गुजरात और हिमाचल प्रदेश का चुनाव साथ न कराने के फैसले को लेकर मचे बवाल के बीच में ही चुनाव आयोग ने लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ-साथ कराने की उतावली जाहिर कर दी । जो काम पूरी तरह चुनाव आयोग के हाथ में था और विवाद में फंसे बिना हो सकता था, उसमें तो चुनाव आयोग ने विवाद को न्योता दिया । गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधान सभा का कार्यकाल एक-दूसरे के दो हफ्ते के अंदर समाप्त हो रहा है । उसके बावजूद चुनाव आयोग दोनों राज्यों का चुनाव साथ नहीं करा पाया । हिमाचल प्रदेश के साथ गुजरात चुनाव की तारीखों की घोषणा नहीं करने के पीछे चुनाव आयोग के सामने जो भी लाचारी रही हो, मगर इतना तो स्पष्ट हो गया कि दोनों राज्यों में चुनाव साथ कराना आयोग के लिए संभव नहीं हो पाया । उसके पीछे के राजनीतिक कारणों को लेकर सभी विपक्षी पार्टियों ने बवाल मचाया हुआ है और चुनाव आयोग के लिए जवाब या स्पष्टीकरण देना कठिन हो रहा है । दोनों राज्यों में विधान सभा चुनाव का साथ एलान और सिर्फ हिमाचल प्रदेश के चुनाव कार्यक्रम के बारे में संवाददाता सम्मेलन में जानकारी देकर गुजरात पर चुप्पी वाला चुनाव आयोग का कदम विवाद के घेरे में है । विपक्षी पार्टियों द्वारा इस विवाद को तूल देना और चुनाव आयोग के इरादे पर सवाल उठाना अनर्गल नहीं है ।
इससे उपजे सवालों का जवाब देने से पहले चुनाव आयोग ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया । मुख्य चुनाव आयुक्त ए. के. जोती ने कहा कि वे चार महीने में ही लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने को तैयार हैं । उनके इस बयान से प्रथम दृष्टया मामला ये बनता है कि साथ चुनाव कराने की उतावली केंद्र की भाजपा गठजोड़ सरकार से ज्यादा चुनाव आयोग को है । उससे भी बड़ा सवाल ये उठता है कि जब दो राज्यों का चुनाव कराना चुनाव आयोग को असंभव लगा तो सभी राज्यों का चुनाव एक साथ और वो भी लोकसभा के साथ कराना कैसे संभव होगा । जिन दो राज्यों की विधान सभा का कार्यकाल दो हफ्ते के अंदर पर समाप्त हो रहे हैं, वहां साथ चुनाव कराने में जब चुनाव आयोग को ‘अड़चन’ आयी, तो अन्य राज्यों की विधान सभाओं का चुनाव साथ कराने में उससे बड़ी अड़चन कैसे नहीं आयेगी ।
चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत ने तीन अक्टूबर को भोपाल में चुनाव में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने वाले एक डिस्प्ले कार्यक्रम के दौरान कहा कि ‘हम सितंबर, 2018 तक लोकसभा और राज्य विधान सभाओं के चुनाव साथ करा सकते हैं ।’ केंद्र सरकार ‘हैरत’ में पड़ गयी, क्योंकि भाजपा गठजोड़ सरकार को इतनी जल्दबाजी नहीं है । सरकार लोकसभा चुनाव का कार्यकाल 2019 में पूरा होने से पहले तो शायद आम चुनाव कराना नहीं चाहेगी । नाम तो किसी का उजागर नहीं हुआ, मगर केंद्र सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों को स्पष्ट करना पड़ गया कि एक साथ चुनाव कराने की सरकार को कोई जल्दबाजी नहीं है । सरकार चाहती है कि पहले इस मुद्दे पर राजनीतिक निर्णय हो, सर्वदलीय बैठक बुलाकर विचार-विमर्श किया जाए और राजनीतिक दल भी आपस में विमर्श करें, उसके बाद चुनाव आयोग आगे बढ़े ।
