पाक पोषित कश्मीरी आतंकियों की फंडिंग के आरोप में तिहाड़ जेल में बंद लोकसभा सदस्य शेख अब्दुल राशिद उर्फ इंजीनियर राशिद को संसद के बजट सत्र में शामिल होने की इजाजत दिल्ली हाईकोर्ट ने शर्त लगाकर दी ।
ऐसा करना हाईकोर्ट की विवशता थी, क्योंकि इंजीनियर राशिद संविधान सम्मत लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत चुनाव जीतकर ‘लामेकर’(संसद सदस्य) बने हैं । दिल्ली हाईकोर्ट के जज विकास महाजन ने इंजीनियर राशिद को सुरक्षा बलों के घेरे में 11 और 13 फरवरी को लोकसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए पेरोल पर तिहाड़ जेल से संसद भवन ले जाने का आदेश जारी किया । उसके लिए अब्दुल राशिद जेल में 10 दिनों से भूख हड़ताल पर थे । यूएपीए(गैर कानूनी गतिविधियां रोक कानून. नच) राशिद को किसी तरह का पेरोल या जमानत का लगातार विरोध कर रही है । अब्दुल राशिद के वकील ने जब दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी तो जज ने कहा कि किसी भी निर्वाचित जनप्रतिनिधि को संसद की कार्यवाही में भाग लेने से कैसे रोका जा सकता है, यह जनप्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन होगा ।
कश्मीर की बारामुला लोकसभा सीट से उमर अब्दुल्ला को हराकर लामेकर बने अब्दुल राशिद को 05.07.2024 को सदस्यता की शपथ लेने के लिए भी पटियाला हाउस कोर्ट ने 2 घंटे की पेरोल दी थी । उनके साथ-साथ 05 जुलाई को पंजाब की खडूर साहिब लोकसभा सीट से जीते कथित खालिस्तान समर्थक अमृतपाल सिंह को भी पेरोल पर दिल्ली लाया गया । अमृतपाल सिंह राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के अंतर्गत डिब्रूगढ़ जेल में बंद हैं ।
अब्दुल राशि के वकील के गत हफ्ते हाईकोर्ट ने बताया कि संसद सदस्य की नियमित जमानत याचिका पर आदेश 28.08.2024 से लंबित है ।
10.02.2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने जब इंजीनियर राशिद को दो दिन के लिए संसद के चालू सत्र में भाग लेने का पेरोल दिया, उसी दिन सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी संख्या में दागियों के संसद पहुंचने पर बुनियादी सवाल उठाए ।
सुप्रीम कोर्ट जज दीपांकर दत्ता और मनमोहन की पीठ ने ‘राजनीति के अपराधीकरण’ पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि आपराधिक मुकदमे में अभियुक्त साबित हो चुका कोई व्यक्ति संसद में वापस कैसे आ सकता है? दोनों जजों ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से इस बात का जवाब मांगा कि जब किसी व्यक्ति के खिलाफ अभियोग साबित हो चुका है, वो संसद तथा विधान सभा में वापस कैसे आ सकता है? उन्हें इसका स्पष्ट उत्तर देना होगा । यह सीधा कानून के साथ खिलबाड़ और हितों के टकराव का मामला है ।
सुप्रीम कोर्ट पीठ ने वकील अश्विनी उपाध्याय की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई की । याचिका में आरोपित राजनीतिज्ञों के आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने और संसद सदस्यों तथा विधायकों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे के जल्द निष्पादन का सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है ।
राजनीति के आपराधीकरण के संबंध में सुप्रीम कोर्ट को दिए गए आंकड़े के अनुसार मौजूदा 18वीं लोकसभा के कुल 543 सदस्यों में से 251 के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं । 251 लोकसभा सदस्यों में से 170 ऐसे गंभीर अपराधों में फंसे हैं, जिसमें पांच या उससे ज्यादा वर्षों की सजा का प्रावधान है ।
विभिन्न हाईकोर्टों से प्राप्त यह आंकड़ा एमीकस क्यूरे सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने जस्टिस दीपांकर दत्ता को सौंपी, इसमें केरल का विशेष रूप से उल्लेख किया गया । जहां की कुल 20 लोकसभा सीटों में से 19 अर्थात् 95: सदस्य आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहे हैं । उनमें से 11 लामेकर गंभीर आपराधिक मामलों में फंसे हैं ।
