मतदाता जागरूकता दिवस मनाने से एक दिन पहले निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी कि दागियों को टिकट न देने का निर्देश राजनीतिक दलों को दिया जाए । स्थापना दिवस 25 जनवरी का चुनाव आयोग का यह आयोजन सिलसिला पिछले कुल दशकों से वोटरों को जगाने के लिए चलाया जा रहा है । क्योंकि वोट डालने के प्रति लोग उदासीन होते जा रह हैं । वोटरों के सोये रहने का सबसे बड़ा करण सभी दलों में दागी उम्मीदवारों को टिकट देने की होड़ है ।

चुनाव आयोग कई वर्षों से केंद्र सरकार से ऐसा अधिकार देनेवाला कानून बनाने की मांग कर रहा है, ताकि दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मिले और वे जनप्रतिनिधि न बन पाएं । उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगाते हुए भी काफी समय गुजर गए । चुनाव आयोग ने दलों से बार-बार कहा कि दागियों को टिकट न दें । सुप्रीम कोर्ट के भी निर्देश का कोई असर नहीं हुआ । चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट दोनों ने ही जनहित में राजनीतिक दलों से दागियों को टिकट न देने कहा । कांग्रेस गठजोड़ सरकार गयी, भाजपा गठजोड़ सरकार आयी । सभी दल आंखें मुंद रह, कान बंद किए रहे । दागियों को जनप्रतिनिधि बनने से रोकना किसी भी दल को जनहित में नहीं लगा, जो अपने अन्य हर काम को जनहित में बताते हैं । सत्ता में बैठे और सत्ता से बाहर सभी नेता राजनीति में अपराधीकरण के प्रति सोये रहते हैं, वोटरों को हर चुनाव में जागरूक करते रहते हैं ।

इस बार संयोग कुछ ऐसा रहा कि मतदाता जागरूकता दिवस के एक दिन पहले 24 जनवरी को सुप्रीम कोट में इस मामले पर सुनवाई थी । याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय वकील हैं और भाजपा के नेता हैं, जिन्होंने दागियों को टिकट देने से नहीं रोक पाने के लिए चुनाव आयोग को ही जिम्मेदार ठहराया । उपाध्याय की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में तीन वर्षों से सुनवाई चल रही है ।

सुप्रीम कोर्ट जज आर. एफ. नरीमन और जस्टिस एस. रवीन्द्र भट्ट की पीठ के समक्ष अपने जवाब में निर्वाचन आयोग ने फिर से शीर्ष कोर्ट के पास गुहार लगायी कि दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का निर्देश जारी किया जाए । चुनाव आयोग ने कहा कि मीडिया में आपराधिक पृष्ठभूमि का ब्योरा देने के बावजूद राजनीति में आपराधीकरण नहीं रूक रहा है । चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से अपील की कि ऐसे में जरूरी है कि सभी दलों से दागियों को टिकट न देने कहा जाए ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ ने याचिकाकर्ता और चुनाव आयोग के ही जिम्मे यह काम सौंप दिया । जजों ने दोनों ही पक्षों को साथ बैठकर ऐसा फ्रेमवर्क तैयार करके लाने कहा, जिससे राष्ट्रहित में राजनीति में अपराधीकरण पर रोक लगायी जा सके । चुनाव आयोग और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय को इसी हफ्ते सुप्रीम कोर्ट के पास ऐसा एक फ्रेमवर्क प्रस्तुत करना है ।

राजनीति में अपराधीकरण रोकने के खिलाफ दायर याचिकाओं पर चल रही सुनवाइयों में से इस हफ्ते की सुनवाई कई माएने में पहले से अलग रही । पहला ये कि इसी समय देश अपना 71वां गणतंत्र दिवस मना रहा था । दूसरा संयोग ये था कि 26 जनवरी के दिन ही आकाशवाणी से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ की 61वीं कड़ी प्रसारित हो रही थी । प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ में कहीं भी जनहित और राष्ट्रहित का यह मुद्दा नहीं आया । भाजपा नेता और चुनाव आयोग को निर्देश देने के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी प्रधानमंत्री ने जरूर सुनी देखी होगी । प्रधानमंत्री आम लोगों से आकाशवाणी के जरिए ‘मन की बात’ करते हैं, लेकिन लोगों की बात शायद सुनते नहीं । 27 जनवरी को भी दिन भर आकाशवाणी के सभी समाचार बुलेटिनों में प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ का प्रसारण बार-बार दुहराया जाता रहा । शाम को प्रादेशिक भाषाओं में भी ‘मन की बात’ का प्रसारण किया गया ।

लेकिन वोटरों के ‘मन की बात’ उसमें शामिल नहीं थी, जो एक दिन पहले ही चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट द्वारा जागरूक किए गए थे । आकाशवाणी और दूरदर्शन में सुप्रीम कोर्ट से प्राप्त ऐसे समाचारों को स्थान नहीं मिलता ।

