‘एक देश एक चुनाव’ की बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रायः अपने हर भाषण में करते हैं । जब चुनाव का समय आता है तो चुनाव आयोग के सामने इस प्रस्ताव को अमल में लाने की जो दुविधा उपस्थित होती है, उस पर प्रधानमंत्री समेत उनके इस नारे को दुहराने वाले भाजपा नेता भी चुप लगा जाते हैं । हरियाणा और महाराष्ट्र विधान सभाओं की चुनाव तारीखों के एलान में झारखंड और दिल्ली को शामिल नहीं किया गया । चुनाव आयोग ने 21 सितंबर को एलान किया कि हरियाणा और महाराष्ट्र विधान सभाओं के लिए मतदान 21 अक्टूबर को कराए जाएंगे । एक ही चरण में मतदान होगा और 21 अक्टूबर को ही 17 राज्यों में रिक्त विधान सभा सीटों के लिए भी उपचुनाव कराए जाएंगे ।

झारखंड और दिल्ली विधान सभाओं का चुनाव हरियाणा और महाराष्ट्र के साथ कराना चुनाव आयोग के लिए संभव नहीं हो पाया । जबकि झारखंड और दिल्ली विधान सभा का कार्यकाल समाप्त होने में हरियाणा तथा महाराष्ट्र के मुकाबले ज्यादा समय का अंतर नहीं है । मात्र एक हफ्ते के अंतर से नवंबर में महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभाओं का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। कुछ ही हफ्ते बाद झारखंड और दिल्ली का नंबर आता है ।

चुनाव आयोग की घोषणा के अनुसार मतदान के तीन दिन बाद 24 अक्टूबर को मतों की गिनती होगी । परिणाम घोषित होने बाद समय से दोनों राज्यों की विधान सभाएं गठित हो जाएंगी । हरियाणा विधान सभा 2 नवंबर को और महाराष्ट्र विधान सभा 9 नवंबर को समाप्त होगी ।

मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने 21 सितंबर को कहा कि झारखंड और दिल्ली विधान सभा चुनाव का एलान बाद में होगा । इस संबंध में संवाददाता सम्मेलन में पूछे गए सवालों के जवाब में मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ने वही कारण बताया जिसका निदान उनके पास नहीं है । उन्होंने कहा कि झारखंड विधान सभा का कार्यकाल 5(पांच) जनवरी को समाप्त होगा । ये वही समस्या है, जो सरकार शेयर नहीं करना चाहती । जबकि एक साथ चुनाव के रास्ते में आनेवाली ये अड़चन विधायी और संवैधानिक है, जो चुनाव आयोग का सिरदर्द नहीं है ।

प्रधानमंत्री समेत भाजपा शासित राज्य सरकारों को भी चुनाव आयोग की समस्या से कोई मतलब नहीं है । अपना कार्यकाल पूरा होने से पहले झारखंड की भाजपा सरकार अगर चुनाव चाहती तो सीईसी को सफाई देकर पल्ला नहीं झाड़ना पड़ता । सीईसी सुनील अरोड़ा ने साफ-साफ कह दिया - ‘झारखंड में सदन के नेता अगर विधान सभा भंग करके पहले चुनाव कराना चाहेंगे तो ये अलग मामला है । लेकिन चुनाव आयोग भला क्यों चाहेगा कि चुनाव पहले हो । एक साथ चुनाव पर चर्चा हो रही है । मगर जब तक राजनीतिक दलों में इस पर स्पष्ट आम राय न बने यह काम मौजूदा स्थिति में तो नहीं हो सकता ।’

दिल्ली विधान सभा का कार्यकाल झारखंड के बाद समाप्त होगा । जब झारखंड की भाजपा सरकार पहले चुनाव नहीं चाहती तो दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार क्यों चाहेगी । दिल्ली के बारे में तो सीईसी से अलग से न तो सवाल पूछा गया, न ही उन्होंने दिल्ली का जिक्र किया । ऐसी ही स्थिति के निदान के लिए सीईसी ने सरकार से संविधान संशोधन करने कहा ।

2018 में तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने कार्यकाल समाप्त होने के आठ महीना पहले ही विधान सभा भंग करके अलग से चुनाव कराने की नौबत ला दी । चुनाव आयोग की मुश्किल है, एक साथ और अलग-अलग चुनाव राजनीतिक कारणों से कराने की परिस्थिति से जूझना । इसके लिए सबसे पहले संविधान की धारा 83(2) और 172(1) बदलनी पड़ेगी । उसके अलावे अनुच्छेद 85(लोकसभा भंग के बारे में) विधान सभाओं के विघटन से संबंधित 174 और 356 में भी संशोधन आवश्यक है ।

दूसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने अपने पहले स्वतंत्रता दिवस संबोधन में 15 अगस्त का लाल किले से भाषण की शुरूआत ‘एक देश एक चुनाव’ से किया । प्रधानमंत्री का भाषण जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा धारा 370 समाप्त करके उस राज्य को एक देश एक संविधान के अंदर एक झंडे के नीचे लाने पर केंद्रित था । पांच अगस्त को संविधान संशोधन बिल संसद में लाकर धारा-370 को निरस्त किया गया । लेकिन मई में जम्मू व कश्मीर विधान सभा का चुनाव लोकसभा के साथ इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि भाजपा नहीं चाहती थी । चुनाव आयोग समेत जम्मू व कश्मीर के सभी राजनीतिक दल लोकसभा के साथ मई में चुनाव के पक्ष में थे । अभी तो धारा-370 और 35-ए खत्म किए जाने के कारण कानून व व्यवस्था के हालात खराब हुए हैं । लेकिन लोकसभा चुनाव के साथ जम्मू व कश्मीर में जिन राजनीतिक परिस्थितियों और कारणों से भाजपा चुनाव नहीं चाहती थी, वो सारी योजनाबद्ध तरीके से पैदा को गयी थीं । भाजपा ने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी गठबंधन से समर्थन वापस लेकर पहले जम्मू व कश्मीर में सरकार गिरायो । 19 जून, 2018 को राज्यपाल शासन लगा और 21 नवंबर, 2018 को राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने विधान सभा भंग कर दी । क्योंकि भाजपा जम्मू व कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करक ‘एक देश’ के अंदर लाकर एक साथ चुनाव में जम्मू व कश्मीर को शामिल करना चाहती थी । अभी 21 सितंबर को हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव तारीखों के एलान के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका में थे । 22 सितंबर को ‘हयूस्टन हाउडी मोदी’ पंप एंड शो के दौरान प्रधानमंत्री वहां कश्मीरी पंडितों के प्रतिनिधिमंडल से मिले । नरेंद्र मोदी ने कहा ‘कश्मीर में नयी हवा बह रही है ।’ मगर यह ऐसी हवा नहीं थी, ताकि वहां चुनाव कराया जा सके । जम्मू व कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों के सभी वरिष्ठ नेता अपने घरों में नजरबंद हैं । ‘एक देश एक चुनाव’ में जम्मू व कश्मीर को शामिल करना दिल्ली और झारखंड चुनाव के समय भी शायद संभव न हो पाए । झारखंड के कांग्रेस नेताओं ने ‘एक देश एक चुनाव’ नारे के कार्यान्वयन के अंदर छिपे पेंच पर सवाल उठाया । ‘एक देश एक चुनाव’ के अंतर्गत अभी उपचुनाव में 17 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश की 64 विधान सभा सीटें शामिल हैं । लोकसभा की मात्र एक सीट है । चुनाव आयोग ने 21 सितंबर को कर्नाटक की 17 रिक्त विधान सभा सीटों के लिए उपचुनाव का भी एलान कर दिया, जो विवाद के घेरे में है । राजनीतिक उठापटक से रिक्त इन सीटों के विधायक कांग्रेस और जद(सेक्यूलर) के हैं, जिन्हें जुलाई में विधान सभा अध्यक्ष के. आर. रमेश ने अयोग्य घोषित कर दिया । वे उस समय से लगातार सुप्रीम कोर्ट की दौड़ लगा रहे हैं और अपनी सीटें रिक्त मानने को तैयार नहीं हैं । अयोग्य घोषित इन 17 विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट में यह उपचुनाव स्थगित करने की अर्जी दी, जिसका 23 सितंबर को चुनाव आयोग ने विरोध किया परन्तु कहा कि स्पीकर की कार्रवाई इन विधायकों को चुनाव लड़ने के अधिकार से वंचित नहीं कर सकती । स्पीकर ने अपने आदेश में कहा था कि अयोग्य घोषित विधायकों को चुनाव लड़ने का हक 2023 तक नहीं है, जब कर्नाटक विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होगा । जुलाई में ही गुजरात में दो राज्यसभा सीटों के लिए अलग-अलग चुनाव कराने के कारण चुनाव आयोग की सुप्रीम कोर्ट में पेशी हुई । जबकि 19 जून को प्रधानमंत्री ने ‘एक देश एक चुनाव’ पर सर्वदलीय बैठक में विमर्श किया । वो इस विषय पर पहली बैठक थी । 2017 में मुख्य चुनाव आयुक्त ए. के. जोती ने हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधान सभाओं का कार्यकाल कुछ ही दिनों के अंतर से समाप्त होने के बावजूद एक साथ चुनाव नहीं कराया । सवाल उठा कि प्रधानमंत्री के चुनाव प्रचार दौरे की तारीखों का ख्याल करके चुनाव आयोग ने उन्हीं के नारे ‘एक देश एक चुनाव’ को अमली जामा नहीं पहनाया । नरेंद्र मोदी 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री बनने के समय से ही ‘एक देश एक चुनाव’ पर यह कहकर जोर दे रहे हैं कि बार-बार चुनाव से जनता का पैसा बहुत खर्च होता है, सरकारी काम बाधित होता है । उनका कहना सही है । जरा 2016 को याद कर लें, जब प्रधानमंत्री ने इस पर राजनीतिक चर्चा शुरू की। कई राज्यों में विधान सभा चुनाव की तैयारी चल रही थी । उस वक्त रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने अप्रील के पहले सप्ताह में राजकोषीय वर्ष की पहली द्वैमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के बाद कहा कि अभी हो रहे विधान सभा चुनावों के राजकोषीय वर्ष की पहली द्वैमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के बाद कहा कि अभी हो रहे विधान सभा चुनावों के दौरान 60,000 करोड़ से ज्यादा रूपये नगद जनता के हाथ में पहुंच गए, जो ‘सामान्य’ नहीं है, इस पर निगरानी की जरूरत है ।

रघुराम राजन को रिजर्व बैंक गवर्नर पद से इस्तीफा देना पड़ा । उसके बाद दो और गवर्नर गए । राजनीतिक दल चुनाव खर्च की सीमा बढ़ाना चाहते हैं, चुनाव आयोग तैयार नहीं है । 2016 में ही चुनाव आयोग ने एक आम चुनाव का खर्च 4500 करोड़ रूपये आंका, जिसमें पार्टियों और उम्मीदवारों द्वारा खर्च किया जानेवाला पैसा शामिल नहीं है ।