पश्चिम बंगाल में सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी को चुनाव आयोग के शीर्ष अधिकारियों के ‘बार-बार’ कोलकाता आने पर एतराज है जहां विधान सभा चुनाव करीब है । पार्टी का आरोप है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी के ‘सुझाने’ पर चुनाव आयोग ऐसा कर रहा है और उन्हीं इलाकों को टार्गेट बना रहा है, जहां वाम मोर्चा का वोट ज्यादा है ।
माकपा महासचिव प्रकाश करात ने पश्चिम बंगाल में चुनाव तैयारियों का जायजा लेने के लिये जनवरी में बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी सुधीर राकेश को भेजने के चुनाव आयोग के फैसले पर भी आपत्ति जतायी । उनका कहना है कि ऐसा पहली बार हुआ है जब चुनाव वाले राज्य में किसी दूसरे प्रदेश के चुनाव अधिकारी को स्थिति का ‘अध्ययन’ करने भेजा गया हो ।
अगर करात की बात को ही लेकर चलें तो ये पहले नेता हैं, जिन्होंने अपने दलीय हित के मद्देनजर चुनाव आयोग के दौरे पर अपने उंगली उठाया है । जनवरी के पहले सप्ताह में मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी अपने साथी दोनों चुनाव आयुक्तों के साथ पश्चिम बंगाल आए और शांतिपूर्ण चुनाव कराने के रास्ते का मुख्य रोड़ा राजनीतिक अपराध करार दिया । साथ में अवैध हथियार जब्त करना भी एक कठिन काम बताया क्योंकि सत्तारूढ़ मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं के पास ही सबसे ज्यादा अवैध हथियार होने की खुफिया रिपोर्ट है । उसके बाद कुरैशी ने पड़ोसी बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी को जमीनी स्तर से जायजा लेने भेजा, क्योंकि पश्चिम बंगाल से ज्यादा राजनीतिक अपराध वाले इस राज्य में शांतिपूर्वक चुनाव कराने के चुनाव आयोग क सारे उपाय सफल रहे । पश्चिम बंगाल से बिहार की सीमाएं भी मिली है ।
मुख्य चुनाव आयुक्त को कोलकाता में 8 जनवरी के अपने संवाददाता सम्मेलन में कहना पड़ा कि पश्चिम बंगाल की चुनौती ज्यादा कठिन है, इसलिए अन्य राज्यों से भी केन्द्रीय बल मंगाने पड़ेंगे । मतदाता सूची में फर्जी नाम भी यहां बिहार से ज्यादा है । जनवरी में ही इस सिलसिले में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात की और केन्द्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने भी मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी कार्यकर्ताओं के हथियार लेकर छुट्टा घूमने पर चिंता व्यक्त की । इस पर किसी ने कोई टिप्पणी नहीं की। यह सब उन्हें रेलमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी के इशारे पर होता नहीं लगा । लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के अधिकारियों के दौरों पर टीका-टिप्पणी लगातार जारी है । चुनाव आयोग को मोहरा बनाकर माकपा नेता अपने प्रबल प्रतिद्वंदी तृणमूल कांग्रेस के प्रति खुंदक निकाल रहे हैं । चुनाव आयोग के जनवरी दौरों पर प्रकाश करात ने टिप्पणी की । उप मुख्य चुनाव आयुक्त विनोद जुत्शी जब तीन दिनों के दौरे पर इसी हफ्ते पहुंचे तो मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी की राज्य यूनिट के प्रमुख बिमन बोस और वरिष्ठ नेता श्यामल चक्रवर्ती ने भी वही आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के अधिकारी जिन इलाकों के दौरे कर रहे हैं वो तृणमूल कांग्रेस के सुझाये लगते है, जिससे जाहिर है कि ये दौरे ‘पूर्वनियोजित’ हैं । विनोद जुत्शी की मौजुदगी में पश्चिमी मेदिनीपुर जिले में माकपा और तृणमूल कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच झड़पें हुई । उपचुनाव आयुक्त ने हावड़ा, हुगली, उत्तरी 24 परगना, दक्षिणी 24 परगना, बान्कुरा, पुरूलिया, पूर्वी और पश्चिमी मेदिनीपुर समेत उन सभी जिले के जिला मजिस्ट्रेट तथा पुलिस अधीक्षकों के साथ अलग-अलग बैठकें की । इन जिलों में प्रायः ऐसी राजनीतिक झड़पें होती रहती हैं । इसके लिए दोनों पार्टियां एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराती हैं ।
