मुख्य चुनाव आयुक्त(सीइसी) राजीव कुमार ने चुनाव प्रक्रिया पर ऊंगली उठानेवाले पराजित राजनीतिक दलों के झमेलों को एक सिरे से खारिज करते हुए मतदाताओं को ऐसे दुष्प्रचार से बचने कहा दिल्ली विधान सभा चुनाव कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा के दौरान सीइसी ने जोर देकर यह बात कहीं कि इवीएम(इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन) किसी भी तरह से हैक नहीं हो सकती और मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों को नकारा ।
चुनाव आयोग की पूरी टीम के साथ सीइसी राजीव कुमार ने सुप्रीम कोर्ट समेत विभिन्न हाईकोर्ट आदेशों का हवाला देते हुए कहा कि इवीएम के ‘फूलप्रूफ’ और छेड़छाड़ की संभावना से मुक्त होने के सत्यापन पर 42 बार अदालती मुहर लग चुकी है । इवीएम और वीवीपीएटी(वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रेल) पर ऊंगली उठाने की बात तो अब आयी गयी हो गयी । हर चुनाव कार्यक्रम के एलान के समय चुनाव आयोग को इस पर स्पष्टीकरण देते हुए ऐसे आरोपों को मनगढंत और आधारहीन बताकर मतदाताओं को गुमराह होने से बचना पड़ता है ताकि वोट डालने के प्रति उनका उत्साह बना रहे । लेकिन चुनाव के बाद हारनेवाली पार्टियां इवीएम में छेड़छाड़ के आरोप लगाकर अपनी झुंझलाहट निकालती हैं और चुनाव आयोग को सबूत नहीं दे पाती ।
गत हफ्ते दिल्ली विधान सभा चुनाव तारीखों के एलान के समय इस बार चुनाव आयोग का मुख्य फोकस मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों पर था । यह आरोप हाल में महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस समेत इंडिया गठजोड़ ने उछाला है । महाराष्ट्र में हार की हताशा कांग्रेस ने चुनाव आयोग पर मढ़ते हुए मतदाता सूची में गड़बड़ी को निशाना बनाया । राजीव कुमार ने उन आरोपों का सटीक और तथ्यपूर्ण खंडन करते हुए मतदाता सूची तैयार करने की पूरी प्रक्रिया की जानकारी 07 जनवरी को दिल्ली में आयोजित संवाददाता सम्मेलन में दी । उन्होंने कहा कि संपूर्ण दस्तावेज देने, मौके पर पहुंचकर किए गए सत्यापन और संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए बगैर कोई नाम मतदाता सूची से नहीं हटाया जा सकता ।
दिल्ली विधान सभा कार्यक्रम के एलान के लिए 07 जनवरी को चुनाव आयोग ने संवाददाता सम्मेलन बुलाया था । 05 फरवरी को वोटिंग होगी और 10 फरवरी को चुनाव प्रक्रिया संपन्न हो जाएगी ।
इस संवाददाता सम्मेलन में मतदाता सूची में गड़बड़ी के आरोपों का विस्तार से खंडन करने के लिए, सीइसी मतदाता सूची जांच परख की प्रक्रिया सार्वजनिक रूप से बताने को विवश थे । शुरू किया दिल्ली की मुख्यमंत्री अतिशी ने और उसे खींचा आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने ।
चुनाव कार्यक्रम की घोषणा से पहले दिल्ली की मुख्यमंत्री अतिशी आरोप लगा चुकी थी कि मतदाता सूची में छेड़छाड़ की जा रही है । कांग्रेस भी लगा चुकी थी । जब चुनाव तारीखों का एलान हो गया तो आप अध्यक्ष और दिल्ली के पूर्व अरविंद केजरीवाल ने चुनाव आयोग को ज्ञापन सौंपकर मतदाता सूची में गड़बड़ी का आंकड़ा बताया । कांग्रेस के आंकड़ा विश्लेषण विभाग प्रमुख प्रवीन चक्रवर्ती ने चुनाव आयोग की सफाई के जवाब में अपना और विपक्ष का आरोप दुहराया कि महाराष्ट्र में चार महीने में 50 लाख वोटर मतदाता सूची में शामिल होना संदेह पैदा करनेवाला है । चक्रवर्ती के आरोप के अनुसार महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा प्रयुक्त युवा आबादी से ज्यादा कुल योग्य मतदाताओं की थी । उसके बाद 09 जनवरी को अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में पंजाब के आप मुख्यमंत्री भगवंत मान, अतिशी और सांसद संजय सिंह ने चुनाव आयुक्तों से मिलकर बताया कि गत 22 दिनों में नयी दिल्ली चुनाव क्षेत्र में 5,500 आवेदन मतदाता सूची से वोटरों का नाम हटाने के लिए आवेदन प्राप्त किए गए हैं । केजरीवाल के अनुसार चुनाव आयोग