सुप्रीम कोर्ट पीठ ने कई बुनियादी सवाल उठाते हुए कहा कि हमें जनप्रतिनिधित्व कानून के सेक्शन 8 और 9 पर नए सिरे से विचार करने तथा उसके औचित्य पर सोचने की जरूरत है । अगर कोई सरकारी कर्मचारी भ्रष्टाचार या सरकार के प्रति गैरवफादारी का दोषी पाया जाता है तो वो सेवा में रखने लायक नहीं माना जाता । मगर वो व्यक्ति मंत्री हो सकता है।
शीर्ष कोर्ट में जनप्रतिनिधित्व कानून के सेक्शन 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गयी है । इसी पर सुप्रीम कोर्ट जजों ने केंद्र सरकार और भारत निर्वाचन आयोग से तीन हफ्ते के अंदर जवाब देने कहा है । पीठ ने इस संबंध में भारत सरकार के अटोर्नी जनरल से सहयोग मांगा कि आपराधिक मुकदमे में लिप्त व्यक्ति संसद में वापस कैसे आ जाते हैं और इसे गंभीर मामला बताया ।
लामेकरों के खिलाफ चल रहे मुकदमे के जल्द निष्पादन की जहां तक बात है, शीर्ष कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कहा कि दो जजों की खंडपीठ के लिए इस मामले को फिर से खोलना उपयुक्त नहीं है । पीठ ने इस मामले को चीफ जस्टिस संजीव खन्ना के सामने रखने का निर्देश दिया, ताकि बड़ी पीठ को सौंपने पर विचार किया जाए ।
एमीकस क्यूरे के रूप में शीर्ष कोर्ट की सहायता कर रहे सीनियर एडवोकेट विजय हंसारिया ने दोनों जजों को बताया कि सुप्रीम कोर्ट के बार-बार आदेशों और हाईकोर्टों की मानीटरिंग के बावजूद लामेकरों के खिलाफ बड़ी संख्या में मुकदमे लंबित हैं । हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट के 2017 के निर्देशों की जानकारी देते हुए पीठ को 10.02.2025 को बताया, जिसमें ऐसे मुकदमे के शीघ्र निष्पादन के लिए 10 विभिन्न राज्यों में 12 स्पेशल अदालतें गठित करने कहा गया । उसके बाद समय-समय पर सुप्रीम कोर्ट ने एमपीए एमएलए के खिलाफ लंबित मुकदमे जल्द निबटाने की प्रोग्रेस रिपोर्ट के लिए भी निर्देश जारी किया है । लेकिन इतना होने के बावजूद यह प्रक्रिया लगभग ठप्प ही है और मुकदमे का ट्रायल बहुत ही धीमी गति से चल रहा है ।
विजय हंसारिया ने शीर्ष कोर्ट पीठ को ध्यान दिलाया कि वकील अश्विनी उपाध्याय की इस जनहित याचिका में जनप्रतिनिधित्व कानून के सेक्शन 8 और 9 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गयी है, जिसमें अभियुक्त लामेकर को सदस्यता के अयोग्य ठहराने की समय सीमा 6 वर्ष रखी गयी है । याचिका में यह भी प्रश्न उठाया गया है कि क्या एक दोषसिद्ध अभियुक्त राजनीतिक पार्टी बना सकता है या किसी पार्टी के किसी पद पर रह सकता है ।
न तो यह याचिका नयी है और न ही चुनाव आयोग या केंद्र सरकार के जवाब में कोई नयी बात सामने आनेवाली है । सुप्रीम कोर्ट में ऐसी याचिकाएं बार-बार दायर की जाती हैं । इसमें एडीआर (एसोसिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) भी शामिल है । तीन दशकों से चुनाव आयोग की चुनाव सुधार सुझावों की वो फाईल केंद्र सरकार के ‘विचाराधीन’ गलियारे में धूल फांक रही है, जिसमें भारत निर्वाचन आयोग ने सरकार से वो अधिकार मांगा जिसमें सभी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द किए जा सकें । चुनाव आयोग क्या जवाब देगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है । सुप्रीम कोर्ट के हाथ में जो है, उसके लगातार इस्तेमाल के बावजूद राजनीति का आपराधीकरण बरकरार है । चुनाव आयोग के लगभग हर चुनाव में सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया है कि आपराधिक मुकदमे में फंसे उम्मीदवारों को टिकट न दें । यह सिलसिला न तो बंद हुआ और न भविष्य में बंद होने की संभावना है । इसीलिए चुनाव आयोग ने दागियों का पर्चा रद्द करने का अधिकार केन्द्र सरकार से मांगा । इसके लिए अलग से कानून बनाकर यह अधिकार चुनाव आयोग को देना होगा । किसी भी पार्टी ने आज तक ऐसा कानून बनाने की जरूरत नहीं समझी । किसी भी संसद सदस्य ने इस संबंध में संसद में सवाल नहीं उठाया ।
सभी पार्टियां सत्ता में आने के लिए मतदाताओं के बीच जाकर अपने प्रतिद्वंदी सत्तारूढ़ दल के खिलाफ प्रचार करती हैं कि जनता बदलाव चाहती है, कुशासन से ऊबी है । लेकिन ऐसे बदलाव की बात किसी भी पार्टी के एजेंडे में नहीं है, ताकि कोई आपराधिक बैग्राउंड वाला व्यक्ति संसद सदस्य न बन सके । ऐसा कानून बनाना सुप्रीम कोर्ट के हाथ में नहीं है ।