पश्चिम बंगाल के साथ-साथ असम, तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में भी मई के आस-पास विधान सभा चुनाव होने हैं । इन राज्यों में सबसे ज्यादा कानून और व्यवस्था का संकट असम में है, जहां मुख्य चुनाव आयुक्त तीसरी बार गये । जनवरी में वे गुवाहाटी होते हुए कोलकाता आए और अभी उपचुनाव आयुक्त के कोलकाता पहुंचने से एक दिन पहले वे स्वयं असम चले गये । असम के मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने आज तक कोई टिप्पणी नहीं की, जबकि वहां भी चुनाव आयोग ने अन्य राज्यों के चुनाव अधिकारियों की टीम भेजी और वे फिर जा रहे हैं । तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने भी चुनाव आयोग के दौरों पर उंगली नहीं उठायी, न ही पार्टी के किसी नेता ने कोई टिप्पणी की । यहां तक कि केरल के मुख्यमंत्री वी. एस. अच्युतानंदन और वहां भी सत्तारूढ़ माकपा की प्रदेश युनिट के किसी नेता को चुनाव आयोग के दौरों पर कोई एतराज नहीं है । लेकिन पश्चिम बंगाल को लेकर माकपा कुछ ज्यादा ही ‘संवेदनशील’ मालूम पड़ती है ।
2009(मई) के लोकसभा चुनाव में इस पार्टी को करारा झटका देने वाली तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी उसी समय से राज्य में निर्धारित समय से पहले विधान सभा चुनाव कराने की मांग कर रही हैं । इस पर अपनी प्रतिक्रिया में मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य समेत लगभग सभी पार्टी नेताओं ने कहा कि ऐसी मांग बेतुकी है, क्योंकि यह चुनाव आयोग का अधिकारक्षेत्र है । आज वही पार्टी चुनाव आयोग के अधिकार पर टीका-टिप्पणी करते नहीं थक रही है । चुनाव तैयारियों का जायजा लेने के लिए चुनाव आयोग को क्या-क्या करना चाहिए, दौर कब और कितने करने चाहिए, यह संवैधानिक अधिकार के तहत आयोग को तय करना होता है । लेकिन माकपा के टिप्पणियों से लगता है कि चुनाव आयोग को अपने दौरे का कार्यक्रम इस पार्टी की राजनीतिक ‘सुविधा’ का ख्याल करके बनाना चाहिए । जबकि ममता बनर्जी की मांग अनसुनी करके चुनाव आयोग निर्धारित समय से ही चुनाव करा रहा है । जनवरी में कोलकाता दौरे के क्रम में राजनीतिक दलों से मशविरे के बाद भी मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी ने चुनाव तारीखों के बारे में कुछ नहीं कहा । लेकिन यह जरूर बताया कि सभी दलों ने मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी कार्यकर्ताओं के हथियारों से लैस होने का मामला उठाया । 2009 के चुनाव के बाद ईवीएम(इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन) के साथ छेड़छाड़ का आरोप सबसे पहले माकपा नेता प्रकाश करात ने लगाया । उसके बाद इस कवायद में राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव और लोकजनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान शामिल हो गये । बिना किसी जनाधार के स्वयंभू जनता पार्टी अध्यक्ष सुब्रमण्यम स्वामी ने अकेला इसके खिलाफ जेहाद छेड़ रखा है । ममता बनर्जी ने रेल मंत्री बनने के बाद तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त नवीन चावला पर सीधा आरोप लगाते हुए कहा कि अगर ईवीएम के साथ छेड़छाड़ नहीं की गयी होती तो पश्चिम बंगाल की सारी लोकसभा सीटें उनकी पार्टी जीतती । 2004 के लोकसभा चुनाव के समय माकपा समेत वाम मार्चे के घटकों को चुनाव आयोग का दौरा नहीं अखरा । उसके पहले के विधान सभा चुनावों में भी नहीं अखरा, जब माकपा कई वर्षों से लगातार बहुमत हासिल कर रही थी । आज का आरोप माकपा के अन्दर मौजूद सत्ता हाथ से जाने का डर नहीं तो और क्या माना जाए, क्योंकि 2009 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद नगरपालिका चुनाव में तृणमूल कांग्रेस अपने ही बलबूते माकपा को हाशिये पर ला चुकी है । बिहार में तो अधिकांश माकपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गयी । पश्चिम बंगाल को लेकर चुनाव आयोग का चिंतित होना तो समझ में आने वाला है, क्योंकि राज्य के मुख्य सचिव समर घोष ने भी वही चिंता व्यक्त की है । उनके मुताबिक पिछले चुनावों में केन्द्रीय बलों की 600 कम्पनियों की जरूरत पड़ी थी, लेकिन इस बार राज्य में पुलिस कर्मियों की कमी की वजह से ज्यादा की दरकार होगी । गैर-सरकारी सूत्रों के मुताबिक माकपा कार्यकर्ताओं के पास जैसे अवैध हथियार हैं, वैसे पुलिस कर्मियों के पास नहीं हैं । राज्य सरकार सामान्य स्थिति में भी अमन-चन कायम रखने के लिए पुलिसकर्मियों की किल्लत झेल रही है । कुछ दिन पहले जो बहाली का विज्ञापन निकला उन आवेदकों की तैनाती चुनाव के समय तक संभव नहीं है क्योंकि उनकी ट्रेनिंग में ही 8 महीने लग जायेंगे । क्या यह राज्य सरकार का दायित्व नहीं था कि रिक्तियां पहले ही भर ली जायें, जबकि पार्टी कार्यक्रताओं में इजाफा हुआ है?
