बिहार विधान सभा चुनाव के लिए जारी मतदान प्रक्रिया के बीच में ही चुनाव आयोग को उन दागी उम्मीदवारों से जवाबतलब करना पड़ गया, जिन्होंने अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे का विवरण अखबारों और टीवी चैनलों में प्रसारित/प्रकाशित नहीं करवाया । दूसरे चरण के मतदान तीन नवंबर से पहले जब चुनाव प्रचार समाप्त होने की समय सीमा समाप्त होन में एक दिन बचे थे, उसी वक्त चुनाव आयोग ने वैसे दागी उम्मीदवारों को नोटिस भेजकर जवाब मांगा ।

चुनाव अधिसूचना जारी होने से एक महीना पहले ही चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के लिए अपने खिलाफ चल रहे लंबित आपराधिक मुकदमे की जानकारी अखबार, टीवी चैनलों और सोशल मीडिया के जरिए देना अनिवार्य कर दिया । यह चुनाव प्रचार की तरह दागी पृष्ठभूमि का भी प्रचार करने जैसा निर्देश है, ताकि मतदाताओं की अदालत में ही फैसला हो कि दागियों को लॉ मेकर(कानून बनानेवाला) बनाया जाए या नहीं ।

लेकिन सभी दलों की ओर से मैदान में उतारे गए उम्मीदवारों और उनकी पार्टियों ने चुनाव आयोग के आदेश की परवाह नहीं की । ज्यादातर दागी उम्मीदवारों ने तो अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे का विवरण बिल्कुल ही सार्वजनिक नहीं किया । इन मुकदमे में फंसे जो कुछेक उम्मीदवारों ने अखबारों में छपाया भी तो उसमें चुनाव आयोग के निर्देश का अनुपालन जरूरी नहीं समझा । चुनाव आयोग के निर्देश के अनुसार दागियों को अपने आपराधिक रिकार्ड की जानकारी मतदाताओं को बार-बार देनी है । कम-से-कम तीन बार देना तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार अनिवार्य है ।

दागी उम्मीदवारों को अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का पहली बार प्रचार नाम वापसी की तारीख के चार दिनों के अंदर करना था । दूसरी बार नाम वापसी की तारीख के पांचवें से लेकर आठवें दिन के अंदर करना था और तीसरी बार दागियों को अपना विवरण चुनाव प्रचार के अंतिम दिन तक प्रचारित करने का निर्देश था । चुनाव आयोग ने सम्बन्धित दलों को भी निर्देश दिया था कि यदि कोई पार्टी दागी को उम्मीदवार बनाता है तो उसका भरपूर प्रचार करने को जिम्मेदारी पार्टी की होगी । इसका प्रचार न सिर्फ प्रत्याशी, बल्कि उसकी पार्टी भी अखबार और टीवी चैनलों में करेगी । निर्वाचन आयोग ने संभवतः पहली बार किसी चुनाव में ऐसा निर्देश जारी किया ।

पार्टियों ने और उम्मीदवारों ने चुनाव आयोग के निर्देशों को हल्के ढंग से लिया । बिहार निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार 28 अक्टूबर को पहले चरण की 71 सीटों के लिए हुए मतदान के दिन तक 104 दागी उम्मीदवारों ने अपना आपराधिक विवरण किसी अखबार में प्रकाशित नहीं कराया । अन्य उम्मीदवारों में कुछ ने एक बार, कुछ ने दो बार, तीन बार तो किसी ने अपना ‘दुष्प्रचार’ नहीं किया ।

चुनाव आयोग ने पहले चरण की सीटों से लड़ रहे ऐसे 104 दागी उम्मीदवारों को 31 अक्टूबर को नोटिस भेजकर जवाब मांगा, जिन्होंने एक बार भी अपने आपराधिक पृष्ठभूमि का प्रचार अखबार या टीवी में नहीं किया । निर्वाचन विभाग के अनुसार पहले चरण में कुल 327 उम्मीदवारों का आपराधिक रिकार्ड है ।

प्रश्न है कि कोई भी दल या उसके दागी उम्मीदवार चुनाव आयोग के ऐसे निर्देशों की परवाह क्यों करे । चुनाव प्रचार की तरह आपराधिक पृष्ठभूमि की प्रचार खुद से क्यों करे । पहले चरण के मतदान में आपराधिक रिकार्ड का प्रचार न करनेवाले उम्मीदवारों को चुनाव आयोग की नोटिस मिलने के बावजूद दूसरे चरण के मतदान वाले दागियों ने इस निर्देश का पालन नहीं किया। तीन नवंबर का दूसरे चरण के चुनाव में खड़े 176 प्रत्याशियों में से भी 154 को निर्वाचन कार्यालय ने अपना आपराधिक रिकार्ड अखबारों और टीवी चैनलों में प्रकाशित/प्रसारित नहीं करने के लिए नोटिस जारी किया । चुनाव विभाग ने इन उम्मीदवारों स पूछा कि निर्वाचन आयोग की अवहेलना के कारण क्यों न कार्रवाई की जाय ।

जिस चुनाव आयाग को दागियों की ओर से पर्चे के साथ अनिवार्य रूप से दिए गए हलफनामे में आपराधिक रिकार्ड की जानकारी देने के बावजूद उनके पर्चे रद्द करने का अधिकार नहीं है, वो संवैधानिक संस्था अपने दासों का प्रचार न करनेवाले उम्मीदवारों का क्या बिगाड़ सकती है, यह तो बिगड़ने के बाद ही पता चलेगा ।

