पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) की हर चुनाव में केंद्रीय निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों से ठन जाती है । ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि कलकता हाईकोर्ट को पंचायत चुनाव में तारीख तय होने से लेकर सुरक्षा व्यवस्था तक में हस्तक्षेप करना पड़ा । इस बार तो नया रिकार्ड कायम हो गया । पंचायत चुनाव का मामला सुप्रीम कोर्ट तक गया । आखिरकार हाईकोर्ट के जस्टिस विश्वनाथ सोमाद्दार और जस्टिस अरिंदम मुखर्जी की खंडपीठ ने राज्य चुनाव आयोग को फटकार के साथ पंचायत चुनाव में अपना ‘आचरण’ निष्पक्ष-तटस्थ रखने का निर्देश दिया, ताकि कोई ऊंगलियां न उठाए । 14 मई को होनेवाले पंचायत चुनाव की संदिग्ध निष्पक्षता पर ऊंगलियां उठी और भाजपा समेत सभी विपक्षी पार्टियों ने एक ही साथ राज्य सरकार समेत राज्य निर्वाचन आयोग के खिलाफ भी सवाल उठाए । इस संबंध में कलकता हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गयीं । भाजपा सुप्रीम कोर्ट तक गयी । मुख्य मुद्दा ये था कि सत्तारूढ़़ तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता कथित रूप से गुंडागर्दी पर आमादा हैं और किसी विपक्षी पार्टी के उम्मीदवारों को पर्चे दायर नहीं करने दे रहे हैं । पुलिस भी सादे भेष में तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं को या तो सहयोग कर रह हैं अथवा तमाशबीन बने हुए हैं । इसलिए लचर सुरक्षा व्यवस्था के खिलाफ सभी दलों ने कलकता हाईकोर्ट में गुहार लगायी । उससे भी ज्यादा गंभीर मामला यह था कि सरकारी कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी के दौरान सुरक्षा पर खतरा मंडराता नजर आया और वे लोग भी अपनी सुरक्षा चिंता को लेकर हाईकोर्ट की शरण में गए । सरकारी कर्मचारी परिषद के संयोजक देवाशीष सिल की याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस ज्योतिर्मय भट्टाचार्य और जस्टिस अरिजित बनर्जी की खंडपीठ ने 27 अप्रील को इस संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों से रिपोर्ट मांगी । न्यायाधीशों ने दोनों पक्षों को अपनी रिपोर्ट चार मई को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया । उसके पहले 20 अप्रील को हाईकोर्ट की एकल पीठ के जज सुब्रत तालुकदार ने पर्चे भरने की डेडलाईन बढ़ानेवाली अधिसूचना राज्य चुनाव आयोग द्वारा रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया और नई अधिसूचना जारी करके उम्मीदवारों को पर्चे भरने की इजाजत देने का निर्देश दिया । जस्टिस तालुकदार ने पंचायत चुनाव प्रक्रिया की नयी तारीखेंं तय करने का भी निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया । उसके पहले राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य सरकार ने मिलकर चुनाव प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी करने का कार्यक्रम बनाया था । उसके मुताबिक एक मई को और 5 मई को मतदान तथा 8 मई को मतों की गिनती का कार्यक्रम तय था । निर्वाचन आयोग ने पर्चे भरने की डेडलाईन बढ़ाने की अधिसूचना जारी की और फिर कोई कारण बताए बिना अपनी अधिसूचना रद्द कर दी । इसके खिलाफ सभी विपक्षी पार्टियां एकजुट हो गयी और सबने राज्य चुनाव आयोग द्वारा डेडलाईन बढ़ानेवाली अधिसूचना रद्द करने के आदेश को कलकता हाईकोर्ट में चुनौती दे डाली । विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि निर्वाचन आयोग ने या तो राज्य सरकार के दबाव में ऐसा किया है, अथवा दोनों की मिलीभगत से विपक्षी दलों को दरकिनार किया गया है । पर्चे भरने की डेडलाईन 9 अप्रील थी और राज्य सरकार एक दिन भी बढ़ाने को तैयार नहीं थी । राज्य निर्वाचन आयोग ने उसी दिन शाम को सिर्फ एक दिन के लिए