यह बात दुहराने की जरूरत नहीं कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और फिर सबसे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री रही इंदिरा गांधी के नेतृत्ववाला कांग्रेस करिश्मा युग समाप्त होने के बाद नरेंद्र मोदी पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जो रिकार्ड परचम लहराने वाले करिश्माई नेता के रूप में उभरे हैं । 17वीं लोकसभा चुनाव परिणाम को मोदी लहर मानी जा रही है । सत्तारूढ़ पार्टी के पक्ष में ऐसी लहर पहले कभी देखने को नहीं मिली । जवाहर लाल नेहरू के समय में नेहरू के प्रभावशाली व्यक्तित्व का प्रभाव था, जिसे लहर नहीं कहा जा सकता । 1977 में जिस इंदिरा गांधी विरोधी लहर में इंदिरा गांधी हारी, वो लोकनायक जयप्रकाश नारायण का करिश्मा नहीं था । सभी इंदिरा विरोधी पार्टियों को एकजुट करके छात्र आंदोलन के जरिए सत्ता परिवर्तन हुआ था । जेपी ने उसका नेतृत्व किया । उसके पहले इंदिरा गांधी अपने करिश्माई व्यक्तित्व की बदौलत सत्ता में बार-बार लौटी । 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने ।
1977 से ही केंद्र में विलय / गठजोड़ शासनयुग की शुरूआत हुई । वामदलों को छोड़कर ज्यादातर कांग्रेस-विरोधी पार्टियों का एक ही मंच जनता पार्टी बना और उसके बिखराव के बाद गठजोड़ युग का सिलसिला चल पड़ा । कांग्रेस भी उस गठजोड़ चलन का हिस्सा बनी । 2004 से 2014 तक 10 साल कांग्रेस नेतृत्ववाले संयुक्त प्रगतिशील गठजोड़ की सरकार चली । उसके पहले भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठजोड़ सरकार बनी । अटल बिहारी वाजपेयी 1999 से 2004 तक पांच साल प्रधानमंत्री रहे ।
जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी के समय तक केंद्र में सिर्फ कांग्रेस थी, कोई गठजोड़ नहीं था । गठजोड़ युग सिलसिले के बाद नरेंद्र मोदी पहले करिश्माई नेता हैं, जो राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन प्रधानमंत्री रहते हुए सिर्फ अपनी पार्टी भाजपा को अकेले अपने ही बलबूते लोकसभा में स्पष्ट बहुमत दिलाने में सफल हुए । ऐसा पहली बार हुआ है । ऐसा नया रिकार्ड कायम करन तक और उसके बाद के कई घटनाक्रम ऐसे हैं जो नए तो हैं ही, साथ-साथ असंगत भी प्रतीत होते हैं । लोकसभा के साथ-साथ चार विधानसभाओं के चुनाव परिणामों ने भी रिकार्ड की सूची उपलब्ध करायी है । कहना पड़ रहा है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ ।
सबसे पहला सार्थक नया रिकार्ड तो यह बना कि 17वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित 542 सदस्यों में से 78 महिला हैं । यह अलग बात कि इनमें ज्यादातर फिल्म और टीवी सीरियल स्टार हैं । लेकिन महिलाओं का प्रतिनिधित्व 14: रहा । पिछले आम चुनाव में 11: और 1952 में पहली लोकसभा में मात्र 5: प्रतिनिधित्व था । पहली लोकसभा में 489 में से मात्र 24 महिला सदस्य थी ।
आम चुनाव के लिए चुनाव कार्यक्रम के ऐलान से लेकर पूरी मतदान प्रक्रिया और परिणाम घोषित होने के समय तक लगभग सभी भाजपा विरोधी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को संदिग्ध बनाने की कवायद में जुटे रहे । ऐसा पहलीबार हुआ जब 23 गैर-भाजपा दलों ने पूरी चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इसके लिए एड़ी-चोटी किए रहे कि मतदाताओं के बीच चुनाव आयोग की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘संभावित’ सांठगांठ का संदेश जाए । 10 मार्च को चुनाव आयोग ने सात चरणों में लोकसभा चुनाव का एलान किया और 13 मार्च को कांग्रेस, आम आदमी पार्टी समेत 23 विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी कि सभी ईवीएम नतीजों का वीवीपैट पर्चियों से मिलान का निर्देश चुनाव आयोग को दिया जाए । 