पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी(दीदी) की ओर से भाजपा के खिलाफ आयोजित विपक्षी सम्मेलन में ईवीएम मुख्य मुद्दा रहा । इसमें शिरकत करने आए जम्मू व कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारूक ने इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीनों(ईवीएम) को चोर बताया । इसका समर्थन महाजुटान में शामिल सभी गैर-भाजपा दलों के नेताओं ने किया । इस सम्मेलन में कांग्रेस ने खुद को जरा लो प्रोफाइल में रखा क्योंकि ममता बनर्जी भाजपा जैसी ही कांग्रेस की भी दुश्मन है । लेकिन भाजपा शासनकाल में पूर्व मंत्री रह चुके अरूण शौरी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर सीबीआई की तरह चुनाव आयोग को भी भ्रष्ट करने तथा इसकी गरिमा घटाने का आरोप लगाया ।

वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने दिसंबर, 2018 में पदभार ग्रहण करते ही राजनीतिक दलों की इस मतलबी सियासी सोच को उजागर कर दिया । उन्होंने सीधा जवाब दागा कि ईवीएम में गड़बड़ी का सवाल उठाकर इस सिस्टम को फुटबॉल बना दिया गया । सीईसी(मुख्य चुनाव आयुक्त) ने आगामी आम चुनाव बैलेट पेपर से कराने की राजनीतिक दलों की मांग को एक सिरे से खारिज करते हुए वही बात कह डाली, जो अभी नए विवाद के साथ बतंगड़ बनी है । हर चुनाव से पहले और उसके बाद चुनाव आयोग को बार-बार सफाई देनी पड़ती ह कि ईवीएम ‘फुलप्रुफ’ है तथा इसमें छेड़छाड़ नहीं की जा सकती । उसी को दुहराते हुए नए सीईसी ने बिल्कुल दो टूक लहजे में दिसंबर, 2018 में ही कहा कि पार्टियों को चुनाव आयोग की आलोचना करने का अधिकार है, मगर चुनाव आयोग को सियासी राजनीति का हिस्सा नहीं बनाया जा सकता ।

ईवीएम छेड़छाड़ का एक नया विस्फोटक मामला अभी ऐसे समय में उभरा, जब सीईसी अपनी टीम के साथ लोकसभा चुनाव की तैयारियों की जायजा लेने के लिए विभिन्न राज्यों के दौरे पर हैं । इस ईवीएम छेड़छाड़ का मुद्दा विदेश से उछाला गया है, जिसका तार इंगलैंड और अमेरिका से जुड़ा है और सीधा ताल्लुक 2014 लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिले प्रचंड बहुमत से है । इसमें कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल का नाम सामने आया है । लंदन के कथित हैकथान प्रेस कान्फ्रेंस में एक विवादास्पद साइबर विशेषज्ञ सैयद शुजा ने दावा किया कि 2014 आम चुनाव में ईवीएम की हैकिंग हुई और इस प्रकार भाजपा को ईवीएम में गड़बड़ी करके जीत मिली । उस सम्मेलन में कांग्रेस नेता सिब्बल की मौजूदगी भाजपा के लिए राजनीतिक मुद्दा बनना स्वाभाविक है, क्योंकि अगला आम चुनाव करीब है । लेकिन उसको लेकर ईवीएम का केंद्रीय मंत्रियों की बार-बार सफाई भाजपा के पुराने दिनों की याद दिलाती है । इसलिए सीईसी का यह कहना बिल्कुल सही है कि सियासी हार-जीत की राजनीति में ईवीएम को मुद्दा नहीं बनाया जा सकता । सीईसी ने प्रतीक रूप में कहा कि परिणाम अगर ग आया तो ईवीएम में छेड़छाड़ की गयी और अगर ल के पक्ष में गया तो ठीक । यह चुनाव आयोग का मुद्दा नहीं हो सकता, ईवीएम फुलप्रूफ है और हार-जीत दोनों के लिए है । केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और प्रकश जावड़ेकर दोनों ने ही कांग्रेस पर निशाना साधने के साथ-साथ चुनाव आयोग का भी भरपूर बचाव किया । लंदन का यह खुलासा लगभग उसी समय हुआ, जब कोलकाता में ममता बनर्जी के न्योते पर भाजपा विरोधी दल जुटे थे और लोकसभा चुनाव 2014 को लेकर अभी तक की भाजपा की सभी जीतों को ईवीएम गड़बड़ी का परिणाम बता रहे थे । उनमें से कांग्रेस समेत किसी भी दल न हालिया विधान चुनाव मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और उसके पहले पंजाब में कांग्रेस की जीत को ईवीएम छेड़छाड़ का परिणाम नहीं माना ।

