिक किये जाने के बाद से ये पचड़े खुल रहे हैं ।

विधि आयोग के अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. एस. चौहान ने काफी विचार विमर्श के बाद 17 अप्रैल को आम जनता से और राजनीतिक दलों की राय जानने के लिए कार्यपत्र सार्वजनिक किया । इस कार्यपत्र मसौदा का नाम ही है - ‘एक साथ चुनाव: संविधान एवं कानूनी पक्ष’ । राजनीतिक दलों को विचार और सुझाव देने के लिए विधि आयोग ने आठ मई तक का समय दिया । राजनीतिक पार्टियों ने इसे बिल्कुल नोटिस ही नहीं लिया । चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त सात राष्ट्रीय पार्टियों और 59 राज्य स्तरीय पार्टियों में से किसी ने भी विधि आयोग के एक साथ चुनाव कार्यपत्र पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी । मई पूरा महीना गुजर गया । यहां तक कि भाजपा के भी पार्टी या सरकार में शामिल किसी नामचीन नेता ने इस पर कुछ बोलने से परहेज किया जो अपनी उपलब्धियों के बखान में जुटे हैं । अगले साल लोकसभा चुनाव है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार साल से इस प्रयास में जुटे हैं कि 2019 से ही एक साथ चुनाव कराने की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से शुरू हो जाए । भाजपा सांसद जी वी एल नरसिंह राव ने अपनी प्रतिक्रिया में सिर्फ इतना कहा - ‘हमारा रूख पहले से स्पष्ट है’ । लेकिन भाजपा ने विधि आयोग को कोई लिखित प्रतिक्रिया नहीं दी है ।

विधि आयोग ने तो एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश कर दी । राजनीतिक दलों की राय की प्रतीक्षा के दौरान ही विधि आयोग ने चुनाव आयोग से भी पत्र लिखकर राय मांगी । 24 अप्रैल के विधि आयोग के पत्र के जवाब में चुनाव आयोग ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और साथ में इस रास्ते में आनेवाली कानूनी तथा वित्तीय अड़चनों का समाधान निकालने पर भी बल दिया ।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया के लिए निर्धारित तारीख आठ मई बीत जाने के एक हफ्ते बाद विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बी. एस. चौहान ने मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) ओ. पी. रावत के साथ बैठकर विमर्श किया । 16 मई की इस बैठक में विधि आयोग के अध्यक्ष समेत तीन अन्य सदस्य मौजूद थे । सीईसी ओ. पी. रावत ने भी अपने दोनों चुनाव आयुक्तों - सुनील अरोड़ा और अशोक लावासा के साथ बैठक में हिस्सा लिया । विदित हो कि विधि आयोग ने ‘एक साथ चुनाव: संविधान और कानूनी पहल’ के कार्यपत्र के मसौदे पर विचार विमर्श शुरू किया है । यह फाइनल रिपोर्ट नहीं है । उसमें अभी कितना समय लगेगा, कहना कठिन है । क्योंकि विधि आयोग के अनुसार जन प्रतिनिधित्व कानून के अलावे, संविधान की कई धाराओं में संशोधन और फेरबदल करने पड़ेंगे, तब जाकर एक साथ लोकसभा और विधान सभा चुनाव कराने का रास्ता साफ होगा । उनमें सबसे महत्वपूर्ण है - धारा-83, जिसमं निर्वाचित संसद का कार्यकाल परिभाषित किया गया है । सूत्रों के मुताबिक विधि आयोग ने चुनाव आयोग से यह जानना चाहा था कि अगर संविधान में और खासकर धारा-83 में संशोधन हो तो चुनाव आयोग की ओर से आके होगा या नहीं और क्या यह संविधान के मूलभूत ढांचे के साथ छेड़छाड़ कहा जा सकता है या नहीं ।

इसका जवाब स्पष्ट देना संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग के लिए लगता है संभव नहीं था । इसलिए चुनाव आयोग ने कहा कि ‘यह प्रश्न हमारे जवाब के लिए नहीं है ।’ विधि आयोग ने कुछ सामाजिक-आर्थिक अड़चनों का भी जिक्र किया है, जो साथ चुनाव कराने पर खड़ी हो सकती है ।