19 मई को मतदान प्रक्रिया समाप्त होने के बाद मतों की गिनती के समय तक यह कवायद जारी रही । इसका नेतृत्व करनेवालों में सबसे आगे रहे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चन्द्रबाबू नायडू । तेलुगू देसम पार्टी प्रमुख चन्द्रबाबू नायडू अपनी जनता के बीच जाने के बजाए दिल्लो आना-जाना करते रहे और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी(दीदी) को साथ रखने के लिए कोलकाता जाते रहे । 23 मई को मतों की गिनती होनी थी । 21 मई को ये सभी दल चुनाव आयोग के पास ईवीएम को गिनती स्थल तक पहुंचाने में गड़बड़ी और उसके दुरूपयोग की शिकायतें लेकर चुनाव आयोग के पास पहुंचे । चुनाव आयोग ने उसे निराधार बताया । 21 मई को ही सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गयी, जो खारिज हो गयी । इसमें भी आगे-आगे नायडू थे, जिन्होंने मतगणना में ईवीएम आंकड़ों के साथ वीवीपैट पर्चियों का शत-प्रतिशत मिलान के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगायी । जब कही नहीं सुनी गयी तो चन्द्रबाबू नायडू इसे चुनाव आयोग और लोकतंत्र का ‘काला दिवस’ कहकर दिल्ली से वापस अपनी राजधानी अमरावती लौटे । आंध्र प्रदेश के मतदाता नायडू की पार्टी तेलुगू देसम पार्टी के काला दिवस का इंतजाम लगा चुके थे । कांग्रेस से ही निकलकर गठित पार्टी वाई एस आर कांग्रेस प्रमुख जगनमोहन रेड्डी ने नायडू की पार्टी को धराशायी कर दिया । 175 सीटों की विधान सभा में वाई एस आर कांग्रेस ने 152 सीटें जीतकर नायडू को इस लायक भी नहीं रहने दिया कि वे विपक्षी नेता भी बन सकें । उतना ही नहीं, जगनमोहन रेड्डी ने लोकसभा की एक भी सीट कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय जनाधार वाली पार्टियों को नहीं जीतने दी । आंध्र प्रदेश के चुनाव इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है ।
आंध्र प्रदेश से निकलकर बने तेलंगाना के राज्य गठन हीरो मुख्यमंत्री के. चन्द्रशेखर राव चुनाव प्रचार के दौरान दक्षिण भारत में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस संघीय मोर्चा बनाने में जुटे रहे । 16 लोकसभा सीटों में से सात सीटें उनके खाते से निकल गयी, जिसे उन्होंने कांग्रेस भाजपा की मिलीभगत बताया । भाजपा को ज्यादा फायदा मिला ।
सबसे कमाल का नया रिकार्ड है, पश्चिम बंगाल का । यह पहला आम चुनाव था, जिसमें वाममोर्चा को एक भी सीट नहीं मिली । भाजपा की सीट दो से बढ़कर 18 पर पहुंच गयी । कांग्रेस को मात्र दो सीटें मिल पायी । 1977 में सत्ता में आने के बाद वाममोर्चा को इतने बुरे दिन कभी नहीं देखने पड़े थे । दीदी का सभी 42 सीटें जीतने का दावा मतदाताओं ने खारिज कर दिया । पश्चिम बंगाल एकमात्र राज्य था, जहां चुनाव प्रक्रिया शुरू होने से लेकर समाप्त होने तक हिंसा का तांडव मचा रहा । नायडू तो चुनाव परिणाम देखने के बाद चुनाव आयोग की नीयत पर ऊंगली उठाना भूल गए । इस बार दीदी ने चुनाव आयोग को दोष देने के बजाए धार्मिक भावनाओं को बेचने और विदेशी शक्तियों की मदद लेने का आरोप भाजपा पर मढ़ा ।
