लोकसभा और विधान सभाओं का चुनाव एक साथ कराने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत भाजपा नेतृत्व के दवाब से चुनाव आयोग उबर नहीं पाया कि बीच ही में तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने विधान सभा भंग करके आयोग को नए फांस में डाल दिया ।

चुनाव आयोग को अब तेलंगाना विधान सभा का चुनाव मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम के साथ कराना होगा । तेलंगाना विधान सभा का कार्यकाल समाप्त होने में आठ महीने से भी ज्यादा समय बचे थे । इतना पहले विधान सभा भंग होने की स्थिति का निदान संविधान में नहीं है । संविधान की धारा-324 और जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के तमाम प्रावधानों को खंगालने पर भी इस सियासी संकट का हल नहीं मिलता । इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त(सीईसी) ओ पी रावत को मजबूरी में उन राज्यों के साथ तेलंगाना विधान सभा का भी चुनाव कराना होगा, जिनका कार्यकाल कायदे से नवंबर-दिसंबर में समाप्त हो रहा है ।

इस स्थिति के लिए चुनाव आयोग तैयार नहीं था । लेकिन जब सिर्फ निहित राजनीतिक स्वार्थवश तेलंगाना राष्ट्र समिति(टीआरएस) प्रमुख और तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने पैदा कर दी। इसलिए चुनाव आयोग को कहना पड़ा कि उन चार राज्यों के साथ चुनाव कराया जा सकता है, जहां साल के अंत में चुनाव होना तय है । चुनाव आयोग को सिर्फ सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2002 में इस संबंध में दिए गए दिशानिर्देश का पालन करना है । सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि सदन भंग होने की स्थिति में ‘पहले अवसर’ में ही चुनाव कराया जाना चाहिए, क्योंकि कार्यवाहक सरकार सत्ता में बने रहकर उसका लाभ नहीं उठा सकती । सीईसी ओ पी रावत ने कहा कि कोई भी विधान सभा भंग करके छह महीने तक कार्यवाहक सरकार के रूप में सत्ता पर काबीज नहीं रह सकता । यह बात सीईसी ने सात सितंबर को ही स्पष्ट कर दी, जब तेलंगाना से आयी समय पूर्व चुनाव की मांग पर दिल्ली में चुनाव आयोग की बैठक हुई । सीईसी ने कहा कि विधान सभा समय पूर्व भंग किए जाने की तारीख से छह महीने के अंदर हर हाल में चुनाव कराना है, ताकि नई विधान सभा गठित हो । सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देश के अनुसार चुनाव आयोग को विधान सभा भंग होने के बाद तत्काल चुनाव प्रक्रिया शुरू कर देनी है ।

तेलंगाना सरकार के अधीन कार्यरत मुख्य निर्वाचन अधिकारी रजत कुमार ने भी रिपोर्ट दे दी कि विधान सभा चुनाव इसी वर्ष कराया जा सकता है । ऐसा करना चुनाव आयोग की मजबूरी है और इस फांस में मुख्य चुनाव आयुक्त को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने अपने राजनीतिक स्वार्थवश डाला है । चुनाव आयोग कार्यकाल समाप्त होने तक चुनाव स्थगित नहीं कर सकता ।

चुनाव आयोग के पास धारा-324 के अंतर्गत संविधान से चुनाव से संबंधित संपूर्ण अधिकार प्राप्त हं । धारा-324 चुनाव आयोग को चुनावों पर नियंत्रण, निर्देश और अधीक्षण का पर्याप्त अधिकार देता है । चुनाव आयोग चाहे तो अपने अधिकारों का इस्तेमाल करके असमय चुनाव थोपने के लिए जवाब-तलब कर सकता है । संविधान किसी मुख्यमंत्री को मनमाने तरीके से किसी भी समय विधान सभा भंग करने की इजाजत नहीं देता । विशेष परिस्थिति में भी सिर्फ छह महीने का ही प्रावधान है, जब सत्तारूढ़ पार्टी अल्पमत में आ जाए और वैकल्पिक सरकार गठन का विकल्प न हो । तेलंगाना के मुख्यमंत्री पूर्ण बहुमत में थे और विधान सभा का कार्यकाल लोकसभा चुनाव के समय ही 2019 में समाप्त होनेवाला था । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी वही चाहते थे, जिसका अप्रत्यक्ष दवाब चुनाव आयोग पर लगातार बढ़ रहा था कि लोकसभा के साथ ही विधान सभाओं का चुनाव कराया जाय ।

