आपराधिक मुकदमे में फंसे उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार सरकार से मांगते-मांगते जब चुनाव आयोग थक गया तो सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा । एक याचिका की सुनवाई के दौरान शीर्ष कोर्ट ने उसी पक्ष को पकड़ा, जिसका हवाला देकर सरकार चुनाव आयोग को यह अधिकार देना नहीं चाहती । सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस रंगन गोगोई और जस्टिस नवीन सिंहा की पीठ ने सरकार का फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का निर्देश दिया है ताकि दागी राजनीतिज्ञों के मुकदमे जल्द निपटाए जाएं । केंद्र में सरकार चाहे भाजपा गठजोड़ की हो, या कांग्रेस गठजोड़ की, दागी उम्मीदवारों को टिकट देने के मामले में दोनों सरकारों की एक राय है । दोनों गठजोड़ सरकारें यह कहकर पल्ला झाड़ लेती हैं कि जबतक मुकदमे का फैसला न हो जाए, तबतक किसी उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से कैसे रोका जा सकता है । लगभग सभी राजनीतिक दलों के अनुसार ऐसा करना उम्मीदवार के ‘संवैधानिक’ अधिकार का उल्लंघन होगा । अभी तो चुनाव आयोग को सिर्फ सजायाफ्ता को ही चुनाव लड़ने से वंचित करने का अधिकार है और वो भी सुप्रीम कोर्ट का ही दिया हुआ है ।
इसका भरपूर फायदा उठाकर दागी उम्मीदवार डंडे की चोट पर अपने पर्चे में लंबित मुकदमे की जानकारी देकर चुनाव लड़ते हैं और जीतते हैं । सुप्रीम कोर्ट के ही आदेश के मुताबिक उम्मीदवारों को अपने विषय में सारी जानकारी पर्चे भरने के समय हलफनामे के साथ चुनाव आयोग को देनी है । आपराधिक मुकदमे की जानकारी सार्वजनिक करने से उल्टे दागी उम्मीदवारों की दादागिरी का परचम लहराता है । क्योंकि चुनाव आयोग के अपने ही हाथ बंधे हैं, तो दागियों का हाथ क्या बांधेगा ।
चुनाव आयोग कई वर्षों से दागियों के पर्चे रद्द करने का अधिकार सरकार से मांग रहा है । चुनाव आयोग का मानना है कि आपराधिक मुकदमे में शामिल होना ही काफी है और आरोप पत्र दायर होते ही वैसे उम्मीदवार को टिकट न दिया जाए । अगर वैसे उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग के पास होता तो दागी लोग संसद या विधान सभा पहुंच ही न पाते । चुनाव आयोग ने सभी दलों से बार-बार दागियों को टिकट न देने कहा । अमूमन दो दशकों से चुनाव आयोग का यह आग्रह सभी दल ठुकरा रहे हैं ।
आज सुप्रीम कोर्ट को इस बात का जिक्र करना पड़ा है कि 2014 चुनावों में पर्चे दायर करते समय ‘ला मेकरों’(कानून बनानेवालों) के खिलाफ 1581 आपराधिक मुकदमे लंबित थे । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने सरकार से पूछा है कि इन मुकदमों की क्या स्थिति है, इसकी जानकारी दे । सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की तरह सरकार से ऐसा कानून बनाने सीधे तौर पर तो सरकार से नहीं कहा है ताकि दागी उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने से रोका जा सके । शायद सुप्रीम कोर्ट जज जानते हैं कि सत्तारूढ़ पार्टी न तो स्वयं ऐसा करेगी, न ही गठजोड़ घटक के कोई दल या विपक्षी पार्टी ऐसा चाहेगी । लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्देश से यह बात खुलकर सामने आ गयी है कि सरकार दागी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से वंचित करने के पक्ष में नहीं है और इसलिए उनके मुकदमे के शीघ्र निष्पादन में भी कोई दिलचस्पी नहीं है । सभी पार्टियां कोर्ट के ही मत्थे खेल जाती हैं कि लंबित मुकदमे के लिए कोर्ट जिम्मेदार है । इसका खामियाजा उम्मीदवार क्यों भुगतें ।