विधि आयोग ने अपना मसौदा केंद्रीय कानून मंत्रालय को भेज दिया है । अब कानून मंत्रालय को इससे जुड़ी विसंगतियों का निदान खोजना है । संविधान संशोधन की बात कोई एक धारा को लेकर नहीं उठी है । कई धाराओं में संशोधन करने के बाद ही एक साथ चुनाव का रास्ता क्लियर हो सकता है । जस्टिस बी. एस. चौहान ने स्वयं माना है कि एक साथ सभी चुनाव कराना बहुत बड़ी कानूनी चुनौती है, जिसके लिए प्रमुख संविधान संशोधन करने पड़ेंगे । जबकि उन्होंने पंचायत और नगर निकायों के चुनावों को इस दायरे से राज्यों का विषय बताकर बाहर कर दिया है । लेकिन लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने के लिए भी केंद्र सरकार को कम-से-कम पांच संविधान संशोधन करने पड़ेंगे । चुनाव आयोग के अनुसार धारा-83 के अलावे धारा-85(राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा भंग किया जाना), धारा-172(विधान सभाओं का कार्यकाल), धारा-174(विधान सभाओं का भंग किया जाना) और धारा-356(राष्ट्रपति शासन लागू किया जाना) । इसमें धारा-356 पहले से ही विवादित है ।

चुनाव आयोग के पूर्व कानूनी सलाहकार एस. के. मेंदीरत्ता ने इसके अलावे जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की भी दो धाराआं में संशोधन की बात कही है, जिसके बिना एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं है । इसमें एक धारा-15 है । मेंदीरत्ता के अनुसार अगर इस धारा में संशोधन करके चुनाव आयोग की सीमा 6 महीने से बढ़ाकर 9 या 10 महीने कर दिया जाए ता फिर उन सभी विधान सभाओं के चुनाव साथ-साथ कराए जा सकते हैं, जिनका कार्यकाल एक साल के अंदर समाप्त हो रहा है । मौजूदा प्रावधान के अंतर्गत चुनाव आयोग उस विधान सभा की चुनाव अधिसूचना जारी नहीं कर सकता, जिसका कार्यकाल समाप्त होने में 6 महीने से ज्यादा समय बचा है । जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-73 में स्पष्ट कहा गया है कि अगर चुनाव परिणाम कार्यकाल समाप्त होने की निश्चित तारीख से पहले घोषित हो जाते हैं तो भी संबंधित विधान सभा चुनाव अपना कार्यकाल पूरा कर सकती है । इसलिए एक साल में सभी चुनाव को साथ जोड़ने के बावजूद जिन विधान सभाओं का कार्यकाल साल के अंत में समाप्त हो रहा है, उसकी अवधि कम नहीं की जा सकती । उन विधान सभाओं को उस साल कार्यकाल पूरा करने दिया जा सकता है और नयी सरकार उसके बाद शपथ ग्रहण कर सकती है ।

एक साल में सभी चुनाव कराने के लिए विधान सभाओं को भंग करने की बात चुनाव आयोग ने नहीं की है । लेकिन चुनाव के बाद त्रिशंकु जनादेश की स्थिति का निदान का सुझाव दिया है जो अविश्वास प्रस्ताव पेश करके सरकार गिराने और उसके बाद भी बहुमत जुटाने के लिए आपाधापी से पैदा होती है । चुनाव आयोग के मुताबिक अविश्वास प्रस्ताव तभी पेश किया जाए जब वैकल्पिक सरकार के लिए पर्याप्त बहुमत हो । आयोग का सीधा इशारा हाल में कर्नाटक में हुए तमाशे की ओर था । विगत दिनों अन्य राज्यों में भी यह देखन को मिला । वैसी स्थिति में विधान सभा को निलंबित अवस्था में रखने के बावजूद मध्यावधि चुनाव की नौबत आ जाती है ।

विधि आयोग को सबसे पेचीदा मामला 10वीं अनुसूची को लेकर भी परेशानी है, दलबदल विरोधी कानून से जुड़ा है । जस्टिस चौहान के अनुसार दलबदल की स्थिति में सदस्यता समाप्त करनेवाले इस कानून को निरस्त किए बगैर संसद और विधान सभाओं का कार्यकाल निर्धारित समय तक बरकरार नहीं रखा जा सकता । उन्होंने स्वीकारा है कि 2019 तक तो यह सारा काम संभव नहीं है । विधि आयोग के अध्यक्ष के रूप में जस्टिस चौहान का कार्यकाल इसी वर्ष अगस्त में समाप्त हो रहा है ।