सीईसी ओ पी रावत ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में तमाम दवाब चर्चाओं को विराम देने के लिए अपनी फांस बाहर निकाली कि मौजूदा परिस्थिति में साथ-साथ चुनाव का कोई चांस नहीं । इसके लिए संविधान संशोधन करने पड़ेंगे और कम-से-कम पांच धाराओं में फेरबदल किए बगैर एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते । विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस बलवीर सिंह चौहान अपना कार्यकाल समाप्त होते-होते 30 अगस्त को कह गए कि इस पर अभी और चर्चा की जरूरत है । जस्टिस चौहान ने भी कहा कि संविधान संशोधन किये बिना एक साथ चुनाव कराना संघीय ढांचे के साथ छेड़छाड़ होगा । उनका पूरा कार्यकाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनुसार एक साथ चुनाव कराने का माहौल बनाने में गुजरा । विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में धारा-172 में संशोधन पर ज्यादा जोर देते हुए कहा कि यह पहला कदम होगा जिससे 12 विधान सभाओं और एक केंद्र शासित प्रदेश(विधान सभा के साथ) लोकसभा चुनाव के साथ 2019 में कराया जा सकता है । धारा-172 विधान सभा का कार्यकाल कम करने या बढ़ाने से संबंधित है ।

प्रधानमंत्री ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की, उन्होंने एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान संशोधन का कभी संकेत नहीं दिया । वे सिर्फ चर्चा चाहते हैं, ताकि राज्य सरकारें स्वयं इस दिशा में पहल करें । बीच में ही तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने लोकसभा चुनाव होने तक विधान सभा का निर्धारित कार्यकाल पूरा होने देने के बजाए पहले ही भंग करके एक साथ सबको सकते में डाल दिया । प्रधानमंत्री, चुनाव आयोग समेत सभी पार्टियां तेलंगाना सरकार के इस प्रत्याशित कदम से भौंचक हैं । 30 अगस्त का विधि आयोग ने अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपी और छह सितंबर को तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने विधान सभा भंग करने की सिफारिश राज्यपाल ई एस एल नरसिंहन को भेज दी । खबर है कि उसके पहले चन्द्रशेखर राव ने दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री से मुलाकात की ।

चुनाव आयोग ने इस चुनौती को स्वीकारा और वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा के नेतृत्व में स्थिति का जायजा लेने चुनाव आयोग की टीम हैदराबाद भेजी गयी । टीम ने दो दिन में अधिकारियों और राजनीतिक दलों से विमर्श करके मुख्य चुनाव आयुक्त को 13 सितंबर को अपनी रिपोर्ट सौंप दी । चुनाव आयोग ने मुख्य रूप से मतदाता सूची में संशोधन और उसे अपडेट करने पर जोर दिया, जिसका आग्रह तेलंगाना के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने किया था । चुनाव आयोग की टीम ने कानून और व्यवस्था की स्थिति की समीक्षा के लिए अधिकारियों से विचार-विमर्श किया, जो एक सामान्य प्रक्रिया है । मगर तेलंगाना में चुनाव आयोग को असामान्य विधायी और संवैधानिक हालातों में चुनाव कराने पड़ रहे हैं । सीईसी को आशंका है कि अगर अन्य राज्यों में भी यह स्थिति पैदा हो गयी तो वे क्या करेंगे । आयोग ने अगर चुनाव टाला तो, ‘महात्वाकांक्षी’ मुख्यमंत्री सुप्रीम कोर्ट जाएंगे ही, इसलिए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के 2002 दिशानिर्देशों के आलोक में ही तेलंगाना में चुनाव प्रक्रिया तत्काल शुरू कर दी । अब मुश्किल है कि लोकसभा चुनाव करीब आने तक अगर सत्तारूढ़ क्षेत्रीय दलों के मंसूबे बढ़ गए तब तो कहीं धारा-83 और धारा-85 में संशोधन की नौबत न आ जाए । धारा-83 संसद के सदनों के कार्यकाल और धारा-85 राष्ट्रपति द्वारा लोकसभा भंग किए जाने से संबंधित है । तेलंगाना से नए संवैधानिक संकट आने शुरू हो गए हैं । चुनाव आयोग की टीम 11 सितंबर को जब हैदराबाद पहुंची उसी दिन मुख्य विपक्षी दल तेलुगू देसम पार्टी(टीडीपी), कांग्रेस और सीपीआई नेताओं ने राज्यपाल से मिलकर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग कर डाली । इन नेताओं ने राज्यपाल से कहा कि चन्द्रशेखर राव के कार्यवाहक मुख्यमंत्री रहते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव नहीं हो सकते । इन पार्टियों ने चन्द्रशेखर राव के खुलेआम किए गए दावे पर भी एतराज किया कि उन्होंने नवंबर में चुनाव कराने के लिए केंद्रीय चुनाव आयाग से विमर्श कर लिया था । टीडीपी के अनुसार यह लोकतंत्र के सिद्धांतों और संविधान के खिलाफ है । कांग्रेस की तेलंगाना यूनिट प्रमुख उत्तम कुमार रेड्डी और टीडीपी के प्रदेश यूनिट प्रमुख एल रमना सीपीआई के साथ मिलकर इसे चुनाव आयोग, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चन्द्रशेखर राव की मिलीभगत बताया । सबसे अहम् मुद्दा जो उन्होंने उठाया वो ये है कि चुनाव आयोग ने एक सितंबर को मतदाता सूची के पुनरीक्षण का एलान किया और पूरी प्रक्रिया चार जनवरी तक पूरी होनी है । 6 सितंबर को चन्द्रशेखर राव ने विधान सभा भंग कर दी और उसके तुरंत बाद चुनाव आयोग ने कहा कि नवंबर में अन्य राज्यों के साथ चुनाव कराया जा सकता है । भाजपा इस घमर्थन में शामिल नहीं है । भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने पहले से ही ‘तेलंगाना मिशन’ की योजना बना रखी है । इसके लिए उन्होंने 17 सितंबर का दिन चुना, जो हैदराबाद रियासत का ‘मुक्ति दिवस’ है । 1948 में इसी दिन हैदराबाद (निजाम) का भारत में विलय हुआ, जिसको ‘तेलंगाना मुक्ति दिवस’ के रूप में चन्द्रशेखर राव चार साल से मना रहे हैं । तेलंगाना राष्ट्र समिति के बैनर तले जनान्दोलन, आमरण अनशन करके चन्द्रशेखर राव ने तेलंगाना को राज्य का दर्जा दिलाया । तेलंगाना राज्य गठन के ‘हीरो’ के रूप में वे 2014 में राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने । 2014 में ही नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने और चन्द्रशेखर राव के मुख्यमंत्री बनने में थोड़े ही दिनों का फर्क है । नरेंद्र मोदी ने जब अपने राष्ट्रीय लहर में एक साथ चुनाव की बात की तो चन्द्रशेखर राव चुप रहे ।