इसलिए सुप्रीम कोर्ट पीठ ने फास्ट ट्रैक कोर्ट गठित करने का निर्देश देने के साथ-साथ सरकार की उदासीनता को भी आड़े हाथों लिया है । सुप्रीम कोर्ट के ही 10 मार्च, 2014 के आदेश का हवाला देते हुए जस्टिस गोगोई और जस्टिस सिन्हा ने सरकार से पूछा है कि 2014 चुनावों में संसद सदस्यों द्वारा पर्चे में दिए गए विवरण के 1581 मुकदमे में से कितने एक साल की समय सीमा के अंदर निपटाए गए । 10 मार्च, 2014 के आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संसद सदस्यों / विधायकों(ला मेकर) के खिलाफ चल रहे मुकदमे के निष्पादन में तेजी लायी जाए और एक साल के अंदर निपटाए जायें ।
ताजा निर्देश सुप्रीम कोर्ट पीठ ने भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय की याचिका पर जारी किया है, जिसमें दागी राजनीतिज्ञों के पूरी उम्र चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग की गयी है ।
केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल(एएसजी) आत्माराम नाडकर्णी ने तो ऐसी दलील रखी मानो चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट से भी ज्यादा केंद्र का ही दागी उम्मीदवारों से चुनाव को मुक्त करने की बेताबी हो । एएसजी ने कहा कि केंद्र राजनीतिज्ञों के खिलाफ चल रहे मुकदमे जल्दी निपटाने के लिए विशेष कोर्ट बनाने के पक्ष में है, लेकिन साथ में यह भी जोड़ दिया कि ऐसे कोर्टों के गठन में प्रमुख जिम्मेदारी राज्यों की है ।
इसी पर जज ने एएसजी को आड़े हाथों लिया । जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा - ‘आप कहते हैं कि फास्ट ट्रैक कोर्ट के खिलाफ नहीं हैं और फिर आप ही कह रहे हैं कि राज्यों को गठित करना है । एक तरफ तो आप प्रतिबद्धता दिखा रहे हैं और दूसरी ओर हाथ पीछे खींच रहे हैं । सुप्रीम कोर्ट पीठ ने यह भी जानना चाहा कि 2014 से 2017 के बीच अगर कोई नया आपराधिक मामला किसी मौजूदा या पूर्व संसद सदस्य / विधायक के खिलाफ दर्ज हुआ है तो उसका विवरण दिया जाए । 10 मार्च, 2014 के सुप्रीम कोर्ट आदेश के आलोक में अभी तक कितने सांसद विधायक बरी हुए, और कितने के खिलाफ दोष साबित हुआ, उसका भी ब्योरा केंद्र सरकार को सुप्रीम कोर्ट पीठ के सामने 13 दिसंबर को प्रस्तुत करना है ।
जहां तक दागियों के आजीवन चुनाव लड़ने से वंचित रखने की बात है, एएसजी ने यह कहकर पल्ला छुड़ाया कि सरकार को अभी इस पर अपना रूख तय करना है । चुनाव आयोग ने भी सुप्रीम कोर्ट नोटिस के जवाब में कहा कि आयोग दोषी साबित हो चुके दागियों के उम्र पर चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में है और सरकार को यह सिफारिश भेजी जा चुकी है ।
सरकार की ‘सहूलियत’ के लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने सरकार के वकील ने विशेष कोर्ट को सीबीआई जैसे कोर्ट के साथ जोड़ने का सुझाव दिया, जिसे जजों ने नहीं माना ।
चुनाव सुधार की बात चुनाव आयोग के सुझावों पर कई वर्षों से चल रही है । जिसमें पहले नंबर पर है दागियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए वैसे उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार । संविधान की धारा-324 में संशोधन करके सरकार को यह अधिकार चुनाव आयोग को देना है, जो किसी पार्टी के एजेंडे में नहीं है । धारा-324 में ही चुनाव आयोग के चुनाव से संबंधित सभी अधिकारों का जिक्र है ।
चुनाव सुधार की बात सिर्फ सेमीनारों, गोष्ठियों में भाषणों और सुप्रीम कोर्ट से मिलने वाली नोटिसों के जवाब तक सीमित है । 31 अक्टूबर को एक ओर सुप्रीम कोर्ट में दागियों के लंबित मुकदमे पर जवाब तैयार हो रहा था और उधर हिमाचल प्रदेश से दागियों के हलफनामे की रिपोर्ट आ रही थी । एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(एडीआर) ने हिमाचल प्रदेश चुनाव में 338 उम्मीदवारों द्वारा दायर हलफनामे के विश्लेषण के बाद पाया कि 68 भाजपा उम्मीदवारों में से 23 के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रह हैं, जिनमें से 9 के खिलाफ हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे गंभीर मामले हैं । सबसे ज्यादा दागी उम्मीदवार भाजपा के हैं । कांग्रेस के 68 उम्मीदवारों में से 6 आपराधिक मुकदमे में फंसे हैं ।