विधि आयोग की उस कवायद पर टिप्पणी करनेवाले एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एम. एन. वेंकटचलैया । जस्टिस वेंकटचलैया संविधान संशोधन आयोग के अध्यक्ष रह चुके हैं । इस आयोग के अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति फरवरी, 2000 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्ववाली भाजपा गठजोड़ सरकार ने की थी । जस्टिस वेंकटचलैया ने जो आपत्तियां उठायी हैं, उन्हें एक सिरे से खारिज नहीं की जा सकती । उनका कहना है कि लोकसभा और विधान सभाओं का चुनाव एक साथ कराने का फैसला सभी निर्वाचित जन प्रतिनिधियों से मशविरा के बाद ही किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना जरूरी है कि इस प्रक्रिया में संघीय सिद्धांत का उल्लंघन न हो । उन्होंने एक और अहम सवाल उठाया है कि अगर लोकसभा चुनाव को विधान सभाओं से जोड़ दिया जाए तो स्थानीय मुद्दे बैकसीट पर चले जाएंगे । विधान सभा चुनाव मुख्य रूप से स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं । जस्टिस वेंकटचलैया ने 17 अप्रैल को ही अपनी प्रतिक्रिया दे दी, जिस दिन विधि आयोग ने मसौदा सार्वजनिक किया ।

अभी तक संविधान संशोधन पर ही विधि आयोग चुनाव आयोग दोनों का फोकस है । राजनीतिक दलों की सहमति के बगैर इतने सारे संशोधन हो ही नहीं सकते, जिनकी एक साथ चुनाव कराने में ही कोई दिलचस्पी नहीं है । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चार साल से इस पर बहस कराने की कवायद करनेवाले एकमात्र व्यक्ति हैं । उनके लिए यह इतना महत्वपूर्ण मुद्दा है कि फरवरी, 2018 में संसद के बजट सत्र की शुरूआत वाले राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के अभिभाषण में एक साथ चुनाव की जरूरत पर बल दिया गया । फिर प्रधानमंत्री ने भी इसे दुहराया । संसद के अंदर और बाहर किसी भी राजनीतिक दल के नेता ने इसे चर्चा योग्य नहीं माना ।

एक साथ चुनाव कराना सिर्फ चुनाव आयोग और विधि आयोग के वश का नहीं है । यह तभी संभव है, जब राजनीतिक दल चाहें । इतने सारे संविधान संशोधन के मसादे पर पहले तो सभी दल एकजुट हाकर संविधान के मूल ढांचे के साथ छेड़छाड़ का आरोप लगायेंगे, जिसकी आशंका विधि आयोग ने ही जतायी है । सारा विपक्ष एकजुट होकर उपचुनावों में भाजपा को बार-बार पटखनी दे रहा है । ईवोएम के अलावे चुनाव की भी भूमिका संदिग्ध बनी हुई है । अपनी छवि के बारे में जनता के बीच सफाई प्रस्तुत करने के लिए मुख्य चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत को अपने पूर्ववर्ती सीईसी की बैठक बुलानी पड़ी । एक साथ चुनाव विमर्श प्रक्रिया के दौरान ही 21 मई को बुलायी गयी इस बैठक में पूर्व सीईसी एम. एस. गिल, जे. एम. लिंगदोह, टी. एस. कृष्णामूर्ति, बो. बो. टंडन, वी. एस. संपत, एस. वाई. कुरैशी, नसीम जैदी, एच. एस. ब्रह्मा ने हिस्सा लिया ।

एक साथ चुनाव का आइडिया वास्तव में चुनाव आयोग का ही है, जो 1983 में आयोग ने अपनी वार्षिक रिपोर्ट में दी । फिर जनवरी,2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गठित नीति आयोग ने इस पर एक कार्यपत्र मसौदा तैयार किया ।

प्रधानमंत्री का कहना तो सही है कि बार-बार चुनाव से मतदाताओं के पैसे की बर्बादी होती है । उम्मीदवार भी पैसा पानी की तरह बहाते हैं ।

कर्नाटक विधान सभा चुनाव अभी तक का सबसे महंगा चुनाव माना गया, जिसमें 10,000 करोड़ रूपये खर्च हुए । भाजपा के 218 उम्मीदवारों में से 91 प्रतिशत करोड़पति और अपराधी छवि के थे । जद(एस) के 29 प्रतिशत उम्मीदवार करोड़पति और अपराधी छवि के थे ।

चुनाव आयोग को इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के पास गुहार लगानी पड़ी है कि ऐसी छविवाले उम्मीदवारों को टिकट न दिया जाए और उनके पर्चे रद्द करने का अधिकार दिया जाए । एक साथ चुनाव के लिए पहले से बने कानून में संशोधन से पहले अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने का कानून तो बने ।