आठ अक्टूबर को सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी कि सभी दलों में आम राय कराने की प्रक्रिया अभी शुरू भी नहीं हो पायी है, इसलिए 2018 में लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराना संभव नहीं हो पाएगा । उसके हफ्ता भर बीतने से पहले मुख्य चुनाव आयुक्त ने और भी ज्यादा जल्दबाजी दिखायी ।
चुनाव आयुक्त ओ. पी. रावत से एक डिग्री आगे बढ़कर मुख्य चुनाव आयुक्त ए. के. जोती ने कहा कि ‘हम चार महीने में ही साथ चुनाव करा सकते हैं ।’ चुनाव आयोग के इतने उतावलेपन के पीछे आखिर आधार क्या है, जबकि चुनाव आयोग को समय-सीमा निर्धारित करने नहीं कहा गया था ।
आखिर चुनाव आयोग क्यों बार-बार सरकार पर दबाव बना रहा है कि जल्दी से जल्दी जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन करके साथ चुनाव कराने का रास्ता क्लियर करे । मुख्य चुनाव आयुक्त ने तो सरकार को चार महीने में ही संशोधन करने कह दिया । तब तो लोकसभा समय से पहले 2018 में ही भंग करनी होगी और जिन राज्यों की विधान सभाओं का कार्यकाल 2018 में समाप्त नहीं हो रहा है, उसे भंग करने का भी कोई कानूनी उपाय अपनाना होगा । यह भी संभव है कि सरकार के अप्रत्यक्ष दबाव में ही चुनाव आयोग को ऐसा करना पड़ रहा है । चुनाव आयोग ने भी इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की एक भी बैठक नहीं बुलायी है । गुजरात और हिमाचल प्रदेश चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों के सीधे निशाने पर चुनाव आयोग है । सत्तारूढ़ दल को फायदा पहुंचाने के कथित मकसद से चुनाव आयोग ने कांग्रेस शासित हिमाचल प्रदेश के साथ भाजपा शासित गुजरात के चुनाव तारीखों का एलान नहीं किया । उसके लिए वर्षों से चले आ रह परंपरागत चुनाव कार्यक्रम में राजनीतिक दबाव में बदलाव किया । उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पूर्व निर्धारित गुजरात दौरों और गुजरात सरकार की वोट लुभावन घोषणाओं से जोड़कर देखा जा रहा है । गुजरात में भी चुनाव तारीखों का एलान हो जाने से आदर्श आचार संहिता लागू हो जाती और चुनावो लाभ वाली ‘जन कल्याण’ योजनाओं की घोषणा नहीं हो पाती । विपक्षी पार्टियों का आरोप बेबुनियाद नहीं है कि प्रधानमंत्री के गुजरात दौरों की तारीखों की वजह से चुनाव आयोग ने चुनाव तारीखें तय करने में देर की । वैसे तो नरेंद्र मोदी 16 अक्टूबर को भी पार्टी की गुजरात गौरव यात्रा के समापन समारोह में भाग लेने गए । मगर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण बड़ोदरा में 780 करोड़ रूपये की मेगा विकास परियोजनाएं हैं, जिनका शिलान्यास प्रधानमंत्री को 23 अक्टूबर को करना है । 12 अक्टूबर को दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के चुनाव एलान संवाददाता सम्मेलन के कुछ ही मिनटों बाद यह सूचना उजागर हुई । 23 अक्टूबर को ही नरेंद्र मोदी ‘रॉल ऑन रॉल ऑफ’ नौका सेवा की शुरूआत करेंगे । मोडल आचार संहिता लागू न होने से गुजरात सरकार और भाजपा शासित अहमदाबाद नगर निगम के वोट लुभावन राशि आवंटन की झड़ी लगा दी । इतनी हड़बड़ी की कोई जरूरत नहीं थी । क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त ए. के. जोती ने कह दिया कि गुजरात चुनाव 19 दिसंबर को हिमाचल के चुनाव परिणाम से पहले कराए जाएंगे । चुनाव आयोग से मिली छूट से ‘उत्साहित’ नरेंद्र मोदी ने 16 अक्टूबर को ही विकास के मुद्दे पर लड़ने की कांग्रेस को चुनौती दे दी ।
