महाराष्ट्र और हरियाणा विधान सभाओं के चुनाव के साथ विभिन्न राज्यों में उपचुनावों के लिए हुए मतदान की पहली रिपोर्ट है, मतदाताओं का कम उत्साह । इक्का-दुक्का सीटों को छोड़ दें तो कुल मिलाकर सभी सीटों पर मतदाताओं की उदासीनता देखने को मिली । असम और अरूणाचल प्रदेश को छोड़ दें तो किसी भी राज्य के उपचुनाव में मतदान का प्रतिशत 50 से 60 फीसदी के बीच ही अटका रहा ।
हरियाणा में 66 प्रतिशत और महाराष्ट्र में मात्र 59 प्रतिशत वोट पड़े । इसका मतलब है, तकरीबन आधे मतदाताओं ने मताधिकार का इस्तेमाल करने में रुचि नहीं ली। इसी के आधार पर एग्जिट पोल में 22 अक्टूबर को ही महाराष्ट्र और हरियाणा में दो तिहाई बहुमत से भाजपा सरकार दोबारा बनने के संकेत उछाल दिए गए । सारे चुनाव एक ही दिन 21 अक्टूबर को कराए गए । इससे जाहिर होता है कि वोटों की गिनती का रुझान दखने के लिए व्यग्र उम्मीदवारों और एग्जिट पोल का सर्वे करनेवाली टीवी चैनलों ने मतदाताओं का रुझान परखने का प्रयास नहीं किया । हरियाणा और महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव परिणाम इसका प्रमाण है । उससे खंडित जनादेश के साथ-साथ यह भी पता चला कि राजनीतिक पार्टियों ने वही उम्मीदवार और मुद्दे मतदाताओं के बीच थोप, जो उन्हें अपने सियासी हित में लगे । मतदाता क्या चाहते हैं, कैसे उम्ममीदवार चाहते हैं, यह ज्यादातर उम्मीदवारों के एजेंडे में नहीं था । परिणाम मतदाताओं के कम उत्साह के रूप में मतदान के दिन ही सामने आ गया । यह सिललिसा काफी समय से चला आ रहा है जिसका सबूत है, पिछले चुनाव के मुकाबले इस चुनाव में वोटों का प्रतिशत कम होना ।
राजनीतिक दलों के पास जिताऊ उम्मीदवार तय करने के लिए मात्र तीन आधार हैं - पहला, धांसू नेता के परिवार का होना । दूसरा, करोड़पति या इलाके का रौबिन हुड अपराधी ‘बैग्राउंड’ का होना और तीसरा, किसी जनपतिनिधि की हत्या या मौत से उपजी सहानुभूति लहर । लगभग स्थापित हो चुकी इस प्रवृत्ति से मतदाताओं की ऊब और अरुचि है वोटों का रुझान ।
बिहार की समस्तीपुर लोकसभा सीट लोकजनशक्ति पार्टी के रामचन्द्र पासवान की मौत से खाली हुई थी । उनके पुत्र प्रिंस राज वहां से एक लाख वोटों के अंतर से जीते, जहां मात्र 45% वोट पड़े । इसका मतलब आधे से ज्यादा मतदाताओं ने वोट नहीं डाला । दूसरा उदाहरण महाराष्ट्र की लातूर(ग्रामीण) विधान सभा सीट का है, जहां 27500 मतदाताओं ने ‘नोटा’(उपरोक्त में से कोई नहीं) का इस्तेमाल किया । इसका तात्पर्य ये कि कोई भी उम्मीदवार मतदाताओं को जनप्रतिनिधि बनने लायक नहीं लगा । इसलिए मताधिकार का दुरूपयोग नहीं करके यह बताया कि ऐसी स्थिति में ‘नोटा’ ही एक मात्र विकल्प बचा । 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को ईवीएम(इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन) में ‘नोटा’ बटन उपलब्ध कराने का निर्देश दिया । गणमान्य नागरिकों की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट को ऐसा निर्देश चुनाव आयोग को देना पड़ा । ये नौबत इसलिए आयी, क्योंकि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट के सामने हाथ खड़े कर दिए कि अपराधी बैग्राउंड वाले उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने का अधिकार उसके पास नहीं है ।
फिलहाल महाराष्ट्र की ही बात करें, जहां, 2014 विधान सभा चुनाव में पहली बार ‘नोटा’ का इस्तेमाल हुआ । कांदीवली में 4653 और जोगेश्वरी(पूर्व) में 2938 वोट ‘नोटा’ को गया ।