अब गांवों के मतदाता भी अखबार, टीवी चैनल शहरों की तरह ज्यादा देखते हैं । लेकिन आकाशवाणी के समाचार बुलेटिन जरूर सुनते हैं । आकाशवाणी के माध्यम से प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ इसीलिए करते हैं, वोटरों के उदासीन होने का कारण प्रधानमंत्री जानते हैं । नरेंद्र मोदी हर चुनाव में वोटरों से मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की बात दुहराते हैं, ताकि भारतीय लोकतंत्र और गणतंत्र कमजोर न हो । इस बार गणतंत्र दिवस के दिन ही ‘मन की बात’ और उसके एक दिन पहले मतदाता जागरूकता दिवस में प्रधानमंत्री ने मतदाताओं के मुरझाते रूझान को महत्व नहीं दिया । अभी जितनी बातें मतदाताओं को प्रधानमंत्री और सभी भाजपा नेता बार-बार ‘देशहित’ और ‘जनहित’ बता रहे हैं, वो आम वोटरों को समझ में नहीं आ रहा है । प्रधानमंत्री आकाशवाणी के जरिए जैसे नागरिकों से ‘मन की बात’ करते हैं, उनकी समझ से बाहर है कि नागरिकता संशोधन कानून उनके हित में है या नहीं । लेकिन वे आम नागरिक यह बात अच्छी तरह जान गये हैं कि चुनाव आयोग के पास दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार नहीं हैं और चुनाव आयोग के बार-बार आग्रह के बावजूद सरकार ऐसा कानून नहीं बनाना चाहती, जिससे चुनाव आयोग को दागियों के पर्चे रद़द करने का अधिकार मिले । आम वोटर भी समझते हैं कि दागी उम्मीदवार जीतने के बाद प्रभाव का इस्तेमाल करके ऐसा कानून नहीं बनने देते और अदालतों में अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे लंबे तक खिंचते रहने तथा रफा-दफा करने की कोशिश में लगे रहते हैं ।

भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय अपनी सरकार से ऐसा आग्रह नहीं करते, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘मन की बात’ नहीं करते । चुनाव आयोग के वकील विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि सितंबर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलों से दागियों को टिकट न देने कहा था । सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने कहा कि राजनीति में अपराधीकरण रोकना संसद का दायित्व है और सरकार ऐसा कानून बनाय । पीठ ने कहा कि इसके लिए संविधान की धारा-324 में संशोधन करना पड़ेगा, जिसमें चुनाव आयोग को अधिकार देनेवाला प्रावधान है ।

उपाध्याय की ओर से पेश वकील गोपाल शंकरनारायण ने इस हफ्ते सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि अभी 46 प्रतिशत संसद सदस्य आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं, इसलिए मौजूदा हालात में यह नहीं माना जा सकता कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने और गंभीर आपराधिक मुकदमे में फंसे सदस्यों को अयोग्य घोषित करनेवाला कानून बनेगा । केंद्र सरकार ने भाजपा नेता की अवमानना याचिका के जवाब में सुप्रीम कोर्ट को यह कहकर गुमराह किया कि 25 सितंबर, 2018 को शीर्ष कोर्ट ने ऐसा कानून बनाने का ‘अलग से’ कोई निर्देश नहीं दिया था ।

सुप्रीम कोर्ट पीठ के दोनों जजों ने सारी दलीलें सुनने के बाद कहा कि जनहित में राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए तत्काल एक प्रभावी मैकेनिज्म की जरूरत है । जजों ने चुनाव आयोग और अश्विनी उपाध्याय को साथ बैठकर एक खाका एक हफ्ते के अंदर प्रस्तुत करने कहा ।

एक ही मैकेनिज्म है कि सरकार दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला बिल संसद में लाए । दागियों के लिए वोट मांगनेवाले अगर जगे होते तो 2019 आम चुनाव म जीतकर आए सांसदों में स 233 पर आपराधिक मुकदमा दर्ज होने का रिकार्ड नहीं होता । चुनाव आयोग से प्राप्त विवरण के आधार पर एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) ने 2009 से 2014 तक का आंकड़ा दिया है - स्पष्ट है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को मिले दोनों ही प्रचंड जनादेशों में दागियों को टिकट देने में इजाफा हुआ । इसके खिलाफ कानून बनाना भाजपा नेताओं की ‘पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त’ शासन प्रणाली के एजेंडे में नहीं है । चुनाव आयोग के पास ऐसा अधिकार नहीं है । सुप्रीम कोर्ट कानून बना नहीं सकता । अगर सुप्रीम कोर्ट ऐसा आदेश जारी कर दे तो उसकी काट में अध्यादेश तुरंत तैयार हो जाएगा । 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने

दागियों के जेल में रहकर चुनाव लड़ने और ‘लॉ मेकर’ बनने की विशेषाधिकार धारा 8/4 को निरस्त किया तो सभी दलों ने इसके काट में लाए गए अध्यादेश प्रस्ताव का समर्थन किया । शुक्र है, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने इस पर सवाल उठा दिया ।

तीन वर्षों में भारत के तीन प्रधान न्यायाधीशों ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान ‘लॉ मेकरों’ को जगाने और वोटरों को सचेत करने के कई निर्देश दिए हैं । 25 सितंबर, 2018 को चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आदेश दिया कि सभी उम्मीदवारों को अपने आपराधिक रिकार्ड का ब्योरा चुनाव आयोग को देना अनिवार्य होगा । चुनाव आयोग से प्राप्त यह विवरण सभी अखबारों में प्रमुखता से छपती हैं । उसके बावजूद डंके की चोट पर दागी चुनाव लड़ रहे हैं, जीत रहे हैं । अश्विनी उपाध्याय की ही याचिका पर सितंबर, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दागियों का आपराधिक ब्योरा प्रमुखता से प्रचारित, प्रकाशित किया जाए, ताकि ज्यादा से ज्यादा वोटरों की ध्यान उस तरफ जाए । उसी के बाद 10 अक्टूबर को चुनाव आयोग ने फॉर्म-26 में संशोधन करके दलों और उम्मीदवारों को आपराधिक ब्योरा प्रकाशित करने का निर्देश दिया था ।