को बताया गया कि 15 सितंबर से अबतक 13,000 आवेदन नये वोटर बनाने के लिए मात्र एक लाख वोटरों वाली नयी दिल्ली विधान सभा सीट के लिए आए हैं । मात्र 15 दिनों में इतने लोग कहां से आए 6 आप प्रमुख केजरीवाल ने कहा कि यह फर्जी मतदाता बनाने का स्पष्ट संकेत है और आरोप लगाया कि ये लोग संभवतः बिहार तथा उत्तर प्रदेश से लाए गए हैं । नयी दिल्ली चुनाव क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार परवेश साहिब सिंह पर 1100 रुपए हर महिला को देने का अरविंद केजरीवाल का आरोप तो चुनाव आचार संहिता का मामला है, जिस शिकायत की जांच का आदेश चुनाव आयोग ने दिल्ली के मुख्य चुनाव अधिकारी को दिया । नयी दिल्ली विधान सभा सीट से अरविंद कजरीवाल जीते हुए हैं और इस बार भी उम्मीदवार हैं । मतदाता सूची में गड़बड़ी की शिकायतों का जवाब देते हुए सीइसी राजीव कुमार ने 07 जनवरी को ही स्पष्ट किया कि प्रखंड स्तर के अधिकारी द्वारा बजाप्ता फील्ड जांच अनिवार्य है, मृत्यु प्रमाण पत्र के जरिए दस्तावेज तैयार किए जाते हैं जिसका क्रॉस सत्यापन होता है । यहां तक कि ड्राफ्ट मतदाता सूची छपने के बावजूद जनता और असंतुष्ट मतदाताओं से दावे तथा आपत्तियां आमंत्रित की जाती हैं । अंतिम सूची छपने से पहले सुनवाई होती है । सीइसी ने संवाददाता सम्मेलन में दिल्ली की मुख्यमंत्री का नाम लिए बगैर कहा कि अन्य राज्यों की तरह शोर हो रहा है । जबकि सूची से नाम हटाने और जोड़ने का एक स्थापित व्यवस्था है । इसका पालन किए बगैर न तो नाम जोड़ा जा सकता है, न ही काटा जा सकता है । फार्म.7 भरे बिना किसी मृतक का नाम भी सूची से बाहर नहीं निकाला जा सकता । अंत में सीइसी ने बताया कि मतदाता सूची तैयारी में 70 चरण अपनाए जाते हैं और हर चरण में उम्मीदवार तथा राजनीतिक दलों को साथ रखा जाता है । इसके बावजूद राजनीतिक दलों की हताशा पर चुनाव आयोग ने कहा कि ऐसे बेबुनियाद आरोपों से युवा मतदाता दिग्भ्रमित न हों और ‘झूठ के गुब्बार’ फैलानेवालों से मतदाताओं को सावधान रहने की सलाह दी । चुनाव नियमों में किए गए हालिया संशोधन के बारे में सीइसी ने कहा कि इसका मकसद मतदाताओं की प्राइवेसी की रक्षा करना है और परिणाम के फर्जी अनुमानों समेत अन्य बातों के प्रचार के लिए डाटा का इस्तेमाल रोकना है ।
वीवीपीएटी पर सफाई में चुनाव आयोग ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2019 में दिए गए आदेश के अनुसार प्रत्येक विधान सभा क्षेत्र से पांच वीवीपीएटी की गिनती अनिवार्य है । 67,000 से ज्यादा वीवीपीएटी की जांच की जा चुकी है, जिसका मतलब 405 करोड़ से अधिक पर्चियों का मिलान किया जा चुका है और एक भी विसंगति नहीं पायी गयी है । उन्होंने कहा कि 42 बार उच्च अदालतों ने फैसला सुनाया है कि इवीएम हैक नहीं की जा सकती ।
गैरतलब है कि अभी भी इवीएम छेड़छाड़ के खिलाफ दायर अर्जियों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है ।
सीइसी राजीव कुमार का यह अंतिम चुनाव कार्यक्रम एलान था । 18 फरवरी को वे सेवानिवृत्त होंगे । 04 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति एक्ट, 2023 को चुनौती देनेवाली याचिकाओं पर सुनवाई होगी । सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुकी है कि जिस प्रावधान के खिलाफ याचिका दायर की गयी है, वो जुड़ना संसद से ही संभव है । वकील प्रशांत भूषण ने 18 फरवरी से पहले सुनवाई पर जोर दिया ।