अभी लातूर से जिला निर्वाचन अधिकारियों के अचरज की रिपोर्ट है । लेकिन एक अधिकारी के अनुसार मतदाता लातूर सीट भाजपा को मिलने की उम्मीद कर रह थे । गठजोड़ के सीट प्रबंधन में शिवसेना को दे दी गयी । इसके विरोध में भाजपा कार्यकर्ताओं ने मतदाताओं के बीच पर्चे बांट कर ‘नोटा’ इस्तेमाल करने का आग्रह किया । महाराष्ट्र की ही सतारा लोकसभा सीट के कुछ बूथों पर मतदाता इसलिए चिढ़ गये कि ईवीएम में जो भी बटन में वे दबा रहे थे, वो वोट भाजपा के पक्ष में जा रहा था, वहां 60 प्रतिशत से ज्यादा वोट पड़े, राष्ट्रवाटी कांग्रेस पार्टी उम्मीदवार जीते ।
18 राज्यों में दो लोकसभा सीटों के अलावे 51 विधान सभा सीटों के लिए भी 21 अक्टूबर को ही वोट पड़े । उसमें सबसे बड राज्य यूपी की 11 विधान सभा सीटों पर मात्र 47.05 प्रतिशत वोट पड़े । बिहार की पांच विधान सभा सीटों पर 49.26 फीसदी वोट डले ।
महाराष्ट्र और हरियाणा के मतदाताओं ने साबित कर दिए कि उन्हें दिल्ली से लाए गए मुद्दे पर वोट डालने में कोई रुचि नहीं । स्टार चुनाव प्रचारक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तक के सिर्फ अनुच्छेद 370 खत्म करने के ऐतिहासिक फैसले की रट से अधिकांश सीटों पर वोट रुझान प्रभावित नहीं हुआ । किसी भी राष्ट्रीय नेता ने उनके स्थानीय मुद्दे की चर्चा नहीं की और कश्मीर मुद्दा उनके लिए ज्यादा माएने नहीं रखता । भाजपा नेताओं ने इसे समझा, लेकिन मतगणना की अंतिम रिपोर्ट आ जाने के बाद ।
हालिया चुनाव परिणाम बता रहा है कि मतदाता जागरूक है, उनके पास मताधिकार का इस्तेमाल करने के लिए वांछित विकल्प नहीं है । प्रबुद्ध मतदाता तो काफी समय से रुचि नहीं ले रहे । अब कम पढ़े-लिखे वोटर भी पैसा, उपहार, शराब, मुर्गा पर नहीं, मुद्दे पर वोट डालने में भरोसा करते हैं । मतदाताओं के रुझान में अरुचि पैदा करने में चुनाव आयोग भी साझीदार हो गया है । इस बीच चुनाव आयोग के राजनीतिक प्रभाव में आने के मामले सुर्खियों में रहे, जिससे निष्पक्ष और स्वतंत्र होने की उम्मीद की जाती है ।
सिक्किम के मुख्यमंत्री प्रेम सिंह तमांग भ्रष्टाचार निरोध एक्ट के अंतर्गत एक साल कैद की सजा काट चुके हैं । उन्हें 2024 तक विधान सभा चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित किया जा चुका था । तमांग की यह अवधि कम करके चुनाव आयोग ने उन्हें 21 अक्टूबर को चुनाव लड़ने की इजाजत दे दी, जब तमांग का भाजपा से गठजोड़ हो गया । सिक्किम विधान सभा का चुनाव लोकसभा के साथ मई में कराया गया । प्रेमसिंह तमांग की पार्टी सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा पवन कुमार चामलिंग की पार्टी सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट को हराने में सफल हुई । चामलिंग को छठी बार मुख्यमंत्री बनने से वंचित करनेवाले तमांग को राज्यपाल गंगा प्रसाद ने ‘माफ’ कर दिया और मुख्यमंत्री पद की शपथ 27 मई को दिला दी । जबकि तमांग ने विधान सभा चुनाव नहीं लड़ा था । चामलिंग मंत्रिमंडल में मंत्री रहे तमांग घोटाला के अपराध में हुई एक साल की सजा के निचली कोर्ट के आदेश के खिलाफ सिक्किम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक गए । शीर्ष कोर्ट ने भी तमांग की सजा बरकरार रखी और जेल काटनी पड़ी । 