लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव में दागियों के बार-बार उम्मीदवार बनाने के राजनीतिक दलों के रवैए पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा कदम उठाया है । दागी सांसदों, विधायकों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे लंबे समय तक खींचने तथा राज्य सरकारों द्वारा मुकदमे वापस लेने की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट यह सख्त निर्देश जारी किया है ।

चीफ जस्टिस एन. वी. रमण की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा है कि राज्य सरकारें दागी सांसदों, विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे राज्य हाईकोर्टों की इजाजत के बगैर वापस नहीं ले सकती ।

चीफ जस्टिस के अलावे जस्टिस विनीत सरन और जस्टिस सूर्यकांत की शीर्ष कोर्ट पीठ ने हाईकोर्टों से कहा है कि 16/09/2020 के सुप्रीम कोर्ट के ही निर्देश के आलोक में इस बात की जांच करें कि उस समय से लेकर अभी तक कितने मुकदमे वापस लिए गए । वे मुकदमे लंबित थे या निपटा लिए गए थे । शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्टों के मुख्य न्यायाधीशों को 16 सितंबर, 2020 को निर्देश दिया था कि मौजूदा और पूर्व दागी सांसदों, विधायकों के खिलाफ चल रहे मुकदमों की मानीटरिंग की जाए और उसके लिए विशेष पीठ गठित की जाए ।

इस मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में कई वर्षों से चल रही है और शीर्ष कोर्ट के बार-बार निर्देशों की कोई राजनीतिक पार्टी परवाह नहीं कर रही है ।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही नियुक्त एमीकस क्यूरे सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया का आग्रह स्वीकार करते हुए शीर्ष कोर्ट ने गत हफ्ते यह निर्देश दिया है कि राज्य सरकारें हाईकोर्टों की अनुमति के बिना दागी सांसदों/विधायकों के खिलाफ मुकदमे वापस नहीं ले सकती ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि कोविड-19 महामारी के कारण कोर्टों के काम बाधित हुए और सभी हाईकोर्टों के रजिस्ट्रार जनरलों से जजों की पोस्टिंग तथा दागियों के खिलाफ लंबित/निबटाए गए मुकदमों की संख्या का विवरण भी उपलब्ध कराने कहा है ।

शीर्ष कोर्ट पीठ ने यह भी निर्देश दिया है कि लंबित मुकदमे के जल्द निष्पादन के लिए उन स्पेशल कोर्टों या सीबीआई कोर्टों के जजों का तबादला अगले आदेश तक न किया जाए, जिनके पास दागी सांसदों/विधायकों का मामला हो ।

सुप्रीम कोर्ट भाजपा नेता और वकील अश्वनी उपाध्याय की याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिन्होंने दागी सांसदों, विधायकों क खिलाफ चल रहे लंबित मुकदमे सलटाने के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्टों की स्थापना का आग्रह किया हुआ है ।

उपाध्याय की लंबित पीआईएल(जनहित याचिका) सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस एन. वी. रमण की पीठ द्वारा सुनवाई के लिए मंजूर किए जाने के दिन 06/08/2021 को उपाध्याय ने पीठ को बताया कि यह मामला 04/11/2020 को ही सूचीबद्ध की गयी थी और तेजी से सुनवाई का आग्रह किया । नवंबर, 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने दागियों वाले लंबित मुकदमे निबटाने के लिए हर राज्य में स्पेशल कोर्ट गठित करने का आदेश दिया । उसके अनुसार देशभर में 12 ऐसे कोर्ट गठित किए गए । बहरहाल लंबित मुकमदों की संख्या अभी भी बहुत ज्यादा और निष्पादन की दर बहुत कम है । सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सहायता के लिए वकील विजय हंसारिया को एमीकस क्यूरे नियुक्त किया । 6 अगस्त का ही हंसारिया ने शीर्ष कोर्ट को बताया कि मुकदमों के लंबित रहने का एक बड़ा कारण हाईकोर्टों द्वारा स्टे दिया जाना है । उसी पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट चीफ जस्टिसों को कहा कि दागियों के खिलाफ मुकदमे की प्रगति की मानीटरिंग के लिए स्पेशल कोर्ट गठित किया जाए ।