जिस गैर-भाजपा महागठजोड़ में दीदी भी हैं, उसके सबसे महत्वपूर्ण घटक कांग्रेस ने केरल में सत्तारूढ़ वाममोर्चा का सूपड़ा साफ कर दिया । माना जा रहा है कि कांग्रेस ने साबरीमला मंदिर का भाजपा मुद्दा हाइजैक कर लिया । अगर वायनाड से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी खड़े नहीं होते तो संसद पहुंचना मुश्किल हो जाता । 15 साल बाद राहुल गांधी का अमेठी से हारना नया रिकार्ड है, जो उनकी परिवारिक परंपरा की सीट थी । दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर दूसरी बार भाजपा ने कब्जा जमाया । दिल्ली की तीन बार मुख्यमंत्री रह चुकी शीला दीक्षित लोकसभा सीट हारने के बाद यह स्वीकार ने वाली एकमात्र कांग्रेस नेता हैं, कि लगता है मोदी लहर थी । शीला दीक्षित के अलावे कई अन्य पूर्व मुख्यमंत्री भी अपनी लोकसभा सीट नहीं जीत सके । मध्यप्रदेश के दिग्विजय सिंह, कनार्टक के विरप्पा मोइली, मल्लिकार्जुन खड़गे, उत्तराखंड के हरीश रावत, हरियाणा के भूपेन्द्र सिंह हुड्डा (ये सभी कांग्रेसी), बिहार के जीतनराम मांझी, झारखंड के बाबूलाल मरांडी, जम्मू व कश्मीर की महबूबा मुफ्ती । इन सबों से बढ़कर कर्नाटक के गैर कांग्रेसी पूर्व मुख्यमंत्री एच डी देवगौड़ा भी लोकसभा सीट हारे, जो प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं । राजस्थान, मध्यप्रदेश, कर्नाटक में लगभग छह सात महीने पहले हुए विधान सभा चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से बाहर किया । इन राज्यों में कांग्रेस का सफाया हो गया । उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस को मात्र एक-एक सीट मिली । कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी एकमात्र उम्मीदवार उत्तर प्रदेश से जीती । 2015 बिहार विधान सभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतनेवाले राष्ट्रीय जनता दल को लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं मिली । 2014 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 44 सीटें मिली, जो उसके चुनावी इतिहास का सबसे खराब रिकार्ड रहा । विपक्षी नेता तक का दर्जा नहीं मिला । दूसरी बार ऐसा रिकार्ड कायम हुआ है, क्योंकि कांग्रेस मात्र सात सीटें बढ़ा पायी । विपक्षी नेता का दर्जा शायद फिर नहीं मिले ।
ओडिशा में बीजू जनता दल के नवीन पटनायक लगातार पांचवी बार मुख्यमंत्री बनकर पश्चिम बंगाल के वाममोर्चा नेता ज्योति बसु और सिक्किम के पवन कुमार चामलिंग की कड़ी में शामिल हुए । ज्योति बसु ने तो स्वेच्छा से सत्ता छोड़ी थी । मगर अभी नवीन पटनायक के वैसा रिकार्ड बनाते-बनाते सिक्किम विधानसभा चुनाव में जनता ने मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग की सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट को सत्ता से बाहर कर दिया ।
तमिलनाडु में भाजपा को एक भी सीट नहीं मिलने की वजह ये हो सकती है कि भाजपा अभी भी दक्षिण में क्षेत्रीयता के इस गढ़ में स्वीकार्य नहीं है ।
इस चुनाव प्रक्रिया में एक और नयी बात देखने को मिली । पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी चुनाव आयोग पर संदेह व्यक्त करने की मुहिम में शामिल हो गए । पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 28वीं पुण्यतिथि के दिन 21 मई को उनकी समाधि पर जाकर प्रणव मुखर्जी ने अपने को इस विवाद का हिस्सा बनाकर कहा कि ‘ईवीएम और जनादेश में कथित छेड़छाड़ की शिकायतें चिंता का विषय है और चुनाव आयोग की तारीफ की भी’ । लेकिन राष्ट्रपति पद से हटने के बाद उनसे ऐसे बयान की उम्मीद नहीं की जाती ।
पहली बार ऐसा हुआ, जब कांग्रेसजन चुनाव परिणाम का इंतजार किए बिना ही राष्ट्रपति को सरकार बनाने का न्योता देने वाला पत्र तैयार कर चुके थे । वे मानकर चल रहे थे कि भाजपा गठजोड़ 272 सीटों का भी आंकड़ा पार नहीं कर पाएगा । कांग्रेस को केरल और पंजाब के अलावे हर जगह नुकसान हुआ ।
इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि नरेंद्र मोदी एकमात्र नेता हैं, जिन्होंने 2014 चुनाव जीतने के बाद संसद भवन की चौखट पर मत्था टेका और अभी दूसरी बार जीतने के बाद सेंट्रल हॉल में संविधान की प्रति के आगे सिर झुकाया ।