मतदाताओं के हाथ में क्या है, यह बात किसी से छिपी नहीं है । दागियों की ही जीत सुनिश्चित मानी जाती है । इसलिए कोई भी पार्टी दागी उम्मीदवारों के दावे की अनदेखी नहीं कर सकती । संविधान की धारा-324 के अंतर्गत चुनाव से संबंधित सारे अधिकारों से लैस निर्वाचन आयोग के हाथ में दागियों के खिलाफ कोई कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है, यह आम मतदाता नहीं जानते । सभी दलों को पता है कि ऐसा कोई कानून नहीं है, जो दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग को दे या उन्हें चुनाव लड़ने से रोकने की अन्य कोई कार्रवाई करे ।

मतदान प्रक्रिया का एलान करने से पहले चुनाव आयोग ने दागदारों के प्रचार का जो निर्देश जारी किया, वो सुप्रीम कोर्ट का भी आदेश नहीं, निर्देश है । सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों की संविधान पीठ ने 25 सितंबर, 2018 को अपने निर्देश में कहा कि सारे दागी उम्मीदवारों को पर्चे भरने से पहले अपने आपराधिक रिकार्ड की जानकारी चुनाव आयोग को देनी होगी और अखबार तथा टीवी के जरिए आपराधिक मुकदमे का खूब प्रचार-प्रसार करना होगा । ऐसा निर्देश शीर्ष कोर्ट को तब देना पड़ा, जब सुप्रीम कोर्ट के बार-बार कहने के बावजूद सरकार ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून बनाने से इन्कार कर दिया । 2014 लोकसभा चुनाव के बाद से सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में दायर दागियों पर सुनवाई चल रही है । नबंवर, 2017 में सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में चुनाव आयोग ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि कई वर्षों से दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार सरकार से मांगा जा रहा है । तीन दशकों से चुनाव सुधार की चुनाव आयोग की फाइलें सरकार के पास ‘विचाराधीन’ है, जिनमें पहले नंबर पर ऐसा कानून बनाने का सुझाव है ताकि दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मिले ।

सुप्रीम कोर्ट के चार चीफ जस्टिस इस मामले पर सरकार को फटकार लगा चुके हैं । 2018 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकनेवाला कानून बनाना संसद का काम है और ऐसा बिल लाना सरकार का महकमा है । इस संबंध में कोई आदेश देना ‘लक्ष्मण रेखा’ की सीमा का उल्लंघन माना जाएगा । 2019 में भी पूरे वर्ष सुनवाई चलती रही ।

एक अक्टूबर, 2020 को चुनाव आयोग ने बिहार चुनाव की अधिसूचना जारी की और उसके पहले 11 सितंबर को दागियों तथा उन्हें टिकट देनेवाले दलों को आपरधिक मुकदमे का बार-बार खुलासा करने का निर्देश दिया । चुनाव अधिसूचना जारी होने से पहले और उसके बाद भी दागी संसद सदस्यों/विधायकों के खिलाफ विभिन्न कोर्टों में वर्षों से मुकदमे लंबित रहने के मामले की सुनवाइ सुप्रीम कोर्ट में चल रही थी ।

जस्टिस एन. बी. रमना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट ने 10 सितंबर को सरकार से विभिन्न कोर्टों में लामेकरों के खिलाफ लंबित तकरीबन 4000 आपराधिक मुकदमे जल्द निबटाने कहा । सरकार की ओर से पेश सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि हमने इसे ‘गंभीरता’ से लिया है । सरकार की गंभीरता का प्रमाण यही है कि सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कहा कि इनमें से कई मुकदमे 36-40 वर्षों से लंबित है । पांच अक्टूबर की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकारों की असलियत यह कहकर सामने ला दी कि संसद सदस्यों और विधायकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे के लंबित रहने का मुख्य कारण यह है पुलिस अधिकारी उनके खिलाफ कानून का काम करने से कतराते हैं ।

13 अक्टूबर के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामले निबटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट और स्पेशल कोर्ट गठन का विवरण सरकार से मांगा । सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में दायर चाचिका के अनुसार स्पेशल कोर्टों में लंबित मुकदमे में उत्तर प्रदेश और बिहार टॉप पर है। बिहार में लॉ मेकरों के खिलाफ 531 मुकदमों में से 256 लंबित मुकदमे वर्तमान विधायकों के खिलाफ लंबित हैं । उत्तर प्रदेश में 446 लंबित आपराधिक मामलों से 217 में वर्तमान विधायक फंसे हैं ।

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने लामेकरों को ‘विशेषाधिकार’ देनेवाली जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8/4 निरस्त कर दी, जिसके तहत जेल में सजा काटते हुए ‘माननीय’ लोग चुनाव लड़ते थे और जीतने के बाद अपने प्रभाव की धौंस पुलिस पर जमाते थे । इसके काट में कांग्रेस गठजोड़ सरकार ने तुरंत अध्यादेश का मसौदा तैयार कर लिया । मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत सभी पार्टियां इसके पक्ष में थी । शुक्र है राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का, जिन्होंने इस अध्यादेश के औचित्य पर सवाल उठा दिया ।

वर्तमान बिहार विधान सभा में 58% सदस्य दागी हैं और 40 के खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं । एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) से प्राप्त यह विवरण सुप्रीम कोर्ट के पास 2018 में ही पहुंची । 15 फरवरी, 2020 को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2018 का फैसला दुहराते हुए कहा कि जिताऊ होना उम्मीदवारी के चयन का आधार नहीं हो सकता । जिताऊ होने के कारण कोई पार्टी दागियों को चुनाव लड़ने से रोकनेवाला कानून बनाने के पक्ष में नहीं है । संसद में आज तक किसी सदस्य ने यह मामला नहीं उठाया । एडीआर की रिपोर्ट के अनुसार बिहार के 36% संसद सदस्यों और विधायकों के खिलाफ 20 वर्षों से गंभीर आपराधिक मुकदमे लंबित हैं ।