राजनीतिक दलों को दागी उम्मीदवारों को टिकट देने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से एक ‘तार्किक आदेश’ जारी करने कहा है । चीफ जस्टिस शरद अरविंद बोबड़े की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपने निर्देश में चुनाव आयोग से ऐसा ‘आदेश’ जारी करने के लिए तीन महीने का समय दिया है । सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ‘आदेश’ जारी करने चुनाव आयोग से कहा है, जिसका अधिकार चुनाव आयोग के पास है ही नहीं । सुप्रीम कोर्ट खुद ऐसा आदेश जारी करके चुनाव आयोग को तात्कालिक प्रभाव से या एक निश्चित समय सीमा के अंदर लागू करने कह सकता है ।
भाजपा नेता और वकील अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर के अंतिम सप्ताह में चुनाव आयोग को यह निर्देश दे दिया, जिसका अनुपालन निर्वाचन आयोग के लिए असंभव है । क्योंकि यह काम चुनाव आयोग के अधिकारक्षेत्र से बाहर है । सुप्रीम कोर्ट स्वयं ऐसा करने से परहेज कर रहा है, क्योंकि यह सीधे ‘लक्ष्मण रेखा’ का उल्लंघन और विधायिका की सीमा में हस्तक्षेप माना जाएगा ।
न तो अश्विनी उपाध्याय की याचिका नयी है, न ही इस पर विचार करनेवाली यह पहली सुप्रीम कोर्ट पीठ है । भाजपा नेता को अच्छी तरह पता है कि चुनाव आयोग कई वर्षों से दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार सरकार से मांग रहा है । जिस चुनाव आयोग के पास दागी उम्मीदवारों के पर्चे और किसी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने का अधिकार नहीं है, वो किस बलबूते राजनीतिक दलों को यह आदेश देगा कि पार्टियां दागियों को उम्मीदवार न बनाए । भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय चुनाव आयोग की इस लाचारी से अच्छी तरह वाकिफ हैं । चीफ जस्टिस बोबड़े ने अश्विनी उपाध्याय की जिस याचिका पर चुनाव आयोग को विचार करने कहा, वो 22 जनवरी, 2019 की है । जनवरी 2019 से लेकर अभी तक आम चुनाव समेत कई राज्यों में विधान सभा चुनाव हो गए । दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने की याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई इसके पहले तीन साल तक चली है । तीन साल में भारत के तीन प्रधान न्यायाधीशों ने इस संबंध में दायर याचिकाओं पर सुनवाई की और सरकार को लताड़ा । 2017 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता में गठित सुप्रीम कोर्ट पीठ के सदस्य रंजन गोगोई अक्टूबर, 2018 में जब चीफ जस्टिस बने तब भी उन्होंने सुनवाई की । जुलाई, 2018 में चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने साफ कह दिया कि दागियों को उम्मीदवार बनाने से रोकने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन करना पड़ेगा और चुनाव आयोग के गठनवाली धारा 324 भी फेरबदल करना होगा, जो संसद के हाथ में है । अक्टूबर, 2018 में चीफ जस्टिस बने रंजन गोगोई को भी याचिकाकर्ताओं से यही कहना पड़ा । 18 नवंबर, 2019 को शरद अरविंद बोबड़े चीफ जस्टिस बने और वही याचिका उनके सामने भी आयी, जो रंजन गोगोई शायद उन्हीं के लिए छोड़ गए । लेकिन चीफ जस्टिस बोबड़े ने चुनाव आयोग के ही जिम्मे लगा दिया । तीन महीने की मियाद जनवरी, 2020 में पूरी होगी । चुनाव आयोग तब तक वैसा ‘मैकेनिज्म’ नहीं बना सकता, जिससे दागियों को उम्मीदवार बनाने से पार्टियों को रोका जाए ।
नवंबर, 2017 में जस्टिस रंजन गोगोई और जस्टिस नवीन सिन्हा की पीठ ने सरकार से ऐसा कानून बनाने को कहा ताकि दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोका जा सके । अश्विनी उपाध्याय ने अपनी अर्जी में दागियों के पूरी उम्र चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की । सुप्रीम कोर्ट की नोटिस के जवाब में चुनाव आयोग ने हाथ खड़े कर दिये कि कई वर्षों से दागी उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मांगा जा रहा है । चुनाव सुधार सुझावों की फाइलें तीन दशकों से सरकार के ‘विचाराधीन’ है, जिनमें पहले नंबर पर ऐसा कानून बनाने का सुझाव है, जिसमें चुनाव आयोग को दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार मिले । चुनाव आयोग का मानना है कि आपराधिक मुकदमे में शामिल होना ही काफी है और राजनीतिक दलों से बार-बार कहा है कि आरोपपत्र दायर होते ही वैसे उम्मीदवारों को टिकट न दिया जाए । सरकारें बदलती रही, किसी भी गठजोड़ सरकार ने ऐसा संविधान संशोधन बिल लाने की जरूरत नहीं समझी, जिसमें चुनाव आयोग को यह अधिकार मिले । सभी पार्टियों इस मामले में एकमत हैं कि दोष साबित होने और सजा होने से पहले किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका नहीं जा सकता, ऐसा करना उम्मीदवार के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन होगा ।
