मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत को आखिरकार स्पष्ट कहना पड़ गया कि निकट भविष्य में एक साथ चुनाव कराना संभव नहीं है । उन्होंने यह भी साफ तौर पर कह दिया कि इसके लिए कानूनी ढांचा तैयार करना पड़ेगा, जो संविधान में संशोधन किए बगैर असंभव है। इतना ही नहीं, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा चलायी जा रही एक साथ चुनाव मुहिम के जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त ने मतदान संकट की वास्तविक स्थिति भी बता दी कि इसके लिए शत प्रतिशत वीवीपीएटी(वेरिफिएबल पेपर ट्रेल) मशीनों की उपलब्धता भी बड़ी अड़चन होगी ।

चुनाव आयोग के लिए इस गले की फांस से छुटकारा पाना कठिन हो रहा है । क्योंकि केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार लगातार चुनाव आयोग पर एक साथ चुनाव कराने का अप्रत्यक्ष दवाब बना रही है, जिसकी कमान स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने थाम रखी है । अभी मुख्य चुनाव आयुक्त को इसलिए अपनी संवैधानिक दिक्कतें बतानी पड़ी, क्योंकि भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा विधान सभा चुनाव एक साथ कराने के लिए विधि आयोग को पत्र लिखा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा शीर्ष नेतृत्व में नंबर दो अमित शाह में से कोई भी एक साथ चुनाव कराने के रास्ते में आनेवाली संवैधानिक अड़चनों की बात नहीं करते । दोनों में से किसी भी नेता को इससे मतलब नहीं है कि चुनाव आयोग को इसमें क्या-क्या दिक्कतें आएंगी, ये सिर्फ जन चर्चा कराकर माहौल बनाना चाहते हैं । नरेंद्र मोदी और अमित शाह समेत किसी भी भाजपा नेता ने उन संविधान संशोधनों की कभी बात नहीं की, जिसके बिना चुनाव आयोग को एक साथ चुनाव कराने का कानूनी अधिकार नहीं मिल सकता । दोनों नेताओं की मुहिम से लगता है कि इस राजनीतिक मुद्दे को संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग पर थोपना चाहते हैं और विधि आयोग का उसके लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं । भाजपा को छोड़ कोई राजनीतिक दल एक साथ चुनाव तो क्या, इस पर चर्चा के भी पक्ष में नहीं हैं । विधि आयोग ने प्रयास करके देख लिया । विधि आयोग ने चुनाव आयोग से राय मांगी तो चुनाव आयोग ने अप्रील में ही इस रास्ते में आनेवाली कानूनी और वित्तीय अड़चनों की ओर विधि आयोग का ध्यान दिला दिया ।

लोकसभा विधान सभा चुनाव एक साथ कराने के सरकार पोषित प्रस्ताव पर राजनीतिक दलों की राय जानने के लिए विधि आयोग ने 17 अप्रील को कार्यपत्र सार्वजनिक किया और इसके लिए आठ मई तक का समय तय किया । मई पूरा महीना गुजर गया, किसी भी पार्टी ने उस प्रस्ताव को राय देने लायक नहीं समझा । पर उसके बावजूद प्रधानमंत्री ने इस पर चर्चा कराने को मुद्दा बनाए रखा । ऐसा संदेश जनता के बीच जा रहा था मानो चुनाव आयोग और विधि आयोग चाहे तो एक साथ चुनाव कराया जा सकता है । विधि आयोग का काम चुनाव कराना नहीं है, सिर्फ सुझाव दे सकता है । चुनाव आयोग के पास उसके लायक जरूरी कानूनी अधिकार नहीं है ।

हालिया घटनाक्रम में चुनाव आयोग को अपने गले की फांस निकालने का प्रयास करना पड़ा । भाजपा प्रमुख अमित शाह ने 13 अगस्त को जश्न-ए-आजादी मनाने के उपलक्ष में ‘एक देश एक चुनाव’ की दुहाई देकर एक साथ चुनाव कराने के लिए विधि आयोग को पत्र लिखा । उसके अगले ही दिन 14 अगस्त को मुख्य चुनाव आयुक्त ने स्पष्ट कर दिया कि प्रस्तावित एक साथ चुनाव के लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत पड़ेगी । इस पहलू पर बल देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने कहा निकट भविष्य में लोकसभा विधान सभा चुनाव एक साथ कराना संभव नहीं है । सीईसी(मुख्य चुनाव आयुक्त) ने यह कहकर अपना बोझ उतार दिया कि अगर कुछ विधान सभाओं के कार्यकाल कम करने होंगे या बढ़ाने होंगे तो उसके लिए संविधान संशोधन जरूरी है । ‘एक देश एक चुनाव’ के मुद्दे पर सीईसी ने कहा कि चुनाव आयोग ने इस संबंध में 2015 में ही अतिरिक्त पुलिस बल, मतदान कर्मी और इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन(ईवीएम) की जरूरत से सरकार को अवगत करा दिया था ।