10 अगस्त, 2018 को वे जेल से छूटे । तमांग के चुनाव लड़ने से अयोग्यता की मियाद 10 अगस्त, 2024 तक थी, जिसे चुनाव आयोग ने छह साल से घटाकर एक साल एक महीना कर दिया । चुनाव आयोग ने दावा किया कि जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 के अनुच्छेद 11 के तहत उसे ऐसा करने का अधिकार है । जिस भ्रष्टाचार निरोध कानून के तहत तमांग को सजा हुई, वो 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी शासनकाल के समय बना । लेकिन चुनाव आयोग ने अपने ‘अधिकार’ का इस्तेमाल ठीक उसी वक्त किया, जब तमांग की पार्टी का 21 अक्टूबर को होनेवाले उपचुनाव के लिए भाजपा से गठजोड़ हो गया । छह महीने के अंदर मुख्यमंत्री तमांग को विधान सभा सदस्य बनना था । उसके लिए उनकी अयोग्यता अवधि सीधे पांच साल घटा दी गयी । ताज्जुब है कि आम चुनाव से पहले तमांग खुद को अयोग्य मान रहे थे और उन्होंने चुनाव आयोग से अनुच्छेद 11 के इस्तेमाल की अपील नहीं की । चुनाव आयोग के फैसले को लेकर सवाल उठे हुए हैं । दिल्ली हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी गयी है ।
हालिया विधान सभा चुनाव के समय ही जम्मू व कश्मीर में प्रखंड विकास परिषद के चुनाव हुए, जिधर लोगों का ध्यान कम गया । लेकिन उसमें मतदाताओं का जो रुझान देखने को मिला, वो भाजपा, कांग्रेस समेत सभी दलों और जम्मू व कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी आंखें खोलने लायक हैं । मतदाताओं ने सभी दलों को सबक दिया कि ‘हम दलों के हिसाब से नहीं, अपने हिसाब से वोट देते हैं ।’ 24 अक्टूबर को हुए चुनाव में लगभग सौ फीसदी अर्थात् 98.3% रिकॉर्ड वोट पड़ने का रिकार्ड है । कांग्रेस, नेशनल कान्फ्रेंस, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी और अन्य क्षेत्रीय कश्मीरी पार्टियों ने बायकाट किया । राज्य के 22 जिलों में 316 प्रखंड विकास परिषदों में से 280 के लिए मतदान हुए । श्रीनगर में तो 100% और अन्य जिलां मं भी 99 प्रतिशत वोट पड । सिर्फ भाजपा और पैंथर्स पार्टी ने मतदान में हिस्सा लिया । प्रखंड विकास परिषद् अध्यक्ष के 217 पदों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने कब्जा जमाया । भाजपा को मात्र 81 पदों पर जीत मिली । राज्य में ऐसा पहला चुनाव था । वोटर पंच और सरपंच थे । सितंबर, 2018 में भाजपा ने पंचायत और नगरपालिका का चुनाव कराया था । उसका भी सभी दलों ने यह कहकर बायकाट किया कि अनुच्छेद 370 पर अपना रूख पहले भाजपा स्पष्ट करे । उसमें भी सिर्फ भाजपा ने हिस्सा लिया और अभी अनुच्छेद 370 हटने के बाद हुए चुनाव में भाजपा का सफाया हुआ । परिणाम घोषित होते ही राज्यपाल सत्यपाल मलिक को हटा दिया गया ।
जम्मू व कश्मीर के मतदाता विधान सभा चुनाव लोकसभा के साथ चाहते थे । चुनाव आयोग और सभी दल इसके लिए तैयार थे । सिर्फ भाजपा नहीं चाहती थी । अपनी सुविधा से विभाजित प्रदेश में भाजपा जब भी चुनाव कराए और उसमें मतदाता कम रुचि लें तो उसे क्या माना जाएगा । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साथ चुनाव की दुहाई यह कहकर देते हैं कि बार-बार चुनाव से ‘जनहित’ के कार्य बाधित होते हैं, मगर चुनाव आयोग को भाजपा हित में टुकड़ों में चुनाव कराना पड़ रहा है । इससे भी मतदाताओं में नाराजगी हो सकती है । अभी दो विधान सभाओं और कई उपचुनावों का मतदान संपन्न होने के बाद पश्चिम बंगाल की तीन विधान सभा सीटों पर उपचुनाव कराने का क्या अर्थ है?