चुनाव आयोग की दलील सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट पीठ को कहना पड़ा कि दागी उम्मीदवारों के मुकदमे जल्द निबटाए जाएं और इसके लिए ‘फास्ट ट्रैक कोर्ट’ गठित किए जाएं । सुप्रीम कोर्ट जजों ने चुनाव आयोग से प्राप्त आंकड़ा प्रस्तुत करते हुए कहा कि वर्ष 2014 के चुनावों में पर्चे दायर करनेवाले ‘लामेकरों’(कानून बनानेवालों) के खिलाफ 1581 आपराधिक मुकदमे लंबित थे । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार से उन मुकदमों की स्थिति का विवरण प्रस्तुत करने कहा । यह प्रकरण नवंबर, 2017 का है, जिस पर सुनवाई 2016 से चल रही थी । केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल आत्माराम नाडकर्णी ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि सरकार राजनीतिज्ञों के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमें जल्द निबटाने के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट के पक्ष में है, मगर ऐसे कोर्टों के गठन में प्रमुख जिम्मेदारी राज्यों की है ।
यह मामला 2018 में फिर सुप्रीम कोर्ट में गया, जिस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने सुनवाई की । उस समय भी गैर-सरकारी संगठन ‘लोक प्रहरी’ के साथ अश्विनी उपाध्याय ने भी याचिका दायर की । 27 जुलाई, 2018 के अपने आदेश में चीफ जस्टिस दीपक मिश्र ने कहा कि सांसद या विधायक को दोषसिद्धि पर अपीलीय अदालत से अगर स्टे नहीं मिला, तो सदस्यता के अयोग्य हो जाएंगे । सुप्रीम कोर्ट को 2013 के आदेश की याद दिलायी गयी, जिसमें जस्टिस ए. के. पटनायक और जस्टिस एस. के. मुखोपाध्याय की पीठ ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8/4 को निरस्त कर दिया । इस धारा के अंतर्गत लामेकर आपराधिक मुकदमे में सजा काटते हुए जेल से ही पर्चे भरने और ‘लॉ मेकर’ बने रहने के ‘विशेषाधिकार’ से लैस थे । याचिकाकर्ताओं ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्र से कहा कि इस आदेश को धता बताकर कई सांसद, विधायक दोष साबित होने के बावजूद सदस्य बने हुए हैं । दीपक मिश्र की पीठ के सामने भी चुनाव आयोग ने अपनी लाचारी दुहरायी कि अगर अधिकार होता तो दागी उम्मीदवार संसद या विधान सभा नहीं पहुंच पाते । चीफ जस्टिस ने कड़ शब्दों में सरकार से कहा कि कानून बनाना संसद का काम है और ऐसा बिल लाना सरकार का महकमा है, इस संबंध में काई आदेश देना ‘लक्ष्मण रेखा’ की सीमा पार करना माना जाएगा । सरकार को संविधान की धारा-324 में संशोधन करके चुनाव आयोग को यह अधिकार देना है । धारा-324 में चुनाव आयोग के अधिकार और कर्त्तव्यों का विवरण है ।
मौजूदा सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अवश्य ही 9 अगस्त, 2018 को जारी पांच जजों की पीठ का आदेश देखा होगा । चीफ जस्टिस दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि राजनीति का अपराधीकरण रोकना संसद का दायित्व है । याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शीर्ष कोर्ट चुनाव आयोग को ऐसा निर्देश दे सकता है, जिसके पास राजनीतिक दलों के पंजीकरण का अधिकार है ताकि दागी लोग इसका हिस्सा न बनें । दागियों के चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने के संबंध में जब सुप्रीम कोर्ट से याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा तो जवाब में ‘लक्ष्मण रेखा’ का हवाला देते हुए जस्टिस आर. एफ. नरीमन और डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने कहा कि जिस कानून के तहत चुनाव आयोग किसी जनप्रतिनिधि को अयोग्य घोषित करता है, वो संसद से बना है ।
जुलाई, 2019 में मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद के पास चुनाव सुधार सुझावों की फाइल फिर से भेजी, जिसमें झूठे फर्जी हलफनामे दायर करनेवाले उम्मीदवारों ‘और पेड न्यूज’ के मामले में जेल की सजा की मांग की गयी है । लेकिन दागियों के पर्चे रद्द करने और टिकट न देने का जिक्र नहीं है ।
गौरतलब है कि 2008 में सांसद ई. एम. सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून बनाने के चुनाव आयोग के सुझाव को ‘अव्यावहारिक’ बताया । नरेंद्र मोदी शासनकाल में भी 2015-2016 में नचियप्पन की ही अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने चुनाव सुधार पर विचार नहीं किया ।
2013 में जब सुप्रीम कोर्ट ने ‘लामेकरों’ को ‘विशेषाधिकार’ वाली धारा को निरस्त किया तो इसकी काट में अध्यादेश लाने के कांग्रेस गठजोड़ सरकार के फैसले से सभी दल सहमत थे । शुक्र है, राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का, जिन्होंने उस अध्यादेश के औचित्य पर सवाल उठाकर सरकार को वापस लेने को विवश किया । कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने उस अध्यादेश को ‘कूड़ा’ बताकर उसकी प्रति सार्वजनिक रूप से फाड़ी । आए दिन एक नया संविधान संशोधन लानेवाली भाजपा गठजोड़ सरकार के अजेंडे में दागियों को चुनाव लड़ने से रोकनेवाला बिल नहीं है और किसी अन्य दल को भी इसमें दिलचस्पी नहीं है ।
मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने जुलाई, 2019 में केंद्रीय कानून मंत्री को लिखे अपने पत्र में किसी पार्टी का पंजीकरण रद्द करने का भी अधिकार मांगा है । अभी चुनाव आयोग के पास सिर्फ पंजीकरण का अधिकार है, जो मामला 2018 में सुप्रीम कोर्ट में गूंजा । चुनाव आयोग ने दो सीटों से चुनाव लड़ने पर रोक लगाने का भी जिक्र किया ।