ममता बनर्जी के माओवादियों से मिले होने का मुख्यमंत्री का आरोप तो समझ में आता है । चुनाव आयोग ने लगभग 51000 हजार बूथों में से 25000 हजार की संवेदनशील बूथों के रूप में पहचान की है, जिनमें ज्यादा माओवादियों के प्रभाव वाले इलाकों में हैं । पार्टी नेताओं के आरोप से तो लगता है कि चुनाव आयोग भी ममता बनर्जी से मिला हुआ है, ये बात गले के नीचे उतरने लायक नहीं लगती ।
चुनाव आयोग के हीरक जयंती वर्ष में एक ओर जहां इस बात की चर्चा है कि भारत की यह संवैधानिक संस्था पड़ोसी देशों समेत दुनियाभर के लिए मॉडल है, वहीं दूसरी ओर यह खबर भी गर्म है कि राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने दलीय स्वार्थ के वशीभूत होकर चुनाव आयोग को मोहरा बनाती रही हैं । चुनाव सुधार पर प्रमुख राजधानियों में चल रहे क्षेत्रीय सेमिनार के क्रम में मुख्य चुनाव आयुक्त ने इस पर खेद व्यक्त किया कि अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाना चुनाव आयोग के वश का नहीं है, क्योंकि कोई राजनीतिक दल ऐसा नहीं चाहता । तो बहुजन समाज पार्टी नेता उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की जबाबी प्रतिक्रिया(अपराधी को टिकट नहीं देने) से लगा मानो वे वाकई एक कदम आगे बढ़ेंगी । मगर लखनऊ सेमिनार(30 जनवरी) में जब उन्होंने कहा कि किसी उम्मीदवार को तब तक चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता, जबतक अदालत उसे दोषी नहीं करार देता, तो असलियत उजागर हो गयी । कुरैशी ने इसीलिए आरोपी होना ही टिकट न देने का आधार बनाने का सुझाव दिया, क्योंकि दोषी साबित करने में अदालत को 25-30 वर्ष लग जाते हैं और तबतक अपराधी चुनाव लड़कर राजनीतिक प्रभाव जमाने की स्थिति में आ जाते हैं ।
भाजपा ने तो इतिहास ही रच डाला है, जिसकी शिकायत पर 2008 में मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालास्वामी ने अपने साथी चुनाव आयुक्त नवीन चावला को बर्खास्त करने की सिफारिश राष्ट्रपति के पास भेज दी, ताकि 2009 के लोकसभा चुनाव के समय वे मुख्य चुनाव आयुक्त न बन पाये । भाजपा ने नवीन चावला पर कांग्रेस से मिले होने का आरोप लगाया और 2004 के आम चुनाव में अपनी हार के लिए उन्ही को दोषी ठहरा दिया । ईवीएम में छेड़छाड़ का आरोप लगाने वाले वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी थे । एन. गोपालास्वामी ने तो साबित कर दिया कि वे भाजपा के आदमी हैं । नवीन चावला से मुख्य चुनाव आयुक्त का कार्यभार लेने वाले कुरैशी की देखरेख में हुए बिहार चुनाव में दुबारा पहले से मजबूत गठजोड़ सरकार बनाने वाली भाजपा को ईवीएम में छेड़छाड़ की ‘शिकायत’ नहीं मिली । लेकिन सूपड़ा साफ सभी पार्टियों ने शिकायत की है ।