डेडलाईन बढ़ायी । निर्वाचन कार्यालय के मुताबिक ऐसा सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कारण करना पड़ा । यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भाजपा ले गयी, जिसमें कहा गया कि विपक्षी पार्टियों के उम्मीदवारों को पर्चे भरने से रोका जा रहा है । लेकिन सत्तारूढ़़ तृणमूल कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद एक दिन के लिए भी पर्चे भरने की अंतिम तारीख बढ़ाने का विरोध किया । निर्वाचन आयोग ने अगले दिन 10 अप्रील को एक दिन के लिए डेडलाईन बढ़ानेवाली अधिसूचना रद्द कर दी । भाजपा तुरंत अर्थात् 11 अप्रील को फिर सुप्रीम कोर्ट गयी । सुप्रीम कोर्ट ने कलकता हाईकोई में जाने का निर्देश दिया । भाजपा ने फिर कलकता हाईकोर्ट में अधिसूचना रद्दीकरण आदेश के खिलाफ याचिका दायर की और जस्टिस सुब्रत तालुकदार ने 12 अप्रील को चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगा दी। भाजपा के अलावे मार्क्सवादी कम्यूनस्टि पार्टी, कांग्रेस ने अलग-अलग याचिकाएं दायर करके निर्वाचन कार्यालय के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी । हाईकोर्ट द्वारा चुनाव प्रक्रिया स्थगित करने के फैसले का भी तृणमूल कांग्रेस ने विरोध किया । दीदी मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष भी हैं । मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से हाईकोर्ट आदेश का विरोध तो नहीं किया मगर यह कहते हुए ‘स्वागत’ किया कि वे जल्द से जल्द चुनाव चाहती हैं, क्योंकि काफी दिन बर्बाद हो गए । दीदी ने यह प्रतिक्रिया 20 अप्रील को दी, जब हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग के अधिसूचना रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया और चुनाव प्रक्रिया की तारीखेंं फिर से तय करने का निर्देश दिया । उस निर्देश के बाद 26 अप्रील को राज्य निर्वाचन आयुक्त ए. के. सिंह ने एलान किया कि 20 जिलों के पंचायत चुनाव एक ही दिन 14 मई को होंगे । यह तारीख भी अधर में लटकी हुई थी । सरकारी कर्मचारी परिषद न चुनाव ड्यूटी के दौरान अपनी सुरक्षा की चिंता से हाईकोर्ट को अवगत कराया था । प्रदेश कांग्रेस कमिटो महासचिव रितजू घोषाल ने एकल पीठ जज के खिलाफ खंडपीठ में याचिका दायर की हुई थी । रितजू घोषाल एकल पीठ जज सुब्रत तालुकदार के पास चुनाव आयोग द्वारा दूसरी बार तय चुनाव कार्यक्रम के खिलाफ याचिका लेकर पहुंचे । जज ने इसमें हस्तक्षेप से इन्कार कर दिया । उसके खिलाफ घोषाल ने खंडपीठ के दोनों जजों के सामने याचिका दायर की और खंडपीठ ने भी निर्वाचन आयोग द्वारा घोषित 14 मई की मतदान तारीख के फैसले में दखल से इंकार कर दिया ।
जस्टिस विश्वनाथ सोमाद्दार और अरिंदम मुखर्जी को खंडपीठ ने अन्य मुद्दों पर यह कहकर फटकार लगायी की इतनी सारी याचिकाओं के लिए राज्य चुनाव आयोग का आचरण जिम्मेदार है । सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम अभी भी लटका है । विपक्षी दलों की शिकायत पर कलकता हाईकोर्ट की यह टिप्पणी बिल्कुल जायज और चुनाव आयोग की छवि पर काला धब्बा है, जिससे मतदाता निष्पक्ष रवैए की उम्मीद रखते हैं । सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला पहुंचने और हाईकोर्ट की शर्मनाक टिप्पणी के बावजूद ऐसा नहीं लगा कि राज्य चुनाव आयोग ने अपना रवैया बदला । इसलिए राज्य निर्वाचन कार्यालय पर तृणमूल कांग्रेस सरकार के या तो दबाव में अथवा शांठगांठ में ‘चुनावी आचरण’ का आरोप बेबुनियाद नहीं है । दीदी के लिए चुनाव आयोग द्वारा लागू चुनाव आचारसंहिता कोई माएने नहीं रखती । इसका सबूत वे पहले भी दे चुकी हैं । इस पंचायत चुनाव में दीदी ने राज्य चुनाव आयोग को मोहरा बनाया और हाईकोर्ट के कारण अनर्गल प्रलाप नहीं कर पायी । लेकिन हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी के बावजूद चुनाव आचार संहिता को द्यता बताकर दीदी अपने मन मुताबिक ‘आचरण’ में जुटी हैं । 