इसके बारे में विस्तृत चचा आगे करेंगे । पहले यह देखें कि किस प्रकार चुनाव प्रक्रिया को राजनीतिक दलों ने सियासी हथकंडा बनाया हुआ है । हारने पर इवीएम को जिम्मेदार ठहरानेवाले कोई भी राजनीतिक दल जीत का श्रेय इवीएम को नहीं देते । मतलब ये कि इवीएम में छेड़छाड़ नहीं हुई, इसीलिए जीते । इवीएम पर दोष मढ़नेवाली बयानबाजी करके हार को स्वीकार न करना इंडिया गठजोड़ में फूट का एक कारण बना है । जम्मू व कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला एकमात्र नेता हैं, जिन्होंने विधान सभा चुनाव में जीत के लिए चुनाव आयोग का शुक्रिया किया और कांग्रेस के इवीएम में छेड़छाड़ के आरोपों का गलत बताया । गत अक्टूबर में संपन्न जम्मू व कश्मीर विधान सभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस को भारी जीत मिली और उसके नेता उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने । कांग्रेस को इतनी सीटें नहीं मिली ताकि अपनी शर्तों पर सरकार में शामिल हो सके । कांग्रेस नेताओं ने हार के लिए इवीएम में छेड़छाड़ को दोषी ठहरा दिया । उनके जवाब में उमर अब्दुल्ला निष्पक्ष और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत बिल्कुल पारदर्शी चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग का शुक्रिया करते हुए कांग्रेस के आरोपों को हताशा का परिणाम बताया ।
दिल्ली विधान सभा चुनाव संपन्न होने से पहले ही इंडिया गठजोड़ में बढ़ती रार खुलकर सामने आ गयी है । संसद के हालिया सत्र में गूंजे गौतम अडाणी के अलावे इवीएम पर अन्य घटक दलों की अलग-अलग राय है ।
उमर अब्दुल्ला ने ही आगे बढ़कर कहा कि दिल्ली विधान सभा चुनाव से हमारा कोई लेना देना नहीं है, इसके बाद इंडिया गठजोड़ की बैठक बुलानी चाहिए और यदि यह गठजोड़ सिर्फ संसदीय चुनावों के लिए था तो इसे समाप्त कर देना चाहिए, हम अपने राज्यों में अलग-अलग काम करेंगे । दिल्ली में आप और कांग्रेस ने भाजपा के खिलाफ अलग-अलग उम्मीदवार खड़े किए हैं ।
कांग्रेस और आप द्वारा चुनाव आयोग के पास शिकायत दर्ज कराने के बाद 09 जनवरी को उमर अब्दुल्ल ने यह बयान जारी किया । जम्मू व कश्मीर के साथ ही हुए हरियाणा विधान सभा चुनाव में मतदान और मतों की गिनती में कथित गड़बड़ी की शिकायत भी कांग्रेस ने चुनाव आयोग के पास अक्टूबर, 2024 में की थी ।
इस विवाद का असर देश में रह रहे मतदाताओं पर नहीं पड़ा है । बर्ना इवीएम गड़बड़ी की नेताओं की बयानवाजी के बावजूद लोग मतदान को पर्व के रूप में नहीं मनाते ।
लेकिन विदेशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों एनआरआई (अप्रवासी भारतीय) पर इवीएम और मतदाता सूची के साथ छेड़छाड़ का असर शायद पड़ा है ।
चुनाव आयोग की ओर से जारी हालिया आंकड़े से ऐसी संभावना लगती है । अप्रवासी भारतीयों ने 2024 लोकसभा चुनाव के समय मतदाता के रूप में पंजीकरण में काफी उत्साह दिखाया, मगर वोट डालने में रुचि नहीं थी ।
चुनाव आयोग के आंकड़े के अनुसार 1,19,374 ने एनआरआई मतदाता के रूप में 2024 में मतदाता सूची में नाम दर्ज कराया, मगर मात्र 2,958 अप्रवासी वोट डालने भारत आए । सबसे ज्यादा केरल निवासियों ने पंजीकरण कराया और वहीं से ज्यादा एनआरआई वोट डालने आए । कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु जैसे बड़े राज्यों में से एक भी एनआरआई मतदाता नहीं पहुंचे । 2019 में 99,844 एनआरआई मतदाता पंजीकृत हुए थे । चुनाव आयोग ऐसे मतदाताओं के लिए ऑनलाईन वोटिंग की सुविधा पर विचार कर रहा है । गत हफ्ते ओडिशा में हुए 18वें एनआरआई सम्मेलन से 15 दिन पहले चुनाव आयोग ने यह आंकड़ा जारी किया ।
चुनाव आयोग के अंदर भी राजनीति चर्चा का विषय है । 04 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में जिन याचिकाओं पर सुनवाई होगी, उसकी जड़ में राजनीतिक विवाद है । दिसंबर, 2023 में संसद से पास मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त(नियुक्ति, सेवा शर्तें, पदावधि) एक्ट में सरकार ने चयन समिति से भारत के प्रधान न्यायाधीश(सीजेआई) को हटा दिया, जबकि वो प्रावधान सुप्रीम कोर्ट का ही दिया हुआ था । केंद्र सरकार ने सीजेआई की जगह प्रधानमंत्री की इच्छा से कोई भी कैबिनेट मंत्री को चयन समिति में रखने का प्रावधान करके एक्ट पास कर दिया । इसको लेकर संपूर्ण विपक्ष ने जबर्दश्त हंगामा किया और सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि यह चुनाव आयोग को सरकारी संस्था बनाने की साजिश है ।