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को 31 अक्टूबर को ही 9 और 14 दिसंबर को होनेवाले गुजरात चुनाव के लिए निर्देश दिया कि ऐसे किसी अधिकारी को चुनाव डयूटी में न लगाया जाए, जिसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही है । गुजरात में अभी नामांकन में देर है । लेकिन 150 विधायकों द्वारा 2012 चुनाव में दायर हलफनामे खंगालने पर पता चला कि उनमें से 49 या 31% विधायक आपराधिक मुकदमे में फंसे थे ।
‘विशेषाधिकार’ से लैस ये संसद सदस्य सजा काटते हुए जेल से पर्चे दायर करते थे और चुनाव आयोग उसे रद्द नहीं कर सकता था, जबकि जेल में रहकर कोई वोट नहीं डाल सकता । सुप्रीम कोर्ट ने 10 जुलाई, 2013 के अपने आदेश में जनप्रतिनिधित्व कानून की वो ‘विशेषाधिकार’ धारा 8(4) निरस्त कर दी, जिसके तहत संसद सदस्य खुद को ‘कानून से ऊपर’ मानते थे । सुप्रीम कोर्ट ये भी कह दिया कि संसद को ऐसा कानून बनाने का अधिकार संविधान नहीं देता । ऐसी अफरातफरी मची कि सुप्रीम कोर्ट आदेश के काट में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने अध्यादेश का मसौदा तैयार कर लिया । ‘लक्ष्मण रेखा’ उल्लंघन की बात उठ गयी । शुक्र है विवेकी राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी का, जिन्होंने वैसे अध्यादेश के औचित्य पर सवाल उठा दिया । सुप्रीम कोर्ट आदेश के तीन महीने बाद राष्ट्रपति ने 26 सितंबर को गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कानून मंत्री कपिल सिब्बल और संसदीय कार्यमंत्री कमलनाथ को बुलाकर पूछा कि दागी सांसदों के बचाव में ऐसा अध्यादेश लाने की जरूरत क्या है? मनमोहन सिंह सरकार ने अध्यादेश वापस ले लिया । उसके बाद राहुल गांधी ने अध्यादेश को ‘कूड़ा’ बताकर उसकी प्रति फाड़ी ।
कांग्रेस सांसद ई. एम. सुदर्शन नचियप्पन की अध्यक्षता में 2008 में चुनाव सुधार पर विचार करने के लिए बनी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि आपराधिक मुकदमे में फंसे उम्मीदवारों के पर्चे रद्द करने का अधिकार चुनाव आयोग द्वारा मांगना और ऐसे उम्मीदवारों को टिकट न देने का सुझाव ‘अव्यावहारिक’ है ।
नरेंद्र मोदी सरकार में भी ‘सुधार विशेषज्ञ’ सुदर्शन ही चुनाव सुधार फाइल देख रहे हैं । सुदर्शन नचियप्पन अभी जन शिकायत, कानून और न्याय मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति के अध्यक्ष हैं ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव सुधार एजेंडे में लोकसभा विधान सभा चुनाव साथ कराने को छोड़ कुछ भी नहीं है । प्रधानमंत्री को दागियों और करोड़पतियों के चुनाव लड़ने पर कोई एतराज नहीं है । चुनाव लड़नेवाले नेताओं के हलफनामे में आय का स्त्रोत अनिवार्य करने के लिए दायर याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट विचार कर रहा है ।
अभी सुप्रीम कोर्ट ने 2014 लोकसभा चुनाव में दायर पर्चे से शुरू किया है, जबकि 2009 लोकसभा चुनाव में 150 दागी जीते, जिनमें से 73 गंभीर अपराधों के आरोपी थे । 2004 में लोकसभा के 543 सदस्यों में 128 दागी जीते । एडीआर और नेशनल इलेक्शन वाच के सौजन्य से आकड़ा मिला है । पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जे. एम. लिंगदोह समेत कई प्रबुद्ध नागरिकों ने 2011 में एक याचिका में सुप्रीम कोर्ट को यह जानकारी दी और दागियों के खिलाफ चल रहे मुकदमे फास्ट ट्रैक और विशेष अदालतों में निपटाने का आग्रह किया ।