4 मई को हाईकोर्ट ने अपनी फटकार में राज्य चुनाव आयोग को यहां तक कहा कि इसे ‘वेक अप कॉल’ समझें । इसकी परवाह किए बगैर 5 मई को ही राज्य चुनाव आयोग ने 15,000 नियुक्तियां जारी रखनी चाही, जो चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन है । राज्य चुनाव आयोग ने इसके लिए इजाजत केंद्रीय चुनाव आयोग से मांगी । केंद्रीय चुनाव आयोग से आचार संहिता का हवाला देकर अनुमति नहीं मिलने के बाद राज्य चुनाव आयोग रूक गया । राज्य चुनाव कार्यालय को क्या आचार संहिता की जानकारी नहीं थी? एक दिन में हाईकोर्ट का ‘जागरण कॉल’ हवा में उड़ गया । ऐसी कई नियुक्तियों पर केंद्रीय चुनाव आयोग को रोक लगानी पड़ी । राज्य सरकार के दबाव या मिलीभगत के बिना राज्य चुनाव आयोग भला ऐसा क्यों करेगा? राज्य चुनाव कार्यालय का ‘आचरण’ और ‘आचार’ दोनों ही कटघरे में है । 4 मई को ही 17 वामदलों ने राज्य सरकार के दहशत और अराजक रवैए के खिलाफ रैली निकाली । तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ता इस बार 34 प्रतिशत सीटें निर्विरोध जीतने पर जश्न मना रहे हैं, जो एक नया रिकार्ड है । इस जश्न को विपक्षी दलों ने आड़े हाथों लिया है कि विपक्षी दल समर्थित उम्मीदवारों को तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने पर्चे दायर ही नहीं करने दिए ।
विपक्षी दलों को वकीलों की हड़ताल के कारण भी याचिकाएं लगाने में परेशानी का सामना करना पड़ा । वकीलों ने कलकता हाईकोर्ट में चीफ जस्टिस और अन्य रिक्त पदों पर जजों की नियुक्ति को लेकर हड़ताल कर रखी थी । पंचायत चुनाव की तारीख वाला झमेला खतम होने के बीच में ही कार्यकारी चीफ जस्टिस ज्योतिर्मय भट्टाचार्य स्थायी चीफ जस्टिस बना दिए गए ।
2013 में भी पंचायत चुनाव के दौरान भारी झमेला हुआ था । हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अरूण मिश्र और जस्टिस जोयमाला बागची को एक ही साथ पश्चिम बंगाल सरकार, राज्य चुनाव आयोग और केंद्र सरकार तीनों को अपना-अपना पक्ष रखने के लिए नोटिस जारी करनी पड़ी । 2013 का हंगामा आज यानो कि 2018 से अलग था । 2013 में केंद्र सरकार, राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग में ठनने का कारण दूसरा था । उस वक्त राज्य चुनाव आयुक्त मीरा पांडे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अनुसार काम करने और उनके दबाव के आगे झुकने को तैयार नहीं हुई । ममता बनर्जी मीरा पांडे को हटाने पर अड़ गयी और केंद्र सरकार तथा केंद्रीय चुनाव आयोग दोनों मीरा पांडे को राज्य चुनाव आयुक्त पद पर बरकरार रखने पर अड़ा रहा । 2013 में केंद्र में कांग्रेस गठजोड़ सरकार थी, जिससे ममता बनर्जी का तालमेल टूट चुका था तो उन्होंने केंद्रीय चुनाव आयोग पर दबाव बनाने का आरोप लगा दिया । 2013 में भी पंचायत चुनाव की तारीख और तृणमूल कांग्रेस उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने पर ‘ऊंगलियां’ उठी, जिस ओर अभी 2018 में हाईकोर्ट ने इशारा किया है ।
2016 में विधान सभा चुनाव के दौरान भी केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा जारी 40 पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के तबादला आदेश पर दीदी बिफर उठी । उन्होंने चुनाव आयोग पर केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार से मिले होने का आरोप लगाया । दीदी ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए चुनाव आयोग से कहा कि ‘अगर राज्य प्रशासनिक व्यवस्था पर भरोसा नहीं है तो अमेरिकी राष्ट्रपति बाराक ओबामा से बात करें, वो पुलिस भेज देंगे ।’