आज भाजपा गठजोड़ शासन है तो केंद्रीय मंत्री चुनाव आयोग को बदनाम करने की साजिश बता रहे हैं और उसी बहाने कांग्रेस से अपने राजनीतिक विरोध को मजबूती प्रदान कर रहे हैं । लेकिन 2004 से 2009 के दो आम चुनावों में भाजपा नेताओं ने अपनी हार के लिए ईवीएम में छेड़छाड़ को दोषी ठहराया । 2009 आम चुनाव में हार के बाद बरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने अपने संसद भवन कक्ष में संवाददाता सम्मेलन अयोजित करके ईवीएम छेड़छाड़ का मामला उठाया और बैलेट पेपर की ओर लौटने की मांग की। उसके सालभर बाद बिहार विधान सभा चुनाव के समय भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने चुनाव आयोग द्वारा बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में ही कहा कि ईवीएम निष्पक्षता सुनिश्चित किए बगैर बिहार में चुनाव कराना न्यायसंगत नहीं होगा । ममता बनर्जी उस समय कांग्रेस गठजोड़ के साथ थी और रेलमंत्री थी और उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की जानकारी में ईवीएम में छेड़छाड़ की गयी है । दीदी ने 2014 लोकसभा चुनाव परिणाम और उसके बाद पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव परिणााम में जीत का श्रेय चुनाव आयोग को नहीं दिया, उल्टे आरोप मढ़ दिया कि अगर ईवीएम में गड़बड़ी नहीं की गयी होती तो सारी सीटों पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा होता । 2017 में उत्तर प्रदेश की गद्दी अखिलेश यादव के हाथ से निकल गयी, मायावती के हाथ कुछ न लगा । भाजपा की जीत को ईवीएम गड़बड़ी का परिणाम बताकर कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और समाजवादी पार्टी के राम गोपाल यादव ने संसद के 2017 बजट सत्र के दौरान संसद नहीं चलने दिया । राज्यसभा में सिर्फ ईवीएम पर छह घंटे तक अल्पकालिक बहस चली । आम आदमी पार्टी 2015 में दिल्ली में सत्ता में बहुमत से सत्ता में आयी तब ईवीएम ठीक थी और उसके बाद विधान सभा में ईवीएम में छेड़छाड़ दिखा दिया । अखिलेश यादव और मायावती अगला चुनाव बैलेट पेपर पर कराने की मांग कर रहे हैं । जिस ईवीएम ने दोनों को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया, वो ‘फुलप्रूफ’ थी । 2018 में सुनील अरोड़ा से पहले के मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर ईवीएम में छेड़छाड़ साबित करने कहा, लेकिन कोई खुलकर सामने नहीं आयी । मौजूदा विवाद में कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने पार्टी को कपिल सिब्बल प्रकरण से अलग कर लिया लेकिन ये जरूर कहा कि ईवीएम हैकिंग सवालों की जांच होनी चाहिए । लंदन के उस कथित हैकथान प्रेस कान्फ्रेंस का हर पहलू संदेह के घेरे में है । यह कथित साइबर एक्सपर्ट सैयद शुजा भारतीय है, जिसने अमेरिका में शरण ले रखी है । उसने लंदन में भारतीय संघ के पत्रकारों का सम्मेलन बुलाकर स्काईप के जरिए चेहरे पर मास्क लगाकर 2014 चुनाव हैकिंग की जानकारी दी । सैयद शुजा के खिलाफ चुनाव आयोग ने दिल्ली पुलिस में मामला दर्ज करा दिया है, जांच होगी । लेकिन इसकी जांच कैसे होगी कि सैयद शुजा ने सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया था । लेकिन कपिल सिब्बल लंदन जानेवाले अकेले व्यक्ति थे और इसका खुलासा ईवीएम हैकिंग विस्फोट के बाद उनके स्वदेश लौटने पर हुआ । यह विवाद आगामी लोकसभा चुनाव का पीछा करेगा और 25 जनवरी के मतदाता जागरूकता दिवस आयोजन को भी लील गया । मतदाता जागरूक होकर क्या करेंगे जब उन्हें यह इत्मीनान कराना कठिन है कि उनका वोट उसी उम्मीदवार या पार्टी के पक्ष में गया जिसे वो जिताना चाहते हैं । चुनाव आयोग की ईवीएम ‘फुलप्रूफ’ सफाई से मतदाता आश्वस्त नहीं हो पाते, क्योंकि चुनाव आयोग खुद पूरी तरह फुलप्रूफ नहीं है । कहने का तात्पर्य है कि राजनीतिक प्रभाव से मुक्त नहीं है । यह कहने के लिए है तो संवैधानिक संस्था, मगर सीईसी का चयन अन्य संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुखों की तरह नहीं होता है । सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ इस पर विचार कर रही है । चुनाव आयोग में सबसे सीनियर चुनाव आयुक्त को सीईसी बना दिया जाता है । उसके लिए पसंदीदा आईएएस अधिकारो पहले से ही बिठाए जाते हैं । 2017 में हिमाचल प्रदेश और गुजरात विधान सभा चुनाव कराने के लिए ए. के. जोती गुजरात से लाकर सीईसी बनाए गए । 2019 में नवीन चावला चुनाव आयुक्त के रूप में ही कांग्रेस समर्थक के रूप में विख्यात थे । 2009 चुनाव से पहले उन्हें हटाने के लिए भाजपा समर्थक सीईसी एन. गोपालास्वामी ने राष्ट्रपति के पास असफल गुहार लगायी । इसके बावजूद वोटर चुनाव आयोग पर भरोसा करते हैं, जो राजनीति दलों के प्रति असंभव है । कांग्रेस शासनकाल में जनता पार्टी के स्वयंभू अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने यूरोपीय विशेषज्ञों को बुलाकर ईवीएम छेड़छाड़ के खिलाफ अभियान चलाया । उसके बाद वे भाजपा में आ गए । भाजपा शासनकाल में कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट के पास ईवीएम निष्पक्षता सुनिश्चित करने की गुहार लगायी ।

ताजा ईवीएम विवााद ने अभी कुंभ में आयोजित प्रवासी भारतीय(एनआरआई) सम्मेलन को भी सांसद में डाल दिया । उन्हें ‘प्रोक्सी वोट’ का अधिकार देनेवाला बिल राज्यसभा में अटका है। हो सकता है, इस बजट सत्र में पास हो जाए । लेकिन एनआरआई तो वोट डलवाने से पहले अब सोचेंगे । विदेश मंत्रालय के अनुसार दुनियाभर में एनआरआई की संख्या लगभग 3.10 करोड़ है ।