राजनीति में बढ़ चुके अपराधीकरण पर नकेल कसने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 10/08/2021 को अपने पूर्व के दिशानिर्देशों में संशोधन करते हुए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा के 48 घंटे के भीतर सभी दलों को उनसे जुड़ी जानकारी साझा करने का आदेश दिया । जस्टिस आर. एफ. नरीमन और वी. आर. गवई की खंडपीठ ने अपने 13/02/2020 के फैसले में राजनीतिक दलों को अपने उम्मीदवारों के आपराधिक रिकार्ड का खुलासा करने के लिए कम-से-कम दो दिन और ज्यादा-से-ज्यादा दो हफ्ते का समय दिया था । इसमें संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट की इसी खंडपीठ ने 10/08/2021 को यह समयसीमा अधिकतम 48 घंटे कर दी । शीर्ष कोर्ट ने यह संशोधन एक वकील ब्रजेश मिश्र की अवमानना याचिका पर दिया, जिसमें दावा किया गया कि राजनीतिक दल सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने लाचारी में जनता की अदालत पर यह तय करने का फैसला छोड़ दिया कि दागियों को जनप्रतिनिधि न चुना जाए । इसके पहले कई बार सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी करके पूछा कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए क्या किया जा रहा है । चुनाव आयोग ने साफ-साफ कह दिया कि दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार उसके पास नहीं है और सरकार इसके लिए कानून बनाने के उसके आग्रह को चुनाव सुधारों की धूल खाती फाईल में डाले हुई है । चुनाव आयोग ने 2016 से 2020 तक सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में चली कई सुनवाई में कहा कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार सरकारें देना नहीं चाहती और राजनीतिक दल दागियों को उम्मीदवार बनाने से बाज नहीं आ रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट ने उसके बाद सरकार से कहा कि संसद से इस तरह का कानून बनाया जाए । लेकिन केंद्र सरकार ने हाथ खड़े कर दिये । क्योंकि सत्तारूढ़ समेत कोई पार्टी इसके पक्ष में नहीं थी । कांग्रेस गठजोड़ के समय से शुरू यह सिलसिला भाजपा गठजोड़ शासनकाल में भी जारी है । सरकारों ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि कोर्टों में मुकदमे लंबे समय तक चलते हैं और कई बार फर्जी मामले दायर कर दिए जाते हैं । ऐसे में किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने के हक से वंचित नहीं किया जा सकता । उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मुकदमे के शीघ्र निबटारे और चुनाव आयोग के जरिए सीधे मतदाताओं की कोर्ट में उनके विवेक पर मामला डाल दिया । 10/08/2021 को दागी सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित मुकदमे के संबंध में सुनवाई के दौरान सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए सरकार प्रतिबद्ध है । यह दलील सरकार की ओर से उस समय पेश की गयी, जब सुप्रीम कोर्ट लंबित मुकदमे को रफादफा करने की विभिन्न दलों की सरकारों के रवैए पर अंकुश लगाने के लिए हाईकोर्टों के लिए निर्देश जारी कर रही थी । सोलिसिटर जनरल ने सरकार के लचर रूख की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को उस वक्त दी, जब चीफ जस्टिस ने सितंबर, 2020 के आदेश की याद दिलायी, जिसमें तुषार मेहता ने लंबित मुकदमे की स्टेटस रिपोर्ट सौंपने के लिए और समय मांगा था । सुप्रीम कोर्ट ने 10/08/2021 को इस बात पर नाराजगी जतायी कि सरकार सांसदों/विधायकों के खिलाफ चल रहे उन मुकदमों की स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं किया, जिनकी जांच सीबीआई और म्व(प्रवर्तन निदेशालय) कर रही है ।

एसोसिएसन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान लोकसभा में 233 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं । यह संख्या लगातार बढ़ती गयी हे । 2014 लोकसभा में 187 दागी थे, 2009 में 162 थे और 2004 में 128 लोकसभा सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मामले लंबित थे ।

बिहार विधान सभा चुनाव करीब था । 2020 में उसी दौरान मतदाताओं की अदालत के जिम्मे यह गंभीर मामला सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को सौंपा और यह देखने का निर्देश दिया कि दिशानिर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं । 01/10/2020 को चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव की अधिसूचना जारी की और उसके पहले सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार दागियों तथा उन्हें टिकट देनेवाले दलों को आपराधिक मुकदमे का टीवी और अखबारों के जरिए बार-बार खुलासा करने कहा । किसी दागी ने इस निर्देश का पालन नहीं किया और चुनाव आयोग कानूनी अधिकार के अभाव में कुछ नहीं कर पाया । उस वक्त सुप्रीम कोर्ट के जज एन. वी. रमण ने 10/09/2020 को सरकारों से विभिन्न कोर्टों में सांसदों/विधायकों के खिलाफ लंबित तकरीबन 4000 आपराधिक मुकदमे जल्द निबटाने कहा । शीर्ष कोर्ट ने यह कहकर केंद्र और राज्य सरकारों की असलियत सामने ला दी कि इनमें से कई मुकदमे 36-40 वर्षों से लंबित हैं और इसका कारण यह है कि सांसदों/विधायकों के खिलाफ कानून का काम करने से पुलिस अधिकारी कतराते हैं ।