चुनाव आयोग की तरह विधि आयोग भी फंसा है । अमित शाह से पहले कांग्रेस के ही शीर्ष नेताओं ने विधि आयोग से मिलकर एक साथ चुनाव को ‘असंवैधानिक और अव्यावहारिक’ बताया । मल्लिकार्जुन खर्गे, पी. चिदंबरम, कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु संघवी, आनंद शर्मा जैसे कांग्रेस नेताओं ने तीन अगस्त को विधि आयोग के अध्यक्ष पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज बी. एस. चौहान से मुलाकात की। इन नेताओं ने विधि आयोग को बताया कि 1950 और 1951 के जन प्रतिनिधित्व कानून के प्रावधानों के अनुसार मौजूदा हालातों में एक साथ चुनाव कराना असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक हागा, जिसकी कानूनन मनाही है । कांग्रेस ने 1979, 1990, 1998 और 1999 का उदाहरण देते हुए बताया कि लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ कराना तभी संवैधानिक माना जाएगा, जब कोई पार्टी लोकसभा या विधान सभा का विश्वास खो दे और ऐसा कोई विकल्प न हो जो नई सरकार बना सके - ऐसी ही स्थितियों में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं । कांग्रेस नेताओं ने विधि आयोग को बताया कि ऐसी स्थिति न तो लोकसभा में है, न ही किसी विधान सभा में । फिर चुनाव आयोग ने जब 14 अगस्त को अपनी लाचारी स्पष्ट की, उसके बाद कांग्रेस ने चुटकी लेते हुए कहा कि क्या भाजपा गुजरात विधान सभा चुनाव समय पूर्व भंग करने को राजी होगी? इतना सब होने के बावजूद चुनाव आयोग एक साथ चुनाव पर सभी दलों से विमर्श करना चाहता था । लेकिन तबतक ईवीएम छेड़छाड़ मामले ने तूल पकड़ लिया । तीन अगस्त के बाद से सभी विपक्षी दलां ने ईवोएम छेड़छाड़ पर एकजुटता दिखायी और लोकसभा चुनाव बैलेट से कराने की मांग तेज कर दी । कांग्रेस समेत 17 राजनीतिक दलों में ईवोएम छेड़छाड़ के खिलाफ ऐसी सहमति बनी कि चुनाव आयोग को नौ अगस्त को ही इस पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की घोषणा करनी पड़ गयी । चुनाव आयोग ने इसके लिए 27 अगस्त की तारीख तय की । जबकि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही ईवोएम में छेड़छाड़ मामले में चुनाव आयोग को सफाई देनी पड़ रही है । अब चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट में यह बताना है कि 30 सितंबर तक लोकसभा चुनाव के लिए जरूरी ईवीएम और वीवीपीएटी उपलब्ध हो जाएंगे या नहीं । सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग यह साबित करने में विफल साबित हुआ है कि ईवोएम ‘फुलप्रूफ’ है और इसमें छेड़छाड़ नहीं की जा सकती । गत वर्ष गुजरात विधान सभा चुनाव के समय तो वीवीपीएटी भी विवाद के घेरे में आ गयी । चार महीना पहले जब विधि आयोग और चुनाव आयोग ने साथ चुनाव पर चर्चा शुरू की, उसी समय से राजनीतिक दलों ने ईवोएम को मुद्दा बनाया और एक साथ चुनाव पर उदासीनता बरती । अभी जब फिर से साथ चुनाव पर चर्चा शुरू हुई है तो पार्टियों ने ईवीएम को तूल दे दिया । एक साथ चुनाव चर्चा तो प्रधानमंत्री के निर्देश पर नीति आयोग ने 2015 में ही जनता के बीच डाला । चुनाव आयोग ने अपनी संवैधानिक दिक्कतें बता दी । लेकिन यह मुद्दा राजनीतिक बना हुआ है । मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने 21 जनवरी, 2018 को सीईसी का पदभार ग्रहण करते ही इस फांस से मुक्ति पाना चाहा । उन्होंने पहला वक्तव्य यही दिया कि निकट भविष्य में लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ कराना कठिन है । ओ पी रावत ने अपने पूर्ववर्ती सीईसी अचल कुमार जोती से पदभार ग्रहण किया जो चार महीने में एक साथ चुनाव कराने को तैयार थे । अचल कुमार जोती अक्टूबर, 2017 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव साथ न करा पाने के बावजूद यह विवादित बयान और उस पर ‘सफाई’ देते रहे । उस वक्त चुनाव आयुक्त ओ पी रावत भोपाल में तीन अक्टूबर को ईवोएम निष्पक्षता और पारदर्शिता डिस्प्ले कार्यक्रम में बोले कि ‘हम सितंबर, 2018 तक एक साथ चुनाव करा सकते हैं’ । अभी सीईसी ओ पी रावत को सिर्फ 2019 लोकसभा चुनाव के लिए आवश्यक ईवीएम और वीवीपीएटी जुटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में दी गयी 30 सितंबर की डेडलाईन पूरी करनी कठिन हो रही है । सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफनामे के अनुसार चुनाव आयोग को जरूरत की सारी ईवीएम - 13.95 लाख बैलट यूनिट, 9.3 लाख कंट्रोल यूनिट 30 सितंबर तक जुटा लेनी है और सितंबर के अंत तक वीवीपीएटी भी प्राप्त कर लेनी है । लेकिन एक साथ चुनाव के लिए आवश्यक संविधान संशोधन की चर्चा चार साल में प्रधानमंत्री समेत किसी भाजपा नेता के मुंह से सुनने को नहीं मिली । इसके लिए एक-दो नहीं, पांच एक्ट में संशोधन करन पड़ेंगे । ये हैं - राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा भंग के बारे में अनुच्छेद 85, विधान सभाओं के कार्यकाल से संबंधित अनुच्छेद 102, विधायी प्रस्तावों को संहिताबद्ध करने वाले संविधान(संशोधन) अधिनियम, 2020 और अनुच्छेद 104, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 106, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 107, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 108, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान 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2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में प्रस्तावित विधेयक, 2020 और अनुच्छेद 109, 2020 विधान सभा चुनाव के संबंध में रिपोर्ट में है । चुनाव आयोग ने 2000 करोड़ रूपए मूल्य की ईवीएम वीवीपीएटी की आवश्यकता मार्च, 2018 में ही जतायी ।