2014 से भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ केंद्र में लगातार सत्ता में है । उसके पहले कांग्रेस गठजोड़ शासनकाल में सुप्रीम कोर्ट में राजनीति का आपराधीकरण रोकने के लिए दायर याचिकाओं पर हुई सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग कोर्ट के आगे हाथ खड़े कर चुका है कि दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार उसके पास नहीं है । चुनाव आयोग यह भी बता चुका है कि केंद्र से आग्रह किया गया है कि पर्चे रद्द करने का अधिकार मिले, ताकि कोई दागी निर्दलीय भी चुनाव न लड़ सके ।
10 वर्षों में भाजपा गठजोड़ सरकार ने चुनाव सुधार की दिशा में ‘एक देश एक चुनाव’ के लिए अभियान चलाया । उसके लिए संविधान संशोधन होने हैं । चुनाव आयोग के सेट अप में बदलाव का संशोधन हुआ । मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनायी गयी चयन प्रक्रिया में बदलने वाला संविधान संशोधन आया, जिसकी वैधता पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है । भाजपा गठजोड़ सरकार ने कई नए कानून बनाए, कई बदले मगर आपराधिक मुकदमे में फंसे लोग लामेकर(कानून बनाने वाले) न बन सकें, ऐसा बिल संसद में लाना जरूरी नहीं समझा । 10 साल से सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग इस संबंध में दायर याचिकाओं से जूझ रहा है । 2014 से अभी तक सुप्रीम कोर्ट में सुनवाईए चुनाव आयोग का जवाब और केंद्र सरकार का पल्ला झाड़ टालमटोल स्पष्टीकरण जारी है ।
2019 लोकसभा चुनाव नजदीक आने से पहले सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की ओर से बार-बार गोलमटोल जवाब देनेवाले अटोर्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कोर्ट से फटकार मिलने के बाद अटोर्नी जनरल पद छोड़ दिया । ‘बड़े कदम’ उठाने की सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी के बावजूद दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला बिल लाने का कोई इरादा केंद्र ने नहीं जताया । आखिरकार 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं के हाथ में ही फैसला छोड़ने वाला निर्देश सीधे चुनाव आयोग को दिया । सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को कहा कि सभी उम्मीदवारों के लिए अपने खिलाफ चल रहे किसी भी तरह के आपराधिक मुकदमे की जानकारी अखबारों में अन्य प्रचार माध्यमों से तीन बार विज्ञापित करना अनिवार्य किया जाए । अगर जेल में रहते हुए पर्चा भरते हैं तो उसकी जानकारी विज्ञापन के ऊपर में मतदाताओं को दी जाए । उसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट को 2024 लोकसभा चुनाव में 251 उम्मीदवारों के वापस सदन में लौटने पर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार से जवाबतलब करना पड़ा है ।
दागियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे के जल्द निबटारे का निर्देश 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर से सभी हाईकोर्टों को दिया । विजय हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट पीठ को बताया कि कुछ राज्यों में ऐसे मामले दो दशकों से लंबित हैं । कई राज्यों ने अभी तक सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार वर्तमान और पूर्व सांसदों, विधायकों के लिए अलग से विशेष अदालतें भी गठित नहीं की हैं । विभिन्न हाईकोर्टों में लंबित लाखों मुकदमे सटलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट वैकल्पिक उपायों पर विचार कर रही है । 01 जनवरी, 2025 के आंकड़े के अनुसार 4ए732 आपराधिक मुकदमे वर्तमान या पूर्व सांसदों, विधायकों के खिलाफ लंबित हैं ।
2024 आम चुनाव में जीतकर आए दागियों का विवरण एमीकस क्यूरे हंसारिया ने सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत किया है । केरल के बाद तेलंगाना का नंबर है, जहां के 17 एमपी में से 14 आपराधिक मुकदमे में फंसे है । उसी क्रम में ओडिशा के 21 में से 16ए झारखंड के 14 में से 10ए तमिलनाडु के 39 में से 26 सांसद दागी हैं । उसके अलावे अन्य प्रमुख और बड़े राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश से जीते 50: सदस्य दागी हैं ।