चन्द्रशेखर राव ने असमय चुनाव तेलंगाना के मतदाताओं पर थोपा है । इनको चुनाव की इतनी उतावली है कि विधान सभा भंग करने के साथ ही पार्टी के 105 उम्मीदवारों का नाम तय होने का भी एलान कर दिया । विधान सभा में कुल सीटों की संख्या 117 है । मतदाताओं के बीच ‘राव लहर’ अभी तक बरकरार है या नहीं, यह तो चुनाव परिणाम से ही सामने आएगा । आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और तेलुगू देसम पार्टी सुप्रीमो चन्द्रबाबू नायडू अंत-अंत तक आंध्र प्रदेश से काटकर तेलंगाना गठन के विरोधी रहे । भाजपा गठजोड़ से अलग होने के बाद वे कांग्रेस की ओर मुखातिब हुए ।

चन्द्रशेखर राव का हराने के लिए कांग्रेस ने महागठजोड़ बना लिया । 35 वर्ष के इतिहास में पहलीबार टीडीपी ने तेलंगाना में कांग्रेस से हाथ मिलाया । ‘मोदी लहर’ बनाम ‘राव लहर’ के भंवर में फंस गया चुनाव आयोग । टीआरएस के खिलाफ एकजुट तमाम भाजपा विरोधी पार्टियों की हवा में भाजपा + टीआरएस गठजोड़ की भी चर्चा है ।

चुनाव आयोग की चिंता चुनाव के लिए फंड और पेपर ट्रेल युक्त ईवोएम मशीनों को लेकर है । राज्य निर्वाचन अधिकारी ने केंद्रीय चुनाव आयोग से कहा है कि कार्यवाहक सरकार को चुनाव तैयारी के लिए 170 करोड़ रूपये जारी करने कहे । टीआरएस सरकार जब बनी थी, तब उसके पास प्रचुर फंड था । आज बदहाली की हालत है । अभी सारा खर्च वोट केंद्रित है । देश के सारे अखबारों में पूरे पृष्ठ में लगातार छप रहे ‘उपलब्धि’ विज्ञापनों के बीच ही अचानक एक स्टेट बस के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से 57 यात्री मारे गये । राज्य पथ परिवहन निगम ने प्रत्येक मृतक परिवार को तीन लाख और राज्य सरकार ने 5-5 लाख रूपये मुआवजा देने का ऐलान किया । इतनी राशि आम तौर पर नहीं दी जाती । वोटर इससे कितना प्रभावित होते हैं, यह तो वक्त बताएगा ।

संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने और मतदाताओं को वोट डालने के प्रति रुचि जगाने के लिए भी बहुत खर्च करना पड़ता है । ऐस चुनाव में मतदाता क्यों रुचि लेंगे जो सिर्फ गद्दी से चिपके रहने के लिए असमय थोपा गया हो । ऐसे में अगर मतदाता ‘नोटा’(नन ऑफ दि एवभ ऊपर में से कोई नहीं) इस्तेमाल करें तो वह नकारात्मक कैसे कहलाएगा ।

सीईसी ओ पी रावत ने एक साथ चुनाव कराने की संभावना से अगस्त में उस समय इन्कार किया और उसके लिए संविधान संशोधन पर बल दिया, जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने लोकसभा-विधानसभा चुनाव साथ कराने के लिए विधि आयोग को पत्र लिखा । तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने बहुमत के बावजूद अगले चुनाव में इसे ‘बरकरार’ रखने की ललक में खुद ही धारा-356 का अपने मतलब से इस्तेमाल करके एक साथ की जगह अकेला चुनाव का रास्ता चुन लिया । चुनाव आयोग ने धारा-356 में भी संशोधन चाहा है, जिसके तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाता है । लेकिन उसमें भी विधान सभा भंग नहीं की जाती । निलंबित अवस्था में रखकर सरकार गठन का उपाय खोजने का विधान है ।