ए. के. जोती ने अपने चारों तरफ सवालों की ऐसी घेराबंदी खड़ी कर ली है कि उसे तोड़ना उनके लिए आसान नहीं है । राजनीतिक दलों के आरोपों को टाल रहे हैं, मतदाताओं के बीच आम चर्चा वे अनसुनी कर रहे हैं । मगर पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी के सवालों का जवाब चुनाव आयोग को देते नहीं बन रहा है । गुजरात चुनाव की तारीखें घोषित क्यों नहीं हुई? हिमाचल में वोटिंग और वोटों की गिनती में 39 दिनों का अंतर क्यों? चुनाव आयोग ने खुद कहा कि 19 दिसंबर को हिमाचल में वोटों की गिनती से पहले गुजरात चुनाव होंगे । तीनों सवाल एक-दूसरे से गुंथे हैं ।
1998 से इन दोनों राज्यों के चुनाव साथ हो रहे थे । 2002 में व्यवधान आया और गुजरात चुनाव आगे खिसका, जब नरेंद्र मोदी मुख्यमंत्री थे । केंद्र में भी भाजपा गठजोड़ सरकार थी । अभी नरेंद्र मोदी स्वयं गुजरात के साथ-साथ पूरे देश की कमान संभाले हुए हैं । सितंबर में गुजरात में राज्य सभा की एक सीट के चुनाव को लेकर ही कांग्रेस और भाजपा दोनों पार्टियों का चुनाव आयोग मोहरा बन गया था ।
अभी चार महीने में ही लोकसभा और विधान सभा चुनाव साथ कराने की उतावली से लगता है कि चुनाव आयोग को सिर्फ वोटिंग मशीनों और उसके लिए फंड से मतलब है । सरकार को मौजूदा हालात में कांग्रेस और गैर-भाजपा शासित विधान सभाओं का कार्यकाल देखना है । इसी समय में पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट से कांग्रेस के सुनील जाखड़ के हाथों भाजपा के सवर्ण सिंह सलारिया का लगभग एक लाख 93 हजार से ज्यादा वोटों के अंतर से हारना हल्का ही सही, झटका तो दिया । भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती पंजाब, पश्चिम बंगाल और केरल विधान सभाओं का कार्यकाल 2019 में लोकसभा चुनाव के समय तक भी समाप्त नहीं होगा । 2018 में जनवरी से सितंबर तक सात राज्यों में चुनाव हो जाएंगे ।
नीति आयोग के जरिए प्रधानमंत्री ने लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ कराने का प्रस्ताव 2016 में उछाला । किसी पार्टी ने अभी तक दिलचस्पी नहीं दिखायी है । प्रधानमंत्री बार-बार इसे दुहराते हैं । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस प्रस्ताव का स्वागत करनेवाले अकेले व्यक्ति हैं । केंद्र सरकार ने राजनीतिक फंडिंग को लेकर जनप्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू की तो मामला सुप्रीम कोर्ट में चला गया । नीति आयोग ने प्रधानमंत्री के निर्देश पर चुनाव साथ कराने लायक माहौल बनाने के लिए 2024 के लोकसभा चुनाव तक का समय तय किया हुआ है । नरेंद्र मोदी ने 16 अक्टूबर को गुजरात में कहा भी - ‘अब 2019 की छोड़ो, 2024 पर ध्यान दो ।’ ऐसे में 2018 में ही लोकसभा विधान सभा चुनाव एक साथ राने की चुनाव आयोग की उतावली उलझन में डालने वाली है ।